देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।<br>मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९ | गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥ |
| महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।<br>आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चन्तः स्याः कथं मुने॥ ३० | पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान हैं। तब आप निःसंग कैसे हो पायेंगे ? और फिर हे मुने! भोजन आदिकी भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥ |
| दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।<br>तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१ | जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥ |
| विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।<br>न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२ | आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये हैं। मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है; क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हूँ॥ ३२॥ |
| सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।<br>न बद्धोऽस्मीति बुद्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३<br><br>त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।<br>इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४ | हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! 'मैं बद्ध नहीं हूँ' इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके विपरीत] 'मैं बद्ध हूँ'—इस शंकासे आप सर्वदा दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥ |
| देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।<br>तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५ | यह शरीर मेरा है—यही बन्धनका कारण है; यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह, सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।<br>आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६ | सूतजी बोले—महाराज जनककी बात सुनकर शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥ |
| आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७ | व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता पूछी॥ ३७॥ |
| स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः।<br>वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८<br><br>जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः।<br>स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९ | सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए महात्मा जनककी वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही स्थित हो गये॥ ३८-३९॥ |
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।<br>शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०<br>स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।<br>कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४१<br>कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।<br>ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२ | योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर दिया॥ ४०—४२॥ |
| अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।<br>ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३<br>कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।<br>ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४<br>पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।<br>मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निर्गलम्॥ ४५ | शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न हुआ॥ ४३—४५ १/२॥ |
| नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।<br>कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः॥ ४६<br>ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।<br>उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः॥ ४७<br>आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।<br>गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८<br>उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।<br>अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९<br>तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः। | उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। तब शुकदेवजीके उड़ते ही पर्वत-शिखर दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६—४९ १/२॥ |
| व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०<br>गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।<br>क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१<br>सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।<br>तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२ | इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर व्यासजी बार-बार 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहते हुए उस पर्वतकी चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया। आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनायी देती है॥ ५०—५२॥ |
| १७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसन्वितम्।<br>पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिप्लुतम्॥ ५३<br>शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत्।<br>व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः॥ ५४<br>परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः।<br>तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाऽशोकं विजानता॥ ५५<br>कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ। | अपने प्रिय पुत्र शुकदेवके विरहमें ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर विलाप करते हुए व्यासजीको शोक-सन्तप्त देखकर साक्षात् शंकरजी वहाँ आकर उन्हें सान्त्वना देने लगे—‘हे व्यासजी! आप शोक मत कीजिये; आपके पुत्र श्रेष्ठ योगवेत्ता हैं। उन्होंने अकृतात्माओंके लिये भी दुर्लभ परमगति प्राप्त कर ली है। अतः ब्रह्मज्ञान रखनेवाले आपको उन [ब्रह्मज्ञानी] शुकदेवके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये; हे पवित्रत्मन्! शुकदेवके समान पुत्रके द्वारा आपकी महान् कीर्ति हुई है’॥ ५३-५५ ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते॥ ५६<br>अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे। | व्यासजी बोले—‘हे देवेश! हे जगत्पते! मैं क्या करूँ, शोक दूर नहीं हो रहा है; पुत्र-दर्शनकी लालसावाले मेरे नेत्र अतृप्त हैं’॥ ५६ ½ ॥ |
| महादेव उवाच<br>छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम्॥ ५७<br>तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप। | महादेवजी बोले—‘अब आप अपने पुत्रकी रमणीय छाया अपने पास सर्वदा विद्यमान देखेंगे। हे मुनिवर! हे परन्तप! उस छायाको देखकर आप अपना शोक दूर कीजिये’॥ ५७ ½ ॥ |
| सूत उवाच<br>तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम्॥ ५८<br>दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत।<br>अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात्॥ ५९<br>शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः॥ ६० | **सूतजी बोले—**तदनन्तर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवकी ओजस्विनी छाया देखी। उन्हें वरदान देकर शंकरजी वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके अन्तर्हित हो जानेपर व्यासजी भी अपने आश्रमको लौट आये। शुकदेवजीके वियोगसे सन्तप्त होकर वे अत्यन्त दुःखी रहने लगे॥ ५८-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य विवाहादिकार्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
सत्यवतीका राजा शन्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शन्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति
| ऋषय ऊचुः<br>शुकस्तु परमां सिद्धिमाप्तवान्देवसत्तमः।<br>किं चकार ततो व्यासस्तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्॥ १ | ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] शुकदेवजीको जब परम सिद्धि प्राप्त हो गयी तब देवश्रेष्ठ व्यासजीने क्या किया? यह सब विस्तारपूर्वक हमसे कहिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>शिष्या व्यासस्य येऽप्यासन्वेदाभ्यासपरायणाः।<br>आज्ञामादाय ते सर्वे गताः पूर्वं महीतले॥ २ | **सूतजी बोले—**उस समय व्यासजीके जितने वेदपाठी शिष्य थे, वे सब व्यासजीकी आज्ञा पाकर पहले ही भूमण्डलमें इधर-उधर चले गये थे॥ २॥ |
| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| असितो देवलश्चैव वैशम्पायन एव च।<br>जैमिनिश्च सुमन्तुश्च गताः सर्वे तपोधनाः॥ ३<br><br>तानेतान्वीक्ष्य पुत्रं च लोकान्तरितमप्युत।<br>व्यासः शोकसमाक्रान्तो गमनायाकरोन्मतिम्॥ ४ | असित, देवल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु आदि सभी तपोधन मुनि चले गये थे। उन ऋषियोंको अन्यत्र तथा अपने पुत्र शुकदेवको अन्तरिक्षमें गया हुआ देखकर शोकाकुल व्यासजीने वहाँसे चले जानेका विचार किया॥ ३-४॥ |
| सस्मार मनसा व्यासस्तां निषादसुतां शुभाम्।<br>मातरं जाह्नवीतीरे मुक्तां शोकसमन्विताम्॥ ५ | उसी समय व्यासजीने मन-ही-मन निषादकन्या अपनी कल्याणकारिणी माताका स्मरण किया, जिन्हें उन्होंने शोकावस्थामें गंगाजीके तटपर ही छोड़ दिया था॥ ५॥ |
| स्मृत्वा सत्यवतीं व्यासस्त्यक्त्वा तं पर्वतोत्तमम्।<br>आजगाम महातेजा जन्मस्थानं स्वकं मुनिः॥ ६ | अपनी माता सत्यवतीका स्मरण करके उस श्रेष्ठ पर्वतको त्यागकर महातेजस्वी व्यासजी अपने जन्मस्थानपर चले आये॥ ६॥ |
| द्वीपं प्राप्याथ पप्रच्छ क्व गता सा वरानना।<br>निषादास्तं समाचख्युर्दत्ता राज्ञे तु कन्यका॥ ७<br><br>दाशराजोऽपि सम्पूज्य व्यासं प्रीतिपुरःसरम्।<br>स्वागतेनाभिसत्कृत्य प्रोवाच विहिताञ्जलिः॥ ८ | इस प्रकार उन्होंने उस द्वीपपर जाकर लोगोंसे पूछा कि 'वे सुन्दर मुखवाली [मेरी माता] कहाँ चली गयीं?' तब निषादोंने बताया कि उस कन्याका तो निषादराजने राजा [शन्तनु]-से विवाह कर दिया। तत्पश्चात् निषादराजने व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन एवं सत्कार करके हाथ जोड़कर कहा—॥ ७-८॥ |
| दाशराज उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म पवित्रं नः कुलं मुने।<br>देवानामपि दुर्दर्शं यज्जातं तव दर्शनम्॥ ९ | दाशराज बोला—हे मुने! मेरा जन्म सफल हो गया और हमारा कुल पवित्र हो गया जो कि आज देवताओंके लिये दुर्लभ आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ९॥ |
| यदर्थमागतोऽसि त्वं तद् ब्रूहि द्विजसत्तम।<br>अपि दारा धनं पुत्रास्त्वदायत्तमिदं विभो॥ १० | हे विप्रवर! आप जिस कामसे आये हैं, वह बताइये। हे विभो! धन, पुत्र, कलत्र आदि—यह सब आपके अधीन है॥ १०॥ |
| सरस्वत्यास्तटे रम्ये चकाराश्रममण्डलम्।<br>व्यासस्तपःसमायुक्तस्तत्रैवास समाहितः॥ ११ | [निषादराजके प्रार्थना करनेपर] व्यासजीने सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया और सावधान-चित्त हो वे पुनः तप करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ११॥ |
| सत्यवत्याः सुतौ जातौ शन्तनोरमितद्युतेः।<br>मत्वा तौ भ्रातरौ व्यासः सुखमाप वने स्थितः॥ १२ | अपूर्व तेजस्वी महाराज शन्तनुको सत्यवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। इन दोनोंको अपना भाई मानकर वनवासी व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १२॥ |
| चित्राङ्गदः प्रथमो रूपवाञ्छत्रुतापनः।<br>बभूव नृपतेः पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यनामासौ द्वितीयः समजायत।<br>सोऽपि सर्वगुणोपेतः शन्तनोः सुखवर्धनः॥ १४ | उनमें राजाका पहला पुत्र चित्रांगद रूपवान्, शत्रुओंको कष्ट देनेवाला तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। शन्तनुके दूसरे पुत्रका नाम विचित्रवीर्य था। वह भी सर्वगुणसम्पन्न एवं शन्तनुके लिये सुखवर्द्धक हुआ॥ १३-१४॥ |
| १७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| गाङ्गेयः प्रथमस्तस्य महावीरो बलाधिकः।<br>तथैव तौ सुतौ जातौ सत्यवत्यां महाबलौ॥ १५ | इसके पूर्व उन राजा शन्तनुको गंगासे भीष्म नामक बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र पैदा हुआ था। उसी प्रकार सत्यवतीसे दो पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए॥ १५॥ |
| शन्तनुस्तान्सुतान्वीक्ष्य सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>अमंस्ताजय्यमात्मानं देवादीनां महामनाः॥ १६ | उन सर्वलक्षणसम्पन्न तीनों पुत्रोंको देखकर महामना शन्तनु अपने आपको देवताओंसे अजेय समझने लगे थे॥ १६॥ |
| अथ कालेन कियता शन्तनुः कालपर्ययात्।<br>तत्याज देहं धर्मात्मा देही जीर्णमिवाम्बरम्॥ १७ | कुछ समय बीतनेपर यथासमय धर्मात्मा शन्तनुने उसी प्रकार अपना शरीर त्याग दिया, जिस प्रकार कोई मनुष्य अपना पुराना वस्त्र छोड़ देता है। |
| कालधर्मगते राज्ञि भीष्मश्चक्रे विधानतः।<br>प्रेतकार्याणि सर्वाणि दानानि विविधानि च॥ १८ | शन्तनुके कालके वशीभूत हो जानेपर भीष्मने विधिवत् उनके समस्त प्रेतकार्य किये और विविध प्रकारके दान दिये॥ १७-१८॥ |
| चित्राङ्गदं ततो राज्ये स्थापयामास वीर्यवान्।<br>स्वयं न कृतवान् राज्यं तस्माद्देवव्रतोऽभवत्॥ १९ | तदनन्तर पराक्रमी भीष्मने चित्रांगदको राज्यसिंहासनपर बैठाया। उन्होंने स्वयं राज्य नहीं किया, इसी कारण उनका नाम देवव्रत हुआ॥ १९॥ |
| चित्राङ्गदस्तु वीर्येण प्रमत्तः परदुःखदः।<br>बभूव बलवान्वीरः सत्यवत्यात्मजः शुचिः॥ २० | सत्यवतीपुत्र चित्रांगद बलगर्वित, शत्रुसन्तापकर्ता, बलशाली, वीर तथा पवित्र थे॥ २०॥ |
| अथैकदा महाबाहुः सैन्येन महतावृत्तः।<br>प्रचचार वनोद्देशान्यश्यन्वध्यान्मृगान् रुरून्॥ २१ | महाबाहु चित्रांगद एक बार महान् सेनासे युक्त होकर आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ वध्य रुरुमृगोंको खोजते हुए वे विविध वन-प्रदेशोंमें घूम रहे थे। |
| चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो दृष्ट्वा तं मार्गगं नृपम्।<br>उत्ततारान्तिकं भूमेर्विमानवरमास्थितः॥ २२ | मार्गमें उन राजाको जाता हुआ देखकर चित्रांगद नामक एक गन्धर्व अपने सुन्दर विमानसे भूमिपर उनके समीप उतर पड़ा॥ २१-२२॥ |
| तत्राभूच्च महद्युद्धं तयोः सदृशवीर्ययोः।<br>कुरुक्षेत्रे महास्थाने त्रीणि वर्षाणि तापसाः॥ २३ | **सूतजी बोले—**हे तपस्वियो ! उस समय कुरुक्षेत्रके उस विशाल मैदान में तीन वर्षतक समान बलवाले उन दोनोंमें घमासान युद्ध होता रहा॥ २३॥ |
| इन्द्रलोकमवापाशु गन्धर्वेण हतो रणे।<br>भीष्मः श्रुत्वा चकाराशु तस्यौर्ध्वदैहिकं तदा॥ २४ | अन्तमें उस गन्धर्वके द्वारा राजा चित्रांगद युद्धमें मारे गये और उन्हें शीघ्र ही इन्द्रलोक प्राप्त हुआ। यह सुनकर भीष्मने उसी समय चित्रांगदका और्ध्वदैहिक संस्कार किया॥ २४॥ |
| गाङ्गेयः कृतशोकस्तु मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>विचित्रवीर्यनामानं राज्येशं च चकार ह॥ २५ | तत्पश्चात् मन्त्रियोंने भीष्मको समझा-बुझाकर शोकरहित किया। उन्होंने छोटे भाई विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २५॥ |
| मन्त्रिभिर्बोधिता पश्चाद् गुरुभिश्च महात्मभिः।<br>स्वपुत्रं राज्यगं दृष्ट्वा पुत्रशोकहतापि च॥ २६ | मन्त्रियों, गुरुजनों एवं महात्माओंके समझानेके बाद शुभलक्षणा राजमाता सत्यवती अपने [ज्येष्ठ] पुत्रकी मृत्युसे शोकाकुल होती हुई भी अपने छोटे पुत्र |
| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सत्यवत्यतिसन्तुष्टा बभूव वरवर्णिनी।<br>व्यासोऽपि भ्रातरं श्रुत्वा राजानं मुदितोऽभवत्॥ २७ | विचित्रवीर्यको राजसिंहासनपर बैठा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। व्यासजी भी अपने भ्राताके राजा होनेका समाचार पाकर प्रसन्न हुए॥ २६-२७॥ |
| यौवनं परमं प्राप्तः सत्यवत्याः सुतः शुभः।<br>चकार चिन्तां भीष्मोऽपि विवाहार्थं कनीयसः॥ २८ | जब सत्यवतीके सुन्दर पुत्र विचित्रवीर्य पूर्ण युवा हुए तब भीष्म अपने कनिष्ठ भ्राताके विवाहकी चिन्ता करने लगे॥ २८॥ |
| काशिराजसुतास्तिस्रः सर्वलक्षणसंयुताः।<br>तेन राज्ञा विवाहार्थं स्थापिताश्च स्वयंवरे॥ २९ | उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं—जो सभी शुभलक्षणोंसे युक्त थीं; उन राजाने विवाहके लिये उनका स्वयंवर रचाया॥ २९॥ |
| राजानो राजपुत्राश्च समाहूताः सहस्रशः।<br>इच्छास्वयंवरार्थं वै पूज्यमानाः समागताः॥ ३०<br>तत्र भीष्मो महातेजास्ता जहार बलेन वै।<br>निर्मथ्य राजकं सर्वं रथेनैकेन वीर्यवान्॥ ३१<br>स जित्वा पार्थिवान्सर्वांस्ताश्चादाय महारथः।<br>बाहुवीर्येण तेजस्वी ह्याससाद गजाह्वयम्॥ ३२ | हजारों पूज्यमान राजा तथा राजकुमार आमन्त्रित होकर उस इच्छास्वयंवरमें उपस्थित हुए थे तथा पराक्रमी भीष्मने अकेले ही रथपर बैठकर सभी राजाओंको रौंदकर बलपूर्वक उन कन्याओंका हरण कर लिया। वे महारथी तथा तेजस्वी भीष्म अपने बाहुबलसे उन सभी राजाओंको जीतकर उन कन्याओंको लेकर हस्तिनापुर चले आये॥ ३०—३२॥ |
| मातृवद्भगिनीवच्च पुत्रीवच्चिन्तयन्किल।<br>तिस्रः समानयामास कन्यका वामलोचनाः॥ ३३<br>सत्यवत्यै निवेद्याशु द्विजानाहूय सत्वरः।<br>दैवज्ञान्वेदविदुषः पर्यपृच्छच्छुभं दिनम्॥ ३४ | सुन्दर नेत्रोंवाली उन तीनों राजकुमारियोंमें माता, भगिनी एवं पुत्रीकी भावना रखते हुए भीष्म उन्हें ले आये और उन्हें सत्यवतीको सौंपकर शीघ्रतापूर्वक ज्योतिर्विदों तथा वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे विवाहका शुभ मुहूर्त पूछा॥ ३३—३४॥ |
| कृत्वा विवाहसम्भारं यदा वै भ्रातरं निजम्।<br>विचित्रवीर्यं धर्मिष्ठं विवाहयति ता यदा॥ ३५<br>तदा ज्येष्ठाप्युवाचेदं कन्यका जाह्नवीसूतम्।<br>लज्जमानासितापाङ्गी तिसृणां चारुलोचना॥ ३६<br>गङ्गापुत्र कुरुश्रेष्ठ धर्मज्ञ कुलदीपक।<br>मया स्वयंवरे शाल्वो वृतोऽस्ति मनसा नृपः॥ ३७<br>वृताहं तेन राज्ञा वै चित्ते प्रेमसमाकुले।<br>यथायोग्यं कुरुष्वाद्य कुलस्यास्य परन्तप॥ ३८<br>तेनाहं वृतपूर्वाऽस्मि त्वं च धर्मभृतां वरः।<br>बलवानसि गाङ्गेय यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३९ | विवाहकी तैयारी करके अपने छोटे भाई धर्मात्मा विचित्रवीर्यके साथ उन कन्याओंका विवाह करनेको जब भीष्म उद्यत हुए तब उन तीनोंमें सबसे बड़ी एवं सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याने गंगापुत्र भीष्मसे लज्जित होते हुए इस प्रकार प्रार्थना की। हे गंगापुत्र! हे कुरुश्रेष्ठ! हे धर्मज्ञ! हे कुलदीपक! मैंने स्वयंवरमें मन-ही-मन राजा शाल्वका पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन राजाने भी प्रेमपूर्वक हृदयसे मुझे अपनी पत्नी मान लिया था। हे परन्तप! अब आप इस कुलकी परम्पराके अनुसार जैसा उचित हो, वैसा कीजिये। उन्होंने पहलेसे ही मुझे वरण कर लिया है। हे गांगेय! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा बलवान् हैं; आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये॥ ३५—३९॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्तस्तया तत्र कन्यया कुरुनन्दनः।<br>अपृच्छद् ब्राह्मणान्वृद्धान्मातरं सचिवांस्तथा॥ ४० | सूतजी बोले— इस प्रकार उस कन्याके कहनेपर कुरुनन्दन भीष्मजीने कुलवृद्धों, ब्राह्मणों, माता सत्यवती तथा मन्त्रियोंसे इस विषयमें परामर्श |
| १७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वेषां मतमाज्ञाय गाङ्गेयो धर्मवित्तमः।<br>गच्छेति कन्यकां प्राह यथारुचि वरानने॥ ४१ | किया। सबकी अनुमति प्राप्त करके धर्मज्ञ गङ्गापुत्रने उस कन्यासे कहा—हे वरानने! तुम स्वेच्छापूर्वक जा सकती हो॥ ४०-४१॥ |
| विसर्जिताथ सा तेन गता शाल्वनिकेतनम्।<br>उवाच तं वरारोहा राजानं मनसेप्सितम्॥ ४२<br><br>विनिर्मुक्तास्मि भीष्मेण त्वन्मनस्केति धर्मतः।<br>आगतास्मि महाराज गृहाणाद्य करं मम॥ ४३<br><br>धर्मपत्नी तवात्यन्तं भवामि नृपसत्तम।<br>चिन्तितोऽसि मया पूर्वं त्वयाहं नात्र संशयः॥ ४४ | भीष्मसे विदा होकर वह सुन्दरी कन्या राजा शाल्वके घर गयी और अपने मनकी अभीष्ट बात उनसे कहने लगी—हे महाराज! आपके प्रति आसक्तचित्त जानकर भीष्मने मुझे धर्मपूर्वक मुक्त कर दिया है। अब मैं आ गयी हूँ; आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये। मैं आपकी पूर्णरूपसे धर्मपत्नी होऊँगी; मैंने पूर्वमें आपको चाहा है और आपने मुझे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४२–४४॥ |
| शाल्व उवाच<br>गृहीता त्वं वरारोहे भीष्मेण पश्यतो मम।<br>रथे संस्थापिता तेन न ग्रहीष्ये करं तव॥ ४५<br><br>परोच्छिष्टां च कः कन्यां गृह्णाति मतिमान्नरः।<br>अतोऽहं न ग्रहीष्यामि त्यक्तां भीष्मेण मातृवत्॥ ४६ | शाल्वने कहा— हे सुन्दरि! मेरे देखते-देखते भीष्मने तुम्हें पकड़ा और अपने रथपर बैठा लिया था, अतः अब मैं तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं कर सकता। कौन बुद्धिमान् मनुष्य दूसरेके द्वारा उच्छिष्ट कन्याको स्वीकार करेगा? अतः भीष्मके द्वारा मातृभावनासे भी त्यागी गयी तुम्हें मैं स्वीकार नहीं करूँगा॥ ४५-४६॥ |
| रुदती विलपन्ती सा त्यक्ता तेन महात्मना।<br>पुनर्भीष्मं समागत्य रुदती चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>शाल्वो मुक्तां त्वया वीर न गृह्णाति गृहाण माम्।<br>धर्मज्ञोऽसि महाभाग मरिष्याम्यन्यथा ह्यहम्॥ ४८ | महात्मा शाल्वने रोती तथा विलाप करती उस कन्याका त्याग कर दिया और वह पुनः भीष्मके यहाँ आकर रोती हुई इस प्रकार कहने लगी—हे वीर! आपके त्याग देनेके कारण शाल्व भी मुझे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, इसलिये आप मुझे स्वीकार कीजिये, अन्यथा मैं प्राण दे दूँगी॥ ४७-४८॥ |
| भीष्म उवाच<br>अन्यचित्तां कथं त्वां वै गृह्णामि वरवर्णिनि।<br>पितरं स्वं वरारोहे व्रज शीघ्रं निराकुला॥ ४९ | भीष्म बोले— हे वरवर्णिनि! तुम दूसरेपर आसक्त चित्तवाली हो, अतः मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूँ? हे वरारोहे! अब तुम चिन्ता त्यागकर शीघ्र अपने पिताके पास चली जाओ॥ ४९॥ |
| तथोक्ता सा तु भीष्मेण जगाम वनमेव हि।<br>तपश्चकार विजने तीर्थे परमपावने॥ ५० | भीष्मके ऐसा कहनेपर वह [अपने पिताके घर न जाकर] वनमें चली गयी और वहाँ किसी निर्जन एवं परम पवित्र तीर्थमें तप करने लगी॥ ५०॥ |
| द्वे भार्ये चातिरूपाढ्ये तस्य राज्ञो बभूवतुः।<br>अम्बालिका चाम्बिका च काशिराजसुते शुभे॥ ५१ | काशिराजकी अन्य दो रूपवती तथा कल्याणमयी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका विचित्रवीर्यकी रानियाँ बन गयीं॥ ५१॥ |
| राजा विचित्रवीर्योऽसौ ताभ्यां सह महाबलः।<br>रेमे नानाविहारैश्च गृहे चोपवने तथा॥ ५२ | महाबली राजा विचित्रवीर्य भी उन दोनोंके साथ कभी राजभवनमें और कभी उपवनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे॥ ५२॥ |