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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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६०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-

कल्पादिका अन्त करनेके लिये आप उठें। हे महात्मन्! जो दुःखस्वरूप अन्धकार व्याप्त है उसे दूर करें। हे देव! भक्तोंको दुःखी देखकर आप भी दुःखी हो जाते हैं।

हे नारायण! हे वासुदेव! हे कृष्ण! हे अच्युत! तथा हे माधव! अब आप उठें, हे वैकुण्ठ! हे दयामूर्ते! हे लक्ष्मीपते! आपको बार-बार नमस्कार है।

हे सरस्वतीके ईश! हे रुद्रेश! हे अम्बिकेश! हे चन्द्रेश! हे शचीपते! आप ब्राह्मणों तथा गौओंके स्वामी हैं, आपका नाम शास्त्रप्रिय है। हे ऋग्वेद और यजुर्वेदके प्रिय! हे निदानमूर्ते! हे साम तथा अथर्वप्रिय! हे मुरारे! आप पुराणमूर्ति हैं और स्तुतियाँ आपको प्रिय हैं, इसलिये आप स्तुतिप्रिय कहलाते हैं। हे विचित्रमूर्ते! आप कमला (लक्ष्मी)-के पति हैं, आप शीघ्र ही उठें, इस योगनिद्राका परित्याग कर संसारमें व्याप्त अन्धकारको दूरकर जगत्की रक्षा करें।

—इस प्रकार स्तुति करनेपर अजन्मा विष्णु योगनिद्राका परित्याग कर शीघ्र ही जाग गये।

(अध्याय २)


नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य

श्रीकृष्णने कहा— हे विनतासुत गरुड! योगनिद्रासे जागनेपर भगवान् विष्णुकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई। यद्यपि इच्छाशक्ति उनमें सदा ही विद्यमान रहती है फिर भी उस समय उन्होंने उसी इच्छाशक्तिसे लौकिक स्वरूप धारण किया और अपने उस रूपके द्वारा प्रलयकालीन अन्धकारको नष्ट किया।

महाविष्णुके सभी अवतार पूर्ण कहे गये हैं। उनका परस्वरूप भी पूर्ण है और पूर्णसे ही पूर्ण उत्पन्न हुआ। विष्णुका परत्व और अपरत्व व्यक्तिमात्रसे है। देश और कालके सामर्थ्यसे परत्व और अपरत्व नहीं है। उनका पूर्ण रूप है, उस पूर्णसे पूर्णका ही विस्तार होता है और अन्तमें उस रूपको ग्रहण करके पुनः पूर्ण ही बच जाता है। पृथ्वीके भारका रक्षण आदि जो कार्य है वह उनका लौकिक व्यवहार है। अपनी गुणमयी मायामें भगवान् अपनी शक्तिका आधान करते हैं। वे वीर्यस्वरूपी भगवान् वासुदेव सभी देश तथा सभी कालमें सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। इसी कारण वे पुरुष ईश्वर कहलाते हैं।

हे विनतापुत्र! अपनी मायामें प्रभु हरि स्वयं वीर्यका आधान करते हैं। वीर्यस्वरूप ही भगवान् वासुदेव हैं और सभी कालोंमें सभी अर्थोंसे युक्त हैं।

इनके अचिन्त्यवीर्य और चिन्त्यवीर्यके भेदसे दो रूप हैं, एक स्त्रीरूप है और दूसरा पुरुषरूप। हे खगेन्द्र! दोनों स्वरूप वीर्यवान् हैं; इनमें अभेदका चिन्तन करना चाहिये।

देवी लक्ष्मी परमात्मासे कभी वियुक्त नहीं हैं, वे नित्य उनकी सेवामें अनुरक्त रहती हैं। नारायण नामसे प्रसिद्ध हरि यद्यपि पूर्ण स्वतन्त्र हैं किंतु लक्ष्मीके बिना वे अकेले कैसे रह सकते हैं। मुकुन्द हरिके चरणारविन्दमें परम आदरसे शुश्रूषा करती हुई वे लक्ष्मी सदा विराजमान रहती हैं। हरिके बिना देवी श्री भी किसी देश और कालमें पृथक् नहीं हैं। मायामें वे वीर्यवान् परमात्मा अपनी शक्तिका आधान करते हैं। पुरुष नामक विभु उन हरिने तीनों गुणोंकी सृष्टि की है।

श्रीकृष्णने पुनः कहा— जिस प्रकार भगवान् हरिने प्रकृतिके तीन गुणोंकी सृष्टि की, उसी प्रकारसे लक्ष्मीने भी तीन रूप धारण किये, जिनका नाम है—श्री, भू और दुर्गा। इनमेंसे सत्त्वाभिमानी रूपको श्रीदेवी, रजोगुणाभिमानी रूपको भूदेवी और तमोऽभिमानी रूपको दुर्गादेवी कहा गया है। तीनों रूपोंमें अन्तर नहीं जानना चाहिये। हे खगेश्वर! गुणोंके सम्बन्धसे ही दुर्गा आदि तीन रूप हैं। इनमें अन्तर नहीं है। इनमें जो अन्तर मानते हैं, वे परम अन्धतमस् नरकमें जाते हैं। साक्षात् परमात्मा पुरुष