गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१५०- स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ
काण्ड ] ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ३१५
ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार
धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, संनिपातज और आगन्तुज-रूपमें आठ प्रकारका ज्वर माना गया है। मुस्त (मोथा), पर्पटक (पित्तपापड़ा), उशीर (खस), चन्दन तथा उदीच्यनागर (सोंठ)-के सहित जलको पकाकर तैयार किया गया शीतल क्वाथ ज्वर-जनित प्यासकी शान्तिके लिये देना चाहिये।
नागर, देवदारु, धान्यक, बृहतीद्वय और कण्टकारीका क्वाथ ज्वर-रोगीको सबसे पहले देना चाहिये। आरग्वध (अमलतास), अभया (पिप्पलीमूल), मुस्त (मोथा), अतितिक्ता (कुटकी) तथा ग्रन्थिक (हरीतकी)-द्वारा जलमें पकाकर तैयार किया गया क्वाथ उद्वेग, शूल और ज्वरमें हितकारी है। मधुकसार (मधु), सेंधा नमक, वच, काली मिर्च और पिप्पली—इन सभीको समान मात्रामें जलके साथ महीन पीसकर कपड़छान कर लेना चाहिये। इसका नस्य देनेसे ज्वरके प्रभावसे मूर्च्छित हुआ रोगी होशमें आ जाता है। त्रिवृद्धिशाला (निसोत-इन्द्रायण), त्रिफला, कटुकी और अमलताससे बने हुए क्वाथमें सेंधा नमक डालकर उसको पीनेसे सभी प्रकारका ज्वर विनष्ट होता है। सोंठ, मोथा, रक्तचन्दन, खस तथा धान्यक (धनिया)-से बने क्वाथमें शर्करा और मधु मिलाना चाहिये। इसका पान करनेसे तृतीयक (तिजरिया)-ज्वर विनष्ट हो जाता है।
रविवारको अपामार्ग (चिचड़े)-की जड़ लाल सूत्रसे बाँधकर कमरमें सात बार घुमाकर बाँधनेसे निश्चित ही इस तिजरिया-ज्वरका नाश होता है। 'गङ्गाया उत्तरे कूले अपुत्रस्तापसो मृतः'—(गङ्गाके उत्तरी तटपर पुत्रविहीन तपस्वी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी है।) कहकर उसे तिलोदक देना चाहिये। ऐसा करनेसे एक आह्निक ज्वर रोगीको छोड़ देता है।
गुडूची (गिलोय)-का क्वाथ और कल्क*, त्रिफला तथा वासक (अडूसा)-का क्वाथ एवं कल्क, द्राक्षा और बला (वरियारा)-का क्वाथ और कल्कसे सिद्ध घृत सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। आँवला, हरीतकी और पिप्पली-चिताका क्वाथ सभी प्रकारके ज्वरोंको विनष्ट करनेवाला है।
इसके बाद अब मैं ज्वरातिसारनाशक औषधिका वर्णन करता हूँ।
पृश्निपर्णी (पिठवन लता), बला, बिल्व, सोंठ, कमल, धान्यक, पाठा, इन्द्रयव, भूनिम्ब (चिरायता), मुस्त तथा पर्पटकसे बना हुआ क्वाथ आमातिसार तथा ज्वरको विनष्ट करता है। नागर, अतिविषा (अतसी या अलसी), मुस्त, भूनिम्ब (चिरायता) और अमृतवत्सकसे बना क्वाथ सभी ज्वर तथा सभी अतिसार-रोगोंका नाशक है। मुस्त, पित्तपापड़ा और सोंठ-मिश्रित दूध भी अतिसार-रोगका विनाश करता है। शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारी, बला, गोखरू, बिल्व, पाठा, सोंठ तथा धनियाका क्वाथ सभी प्रकारके अतिसार-रोगोंमें हितकारी होता है। बिल्व और आमकी गुठलीके क्वाथका मिश्री तथा मधुके साथ सेवन अतिसारका नाशक है। अतिसारमें कुटज-वृक्षका छाल भी हितकारी होता है। इन्द्रयव, अलसी, सोंठ और पिप्पलीमूलका क्वाथ प्रयोग करनेसे आमशूलसे युक्त खूनी अतिसारमें लाभ होता है।
अब मैं ग्रहणी-रोगकी चिकित्सा कह रहा हूँ।
* कूटकर लुगदी बनानेको कल्क कहा जाता है।
| ३१६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ग्रहणी जठराग्निको विनष्ट कर देती है। चित्रक अर्थात् चित्ताके द्वारा बने हुए क्वाथ और कल्कके साथ पका हुआ घृत ग्रहणी-रोगका विनाशक है। यह गुल्म, शोथ, उदर, प्लीहा, शूल तथा अर्शरोगको भी नष्ट कर देता है। इसके सेवनसे पेटकी अग्नि प्रदीप्त हो उठती है। सौवर्च (काला नमक), सैन्धव (सेंधा नमक), विडंग (लवण-विशेष), उद्भिद (रेह) और समुद्र-फेन—इन पाँचों लवणोंके समान भागमें मिश्रित चूर्णका प्रयोग करनेसे लाभ होता है।
शस्त्र, क्षार तथा अग्नि इस त्रिविध चिकित्साके द्वारा अर्श-रोगका विनाश होता है। यदि नया तैयार किया हुआ तक्र हो तो उसको भी अर्श-विनाशक ही मानना चाहिये। घीमें भूनी गुडूची, पिप्पली और हरीतकीका चूर्ण अम्ल तथा लवणके साथ रसोतका चूर्ण खानेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। तिल और ईखके रसका प्रयोग करनेसे अर्श तथा कुष्ठ-रोगका विनाश होता है। पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चीता तथा सोंठ)-के साथ काली मिर्च और त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च)-का चूर्ण अग्निवर्धक है। सोंठ, गुड़ अथवा सेंधा नमकके साथ हरीतकीका चूर्ण निरन्तर खाना चाहिये; क्योंकि यह अग्निवर्धक होती है। त्रिफला, गिलोय, वासक, चिरायता, नीमकी छाल और नीमकी गिरीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे कामला तथा पाण्डु-रोग समाप्त हो जाता है। त्रिवृत, त्रिफला, श्यामा, पिप्पली, शर्करा और मधुमिश्रित बना मोदक संनिपात-ज्वरका विनाशक तथा रक्त-पित्तज ज्वरको भी नष्ट करता है।
वासक (अडूसाँ)-का रस उदरभागमें पहुँचनेपर जीवनकी आशा बनी रहती है। ऐसी स्थितिमें रक्त और पित्तका क्षय होता है, तब खाँसीके रोगसे व्यथित प्राणी किसलिये दुखित होता है (अर्थात् वासकके रहते खाँसीके रोगीको जीवनसे निराश नहीं होना चाहिये।) शर्करासे युक्त जंगली अडूसा और मृद्धीक^२ रसका बना क्वाथ पथ्य है। इसको मिश्रीके साथ पान करनेसे कास, निःश्वास और रक्तपित्तज दोष विनष्ट हो जाता है। मिश्री अथवा मधुके साथ अडूसेका रस पान करनेसे रोगी रक्तज दोषपर सफलता प्राप्त कर लेता है। शाल्लकी (सलई), बेर, जामुन, प्रियाक, आम, अर्जुन और धव नामक वृक्षकी छालका क्वाथ दूध और मधुके साथ पान करनेसे रक्त-सम्बन्धित रोग दूर हो जाता है। अपने ही रसमें भावित, मूल, फल और पत्रसहित निर्गुण्डीका सिद्ध घृत पान करके क्षय-रोगसे क्षीण हुआ रोगी व्याधिरहित होकर देवताओंके समान कान्तिमान् हो उठता है।
हरीतकी, सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च और गुड़ मिलाकर बनाये गये मोदकको कासनाशक कहा गया है। इसको खानेसे तृष्णा एवं अरुचिका भी नाश होता है। कण्टकारी तथा गुडूचीसे पृथक्-पृथक् निकाले गये तीस-तीस पल रसमें सिद्ध किया गया एक प्रस्थ घृत कासरोगका नाश और अग्निका दीपन करता है। कृष्णा (काली पत्तियोंवाली तुलसी), धात्री (आँवला), श्वेत सोंठका चूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना हिक्का (हिचकी)-रोगका विनाशक बन जाता है। जो प्राणी हिचकी और श्वास-रोगके रोगी हैं, उनको विश्वा अर्थात् सोंठके साथ भार्गी (भारंगी)-का रस गरम जलसे पीना चाहिये।
स्वरभेद होनेपर मुखमें तिलके तेलमें सिद्ध खदिर (कत्थे)-का रस रखना लाभप्रद होता है
१-वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च। रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति॥
२-मृद्धीक—मुनक्का
काण्ड ] ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ३१७
अथवा सोंठके साथ हरीतकी और पिप्पलीका चूर्ण इस रोगमें लाभकारी है। मधुके साथ विडंग तथा त्रिफलाका चूर्ण वमन-रोगको दूर करता है। आम और जामुनकी छालका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे सभी प्रकारके वमन नष्ट हो जाते हैं। यह तृष्णाको भी समाप्त कर देता है अथवा इस रोगमें मधुके साथ त्रिफलाचूर्णका ही सेवन करना चाहिये। यह औषधि तो भ्रम और मूर्च्छाको भी दूर कर देती है। गायके दूध, दही, घृत, मूत्र और गोमयसे बना पञ्चगव्य हितकारी होता है। इसका अनुपान अपस्मार (मिरगी) और मलग्रहादि रोगोंको नष्ट करता है। कूष्माण्ड (कुम्हड़ा)-का रस ब्रह्मयष्टी तथा घृतके साथ पान करनेसे भी उक्त अपस्मार और मलग्रहादिके रोग दूर होते हैं। ब्राह्मी रस, वचकुष्ठ और शंखपुष्पीके साथ प्रयुक्त पुराना घृत प्राणियोंके लिये सेव्य है, क्योंकि यह उन्माद, ग्रहणी और अपस्मार-रोगोंका विनाशक है।
अश्वगन्ध क्वाथका कल्क बनाकर उसमें चौगुना दूध डालकर पकाना चाहिये। तदनन्तर उस योगमें घृतपाक तैयार करके उसका सेवन करे। यह घृत वातनाशक, बल-मांस-वर्धक और पुत्रोत्पादक होता है। नीली<sup>१</sup> और मुण्डीका चूर्ण मधु एवं घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे अथवा छिन्ना (गिलोय)-का क्वाथ पान करनेसे वह अत्यन्त असाध्य वात-रक्तको दूर कर देता है। गुड़के सहित हरीतकी आदि पाँच औषधियोंका सेवन कुष्ठ, अर्श तथा वातरोगका विनाशक है। गुडूचीका रस, कल्क, चूर्ण अथवा क्वाथ वात-रक्तरोगका हन्ता है। गुडूची लताके क्वाथसे बने कल्कका उपयोग करनेसे कुष्ठ और व्रणरोगका उपशमन होता है। इस कल्कका प्रयोग गोघृत या गोदुग्धके साथ करना चाहिये।
त्रिफला तथा गुग्गुल वात-रक्त और मूर्च्छाका नाशक है। गोमूत्रके साथ प्रयुक्त गुग्गुल ऊरुस्तम्भ नामक रोगका शमन करता है। सोंठ और गोखरूका क्वाथ सामवात तथा शूलरोगका विनाशक है। दशमूल<sup>२</sup>, हरीतकी, एरण्ड, रास्ना, सोंठ और देवदारु नामक औषधियोंसे बना हुआ क्वाथ काली मिर्च एवं गुड़के साथ सेवन करनेपर महाशोथको दूर करता है। कण्टकारी और गुडूचीके पृथक्-पृथक् तीस-तीस पल रसको निकालकर उसमें एक प्रस्थ सिद्ध किया गया घृत कासरोग-विनाशक तथा जठराग्नि-दीपक होता है। काली तुलसी, आँवला, सफेद सोंठ, काली मिर्च और सेंधा नमकसे बना हुआ क्वाथ एरण्ड-तेलके साथ पान करनेपर वह आमदोष तथा प्रबल वायु-विकारको दूर करता है।
बला, पुनर्नवा, एरण्ड, बृहतीद्वय, कण्टकारी और गोखरूका क्वाथ हींग और सेंधा नमक मिलाकर पान करनेसे वातशूल विनष्ट हो जाता है। दाह और शूलरोगकी शान्तिके लिये त्रिफला, निम्ब, मुलेठी, कटुकी तथा अमलताससे बने क्वाथको मधु मिलाकर पान करना चाहिये। जेठी मधुके साथ त्रिफलाका क्वाथ पीनेपर शूलसे होनेवाला दुःख दूर होता है। त्रिफलाचूर्ण गोमूत्र और शुद्ध मण्डूर, मधु तथा घृतके साथ चाटनेपर त्रिदोषजन्य शूलको विनष्ट करता है।
त्रिवृत, काली तुलसी और हरीतकीके चूर्णको क्रमशः दो भाग, चार भाग तथा पाँच भाग गुड़-समन्वित करके उसकी समान गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे मलकाठिन्य-दोष दूर हो जाता है। हरीतकी, यवक्षार, पिप्पली और त्रिवृत अर्थात्
१-नीली (नील), २-बिल्व, श्योणाक, गम्भारी, पाटला, गणकारिका, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहतीद्वय, कण्टकारी तथा गोखरू-इन दस वृक्षोंके मूल दशमूल कहलाते हैं।