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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

काण्ड ] ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ३१५


ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार

धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, संनिपातज और आगन्तुज-रूपमें आठ प्रकारका ज्वर माना गया है। मुस्त (मोथा), पर्पटक (पित्तपापड़ा), उशीर (खस), चन्दन तथा उदीच्यनागर (सोंठ)-के सहित जलको पकाकर तैयार किया गया शीतल क्वाथ ज्वर-जनित प्यासकी शान्तिके लिये देना चाहिये।

नागर, देवदारु, धान्यक, बृहतीद्वय और कण्टकारीका क्वाथ ज्वर-रोगीको सबसे पहले देना चाहिये। आरग्वध (अमलतास), अभया (पिप्पलीमूल), मुस्त (मोथा), अतितिक्ता (कुटकी) तथा ग्रन्थिक (हरीतकी)-द्वारा जलमें पकाकर तैयार किया गया क्वाथ उद्वेग, शूल और ज्वरमें हितकारी है। मधुकसार (मधु), सेंधा नमक, वच, काली मिर्च और पिप्पली—इन सभीको समान मात्रामें जलके साथ महीन पीसकर कपड़छान कर लेना चाहिये। इसका नस्य देनेसे ज्वरके प्रभावसे मूर्च्छित हुआ रोगी होशमें आ जाता है। त्रिवृद्धिशाला (निसोत-इन्द्रायण), त्रिफला, कटुकी और अमलताससे बने हुए क्वाथमें सेंधा नमक डालकर उसको पीनेसे सभी प्रकारका ज्वर विनष्ट होता है। सोंठ, मोथा, रक्तचन्दन, खस तथा धान्यक (धनिया)-से बने क्वाथमें शर्करा और मधु मिलाना चाहिये। इसका पान करनेसे तृतीयक (तिजरिया)-ज्वर विनष्ट हो जाता है।

रविवारको अपामार्ग (चिचड़े)-की जड़ लाल सूत्रसे बाँधकर कमरमें सात बार घुमाकर बाँधनेसे निश्चित ही इस तिजरिया-ज्वरका नाश होता है। 'गङ्गाया उत्तरे कूले अपुत्रस्तापसो मृतः'—(गङ्गाके उत्तरी तटपर पुत्रविहीन तपस्वी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी है।) कहकर उसे तिलोदक देना चाहिये। ऐसा करनेसे एक आह्निक ज्वर रोगीको छोड़ देता है।

गुडूची (गिलोय)-का क्वाथ और कल्क*, त्रिफला तथा वासक (अडूसा)-का क्वाथ एवं कल्क, द्राक्षा और बला (वरियारा)-का क्वाथ और कल्कसे सिद्ध घृत सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। आँवला, हरीतकी और पिप्पली-चिताका क्वाथ सभी प्रकारके ज्वरोंको विनष्ट करनेवाला है।

इसके बाद अब मैं ज्वरातिसारनाशक औषधिका वर्णन करता हूँ।

पृश्निपर्णी (पिठवन लता), बला, बिल्व, सोंठ, कमल, धान्यक, पाठा, इन्द्रयव, भूनिम्ब (चिरायता), मुस्त तथा पर्पटकसे बना हुआ क्वाथ आमातिसार तथा ज्वरको विनष्ट करता है। नागर, अतिविषा (अतसी या अलसी), मुस्त, भूनिम्ब (चिरायता) और अमृतवत्सकसे बना क्वाथ सभी ज्वर तथा सभी अतिसार-रोगोंका नाशक है। मुस्त, पित्तपापड़ा और सोंठ-मिश्रित दूध भी अतिसार-रोगका विनाश करता है। शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारी, बला, गोखरू, बिल्व, पाठा, सोंठ तथा धनियाका क्वाथ सभी प्रकारके अतिसार-रोगोंमें हितकारी होता है। बिल्व और आमकी गुठलीके क्वाथका मिश्री तथा मधुके साथ सेवन अतिसारका नाशक है। अतिसारमें कुटज-वृक्षका छाल भी हितकारी होता है। इन्द्रयव, अलसी, सोंठ और पिप्पलीमूलका क्वाथ प्रयोग करनेसे आमशूलसे युक्त खूनी अतिसारमें लाभ होता है।

अब मैं ग्रहणी-रोगकी चिकित्सा कह रहा हूँ।


* कूटकर लुगदी बनानेको कल्क कहा जाता है।