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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

श्लोकअर्थ
रतिजोऽथोत्साहजश्च पात्रभेदे विवक्षितः।<br>रतिजस्त्वयि वामोरु शत्रोरुत्साहजः स्मृतः॥ ४९तात्पर्य वह नहीं जान सका। हे मानिनि! संग्राम दो प्रकारका होता है—कामजनित और उत्साहजनित। पात्रभेदसे समय-समयपर इनका अलग-अलग अर्थ किया जाता है। हे वामोरु! उन दोनोंमें आप-जैसी युवतीके साथ होनेवाले संग्रामको कामजनित संग्राम और शत्रुके साथ होनेवाले संग्रामको उत्साहजनित संग्राम कहा गया है॥ ४६—४९॥
सुखदः प्रथमः कान्ते दुःखदश्चारिजः स्मृतः।<br>जानाम्यहं वरारोहे भवत्या मानसं किल॥ ५०<br><br>रतिसंग्रामभावस्ते हृदये परिवर्तते।<br>इति तज्ज्ञं विदित्वा मां त्वत्सकाशं नराधिपः॥ ५१<br><br>प्रेषयामास शुम्भोऽद्य बलेन महतावृत्तम्।हे कान्ते! उनमें प्रथम रतिजन्य संग्राम सुखदायक और शत्रुके साथ किया जानेवाला उत्साहजन्य संग्राम दुःखदायक कहा गया है। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारे मनकी बात जानता हूँ; तुम्हारे मनमें रतिजन्य संग्रामका भाव है। मुझको यह सब जाननेमें निपुण समझकर ही महाराज शुम्भने विशाल सेनाके साथ इस समय मुझे आपके पास भेजा है॥ ५०-५१ १/२॥
चतुरासि महाभागे शृणु मे वचनं मृदु॥ ५२<br><br>भज शुम्भं त्रिलोकेशं देवदर्पनिबर्हणम्।<br>पट्टराज्ञी प्रिया भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ५३हे महाभागे! तुम बड़ी चतुर हो। मेरे मधुर वचन सुनो। देवताओंका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले त्रिलोकाधिपति शुम्भको [पतिरूपसे] स्वीकार कर लो और उनकी प्रिय पटरानी बनकर अत्युत्तम सुखोंका उपभोग करो॥ ५२-५३॥
जेष्यति त्वां महाबाहुः शुम्भः कामबलार्थवित्।<br>विचित्रान्कुरु भावांस्त्वं सोऽपि भावान्करिष्यति॥ ५४<br><br>भविष्यति कालिकेयं तत्र वै नर्मसाक्षिणी।<br>एवं सङ्गरयोगेन पतिर्मे परमार्थवित्॥ ५५<br><br>जित्वा त्वां सुखशय्यायां परिश्रान्तां करिष्यति।<br>रक्तदेहां नखाघातैर्दन्तैश्च खण्डिताधराम्॥ ५६<br><br>स्वेदक्लिन्नां प्रभग्नां त्वां संविधास्यति भूपतिः।<br>भविता मानसः कामो रतिसंग्रामजस्तव॥ ५७कामसम्बन्धी बलका रहस्य जाननेवाले विशालबाहु शुम्भ तुम्हें जीत लेंगे। तुम उनके साथ विचित्र हाव-भाव करो, वे भी वैसे ही हाव-भाव प्रदर्शित करेंगे। यह कालिका [उस अवसरपर] हास-विलासकी साक्षी रहेगी। इस प्रकार कामतत्त्वके परमवेत्ता मेरे स्वामी शुम्भ कामयुद्धके द्वारा तुम्हें सुखशय्यापर जीतकर शिथिल कर देंगे। वे महाराज शुम्भ अपने नखोंके आघातसे तुम्हें रक्तरंजित शरीरवाली बना देंगे, दाँतोंसे काटकर तुम्हारे ओठोंको खण्डित कर देंगे, तुम्हें पसीनेसे तर कर देंगे और मर्दित कर डालेंगे; तब तुम्हारा रतिसंग्रामसम्बन्धी मनोरथ पूर्ण हो जायगा॥ ५४—५७॥
दर्शनाद्वश एवास्ते शुम्भः सर्वात्मना प्रिये।<br>वचनं कुरु मे पथ्यं हितकृच्चापि पेशलम्॥ ५८<br><br>भज शुम्भं गणाध्यक्षं माननीयातिमानिनी।<br>मन्दभाग्याश्च ते नूनं ह्यस्त्रयुद्धप्रियाश्च ये॥ ५९हे प्रिये! तुम्हें देखते ही शुम्भ पूर्णरूपसे तुम्हारे वशीभूत हो जायेंगे। अतएव मेरी उचित, कल्याणकारी और सुखकर बात मान लो। तुम माननीयोंमें अत्यन्त मानिनी हो, अतः गणाध्यक्ष शुम्भको स्वीकार कर लो। जो शस्त्रयुद्धसे प्रेम रखते हैं, वे अवश्य ही मन्दभाग्य हैं। रतिक्रीड़ामें प्रीति रखनेवाली हे कान्ते!
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६३

| न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे।<br>अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम्॥ ६०<br><br>बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु॥ ६१ | तुम शस्त्रयुद्धके योग्य नहीं हो। जैसे कामिनीके पदप्रहारसे अशोक, मुख मदिराके सेचनसे मौलसिरी और कुरबक प्रफुल्लित हो उठता है, उसी प्रकार तुम भी महाराज शुम्भको शोकरहित और आह्लादित करो॥ ५८-६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये देवीपार्श्वे धूम्रलोचनदूतप्रेषणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे महाराज!] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया। तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं—धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों-जैसी बात करते हो। मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो॥ १-२॥
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः।<br>प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः॥ १<br><br>विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे।<br>वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन्॥ २
बलवान्बलसंयुक्तः प्रेषितोऽसि दुरात्मना।<br>कुरु युद्धं वृथा वादं मुञ्च मूढमतेऽधुना॥ ३हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भने तुझ बलवान्‌को सेनासे सुसज्जित करके युद्धहेतु भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थकी बातें छोड़ दो॥ ३॥
हत्वा शुम्भं निशुम्भञ्च त्वदन्यान्वा बलाधिकान्।<br>देवी क्रुद्धा शराघातैर्व्रजिष्यति निजालयम्॥ ४ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान् दैत्योंका अपने बाणोंके प्रहारसे संहार करके अपने धामको चली जायँगी॥ ४॥
क्वासौ मन्दमतिः शुम्भः क्व वा विश्वविमोहिनी।<br>अयुक्तः खलु संसारे विवाहविधिरेतयोः॥ ५कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ ये विश्वमोहिनी जगदम्बा! इन दोनोंका विवाह इस संसारमें सर्वथा अनुपयुक्त है॥ ५॥
सिंही किं त्वतिकामार्ता जम्बुकं कुरुते पतिम्।<br>करिणी गर्दभं वापि गवयं सुरभिः किमु॥ ६क्या अत्यधिक कामार्त होनेपर भी सिंहिनी सियारको, हथिनी किसी गर्दभको अथवा सुरभि किसी सामान्य वृषभको अपना पति बना सकती है?॥ ६॥
गच्छ शुम्भं निशुम्भं च वद सत्यं वचो मम।<br>कुरु युद्धं न चेद्याहि पाताल तरसाधुना॥ ७अब तुम शुम्भ-निशुम्भके पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो कि 'तुम मेरे साथ युद्ध करो; अन्यथा इसी समय शीघ्र पाताललोक चले जाओ'॥ ७॥
व्यास उवाच<br>कालिकाया वचः श्रुत्वा स दैत्यो धूम्रलोचनः।<br>तामुवाच महाभाग क्रोधसंरक्तलोचनः॥ ८**व्यासजी बोले—**हे महाभाग! देवी कालिकाका यह वचन सुनते ही वह दैत्य धूम्रलोचन क्रोधके मारे आँखें लाल करके उनसे कहने लगा—