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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२६७- नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार

काण्ड ] गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना ६०५


गर्तमें पतन हो जाता है।

जिस समय प्रलयकालीन समुद्रमें व्यापक भगवान् सभी जीवोंको अपने उदरमें प्रविष्ट कराकर शयन करते हैं, ब्रह्मा तथा इन्द्र, मरुत् आदि देवोंको, मुक्तोंको तथा मुक्तिके लिये सचेष्ट जनोंको भी वे अपनेमें अवस्थित करके कल्पपर्यन्त स्थित होते हैं, उस समय सर्ववेदात्मिका लक्ष्मी भक्तिसे समन्वित हो भगवान्‌की स्तुति करती हैं। उस समय विष्णु और लक्ष्मीको छोड़कर कुछ भी नहीं रहता। पर्यङ्करूपमें वे ही देवी हो जाती हैं एवं वासरूपसे लक्ष्मीके रूपमें भी विराजमान रहती हैं; वे देवी उस समय बहुत रूपोंमें सुशोभित होती हैं।

हे शौनक! गरुडको पुनः उन परम देवकी महिमाको बताते हुए श्रीकृष्णने कहा—हे विष्णो! आप सभीमें उत्कृष्ट हैं, सभी देवोंमें उत्तम होनेके कारण आप उत्कृष्ट हैं, आपके समान अथवा आपसे अधिक बड़ा और कोई नहीं है। आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं। आपमें ही ब्रह्म शब्दका मुख्य प्रयोग है। अन्य ब्रह्मा, रुद्रादिमें अमुख्य है। अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण होनेके कारण आप हरिको ही ब्रह्म कहा जाता है। गुण आदिकी पूर्णताके अभावसे अन्यको ब्रह्म नहीं कहा जा सकता। गुण और कालसे देशका आनन्त्य होता है, किंतु देश-कालमें गुण या कार्यसे आनन्त्य नहीं होता। हे विष्णो! आपमें गुणोंकी अनन्तता है। आपको न मैं जानता हूँ न ब्रह्मा तथा रुद्रादि देव ही जानते हैं। इन्द्र, अग्नि, यम आदि देव आपके गुणोंको जाननेमें असमर्थ हैं। देवर्षि नारद आदि ऋषि, गन्धर्व आदि कोई भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; फिर सामान्य लोगोंकी तो बात ही क्या है? आपसे ही देवोंकी सृष्टि हुई है। आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा आदि सृष्टि करनेमें समर्थ होते हैं। ब्राह्मणोंके द्वारा वेदादिके जितने अक्षरोंका पाठ होता है, वे सभी आप हरिके नाम ही हैं, आपको वे अति प्रिय हैं। मेरे स्वामी भी आप हरि ही हैं, सभीके एकमात्र स्वामी आप ही हैं। वेदोंमें आपकी स्तुतिका गान किया गया है, ऐसा जानकर जो वेदोंका पाठ करता है वह द्विजोंमें उत्तम है। उसे वेदपाठी कहा गया है, इससे विपरीत भाव रखनेवाला वेदवादी कहलाता है।

श्रीकृष्णजीने गरुडजीको विष्णुतत्त्व बतलाते हुए पुनः कहा—हे महात्मन्! संसारमें अज्ञानी जीवद्वारा सैकड़ों-करोड़ों महान्-से-महान् अपराध बनते रहते हैं, पर वे हरि बड़े ही दयालु हैं, कृपालु हैं, उनका तीन बार नाममात्र लेनेसे ही वे उन्हें क्षमा कर देते हैं—

महापराधाः सन्ति लोके महात्मन्
सहस्रशः शतशः कोटिशश्च।
हरिश्च तान् क्षमते सदैव
नामत्रयस्मरणाद्वै कृपालुः॥
(२।६०)

कल्पान्तमें शयन कर रहे उन विष्णुको इस प्रकार स्तुति करते हुए जगाया गया—

वेदोंके द्वारा जानने योग्य यज्ञस्वरूप हे गोविन्द! आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायें और जगत्की रक्षा करें। हे केशव! अब आप अपनी योगनिद्राका परित्याग कर उठें। हे आनन्दस्वरूप! आप सृष्टि और प्रलय करनेमें समर्थ हैं।

हे प्रभो! ब्रह्माको प्रादुर्भूत कर आप उन्हें सृष्टि करनेके लिये प्रेरित करें और रुद्रको सृष्टिके संहारके लिये प्रेरित करें। हे हरे! हे मुरारे!

६०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-

कल्पादिका अन्त करनेके लिये आप उठें। हे महात्मन्! जो दुःखस्वरूप अन्धकार व्याप्त है उसे दूर करें। हे देव! भक्तोंको दुःखी देखकर आप भी दुःखी हो जाते हैं।

हे नारायण! हे वासुदेव! हे कृष्ण! हे अच्युत! तथा हे माधव! अब आप उठें, हे वैकुण्ठ! हे दयामूर्ते! हे लक्ष्मीपते! आपको बार-बार नमस्कार है।

हे सरस्वतीके ईश! हे रुद्रेश! हे अम्बिकेश! हे चन्द्रेश! हे शचीपते! आप ब्राह्मणों तथा गौओंके स्वामी हैं, आपका नाम शास्त्रप्रिय है। हे ऋग्वेद और यजुर्वेदके प्रिय! हे निदानमूर्ते! हे साम तथा अथर्वप्रिय! हे मुरारे! आप पुराणमूर्ति हैं और स्तुतियाँ आपको प्रिय हैं, इसलिये आप स्तुतिप्रिय कहलाते हैं। हे विचित्रमूर्ते! आप कमला (लक्ष्मी)-के पति हैं, आप शीघ्र ही उठें, इस योगनिद्राका परित्याग कर संसारमें व्याप्त अन्धकारको दूरकर जगत्की रक्षा करें।

—इस प्रकार स्तुति करनेपर अजन्मा विष्णु योगनिद्राका परित्याग कर शीघ्र ही जाग गये।

(अध्याय २)


नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य

श्रीकृष्णने कहा— हे विनतासुत गरुड! योगनिद्रासे जागनेपर भगवान् विष्णुकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई। यद्यपि इच्छाशक्ति उनमें सदा ही विद्यमान रहती है फिर भी उस समय उन्होंने उसी इच्छाशक्तिसे लौकिक स्वरूप धारण किया और अपने उस रूपके द्वारा प्रलयकालीन अन्धकारको नष्ट किया।

महाविष्णुके सभी अवतार पूर्ण कहे गये हैं। उनका परस्वरूप भी पूर्ण है और पूर्णसे ही पूर्ण उत्पन्न हुआ। विष्णुका परत्व और अपरत्व व्यक्तिमात्रसे है। देश और कालके सामर्थ्यसे परत्व और अपरत्व नहीं है। उनका पूर्ण रूप है, उस पूर्णसे पूर्णका ही विस्तार होता है और अन्तमें उस रूपको ग्रहण करके पुनः पूर्ण ही बच जाता है। पृथ्वीके भारका रक्षण आदि जो कार्य है वह उनका लौकिक व्यवहार है। अपनी गुणमयी मायामें भगवान् अपनी शक्तिका आधान करते हैं। वे वीर्यस्वरूपी भगवान् वासुदेव सभी देश तथा सभी कालमें सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। इसी कारण वे पुरुष ईश्वर कहलाते हैं।

हे विनतापुत्र! अपनी मायामें प्रभु हरि स्वयं वीर्यका आधान करते हैं। वीर्यस्वरूप ही भगवान् वासुदेव हैं और सभी कालोंमें सभी अर्थोंसे युक्त हैं।

इनके अचिन्त्यवीर्य और चिन्त्यवीर्यके भेदसे दो रूप हैं, एक स्त्रीरूप है और दूसरा पुरुषरूप। हे खगेन्द्र! दोनों स्वरूप वीर्यवान् हैं; इनमें अभेदका चिन्तन करना चाहिये।

देवी लक्ष्मी परमात्मासे कभी वियुक्त नहीं हैं, वे नित्य उनकी सेवामें अनुरक्त रहती हैं। नारायण नामसे प्रसिद्ध हरि यद्यपि पूर्ण स्वतन्त्र हैं किंतु लक्ष्मीके बिना वे अकेले कैसे रह सकते हैं। मुकुन्द हरिके चरणारविन्दमें परम आदरसे शुश्रूषा करती हुई वे लक्ष्मी सदा विराजमान रहती हैं। हरिके बिना देवी श्री भी किसी देश और कालमें पृथक् नहीं हैं। मायामें वे वीर्यवान् परमात्मा अपनी शक्तिका आधान करते हैं। पुरुष नामक विभु उन हरिने तीनों गुणोंकी सृष्टि की है।

श्रीकृष्णने पुनः कहा— जिस प्रकार भगवान् हरिने प्रकृतिके तीन गुणोंकी सृष्टि की, उसी प्रकारसे लक्ष्मीने भी तीन रूप धारण किये, जिनका नाम है—श्री, भू और दुर्गा। इनमेंसे सत्त्वाभिमानी रूपको श्रीदेवी, रजोगुणाभिमानी रूपको भूदेवी और तमोऽभिमानी रूपको दुर्गादेवी कहा गया है। तीनों रूपोंमें अन्तर नहीं जानना चाहिये। हे खगेश्वर! गुणोंके सम्बन्धसे ही दुर्गा आदि तीन रूप हैं। इनमें अन्तर नहीं है। इनमें जो अन्तर मानते हैं, वे परम अन्धतमस् नरकमें जाते हैं। साक्षात् परमात्मा पुरुष