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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१

अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकतश्च सुराः सर्वे युद्धाय समुपस्थिताः ।<br>एकतो बलवांस्त्वाष्ट्रः संग्रामे समवर्तत ॥ ४०युद्ध करनेके लिये संग्राममें एक ओर सभी देवता उपस्थित थे तो दूसरी ओर त्वष्टाका बलशाली पुत्र वृत्रासुर डटा हुआ था ॥ ४० ॥
यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वरमदावृतः ।<br>पराजितस्तदा शक्रस्तेजसा तस्य धर्षितः ॥ ४१वरदानके अहंकारसे उन्मत्त वृत्रासुरका उत्कर्ष जब रणमें प्रबल हो गया, तब उसके तेजसे पराक्रमहीन इन्द्र पराजित हो गये ॥ ४१ ॥
विव्यथे मघवा युद्धे ततः प्राप्य पराजयम् ।<br>विषादमगमन्देवा दृष्ट्वा शक्रं पराजितम् ॥ ४२उससे युद्धमें पराजय प्राप्त करके इन्द्रको बहुत व्यथा हुई और उन्हें पराजित देखकर देवगण भी विषादग्रस्त हो गये ॥ ४२ ॥
जग्मुस्त्यक्त्वा रणं सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः ।<br>गृहीतं देवसदनं वृत्रेणागत्य रंहसा ॥ ४३तब इन्द्र आदि समस्त देवता युद्ध छोड़कर भाग गये और वृत्रासुरने शीघ्रतापूर्वक आकर अमरावतीपर अधिकार कर लिया ॥ ४३ ॥
देवोद्यानानि सर्वाणि भुङ्क्तेऽसौ दानवो बलात् ।<br>ऐरावतोऽपि दैत्येन गृहीतोऽसौ गजोत्तमः ॥ ४४अब वह दानव समस्त देवोद्यानोंका बलपूर्वक उपभोग करने लगा। उस दैत्य वृत्रासुरके द्वारा गजश्रेष्ठ ऐरावत भी अधिकारमें कर लिया गया ॥ ४४ ॥
विमानानि च सर्वाणि गृहीतानि विशाम्पते ।<br>उच्चैःश्रवा हयवरो जातस्तस्य वशे तदा ॥ ४५हे राजन्! तत्पश्चात् उसने समस्त विमानोंको ग्रहण कर लिया और अश्वश्रेष्ठ उच्चैःश्रवाको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ४५ ॥
कामधेनुः पारिजातो गणश्चाप्सरसां तथा ।<br>गृहीतं रत्नमात्रं तु तेन त्वष्टृसुतेन ह ॥ ४६उसी प्रकार कामधेनु, कल्पवृक्ष, अप्सराओंका समूह तथा रत्न आदि जो कुछ था; वह सब उस त्वष्टापुत्र वृत्रने अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४६ ॥
स्थानभ्रष्टाः सुराः सर्वे गिरिदुर्गेषु संस्थिताः ।<br>दुःखमापुः परिभ्रष्टा यज्ञभागात्सुरालयात् ॥ ४७अब राज्यच्युत होकर सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओंमें रहकर अत्यन्त दुःख प्राप्त करने लगे। वे यज्ञभाग और देवसदन—दोनोंसे वंचित हो गये ॥ ४७ ॥
वृत्रः सुरपदं प्राप्य बभूव मदगर्वितः ।<br>त्वष्टातीव सुखं प्राप्य मुमोद सुतसंयुतः ॥ ४८वृत्रासुर देव-राज्य पाकर मदोन्मत्त हो गया। त्वष्टा भी अत्यन्त सुख प्राप्तकर पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४८ ॥
अमन्त्रयन्हितं देवा मुनिभिः सह भारत ।<br>किं कर्तव्यमिति प्राप्ते विचिन्त्य भयमोहिताः ॥ ४९<br><br>जग्मुः कैलासमचलं सुराः शक्रसमन्विताः ।<br>महादेवं प्रणम्योचुः प्रह्वाः प्राञ्जलयो भृशम् ॥ ५०हे भारत! देवगण अपने कल्याणके लिये मुनियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगे कि इस स्थितिके प्राप्त होनेपर अब हमें क्या करना चाहिये—ऐसा विचार करके भयमोहित वे देवगण इन्द्रके साथ कैलासपर्वतपर गये और वहाँ देवाधिदेव भगवान् शंकरको प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहने लगे— ॥ ४९-५० ॥
देवदेव महादेव कृपासिन्धो महेश्वर ।<br>रक्षास्मान्भयभीतांस्तु वृत्रेणातिपराजितान् ॥ ५१हे देव! हे महादेव! हे कृपासागर! हे महेश्वर! वृत्रासुरसे पूर्णतः पराजित हम भयभीत देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ५१ ॥
७४२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

| गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा।<br>किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः॥ ५२ | हे देव! उस महाबलीने देवलोकपर अधिकार कर लिया है। हे शम्भो! हे शिव! अब हमें क्या करना चाहिये, आप हमें सही-सही बताइये॥ ५२॥ |
| किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर।<br>दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर॥ ५३ | हे महेश्वर! हम राज्यभ्रष्ट क्या करें और कहाँ जायँ? हे ईश्वर! हम इस दुःखके विनाशके लिये कोई भी उपाय नहीं जान पा रहे हैं॥ ५३॥ |
| साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे।<br>वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो॥ ५४ | हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिये। हे कृपानिधान! हम सब बहुत दुःखी हैं। हे विभो! वरदानके प्रभावसे मदोन्मत्त वृत्रासुरका वध कीजिये॥ ५४॥ |
| शिव उवाच<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम्।<br>गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम्॥ ५५ | शिवजी बोले—ब्रह्माजीको आगे करके हमलोग विष्णुलोक चल करके वहाँ उन श्रीहरिके पास जाकर उस वृत्रासुरके वधके उपायपर विचार करेंगे॥ ५५॥ |
| स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः।<br>शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः॥ ५६ | वे जनार्दन भगवान् विष्णु शक्तिशाली, छलकार्यमें निपुण, बलवान्, सबसे बुद्धिमान्, शरणदाता और दयाके सागर हैं॥ ५६॥ |
| विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति।<br>तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये॥ ५७ | उन देवदेवेशके बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये हमें वहीं चलना चाहिये॥ ५७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः।<br>जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम्॥ ५८ | व्यासजी बोले—ऐसा विचारकर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता शरणदाता और भक्तवत्सल भगवान् विष्णुके लोक गये॥ ५८॥ |
| गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम्॥ ५९ | वैकुण्ठधाममें पहुँचकर वे देवता वेदोक्त पुरुषसूक्तसे उन परमेश्वर जगद्गुरु श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५९॥ |
| प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः।<br>सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरःस्थितः॥ ६० | तब भगवान् जगन्नाथ कमलापति विष्णु उनके सम्मुख उपस्थित हो गये और सभी देवताओंका सम्मान करके उनसे बोले—॥ ६०॥ |
| किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः।<br>कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः॥ ६१ | हे लोकपालगण! आपलोग ब्रह्मा और शिवजीके साथ यहाँ क्यों आये हैं? हे श्रेष्ठ देवताओ! आप सभी अपने आगमनका कारण बतायें॥ ६१॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम्।<br>चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वे प्राञ्जलयस्तथा॥ ६२ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी देवगण उन रमापतिसे कुछ बोल न सके और वे चिन्तातुर होकर हाथ जोड़े खड़े ही रहे॥ ६२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मनेतृत्वे सेन्द्रैः सुरैर्विष्णोः शरणगमनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥