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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

पञ्चमः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>भवता कथितं सूत महदाख्यानमुत्तमम्।<br>कृष्णस्य चरितं दिव्यं सर्वपातकनाशनम्॥ १ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने यह बहुत ही उत्तम कथा कही, जिसमें भगवान् श्रीकृष्णके सर्वपापविनाशक तथा अलौकिक चरित्रका वर्णन है॥ १॥
सन्देहोऽत्र महाभाग वासुदेवकथानके।<br>जायते नः प्रोच्यमाने विस्तरेण महामते॥ २हे महाभाग! हे महामते! [आपके द्वारा] विस्तारपूर्वक कहे जा रहे श्रीकृष्णके इस कथानकमें हमें सन्देह हो रहा है॥ २॥
वने गत्वा तपस्तप्तं वासुदेवेन दुष्करम्।<br>विष्णोरंशावतारेण शिवस्याराधनं कृतम्॥ ३<br><br>वरप्रदानं देव्या च पार्वत्या यत्कृतं पुनः।<br>जगन्मातुश्च पूर्णायाः श्रीदेवीव्या अंशभूतया॥ ४<br><br>ईश्वरेणापि कृष्णेन कुतस्तौ सम्प्रपूजितौ।<br>न्यूनता वा किमस्त्यस्य तदेवं संशयो मम॥ ५[एक तो] विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णने वनमें जाकर घोर तप किया और शिवकी आराधना की; पुनः जगज्जननी श्रीदेवी भगवती पूर्णाकी अंशस्वरूपा देवी पार्वती ने श्रीकृष्णको जो वरदान दिया; ईश्वर होते हुए भी श्रीकृष्णने शिव तथा पार्वतीकी उपासना क्यों की? क्या श्रीकृष्णमें शिवकी अपेक्षा कोई न्यूनता थी? यही हमारा सन्देह है॥ ३—५॥
सूत उवाच<br>शृणुध्वं कारणं तत्र मया व्यासश्रुतञ्च यत्।<br>प्रब्रवीमि महाभागाः कथां कृष्णगुणान्विताम्॥ ६सूतजी बोले—हे महाभाग मुनिगण! व्यासजीसे इसका जो कारण मैंने सुना है, उसे आपलोग सुनिये। अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंसे परिपूर्ण कथा कहता हूँ॥ ६॥
वृत्तान्तं व्यासतः श्रुत्वा वैराटीसुतजस्तदा।<br>पुनः पप्रच्छ मेधावी सन्देहं परमं गतः॥ ७व्यासजीसे यह वृत्तान्त सुनकर प्रतिभावान् राजा जनमेजय और भी अधिक सन्देहमें पड़ गये; तब उन्होंने फिर पूछा॥ ७॥
जनमेजय उवाच<br>सम्यक्सत्यवतीसूनो श्रुतं परमकारणम्।<br>तथापि मनसो वृत्तिः संशयं न विमुञ्चति॥ ८जनमेजय बोले—हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मैंने परमकारणस्वरूपा भगवतीके विषयमें सुना। फिर भी मनकी वृत्ति संशयसे मुक्त नहीं हो पा रही है॥ ८॥
कृष्णेनाराधितः शम्भुस्तपस्तप्त्वातिदारुणम्।<br>विस्मयोऽयं महाभाग देवदेवेन विष्णुना॥ ९हे महाभाग! मुझे यह महान् विस्मय है कि देवोंके भी देव विष्णुके अंशसे उत्पन्न श्रीकृष्णने अति उग्र तपस्या करके भगवान् शिवकी आराधना की। जो
५३२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १ ]
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यः सर्वात्मापि सर्वेशः सर्वसिद्धिप्रदः प्रभुः।<br>स कथं कृतवान्घोरं तपः प्राकृतवद्धरिः॥ १०<br>जगत्कर्तुं क्षमः कृष्णस्तथा पालयितुं क्षमः।<br>संहर्तुमपि कस्मात्स दारुणं तप आचरत्॥ ११सभी जीवोंकी आत्मा, सभीके ईश्वर और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं—उन भगवान् कृष्णने भी सामान्य प्राणियोंकी भाँति घोर तप क्यों किया? भगवान् श्रीकृष्ण तो जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ हैं; तब भी उन्होंने इतनी उग्र तपस्या किसलिये की?॥ ९—११॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
सत्यमुक्तं त्वया राजन् वासुदेवो जनार्दनः।<br>क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसूदनः॥ १२<br>तथापि मानुषं देहमाश्रितः परमेश्वरः।<br>कृतवान्मानुषान्भावान्वर्णाश्रमसमाश्रितान्॥ १३<br>वृद्धानां पूजनं चैव गुरुपादाभिवन्दनम्।<br>ब्राह्मणानां तथा सेवा देवताराधनं तथा॥ १४<br>शोके शोकाभियोगश्च हर्षे हर्षसमुन्नतिः।<br>दैन्यं नानापवादाश्च स्त्रीषु कामोपसेवनम्॥ १५<br>कामः क्रोधस्तथा लोभः काले काले भवन्ति हि।<br>तथा गुणमये देहे निर्गुणत्वं कथं भवेत्॥ १६हे राजन्! आपने सत्य कहा है। दैत्यदमन भगवान् वासुदेव देवताओंके सभी कार्य करनेमें समर्थ थे; फिर भी उन परमेश्वर श्रीकृष्णने मानव-देह धारण करनेके कारण वर्णाश्रमधर्मसे सम्बन्धित मानवोचित कार्य सम्पादित किये थे। उन्होंने वृद्धजनोंकी पूजा, गुरु-जनोंकी चरण-वन्दना, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा देवताओंकी आराधना की। शोकके अवसरपर वे शोकाकुल हुए तथा हर्षकी स्थितिमें हर्षित हुए। [अवसरके अनुसार] उन्होंने दीनताका प्रदर्शन किया, नानाविध लोकापवादोंको सहन किया तथा अपनी स्त्रियोंके साथ लीला-विहार किया। जिस प्रकार मानवमें समय-समयपर काम, क्रोध तथा लोभ होते रहते हैं, उसी प्रकारके भाव उनके भी मनमें जाग्रत् हुए; क्योंकि गुणमय देहमें निर्गुणत्व कैसे हो सकता है?॥ १२—१६॥
सौबलीशापजाद्दोषत्तथा ब्राह्मणशापजात्।<br>निधनं यादवानां तु कृष्णदेहस्य मोचनम्॥ १७सुबलसुता गान्धारी तथा ब्राह्मण अष्टावक्रके शापजनित दोषके कारण यादवोंका विनाश हुआ और भगवान् कृष्णको देह-त्याग करना पड़ा॥ १७॥
हरणं लुण्ठनं तद्वत्तत्पत्नीनां नराधिप।<br>अर्जुनस्यास्त्रमोक्षे च क्लीबत्वं तस्करेषु च॥ १८हे राजन्! उसी प्रकार उनकी स्त्रियोंका हरण हुआ, उनका धन लूट लिया गया तथा अर्जुन उन लुटेरोंपर अपना अस्त्र चलानेमें पुरुषार्थहीन हो गये॥ १८॥
अज्ञत्वं हरणे गेहात्तत्प्रद्युम्नानिरुद्धयोः।<br>एवं मानुषदेहेऽस्मिन्मानुषं खलु चेष्टितम्॥ १९श्रीकृष्णको अपने घरसे प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके हरणकी जानकारी नहीं हो पायी। इस प्रकार यह मानव-शरीर पाकर उन्होंने साधारण प्राणीकी भाँति सभी मानवीय चेष्टाओंका प्रदर्शन किया॥ १९॥
विष्णोरंशावतारेऽस्मिन्नारायणमुनेस्तथा ।<br>अंशजे वासुदेवेऽत्र किं चित्रं शिवसेवने॥ २०तब भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा साक्षात् नारायणके अंशसे उत्पन्न इन श्रीकृष्णने यदि शिवजीकी उपासना की तो इसमें आश्चर्य क्या?॥ २०॥
स हि सर्वेश्वरो देवो विष्णोरपि च कारणम्।<br>सुषुप्तस्थाननाथः स विष्णुना च प्रपूजितः॥ २१वे प्रभु सबके ईश्वर हैं तथा विष्णुकी भी उत्पत्तिके कारण हैं। वे सुषुप्तस्थान (कारण-देह)-के स्वामी हैं। इसीलिये वे विष्णुके द्वारा भी पूजित
अ० १ ]पञ्चम स्कन्ध५३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदंशभूताः कृष्णाद्यास्तैः कथं न स पूज्यते।<br>अकारो भगवान्ब्रह्माप्युकारः स्याद्धरिः स्वयम्॥ २२<br><br>मकारो भगवान् रुद्रोऽप्यर्धमात्रा महेश्वरी।<br>उत्तरोत्तरभावेनाप्युत्तमत्वं स्मृतं बुधैः॥ २३हैं। कृष्ण आदि उन्हीं विष्णुके अंशसे अवतीर्ण हैं तब वे शिवकी पूजा क्यों नहीं करेंगे? ॐकारका 'अ' ब्रह्माका रूप है, 'उ' विष्णुका रूप है, 'म्' भगवान् शिवका रूप है और अर्धमात्रा (चन्द्रबिन्दु) भगवती महेश्वरीका रूप है। ये उत्तरोत्तर क्रमसे एक-दूसरेसे उत्तम हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है॥ २१—२३॥
अतः सर्वेषु शास्त्रेषु देवी सर्वोत्तमा स्मृता।<br>अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥ २४अतएव समस्त शास्त्रोंमें देवी सर्वोत्तम मानी गयी हैं। वे भगवती बिन्दुरूप नित्य अर्धमात्रामें स्थित हैं, जो [अर्धमात्रा] विशेषरूपसे उच्चारित नहीं की जा सकती॥ २४॥
विष्णोरप्यधिको रुद्रो विष्णुस्तु ब्रह्मणोऽधिकः।<br>तस्मान्न संशयः कार्यः कृष्णेन शिवपूजने॥ २५ब्रह्माजीसे भी बढ़कर विष्णु तथा विष्णुसे भी बढ़कर भगवान् शिव हैं। अतः श्रीकृष्णद्वारा शिवकी आराधनामें किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २५॥
इच्छया ब्रह्मणो वक्त्राद्वरदानार्थमुद्बभौ।<br>मूलरुद्रस्यांशभूतो रुद्रनामा द्वितीयकः॥ २६<br><br>सोऽपि पूज्योऽस्ति सर्वेषां मूलरुद्रस्य का कथा।<br>देवीतत्त्वस्य सान्निध्यादुत्तमत्वं स्मृतं शिवे॥ २७सृजन-कार्यके लिये जब ब्रह्माजीने शिवकी उपासना की तब इच्छापूर्वक उन्हें वरदान देनेके लिये शिवजी उन्हींके मुखसे प्रकट हो गये, जो मूलरुद्र कहलाये। पुनः उन मूलरुद्रके अंशसे द्वितीय रुद्र उत्पन्न हुए। वे रुद्रदेव भी सबके पूजनीय हैं तो फिर मूलरुद्रके विषयमें कहना ही क्या? देवीतत्त्वके सांनिध्यमें रहनेके कारण ही शिवजीमें उत्तमता कही गयी है॥ २६-२७॥
अवतारा हरेरेवं प्रभवन्ति युगे युगे।<br>योगमायाप्रभावेण नात्र कार्या विचारणा॥ २८भगवती योगमायाके ही प्रभावसे प्रत्येक युगमें भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार होते रहते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २८॥
या नेत्रपक्ष्मपरिसञ्चलनेन सम्य-<br> ग्विश्‍वं सृजत्यवति हन्ति निगूढभावा।<br>सैषा करोति सततं द्रुहिणाच्युतेशान्<br> नानावतारकलने परिभूयमानान्॥ २९अत्यन्त निगूढ रहस्योंवाली जो भगवती अप्रत्यक्षरूपसे नेत्रकी पलक झँपनेमात्रमें भलीभाँति जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार कर देती हैं; वे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको अनेकविध रूपोंमें अवतार ग्रहण करनेमें निरन्तर दुःखोंसे व्याकुल करती रहती हैं॥ २९॥
सूतीगृहाद् व्रजनमप्यनया नियुक्तं<br> संगोपितश्च भवने पशुपालराज्ञः।<br>सम्प्रापितश्च मथुरां विनियोजितश्च<br> श्रीद्वारकाप्रणयने ननु भीतचित्तः॥ ३०इन्हीं योगमायाके द्वारा श्रीकृष्णको प्रसूतिगृहसे निकालकर गोपराज नन्दके भवनमें पहुँचाकर उनकी रक्षा की गयी। वे योगमाया ही कंसके विनाशार्थ श्रीकृष्णको मथुरा ले गयीं। जरासन्धसे अत्यन्त भयाक्रान्त चित्तवाले श्रीकृष्णको द्वारका बनानेकी प्रेरणा भी उन्हीं भगवतीने दी॥ ३०॥