देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| सम्भवन्ति तदाकारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः।<br>युद्धं पुनस्ते कुर्वन्ति पुरुषा रक्तसम्भवाः॥ ३७<br>अतः सोऽपि महावीर्यः संग्रामेऽतीव दुर्जयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां रक्तबीजो महासुरः॥ ३८ | और वे सभी पुनः युद्ध करने लगते थे। इसलिये संग्राममें महापराक्रमी तथा अजेय समझा जानेवाला वह महान् असुर रक्तबीज सभी प्राणियोंसे अवध्य हो गया था॥ ३४-३८॥ |
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| अन्ये च बहवः शूराश्चतुरङ्गसमन्विताः।<br>शुम्भञ्च नृपतिं मत्वा बभूवुस्तस्य सेवकाः॥ ३९ | इसके अतिरिक्त चतुरंगिणी सेनासे युक्त अन्य बहुत-से पराक्रमी दानव भी शुम्भको अपना राजा मानकर उसके सेवक बन गये॥ ३९॥ |
| असंख्याता तदा जाता सेना शुम्भनिशुम्भयोः।<br>पृथिव्याः सकलं राज्यं गृहीतं बलवत्तया॥ ४० | उस समय शुम्भ और निशुम्भके पास असंख्य सेना हो गयी थी और उन्होंने अपने बलके प्रभावसे भूमण्डलका सम्पूर्ण राज्य अपने अधिकारमें कर लिया॥ ४०॥ |
| सेनायोगं तदा कृत्वा निशुम्भः परवीरहा।<br>जगाम तरसा स्वर्गे शचीपतिजयाय च॥ ४१<br>चकारासौ महायुद्धं लोकपालैः समन्ततः।<br>वृत्रहा वज्रपातेन ताडयामास वक्षसि॥ ४२<br>स वज्राभिहतो भूमौ पपात दानवानुजः।<br>भग्नं बलं तदा तस्य निशुम्भस्य महात्मनः॥ ४३ | तत्पश्चात् शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले निशुम्भने अपनी सेना सुसज्जित करके इन्द्रको जीतनेहेतु बड़े वेगसे स्वर्गके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] उसने लोकपालोंके साथ घोर युद्ध किया। तब इन्द्रने उसके वक्षपर वज्रसे प्रहार किया। उस वज्राघातसे आहत होकर दानव शुम्भका छोटा भाई निशुम्भ भूमिपर गिर पड़ा। तब परम साहसी उस निशुम्भकी सेना भाग गयी॥ ४१-४३॥ |
| भ्रातरं मूर्च्छितं श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः।<br>तत्रागत्य सुरान्सर्वांस्ताडयामास सायकैः॥ ४४ | अपने भाईको मूर्च्छित हुआ सुनकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला शुम्भ वहाँ आकर सभी देवताओंको बाणोंसे मारने लगा॥ ४४॥ |
| कृतं युद्धं महत्तेन शुम्भेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निर्जितास्तु सुराः सर्वे सेन्द्राः पालाश्च सर्वशः॥ ४५ | इस प्रकार किसी भी कार्यको कठिन न समझनेवाले उस शुम्भने भीषण युद्ध किया और इन्द्रसहित सभी देवताओं तथा लोकपालोंको पराजित कर दिया॥ ४५॥ |
| ऐन्द्रं पदं तदा तेन गृहीतं बलवत्तया।<br>कल्पपादपसंयुक्तं कामधेनुसमन्वितम्॥ ४६<br>त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृतास्तेन महात्मना।<br>नन्दनं च वनं प्राप्य मुदितोऽभून्महासुरः॥ ४७<br>सुधायाश्चैव पानेन सुखमाप महासुरः। | तब उस शुम्भने अपने पराक्रमके प्रभावसे कल्पवृक्ष और कामधेनुसहित इन्द्रपदको अधिकारमें कर लिया। उस दुस्साहसी शुम्भने तीनों लोकोंपर आधिपत्य जमा लिया और देवताओंको मिलनेवाले यज्ञभागोंका हरण कर लिया। नन्दनवन पा करके वह महान् असुर आनन्दित हुआ और अमृतके पानसे उसे बहुत सुख मिला॥ ४६-४७ ½॥ |
| कुबेरं स च निर्जित्य तस्य राज्यं चकार ह॥ ४८<br>अधिकारं तथा भानोः शशिनश्च चकार ह।<br>यमञ्चैव विनिर्जित्य जग्राह तत्पदं तथा॥ ४९<br>वरुणस्य तथा राज्यं चकार वह्निकर्म च।<br>वायोः कार्यं निशुम्भश्च चकार स्वबलान्वितः॥ ५० | उसने कुबेरको जीतकर उनके राज्यपर अधिकार कर लिया और सूर्य तथा चन्द्रमाका भी अधिकार छीन लिया। उसने यमराजको परास्त करके उनका पद स्वयं ले लिया। इसी प्रकार अपने बलके प्रभावसे वरुणका राज्य अपने अधीन करके वह शुम्भ राज्य-शासन स्वयं करने लगा और अग्नि तथा वायुके कार्य स्वयं करने लगा॥ ४८-५०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 D
| अ० २१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४५ |
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| ततो देवा विनिर्धूता हृतराज्या हृतश्रियः।<br>सन्त्यज्य नन्दनं सर्वे निर्ययुर्गिरिगह्वरे ॥ ५१ | तब [असुरोंके द्वारा] तिरस्कृत और राज्य छिन जानेके कारण नष्ट शोभावाले सभी देवता नन्दनवन छोड़कर पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ |
| हृताधिकारास्ते सर्वे बभ्रमुर्विजने वने।<br>निरालम्बा निराधारा निस्तेजस्का निरायुधाः ॥ ५२<br><br>विचेरुरमराः सर्वे पर्वतानां गुहासु च।<br>उद्यानेषु च शून्युषु नदीनां गह्वरेषु च ॥ ५३ | अधिकारसे वंचित होकर वे सब निर्जन वनमें भटकने लगे। अब उनका कोई सहारा नहीं रहा, उनके रहनेकी जगह नहीं रही, वे तेजहीन और आयुधविहीन हो चुके थे। इस प्रकार सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओं, निर्जन उद्यानों और नदियोंकी घाटियोंमें विचरण करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ |
| न प्रापुस्ते सुखं क्वापि स्थानभ्रष्टा विचेतसः।<br>लोकपाला महाराज दैवाधीनं सुखं किल ॥ ५४ | हे महाराज! स्थानभ्रष्ट हो जानेके कारण उन बेचारे लोकपालोंको कहीं भी सुख नहीं मिल रहा था, और फिर यह सुनिश्चित भी है कि सुख सदा प्रारब्धके अधीन रहता है ॥ ५४ ॥ |
| बलवन्तो महाभागा बहुज्ञा धनसंयुताः।<br>काले दुःखं तथा दैन्यमाप्नुवन्ति नराधिप ॥ ५५ | हे नराधिप! बलशाली, बड़े भाग्यवान्, महान् ज्ञानी तथा धनसम्पन्न व्यक्ति भी विपरीत समय उपस्थित होनेपर दुःख तथा कष्ट पाते हैं ॥ ५५ ॥ |
| चित्रमेतन्महाराज कालस्यैव विचेष्टितम्।<br>यः करोति नरं तावद्राजानं भिक्षुकं ततः ॥ ५६<br><br>दातारं याचकं चैव बलवन्तं तथाबलम्।<br>पण्डितं विकलं कामं शूरं चातीव कातरम् ॥ ५७ | हे महाराज! उस कालकी गति बड़ी ही विचित्र होती है, जो एक साधारण मनुष्यको राजा बना देता है और उसके बाद राजाको भिखारी बना देता है। वही काल दाताको याचक, बलवान्को निर्बल, पण्डितको अज्ञानी और वीरको अत्यन्त कायर बना देता है ॥ ५६-५७ ॥ |
| मखानाञ्च शतं कृत्वा प्राप्येन्द्रासनमुत्तमम्।<br>पुनर्दुःखं परं प्राप्तं कालस्य गतिरीदृशी ॥ ५८ | सौ अश्वमेधयज्ञ करनेके बाद सर्वोत्कृष्ट इन्द्रासन प्राप्त करके भी बादमें समयके फेरसे इन्द्रको असीम कष्ट उठाना पड़ा था—कालकी ऐसी विचित्र गति होती है ॥ ५८ ॥ |
| कालः करोति धर्मिष्ठं पुरुषं ज्ञानसंयुतम्।<br>तमेवातीव पापिष्ठं ज्ञानलेशविवर्जितम् ॥ ५९ | समय ही मनुष्यको धर्मात्मा तथा ज्ञानवान् बनाता है और फिर उसी व्यक्तिको पापी तथा अत्यल्प ज्ञानसे भी हीन बना देता है ॥ ५९ ॥ |
| न विस्मयोऽत्र कर्तव्यः सर्वथा कालचेष्टिते।<br>ब्रह्मविष्णुहरादीनामपीदृक्कष्टचेष्टितम् ॥ ६०<br><br>विष्णुर्जननमाप्नोति सूकरादिषु योनिषु।<br>हरः कपाली सञ्जातः कालेनैव बलीयसा ॥ ६१ | अतः कालकी इस अद्भुत गतिके विषयमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये। यही काल ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी इसी प्रकार संकटमें डाल देता है। बलवान् कालके ही प्रभावसे भगवान् विष्णुको सूकर आदि योनियोंमें जन्म लेना पड़ा और शिवजीको कपाली होना पड़ा ॥ ६०-६१ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शुम्भनिशुम्भद्वारा स्वर्गविजयवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
| ६४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| पराजिताः सुराः सर्वे राज्यं शुम्भः शशास ह।<br>एवं वर्षसहस्रं तु जगाम नृपसत्तम॥ १ | हे नृपश्रेष्ठ! सभी देवता पराजित हो गये। इसके बाद शुम्भ राज्यपर शासन करने लगा। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १॥ |
| भ्रष्टराज्यास्ततो देवाश्चिन्तामापुः सुदुस्तराम्।<br>गुरुं दुःखातुरास्ते तु पप्रच्छुरिदमादृताः॥ २ | तत्पश्चात् राज्यच्युत होनेके कारण देवता महान् दुस्सह चिन्तामें पड़ गये। दुःखसे व्याकुल हुए वे देवता गुरु बृहस्पतिसे आदरपूर्वक यह पूछने लगे॥ २॥ |
| किं कर्तव्यं गुरो ब्रूहि सर्वज्ञस्त्वं महामुनिः।<br>उपायोऽस्ति महाभाग दुःखस्य विनिवृत्तये॥ ३<br><br>उपचारपरा नूनं वेदमन्त्राः सहस्रशः।<br>वाञ्छितार्थकरा नूनं सूत्रैः संलक्षिताः किल॥ ४<br><br>इष्टयो विविधाः प्रोक्ताः सर्वकामफलप्रदाः।<br>ताः कुरुष्व मुने नूनं त्वं जानासि च तत्क्रियाः॥ ५ | हे गुरो! अब हम क्या करें, आप हमें बतायें। आप सर्वज्ञ महामुनि हैं। हे महाभाग! दुःखकी निवृत्तिका उपाय भी तो होता है। हजारों ऐसे वैदिक मन्त्र हैं, जो उपचारोंसे परिपूर्ण हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं। सूत्रोंने उनका भलीभाँति निदर्शन भी किया है। सभी वांछित फल प्रदान करनेवाले अनेक प्रकारके यज्ञ भी बताये गये हैं। हे मुने! आप उनका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि आप उनकी क्रिया-विधिको भलीभाँति जानते हैं॥ ३—५॥ |
| विधिः शत्रुविनाशाय यथोद्दिष्टः सदागमे।<br>तं कुरुष्वाद्य विधिवद्यथा नो दुःखसंक्षयः॥ ६<br><br>भवेदांगिरसाद्यैव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>दानवानां विनाशाय अभिचारं यथामति॥ ७ | शत्रुओंके विनाशके लिये वेदमें जैसा उपाय बताया गया है, अब आप विधिपूर्वक उसका अनुष्ठान कीजिये, जिससे हमारे दुःखका पूर्णरूपसे नाश हो जाय। हे आंगिरस! दानवोंके विनाशके लिये आप अपनी बुद्धिके अनुसार आज ही अभिचारकर्म आरम्भ करनेकी कृपा कीजिये॥ ६-७॥ |
बृहस्पतिरुवाच | बृहस्पति बोले—
</div>| बृहस्पतिरुवाच | बृहस्पति बोले— |
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| सर्वे मन्त्राश्च वेदोक्ता दैवाधीनफलाश्र्च ते।<br>न स्वतन्त्राः सुराधीश तथैकान्तफलप्रदाः॥ ८ | हे देवराज! वेदोंमें बताये गये सभी मन्त्र प्रारब्धके अनुसार ही फल प्रदान करनेवाले हैं। वे स्वतन्त्र नहीं हैं और नियमके अनुसार ही फल प्रदान करते हैं॥ ८॥ |
| मन्त्राणां देवता यूयं ते तु दुःखैकभाजनम्।<br>जाताः स्म कालयोगेन किं करोमि प्रसाधनम्॥ ९ | उन मन्त्रोंके देवता तो आप ही लोग हैं। जब आपलोग स्वयं समयके फेरसे कष्टमें पड़े हुए हैं तो मैं कौन-सा उपाय करूँ?॥ ९॥ |
| इन्द्राग्निवरुणादीनां यजनं यज्ञकर्मसु।<br>ते यूयं विपदं प्राप्ताः करिष्यन्ति किमिष्टयः॥ १० | यज्ञ-कर्मोंमें इन्द्र, अग्नि, वरुण आदिकी पूजा की जाती है और वे आप सब देवता ही स्वयं विपत्ति भोग रहे हैं, तब यज्ञ क्या कर सकेंगे?॥ १०॥ |
| अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते।<br>उपायस्त्वथ कर्तव्य इति शिष्टानुशासनम्॥ ११ | अवश्यम्भावी घटनाओंका कोई प्रतीकार नहीं है; फिर भी [संकटसे बचनेके लिये] उपाय तो करना ही चाहिये, यह शिष्ट पुरुषोंका उपदेश है॥ ११॥ |
| अ० २२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दैवं हि बलवत्केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>उपायवादिनो दैवं प्रवदन्ति निरर्थकम्॥ १२<br>दैवं चैवाप्युपायश्च द्वावेवाभिमतौ नृणाम्।<br>केवलं दैवमाश्रित्य न स्थातव्यं कदाचन॥ १३<br>उपायः सर्वथा कार्यों विचार्य स्वधिया पुनः।<br>तस्माद् ब्रवीमि वः सर्वान्संविचार्य पुनः पुनः॥ १४ | कुछ विद्वान् कहते हैं कि दैव सबसे बलवान् होता है और उपायवादी लोग दैवको निरर्थक बताते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये दैव और उपाय दोनों ही आवश्यक माने गये हैं। मात्र दैवका आश्रय लेकर कभी भी बैठे नहीं रहना चाहिये। अपनी बुद्धिसे विचार करके सम्यक् रूपसे प्रयत्न करनेमें तत्पर हो जाना चाहिये। इसलिये भलीभाँति बार-बार सोच-विचारकर मैं आप सभीको उपाय बता रहा हूँ॥ १२—१४॥ |
| पुरा भगवती तुष्टा जघान महिषासुरम्।<br>युष्माभिस्तु स्तुता देवी वरदानं ददावथ॥ १५<br>आपदं नाशयिष्यामि संस्मृता वा सदैव हि।<br>यदा यदा वो देवेशा आपदो दैवसम्भवाः॥ १६<br>प्रभवन्ति तदा कामं स्मर्तव्याहं सुरैः सदा।<br>स्मृताहं नाशयिष्यामि युष्माकं परमापदः॥ १७ | पूर्वकालमें जब भगवती जगदम्बाने आपलोगोंपर प्रसन्न होकर महिषासुरका वध किया था, उस समय आपलोगोंके स्तुति करनेपर उन्होंने यह वरदान दिया था—‘आपलोगोंके स्मरण करनेपर मैं सदा आपलोगोंकी विपत्ति दूर करूँगी। हे देवेश्वरो! जब-जब आपलोगोंपर दैव-जन्य आपदाएँ आयें, तब-तब आप देवतागण मेरा ध्यान कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं आपलोगोंकी बड़ी-से-बड़ी विपत्तियोंका नाश कर दूँगी’॥ १५—१७॥ |
| तस्माद्धिमाचले गत्वा पर्वते सुमनोहरे।<br>आराधनं चण्डिकायाः कुरुध्वं प्रेमपूर्वकम्॥ १८<br>मायाबीजविधानज्ञास्तत्पुरश्चरणे रताः।<br>जानाम्यहं योगबलात्प्रसन्ना सा भविष्यति॥ १९ | अतः अब आपलोग परम रमणीक हिमालय-पर्वतपर जाकर प्रेमपूर्वक भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये। आपलोग मायाबीजके विधानके ज्ञाता हैं, उसीके पुरश्चरणमें तत्पर हो जाइये। मैं जानता हूँ कि इस अनुष्ठानके प्रभावसे वे भगवती प्रसन्न हो जायेंगी॥ १८-१९॥ |
| दुःखस्यान्तोऽद्य युष्माकं दृश्यते नात्र संशयः।<br>तस्मिञ्छैले सदा देवी तिष्ठतीति मया श्रुतम्॥ २०<br>स्तुता सम्पूजिता सद्यो वाञ्छितार्थान् प्रदास्यति।<br>निश्चयं परमं कृत्वा गच्छध्वं वै हिमालयम्॥ २१<br>सुराः सर्वाणि कार्याणि सा वः कामं विधास्यति। | अब आपलोगोंके दुःखका अन्त दिखायी पड़ रहा है; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने सुना है कि वे भगवती उस हिमालयपर्वतपर सदा विराजमान रहती हैं। उनकी स्तुति तथा विधिवत् पूजा करनेपर वे शीघ्र ही आपलोगोंको वांछित फल प्रदान करेंगी। अतः हे देवताओ! आपलोग दृढ़ निश्चय करके हिमालयपर्वतपर जाइये; वे भगवती आपलोगोंका कार्य अवश्य सिद्ध कर देंगी॥ २०—२१ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा देवास्ते प्रययुर्गिरिम्॥ २२<br>हिमालयं महाराज देवीध्यानपरायणाः।<br>मायाबीजं हृदा नित्यं जपन्तः सर्व एव हि॥ २३<br>नमश्चक्रुर्महामायां भक्तानामभयप्रदाम्।<br>तुष्टुवुः स्तोत्रमन्त्रैश्च भक्त्या परमया युताः॥ २४ | व्यासजी बोले— हे महाराज! उनका वचन सुनकर देवता हिमालयपर्वतपर चले गये। वहाँ देवीके ध्यानमें लीन होकर एकाग्र मनसे निरन्तर मायाबीज-मन्त्रका जप करते हुए उन सब देवताओंने भक्तोंके लिये अभयदायिनी महामाया भगवतीको प्रणाम किया और पूर्णभक्तिसे युक्त होकर स्तोत्र-मन्त्रोंसे वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे॥ २२—२४॥ |