माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ३४१ )
अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।
विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे ।
मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च ॥ १ ॥
जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाच्च शृणु ताः पृथक् ।
रोगसंग्रहमें योनिके बीस रोग हैं वह मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करके
तथा दुष्ट आर्त्तवसे, बीजदोषसे और दैवकी इच्छासे स्त्रियोंके होते हैं, उनके लक्षण
पृथक् पृथक् कहताहूं सुनो ॥
सा फेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुञ्चति ॥ २ ॥
वन्ध्यां नष्टार्तवां विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम् ।
परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मेण रुग्भृशम् ॥ ३ ॥
वातला कर्कशा स्तब्धा शूलनिस्तोदपीडिता ।
चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥ ४ ॥
जिस योनिसे झाग मिला रुधिर बडे कष्टसे बहे उसको उदावर्त्ता योनि कहते हैं
और जिसका आर्त्तव नष्ट हो उसको वंध्या कहते हैं, जिसके निरंतर पीडा हो उसको
विप्लुता कहते हैं, जिसके मैथुन करनेमें अत्यन्त पीडा हो उसको परिप्लुता कहते हैं,
जो योनि कठोर स्तब्ध होकर शूलतोदयुक्त होवे उसको वातला कहते हैं । स्वस्व-
लक्षणसंयुक्ता पित्तला श्लेष्मला योनि भी जाननी चाहिये और पहले जो चार योनि
(उदावर्त्ता, वंध्या, विप्लुता, परिप्लुता) कही हैं इनमें वातकी पीडा होती है और
वातलामें वातकी पीडा विशेष होती है ॥
सदाहं क्षीयते रक्तं यस्याः सा लोहितक्षया ।
सवातमुद्विरेद्बीजं वामिनी रजसान्वितम् ॥ ५ ॥
प्रस्रंसिनी भ्रंशते तु क्षोभिता दुष्प्रजायिनी ।
स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रघ्नी रक्तसंक्षयात् ॥ ६ ॥
अत्यर्थं पित्तला योनिर्दाहपाकज्वरान्विता ।
चतसृष्वपि चाद्यासु पित्तलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ ७ ॥