माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १७२ ) माधवनिदान ।
( १७२ ) माधवनिदान ।
अथ गुल्मनिदानम् ।
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दुष्टा वातादयोऽत्यर्थं मिथ्याहारविहारतः ।
कुर्वन्ति पञ्चधा गुल्मं कोष्ठान्तर्ग्रन्थिरूपिणम् ॥
तस्य पञ्चविधं स्थानं पार्श्वहृन्नाभिबस्तयः ॥ १ ॥
मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करनेसे अत्यन्त दुष्ट भये वातादि दोष कोष्ठ
( पेट ) में ग्रंथरूप ( गांठ ) पांच प्रकारका गुल्मरोग उत्पन्न करे हैं। उस गुल्मरोगके
पांच स्थान हैं, दोनों पसवाडे, हृदय, नाभि और बस्ति ॥
गुल्मके सामान्यरूप ।
हृन्नाभ्योरन्तरे ग्रन्थिः सञ्चारी यदि वाऽचलः ।
वृत्तश्चयोपचयवान्स गुल्म इति कीर्तितः ॥ २ ॥
हृदय और नाभि तथा वस्ती ( मूत्रस्थान ) इनमें चलायमान अथवा निश्चल,
गोल कभी घटे कभी बढे ऐसी ग्रन्थि ( गांठ ) हो उसको गुल्मं ( गोला ) का रोग
कहते हैं । इस श्लोकमें नाभिशब्दसे बस्तीका ग्रहण करा है ॥
गुल्मकी सम्प्राप्ति ।
स व्यस्तैर्जायते दोषैः समस्तैरपि चोच्छ्रितैः ।
पुरुषाणां तथा स्त्रीणां ज्ञेयो रक्तेन चापरः ॥ ३ ॥
कुपित भये दोषोंसे पृथक् २ तीन और सब दोष मिलकर एक ये चार प्रकारके
गुल्म पुरुषोंके होते हैं और स्त्रियोंके रक्त ( रज ) के दोषसे एक प्रकारका गुल्म होय
है, परन्तु प्रथम जो लिख आये हैं कि, गुल्मरोग पांच प्रकारका है सो इसका निश्चय
नहीं है क्योंकि, रक्तगुल्म स्त्रियोंके होता है, पुरुषोंके नहीं होता, धातुरूप रक्तज
गुल्म जो है सो स्त्री पुरुष दोनोंके होता है, यह क्षीरपाणिका मत है। पांच प्रका-
रका गुल्म है इसपर बहुत शास्त्रार्थ और मतमतांतर हैं जिनको देखनेकी इच्छा हो
सो मधुकोश और आतंकदर्पण टीकामें देख लेवें ॥
गुल्मके पूर्वरूप ।
उद्गारबाहुल्यपुरीषबन्धतृप्त्यक्षमत्वान्त्रनिकूजनानि ।
आटोपमाध्मानमपक्तिशक्तिरासन्नगुल्मस्य वदन्ति चिह्नम् ॥ ४ ॥
१ सपिण्डितदोषो गुडकेन मीयत इति गुल्मः । २ क्षीरपाणिः- “स्त्रीणामार्तवजो गुल्मो न
पुंसामुपजायते । अन्यस्त्वसृग्भवो गुल्मः स्त्रीणां पुंसां च जायते ॥”
भाषाटीकासमेत । ( १७३ )
डकार बहुत आवै, मलका अवरोध होय, अन्नमें अरुचि होय, सामर्थ्यका नाश
होना, आंत बोले, पेटमें गुडगुड शब्द होय और अफरा होय, मंदाग्नि होना
ये लक्षण होयं तो जानना कि, गुल्म ( गोला ) रोग शीघ्र प्रगट होना चाहता है
अर्थात् ये गुल्मके पूर्वरूपके लक्षण हैं ॥
गुल्मके साधारण लक्षण ।
अरुचिः कृच्छ्रविण्मूत्रं वातेनान्त्रविकूजनम् ।
आनाहश्चोर्ध्ववातत्वं सर्वगुल्मेषु लक्षयेत् ॥ ५ ॥
अरुचि, मल-मूत्र कष्टसे उतरें, वादीसे आंत बोले, पेट फूल आवे, ऊर्ध्ववात
होय ये लक्षण सब गुल्मोंमें होते हैं । सब गुल्मरोगमें वात कारण है सो चरक और
सुश्रुतमें भी लिखा है ॥
वातगुल्मके कारण और लक्षण ।
रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टनं वेगविनिग्रहश्च ।
शोकाभिघातोऽतिमलक्षयश्च निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ६ ॥
यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विद्वातसङ्गं गलवक्त्रशोषम् ।
श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ ७॥
करोति जीर्णेऽप्यधिकं च कोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति पश्चात् ।
वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ८॥
रूखा, विषम और अतिमात्र ऐसे अन्नपान सेवन करनेसे, बलवान् पुरुषसे
लडना, मल मूत्र आदि वेगोंके धारण करनेसे, शोक और अभिघात ( लकडी
आदिकी चोट ) से, विरेचन आदिसे, मलका क्षय करना, उपवास ये सब वात-
गुल्मके कारण हैं । जो गुल्म कभी नाभि, बस्ती, पसवाडेमें चला जाय तथा कभी
लंबा कभी मोटा गोल अथवा छोटा होय, तथा उसमें पीडा कभी थोडी कभी
बहुत होय, तोद भेद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ) होय अथवा अनेक प्रकारकी
पीडा होय, मलकी और अधोवायुकी अच्छी रीतिसे प्रवृत्ति होय नहीं, गला और
मुख सूखै, शरीरका वर्ण नीला अथवा लाल होय, शीतज्वर, हृदय, कूख, पसवाडे,
कंधा और मस्तक इनमें पीडा होय और गोला जीर्ण होनेपर अधिक कोप करे
१ गुल्मिनामनिलशांतिरुपायैः सर्वशो विविधदाचरणीया । मारुतेऽत्र विजितेऽन्यमुदीर्णं
दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ इति । २ कुपिताऽनिलमूलत्वादगूढमूलोदयादपि । गुल्मवद्वा
विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ इति ।