जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगग्ग ] १५५
पानी मे खड़े ही खड़े बोधिसत्त्व ने गरुड राज की प्रशंसा करते हुए यह
गाथा कही—
सो ब्रह्मगुत्तो चिरमेव जीव
दिव्या च ते पातुभवन्तु भक्खा
सो ब्रह्मवण्णं अपचायमानो
धुभुक्खितो नो वितरासि भोत्तु ॥
[ तू ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर चिर काल तक जीवित रह । तुझे दिव्य
भोजन प्राप्त हो । तू ब्राह्मण वर्ण के गौरव के कारण भूखा होता हुआ भी
नहीं खा रहा है । ]
सो ब्रह्मगुत्तो, यह तू ब्रह्म द्वारा गोपित, ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर दिब्बा च
ते पातुभवन्तु भक्खा, देवताओ के भोजन करने योग्य भोजन तुझे मिलें ।
प्राण हिंसा करके नाग-मास खानेवाला न बन ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पानी में खड़े ही खड़े अनुमोदन कर, पानी से
निकल वल्कल पहन उन दोनो को अपने आश्रम पर ले जा मैत्री-भावना की
प्रशंसा कर दोनो का मेल करा दिया । उसके बाद से वह प्रसन्नता पूर्वक सुख
से रहने लगे ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
नाग और गरुड यह दो महामात्य थे । तपस्वी तो मैं ही था ।
१५५. गग्ग जातक
“जीव यस्स सत गग्ग ” यह शास्ता ने जेतवन के समीप राजा
प्रसेनजित के बनवाए राजकाराम म रहते हुए अपनी छींक के बारे में कही ।