देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ८ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३७
अ० ८ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३७
| नृसिंहेन च पाताले स्थापितः सोऽथ दैत्यराट्।<br>राज्यं चकार तत्रैव प्रजापालनतत्परः ॥ ११ | नृसिंहभगवान्ने उस दैत्यराज प्रह्लादको पाताललोकके राजसिंहासनपर स्थापित कर दिया था और वे वहींपर प्रजापालनमें तत्पर होकर राज्य करने लगे॥ ११॥ |
| कदाचिद् भृगुपुत्रोऽथ च्यवनाख्यो महातपाः।<br>जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थं वै व्याहृतीश्वरम् ॥ १२ | एक बार भृगुके पुत्र महातपस्वी च्यवन नर्मदामें स्नान करनेके लिये व्याहृतीश्वर नामक तीर्थमें पहुँचे ॥ १२ ॥ |
| रेवां महानदीं दृष्ट्वा ततस्तस्यामवातरत्।<br>उत्तरन्तं प्रजग्राह नागो विषभयङ्करः ॥ १३ | वहाँपर रेवा नामक महानदीको देखकर वे उसमें उतरने लगे। इसी बीच एक भयंकर विषधर सर्पने उतरते हुए मुनिको पकड़ लिया॥ १३॥ |
| गृहीतो भयभीतस्तु पाताले मुनिसत्तमः।<br>सस्मार मनसा विष्णुं देवदेवं जनार्दनम् ॥ १४ | तदनन्तर उन महामुनि च्यवनको वह नागराज खींचकर पाताललोकमें ले गया। तब उन भयाक्रान्त मुनिने मन-ही-मन देवाधिदेव जनार्दन विष्णुका स्मरण किया॥ १४॥ |
| संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः।<br>न प्राप च्यवनो दुःखं नीयमानो रसातलम् ॥ १५ | मुनि च्यवनके द्वारा हृदयसे कमलनयन भगवान् विष्णुका स्मरण किये जानेपर वह भयंकर सर्प विषहीन हो गया। अतएव रसातलमें ले जाये गये उन मुनिको कष्ट नहीं हुआ॥ १५॥ |
| द्विजिह्वेन मुनिस्त्यक्तो निर्विण्णेनातिशङ्किना।<br>मां शपेत मुनिः क्रुद्धस्तापसोऽयं महानिति॥ १६ | तत्पश्चात् अत्यन्त दुःखी तथा सशंकित उस सर्पने यह सोचकर उन्हें छोड़ दिया कि ये महातपस्वी मुनि क्रोधित होकर कहीं मुझे शाप न दे दें ॥ १६॥ |
| चचार नागकन्याभिः पूजितो मुनिसत्तमः।<br>विवेशाप्यथ नागानां दानवानां महत्पुरम् ॥ १७ | वहाँकी नागकन्याओंद्वारा पूजित होते हुए मुनिश्रेष्ठ च्यवन पाताललोकमें विचरण करने लगे। वे नागों तथा दानवोंके विशाल पुरमें भी आने-जाने लगे॥ १७॥ |
| कदाचिद् भृगुपुत्रं तं विचरन्तं पुरोत्तमे।<br>ददर्श दैत्यराजोऽसौ प्रह्लादो धर्मवत्सलः ॥ १८ | एक बार उन धर्मानुरागी दैत्यराज प्रह्लादने अपनी श्रेष्ठ पुरीमें विचरण करते हुए उन भृगुपुत्र मुनि च्यवनको देखा ॥ १८ ॥ |
| दृष्ट्वा तं पूजयामास मुनिं दैत्यपतिस्तदा।<br>पप्रच्छ कारणं किं ते पातालागमने वद ॥ १९ | मुनिको देखकर दैत्यराज प्रह्लादने उनकी पूजा की और उनसे पूछा कि पाताललोकमें आपके आगमनका क्या कारण है, आप मुझे बताइये ? ॥ १९॥ |
| प्रेषितोऽसि किमिन्द्रेण सत्यं ब्रूहि द्विजोत्तम।<br>दैत्यविद्वेषयुक्तेन मम राज्यदिदृक्षया॥ २० | हे द्विजश्रेष्ठ! क्या दैत्योंके प्रति द्वेष-भाव रखनेवाले इन्द्रने मेरे राज्यके विषयमें जानकारीके लिये आपको यहाँ भेजा है ? आप मुझे सच-सच बताइये॥ २०॥ |
| च्यवन उवाच<br>किं मे मघवता राजन् यदहं प्रेषितः पुनः।<br>दूतकार्यं प्रकुर्वाणः प्राप्तवान्नगरे तव ॥ २१ | च्यवन बोले— हे राजन् ! इन्द्रसे मेरा क्या प्रयोजन है, जो कि वे मुझे यहाँ भेजें और मैं उनके दूतका कार्य करता हुआ आपके नगरमें घूमता फिरूँ ? ॥ २१॥ |
| ४३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| विद्धि मां भृगुपुत्रं तं स्वनेत्रं धर्मतत्परम्।<br>मा शङ्कां कुरु दैत्येन्द्र वासवप्रेषितस्य वै॥ २२ | हे दैत्यराज! आप मुझे महर्षि भृगुका धर्मनिष्ठ तथा ज्ञाननेत्रसम्पन्न पुत्र च्यवन जानिये। आप मेरे प्रति इन्द्रके द्वारा भेजे गये किसी दूतकी शंका मत करें॥ २२॥ |
| स्नानार्थं नर्मदां प्राप्तः पुण्यतीर्थे नृपोत्तम।<br>नद्यामेवावतीर्णोऽहं गृहीतश्च महाहिना॥ २३ | हे नृपश्रेष्ठ! मैं नर्मदानदीमें स्नान करनेके लिये पुण्यतीर्थमें गया था। मैं नदीमें उतरा ही था कि एक विशाल सर्पने मुझे पकड़ लिया॥ २३॥ |
| जातोऽसौ निर्विषः सर्पो विष्णोः संस्मरणादिव।<br>मुक्तोऽहं तेन नागेन प्रभावात्स्मरणस्य वै॥ २४ | मेरे द्वारा भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे वह सर्प विषहीन हो गया और विष्णुस्मरणके प्रभावसे मैं उस नागसे मुक्त हो गया॥ २४॥ |
| अत्रागतेन राजेन्द्र मयाप्तं तव दर्शनम्।<br>विष्णुभक्तोऽसि दैत्येन्द्र तद्भक्तं मां विचिन्तय॥ २५ | हे राजेन्द्र! यहाँ आनेसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया। हे दैत्यराज! आप भगवान् विष्णुके भक्त हैं और मुझे भी उनका भक्त ही समझिये॥ २५॥ |
| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचः श्लक्ष्णं हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>पप्रच्छ परया प्रीत्या तीर्थानि विविधानि च॥ २६ | व्यासजी बोले—महर्षि च्यवनका मधुर वचन सुनकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद अत्यन्त प्रेमपूर्वक नानाविध तीर्थोंके विषयमें उनसे पूछने लगे॥ २६॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>पृथिव्यां कानि तीर्थानि पुण्यानि मुनिसत्तम।<br>पाताले च तथाकाशे तानि नो वद विस्तरात्॥ २७ | प्रह्लाद बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! पृथ्वी, पाताल तथा आकाशमें कौन-कौनसे पवित्र तीर्थ हैं? उनके सम्बन्धमें विस्तारपूर्वक मुझे बताइये॥ २७॥ |
| च्यवन उवाच<br>मनोवाक्कायशुद्धानां राजंस्तीर्थं पदे पदे।<br>तथा मलिनचित्तानां गङ्गापि कीकटाधिका॥ २८ | च्यवन बोले—हे राजन्! मन, वचन तथा कर्मसे शुद्ध प्राणियोंके लिये तो पद-पदपर तीर्थ हैं, किंतु दूषित मनवाले प्राणियोंके लिये गंगा भी मगधसे अधिक अपवित्र हो जाती हैं॥ २८॥ |
| प्रथमं चेन्मनः शुद्धं जातं पापविवर्जितम्।<br>तदा तीर्थानि सर्वाणि पावनानि भवन्ति वै॥ २९<br><br>गङ्गातीरे हि सर्वत्र वसन्ति नगराणि च।<br>व्रजाश्चैवाकरा ग्रामाः सर्वे खेटास्तथापरे॥ ३०<br><br>निषादानां निवासाश्च कैवर्तानां तथापरे।<br>हूणबङ्गरवसानां च म्लेच्छानां दैत्यसत्तम॥ ३१<br><br>पिबन्ति सर्वदा गाङ्गं जलं ब्रह्मोपमं सदा।<br>स्नानं कुर्वन्ति दैत्येन्द्र त्रिकालं स्वेच्छया जनाः॥ ३२<br><br>तत्रैकोऽपि विशुद्धात्मा न भवत्येव मारिष।<br>किं फलं तर्हि तीर्थस्य विषयोपहतात्मसु॥ ३३ | यदि मनुष्यका मन शुद्ध तथा पापरहित हो गया तो उसके लिये सभी तीर्थ पवित्र हो जाते हैं। गंगाके तटपर तो सर्वत्र नानाविध नगर, गोष्ठ (गायोंका बाड़ा), बाजार, गाँव तथा अनेक कस्बे वहाँ बसे हैं। हे दैत्यराज! निषादों, धीवरों, हूणों, बंगों, खसों तथा म्लेच्छ जातियोंका निवास भी वहाँ रहता है। हे दैत्येन्द्र! वे सदैव ब्रह्मसदृश गंगाजलका पान करते हैं और अपनी इच्छासे त्रिकाल गंगा-स्नान भी करते हैं। किंतु हे धर्मात्मन्! उनमेंसे कोई एक भी शुद्ध अन्तःकरणवाला नहीं हो पाता। तब नानाविध वासनाओंसे प्रदूषित चित्तवाले लोगोंके लिये तीर्थका क्या फल हो सकता है?॥ २९—३३॥ |
| अ० ८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| कारणं मन एवात्र नान्यद्राजन्विचिन्तय ।<br>मनःशुद्धिः प्रकर्तव्या सततं शुद्धिमिच्छता ॥ ३४ | हे राजन्! आप यह निश्चित समझिये कि मन ही इसमें प्रमुख कारण है; इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं। अतः शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको निरन्तर अपने मनको शुद्ध बनाये रखना चाहिये ॥ ३४ ॥ |
| तीर्थवासी महापापी भवेत्तत्रात्मवञ्चनात् ।<br>तत्रैवाचरितं पापमानन्त्याय प्रकल्पते ॥ ३५ | तीर्थमें निवास करनेवाला प्राणी भी आत्मवंचनाके कारण महापापी हो जाता है। वहाँ किया गया पाप अनन्तगुना हो जाता है ॥ ३५ ॥ |
| यथेन्द्रवारुणं पक्वं मिष्टं नैवोपजायते ।<br>भावदुष्टस्तथा तीर्थे कोटिस्नातो न शुध्यति ॥ ३६ | जिस प्रकार इन्द्रवारुणका फल पक जानेपर भी मीठा नहीं होता, उसी प्रकार दूषित भावनाओंवाला मनुष्य तीर्थमें करोड़ों बार स्नान करके भी पवित्र नहीं हो पाता ॥ ३६ ॥ |
| प्रथमं मनसः शुद्धिः कर्तव्या शुभमिच्छता ।<br>शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा ॥ ३७ | अतः कल्याणकी कामना करनेवाले पुरुषको सर्वप्रथम अपने मनको शुद्ध कर लेना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर द्रव्यशुद्धि स्वतः हो जाती है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ३७ ॥ |
| तथैवाचारशुद्धिः स्यात्ततस्तीर्थं प्रसिध्यति ।<br>अन्यथा तु कृतं सर्वं व्यर्थं भवति तत्क्षणात् ॥ ३८ | उसी प्रकार आचार-शुद्धि भी आवश्यक है; इसके अनन्तर ही तीर्थयात्राकी पूर्ण सिद्धि होती है। इसके विपरीत उसका किया हुआ सारा कर्म उसी क्षण व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥ |
| ( हीनवर्णस्य संसर्गं तीर्थे गत्वा सदा त्यजेत् । )<br>भूतानुकम्पनं चैव कर्तव्यं कर्मणा धिया ।<br>यदि पृच्छसि राजेन्द्र तीर्थं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ॥ ३९ | (तीर्थमें पहुँचकर नीच प्राणीके संसर्गका सर्वदाके लिये त्याग कर देना चाहिये।) कर्म तथा बुद्धिसे प्राणियोंके प्रति सदा दयाभाव रखना चाहिये। फिर भी हे राजेन्द्र! यदि आप पूछते ही हैं तो मैं आपको प्रमुख तीर्थोंके विषयमें बता रहा हूँ ॥ ३९ ॥ |
| प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।<br>अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले ॥ ४०<br><br>पावनानि च स्थानानि बहूनि नृपसत्तम । | प्रथम श्रेणीका तीर्थ पुण्यमय नैमिषारण्य है। इसी प्रकार चक्रतीर्थ, पुष्करतीर्थ तथा अन्य भी अनेक तीर्थ पृथ्वीलोकमें हैं, जिनकी संख्या निश्चित नहीं है। हे नृपश्रेष्ठ! और भी बहुत-से पवित्र स्थान हैं ॥ ४० १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नैमिषं गन्तुमुद्यतः ॥ ४१ | व्यासजी बोले— च्यवनऋषिका वचन सुनकर राजा प्रह्लाद नैमिषारण्यतीर्थ जानेको तैयार हो गये। हर्षातिरेकसे परिपूर्ण हृदयवाले प्रह्लादने अन्य दैत्योंको भी चलनेकी आज्ञा दी ॥ ४१ १/२ ॥ |
| नोदयामास दैत्यान्वै हर्षनिर्भरमानसः ।<br><br>प्रह्लाद उवाच<br>उत्तिष्ठन्तु महाभागा गमिष्यामोऽद्य नैमिषम् ॥ ४२<br>द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् । | प्रह्लाद बोले— हे महाभाग दैत्यगण ! आपलोग उठिये, हम सभी लोग आज नैमिषारण्य चलेंगे। वहाँ हमलोग पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् अच्युत (विष्णु)-का दर्शन करेंगे ॥ ४२ १/२ ॥ |