जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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नाग ने गरुड को गरुड न समझ उसके कंधे पर हाथ रख दिया। गरुड
ने मुड़कर देखा कि मेरे कंधे पर हाथ किसने रखा ? उसने देखा कि नाग है।
नाग ने भी जब गरुड को देखा तो उसे जान का डर हुआ। वह नगर से
निकल नदी के रास्ते भाग गया। गरुड ने भी उसे पकड़ने के लिए पीछा
किया।
उस समय बोधिसत्त्व तपस्वी थे। वे उसी नदी के किनारे पर्णशाला में
रहते हुए दिन की थकावट मिटाने के लिए नहाने का वस्त्र पहन वल्कल-छाल
को बाहर छोड़ नदी में उतर स्नान कर रहे थे।
नाग ने सोचा इस प्रव्रजित की सहायता से जान बचा सकूँगा। उसने
अपना असली रूप छोड़ मणि की शक्ल बना वल्कल के अन्दर प्रवेश किया।
गरुड़ ने पीछा करते हुए उसे वहाँ घुसा देख वल्कल के प्रति गौरव होने से उसे
न पकड़ बोधिसत्त्व को 'भन्ते ! मैं भूखा हूँ। आप अपने वल्कल को लें।
मैं नाग को खाऊँगा' कहने के लिए यह गाथा कही—
इधूरगान पवरो पविट्ठो
सेलस्स वण्णेन पमोक्खमिच्छ
बह्मञ्च वण्ण अपचायमानो
बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तुं ॥
[यहाँ मणिवर्ण से नागराजा जान बचाने के लिए घुसा है। मैं ब्राह्मण
वर्ण का आदर करने के कारण भूखा होता हुआ भी उसे खाने की हिम्मत नहीं
करता।]
इधूरगान पवरो पविट्ठो, उस वल्कल में नागों में श्रेष्ठ नागराज प्रविष्ट
हुआ है। सेलस्स वण्णेन, मणि के वर्ण से, अर्थात मणि की शक्ल बना प्रविष्ट
हुआ। पमोक्खमिच्छ, मुझसे बचने की इच्छा से। ब्रह्मञ्च वण्ण अपचायमानो,
मैं तुम्हारे ब्रह्म वर्ण श्रेष्ठ वर्ण की पूजा करने के कारण, गौरव करने के कारण
बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तु वल्कल में घुसे हुए इस नाग को भूख होते
भी नहीं खा सकता हूँ।