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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

उरग ] १५३

दूसरा भी पात्र लिए हुए शास्ता के साथ ही अन्दर गया। शास्ता ने उसे मैत्री-
भावना के ग्यारह लाभ¹ बतलाए। जब जाना कि उसका चित्त कोमल पड
गया तो आर्य-सत्यो को प्रकाशित किया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर
यह भी श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
वे दोनो श्रोतापन्न हो परस्पर अपने अपने दोषो को स्वीकार कर, उनके
लिए क्षमा मांग एक दूसरे के साथ मिलकर आनन्दपूर्वक रहनेवाले, एक ही
विचार के हो गए। उसी दिन भगवान् के सामने बैठकर उन्होने इकट्ठे
खाया।
शास्ता भोजन-कृत्य समाप्त करके विहार गए। वे भी बहुत सा माला-
गन्ध-लेप आदि सुगन्धित वस्तुएँ तथा घी, शहद और शक्कर आदि लेकर शास्ता
के साथ ही घर से निकले। भिक्षु-सघ ने शास्ता को आदर प्रदर्शित किया।
बुद्ध उपदेश देकर गन्ध-कुटी मे प्रविष्ट हुए।
भिक्षुओ ने सायकाल धर्म-सभा मे बातचीत चलाई। 'आयुष्मानो !
शास्ता अविनयी को विनयी बनानेवाले हैं। जिन दो अमात्यो का चिर काल
तक प्रयत्न करके भी न राजा और न उनके रिश्तेदार वा सम्बन्धी मेल करा सके
तथागत ने उनको एक ही दिन मे विनीत कर दिया।' शास्ता ने आकर पूछा-
'भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?' 'अमुक बात चीत' कहने पर
तथागत ने कहा—'भिक्षुओ मैने केवल अभी इन दो जनो का मेल नही कराया,
पहले भी कराया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही-

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी
के उत्सव की घोषणा होने पर वडा मेला हुआ। बहुत से मनुष्य, देव, नाग
तथा गरुड आदि समज्‍ज² देखने के लिए इकट्ठे हुए।
वहाँ एक जगह एक नाग और गरुड मेला देखते हुए इकट्ठे खडे थे।


¹ अङ्गुत्तर निकाय एकादशक निपात ।
² समज्‍ज = मेला ।