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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१५४. उरग जातक

१५२ [ २.१.१५४
१५४. उरग जातक
"उधूरगान पवरो पविट्ठो . . " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय श्रेणियों¹ के सघ कलह के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कोशल राजा के दो सेवक श्रेणियों के प्रधान थे। वे दोनो महामात्य एक
दूसरे को जहाँ कहीं देखते झगडा करते। उनके वैर की बात सारे नगर में
फैल गई। न राजा और न उनके रिश्तेदार तथा मित्र उनका झगडा मिटा
सके।
एक दिन प्रातःकाल शास्ता ने उन आदमियो का विचार करते हुए जिनके
ज्ञानी होने की संभावना थी इन दोनो के श्रोतापन्न होने की संभावना को देखा।
किसी एक दिन वे श्रावस्ती मे भिक्षाचार करते हुए उनमें से एक के घर के
दरवाजे पर खडे हुए।
उसने बाहर निकल पात्र ले शास्ता को घर के अन्दर ले जा आसन बिछा
कर बिठाया। शास्ता ने बैठते ही उसे मैत्री भावना की महिमा समझाई
जब उसका चित्त कुछ कोमल हुआ देखा तो आर्य्य-सत्यों को प्रकाशित
किया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हुआ।
शास्ता ने जब देखा कि वह श्रोतापन्न हो गया तो उसी के हाथ में पात्र
रहने देकर उसे साथ ले दूसरे के घर पर पहुँचे। उसने भी बाहर निकल शास्ता
को प्रणाम कर 'भन्ते ! घर में प्रवेश करें' कह घर में ले जाकर बिठाया।
—————
¹ शिल्पियों के संघ।

उरग ] १५३

दूसरा भी पात्र लिए हुए शास्ता के साथ ही अन्दर गया। शास्ता ने उसे मैत्री-
भावना के ग्यारह लाभ¹ बतलाए। जब जाना कि उसका चित्त कोमल पड
गया तो आर्य-सत्यो को प्रकाशित किया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर
यह भी श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
वे दोनो श्रोतापन्न हो परस्पर अपने अपने दोषो को स्वीकार कर, उनके
लिए क्षमा मांग एक दूसरे के साथ मिलकर आनन्दपूर्वक रहनेवाले, एक ही
विचार के हो गए। उसी दिन भगवान् के सामने बैठकर उन्होने इकट्ठे
खाया।
शास्ता भोजन-कृत्य समाप्त करके विहार गए। वे भी बहुत सा माला-
गन्ध-लेप आदि सुगन्धित वस्तुएँ तथा घी, शहद और शक्कर आदि लेकर शास्ता
के साथ ही घर से निकले। भिक्षु-सघ ने शास्ता को आदर प्रदर्शित किया।
बुद्ध उपदेश देकर गन्ध-कुटी मे प्रविष्ट हुए।
भिक्षुओ ने सायकाल धर्म-सभा मे बातचीत चलाई। 'आयुष्मानो !
शास्ता अविनयी को विनयी बनानेवाले हैं। जिन दो अमात्यो का चिर काल
तक प्रयत्न करके भी न राजा और न उनके रिश्तेदार वा सम्बन्धी मेल करा सके
तथागत ने उनको एक ही दिन मे विनीत कर दिया।' शास्ता ने आकर पूछा-
'भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?' 'अमुक बात चीत' कहने पर
तथागत ने कहा—'भिक्षुओ मैने केवल अभी इन दो जनो का मेल नही कराया,
पहले भी कराया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही-

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी
के उत्सव की घोषणा होने पर वडा मेला हुआ। बहुत से मनुष्य, देव, नाग
तथा गरुड आदि समज्‍ज² देखने के लिए इकट्ठे हुए।
वहाँ एक जगह एक नाग और गरुड मेला देखते हुए इकट्ठे खडे थे।


¹ अङ्गुत्तर निकाय एकादशक निपात ।
² समज्‍ज = मेला ।

१५४ [ २१५४
नाग ने गरुड को गरुड न समझ उसके कंधे पर हाथ रख दिया। गरुड
ने मुड़कर देखा कि मेरे कंधे पर हाथ किसने रखा ? उसने देखा कि नाग है।
नाग ने भी जब गरुड को देखा तो उसे जान का डर हुआ। वह नगर से
निकल नदी के रास्ते भाग गया। गरुड ने भी उसे पकड़ने के लिए पीछा
किया।
उस समय बोधिसत्त्व तपस्वी थे। वे उसी नदी के किनारे पर्णशाला में
रहते हुए दिन की थकावट मिटाने के लिए नहाने का वस्त्र पहन वल्कल-छाल
को बाहर छोड़ नदी में उतर स्नान कर रहे थे।
नाग ने सोचा इस प्रव्रजित की सहायता से जान बचा सकूँगा। उसने
अपना असली रूप छोड़ मणि की शक्ल बना वल्कल के अन्दर प्रवेश किया।
गरुड़ ने पीछा करते हुए उसे वहाँ घुसा देख वल्कल के प्रति गौरव होने से उसे
न पकड़ बोधिसत्त्व को 'भन्ते ! मैं भूखा हूँ। आप अपने वल्कल को लें।
मैं नाग को खाऊँगा' कहने के लिए यह गाथा कही—
इधूरगान पवरो पविट्ठो
सेलस्स वण्णेन पमोक्खमिच्छ
बह्मञ्च वण्ण अपचायमानो
बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तुं ॥
[यहाँ मणिवर्ण से नागराजा जान बचाने के लिए घुसा है। मैं ब्राह्मण
वर्ण का आदर करने के कारण भूखा होता हुआ भी उसे खाने की हिम्मत नहीं
करता।]
इधूरगान पवरो पविट्ठो, उस वल्कल में नागों में श्रेष्ठ नागराज प्रविष्ट
हुआ है। सेलस्स वण्णेन, मणि के वर्ण से, अर्थात मणि की शक्ल बना प्रविष्ट
हुआ। पमोक्खमिच्छ, मुझसे बचने की इच्छा से। ब्रह्मञ्च वण्ण अपचायमानो,
मैं तुम्हारे ब्रह्म वर्ण श्रेष्ठ वर्ण की पूजा करने के कारण, गौरव करने के कारण
बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तु वल्कल में घुसे हुए इस नाग को भूख होते
भी नहीं खा सकता हूँ।

गग्ग ] १५५
पानी मे खड़े ही खड़े बोधिसत्त्व ने गरुड राज की प्रशंसा करते हुए यह
गाथा कही—
सो ब्रह्मगुत्तो चिरमेव जीव
दिव्या च ते पातुभवन्तु भक्खा
सो ब्रह्मवण्णं अपचायमानो
धुभुक्खितो नो वितरासि भोत्तु ॥
[ तू ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर चिर काल तक जीवित रह । तुझे दिव्य
भोजन प्राप्त हो । तू ब्राह्मण वर्ण के गौरव के कारण भूखा होता हुआ भी
नहीं खा रहा है । ]
सो ब्रह्मगुत्तो, यह तू ब्रह्म द्वारा गोपित, ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर दिब्बा च
ते पातुभवन्तु भक्खा, देवताओ के भोजन करने योग्य भोजन तुझे मिलें ।
प्राण हिंसा करके नाग-मास खानेवाला न बन ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पानी में खड़े ही खड़े अनुमोदन कर, पानी से
निकल वल्कल पहन उन दोनो को अपने आश्रम पर ले जा मैत्री-भावना की
प्रशंसा कर दोनो का मेल करा दिया । उसके बाद से वह प्रसन्नता पूर्वक सुख
से रहने लगे ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
नाग और गरुड यह दो महामात्य थे । तपस्वी तो मैं ही था ।
१५५. गग्ग जातक
“जीव यस्स सत गग्ग ” यह शास्ता ने जेतवन के समीप राजा
प्रसेनजित के बनवाए राजकाराम म रहते हुए अपनी छींक के बारे में कही ।