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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१

अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं श्रुत्वा निहतं त्वष्टा पुत्रं परमधार्मिकम्।<br>चुकोपातीव मनसा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३०उस परम धार्मिक पुत्रको मारा गया सुनकर त्वष्टाने मनमें अत्यन्त क्रोधित हो यह वचन कहा—
अनागसं मुनिं यस्मात्पुत्रं निहतवान्मम।<br>तस्मादुत्पादयिष्यामि तद्वधार्थं सुतं पुनः॥ ३१जिसने मेरे निरपराध मुनिवृत्तिवाले पुत्रको मार डाला है, उसके वधके लिये मैं पुनः पुत्र उत्पन्न करूँगा। देवतालोग मेरे पराक्रम और तपोबलको देख लें; वह पापात्मा भी अपनी करनीका महान् फल जान ले॥ ३०—३२॥
सुराः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च बलं तथा।<br>जानातु सर्व पापात्मा स्वकृतस्य फलं महत्॥ ३२
इत्युक्त्वाग्निं जुहावाथ मन्त्रैराथर्वणोदितैः।<br>पुत्रस्योत्पादनार्थाय त्वष्टा क्रोधसमाकुलः॥ ३३ऐसा कहकर क्रोधसे अत्यन्त व्याकुल त्वष्टा पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे अग्निमें हवन करने लगे॥ ३३॥
कृते होमेऽष्टरात्रं तु सन्दीप्ताच्च विभावसौ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा पुरुषः पावकोपमः॥ ३४आठ रात्रियोंतक प्रज्वलित अग्निमें हवन करनेपर सहसा अग्निसदृश एक पुरुष प्रकट हुआ॥ ३४॥
तं दृष्ट्वाग्रे सुतं त्वष्टा तेजोबलसमन्वितम्।<br>वेगात्प्रकटितं वह्नेर्दीप्यमानमिवानलम्॥ ३५वेगपूर्वक अग्निसे प्रकट हुए और अग्निके सदृश प्रकाशमान तथा तेज-बलसे युक्त उस पुत्रको अपने सम्मुख देखकर त्वष्टाने कहा—हे इन्द्रशत्रु! मेरे तपोबलसे तुम शीघ्र बढ़ जाओ॥ ३५-३६॥
उवाच वचनं त्वष्टा सुतं वीक्ष्य पुरःस्थितम्।<br>इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रतापात्तपसो मम॥ ३६
इत्युक्ते वचने त्वष्ट्रा क्रोधप्रज्वलितेन च।<br>सोऽवर्धत दिवं स्तब्ध्वा वैश्वानरसमद्युतिः॥ ३७क्रोधसे जाज्वल्यमान त्वष्टाके ऐसा कहते ही अग्निके समान कान्तिवाला वह पुत्र द्युलोकको स्तब्ध करता हुआ बड़ा होने लगा॥ ३७॥
जातः स पर्वताकारः कालमृत्युसमः स्वराट्।<br>किं करोमीति तं प्राह पितरं परमातुरम्॥ ३८बढ़ते-बढ़ते वह पर्वताकार विशाल और काल पुरुषके समान भयानक हो गया। उसने अत्यन्त दुःखित अपने पितासे कहा—मैं क्या करूँ? हे नाथ! मेरा नामकरण कीजिये। हे सुव्रत! मुझे कार्य बताइये, आप चिन्तित क्यों हैं? मुझे अपने दुःखका कारण बताइये। मैं आज ही आपके शोकका नाश कर दूँगा—ऐसा मेरा दृढ़ संकल्प है। जिस पुत्रके रहते पिता दुःखी हो, उस पुत्रसे क्या लाभ! मैं शीघ्र ही समुद्रको पी जाऊँगा, पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा और उगते हुए प्रचण्ड तेजस्वी सूर्यको रोक दूँगा। मैं देवताओंसहित इन्द्रको तथा यमको अथवा अन्य किसी भी देवताको मार डालूँगा। इन सबको तथा पृथिवीको भी उखाड़कर समुद्रमें फेंक दूँगा॥ ३८—४२॥
कुरु मे नामकं नाथ कार्यं कथय सुव्रत।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं ब्रूहि मे शोककारणम्॥ ३९
नाशयाम्यद्य ते शोकमिति मे व्रतमाहितम्।<br>तेन जातेन किं भूयः पिता भवति दुःखितः॥ ४०
पिबामि सागरं सद्यश्चूर्णयामि धराधरान्।<br>उद्यन्तं वारयाम्यद्य तरणिं तिग्मतेजसम्॥ ४१
हन्मीन्द्रं ससुरं सद्यो यमं वा देवतान्तरम्।<br>क्षिपामि सागरे सर्वान्समुत्पाट्य च मेदिनीम्॥ ४२
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्वष्टा पुत्रस्य पेशलम्।<br>प्रत्युवाचातिमुदितस्तं सुतं पर्वतोपमम्॥ ४३उसका यह प्रिय वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न हो पर्वतके समान विशाल उस पुत्रसे कहा—॥ ४३॥
संस्कृतहिन्दी
वृजिनात्रातुमधुना यस्माच्छक्तोऽसि पुत्रक।<br>तस्माद् वृत्र इति ख्यातं तव नाम भविष्यति॥ ४४<br>भ्राता तव महाभाग त्रिशिरा नाम तापसः।<br>त्रीणि तस्य च शीर्षाणि ह्यभवन्वीर्यवन्ति च॥ ४५<br>वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वविद्याविशारदः।<br>संस्थितस्तपसि प्रायस्त्रिलोकीविस्मयप्रदे॥ ४६<br>शक्रेण तु हतः सोऽद्य वज्रघातेन साम्प्रतम्।<br>विनापराधं सहसा छिन्नानि मस्तकानि च॥ ४७<br>तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र जहि शक्रं कृतागसम्।<br>ब्रह्महत्यायुतं पापं निस्त्रपं दुर्मतिं शठम्॥ ४८हे पुत्र! तुम अभी वृजिन (कष्ट)-से त्राण दिलानेमें समर्थ हो, इसलिये तुम्हारा ‘वृत्र’—यह नाम प्रसिद्ध होगा। हे महाभाग! तुम्हारा त्रिशिरा नामका एक तपस्वी भाई था। उसके अत्यन्त शक्तिशाली तीन सिर थे। वह वेद-वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाला, सभी विद्याओंमें निपुण और तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डाल देनेवाली तपस्यामें रत था। इन्द्रने वज्रका प्रहार करके उस निरपराधको मार डाला और उसके मस्तक काट डाले। इसलिये हे पुरुषसिंह! तुम उस ब्रह्म-हत्यारे, पापी, निर्लज्ज, दुष्टबुद्धि तथा मूर्ख इन्द्रको मार डालो॥ ४४-४८॥
इत्युक्त्वा च तदा त्वष्टा पुत्रशोकसमाकुलः।<br>आयुधानि च दिव्यानि चकार विविधानि च॥ ४९<br>ददावस्मै सहस्राक्षवधाय प्रबलानि च।<br>खड्गशूलगदाशक्तितोमरप्रमुखानि वै॥ ५०<br>शार्ङ्गं धनुस्तथा बाणं परिघं पट्टिशं तथा।<br>चक्रं दिव्यं सहस्रारं सुदर्शनसमप्रभम्॥ ५१<br>तूणीरौ चाक्षयौ दिव्यौ कवचं चातिसुन्दरम्।<br>रथं मेघप्रतीकाशं दृढं भारसहं जवम्॥ ५२<br>युद्धोपकरणं सर्वं कृत्वा पुत्राय पार्थिव।<br>दत्त्वासौ प्रेरयामास त्वष्टा क्रोधसमन्वितः॥ ५३ऐसा कहकर पुत्रशोकसे व्याकुल त्वष्टाने विविध प्रकारके दिव्य तथा प्रबल आयुधोंका निर्माण किया और इन्द्रका वध करनेके लिये उस महाबली (वृत्र)-को दे दिया। उनमें खड्ग, शूल, गदा, शक्ति, तोमर, शार्ङ्गधनुष, बाण, परिघ, पट्टिश, सुदर्शन चक्रके समान कान्तिमान् हजार अरोंवाला दिव्य चक्र, दो दिव्य तथा अक्षय तरकस और अत्यन्त सुन्दर कवच एवं मेघके समान श्याम आभावाला, सुदृढ़, भार सहनेमें समर्थ और तीव्रगामी रथ था। इस प्रकार हे राजन्! समस्त युद्धसामग्री तैयार करके क्रोधसे व्याकुल त्वष्टाने अपने पुत्रको देकर उसे भेज दिया॥ ४९-५३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे त्रिशिरवधानन्तरं वृत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
कृतस्वस्त्ययनो वृत्रो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>निर्जगाम रथारूढो हन्तुं शक्रं महाबलः॥ १[हे राजन्!] वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर महाबली वृत्रासुर रथपर सवार हो इन्द्रको मारनेके लिये चला॥ १॥
तदैव राक्षसाः क्रूराः पुरा देवपराजिताः।<br>समाजग्मुश्च सेवार्थं वृत्रं ज्ञात्वा महाबलम्॥ २उस समय बहुत-से क्रूर राक्षस जो पहले देवताओंसे पराजित हो गये थे, वृत्रासुरको महान् बलशाली जानकर उसकी सेवाके लिये आ गये॥ २॥
अ० ३ ]षष्ठ स्कन्ध७३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन्द्रदूतास्तु तं दृष्ट्वा युद्धाय तु समागतम्।<br>वेगादागत्य वृत्तान्तं शशंसुस्तस्य चेष्टितम्॥ ३<br><br>दूता ऊचुः<br>स्वामिञ्छीघ्रमिहायाति वृत्रो नाम रिपुस्तव।<br>बलवान्स्यन्दने रूढस्त्वष्ट्रा चोत्पादितः किल॥ ४<br><br>अभिचारेण नाशार्थं तव क्रोधान्वितेन वै।<br>पुत्रघाताभितप्तेन दुःसहो राक्षसैर्युतः॥ ५इन्द्रके दूत उसे युद्धके लिये आया देखकर शीघ्रतापूर्वक [इन्द्रके पास] आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त और उसकी गतिविधि बताने लगे॥ ३॥<br><br>दूत बोले— हे स्वामिन्! वृत्र नामका आपका बलवान् और दुर्धर्ष शत्रु रथपर आरूढ़ होकर राक्षसोंके साथ शीघ्र ही यहाँ आ रहा है; पुत्रशोकसे सन्तप्त और क्रोधाभिभूत त्वष्टाने आपके नाशके लिये अभिचारकर्मसे उसे उत्पन्न किया है॥ ४-५॥
यतं कुरु महाभाग शीघ्रमायाति साम्प्रतम्।<br>मेरुमन्दरसंकाशो घोरशब्दोऽतिदारुणः॥ ६<br><br>एतस्मिन्नन्तरे तत्र भीता देवगणा भृशम्।<br>आगत्योचुः सुरपतिं शृण्वन्तं दूतभाषितम्॥ ७हे महाभाग! शीघ्र ही [रक्षाका] उपाय कीजिये। सुमेरु और मन्दराचलके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाला वह (वृत्रासुर) घोर गर्जन करता हुआ अब शीघ्र यहाँ आ रहा है॥ ६॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त भयभीत देवगण वहाँ आ करके दूतोंकी बात सुन रहे देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहने लगे॥ ७॥
गणा ऊचुः<br>मघवन् दुर्निमित्तानि भवन्ति त्रिदशालये।<br>बहूनि भयशंसीनि पक्षिणां विरुतानि च॥ ८<br><br>काकगृध्रास्तथा श्येनाः कङ्काद्या दारुणाः खगाः।<br>रुदन्ति विकृतैः शब्दैरुत्कोरैर्भवनेनोपरि॥ ९<br><br>चीचीकूचीति निनदान्कुर्वन्ति विहगा भृशम्।<br>वाहनानां च नेत्रेभ्यो जलधाराः पतन्त्यधः॥ १०<br><br>श्रूयतेऽतिमहाञ्छब्दो रुदतीनां निशासु च।<br>राक्षसीनां महाभाग भवनोपरि दारुणः॥ ११<br><br>प्रपतन्ति ध्वजास्तूर्णं विना वातेन मानद।<br>प्रभवन्ति महोत्पाता दिवि भूम्यन्तरिक्षजाः॥ १२<br><br>कृष्णाम्बरधरा नार्यो भ्रमन्ति च गृहे गृहे।<br>यान्तु यान्तु गृहात्तूर्णं कुर्वन्त्यो विकृताननाः॥ १३<br><br>रात्रौ स्वप्नेषु कान्तानां सुप्तानां निजमन्दिरे।<br>केशाँल्लुनन्ति राक्षस्यो भीषयन्त्यो भृशातुराः॥ १४गण बोले— हे इन्द्र! इस समय स्वर्गमें अनेक प्रकारके अपशकुन हो रहे हैं। पक्षियोंके बहुत ही डरावने शब्द हो रहे हैं। कौए, गिद्ध, बाज और चील आदि क्रूर पक्षी भवनोंके ऊपर बैठकर भयानक स्वरोंमें रोते हैं और अन्य पक्षी भी बार-बार चीची-कूची—ऐसे शब्द कर रहे हैं। [हाथी, घोड़े आदि] वाहनोंकी आँखोंसे लगातार जल (अश्रु)-की धाराएँ नीचे गिर रही हैं। हे महाभाग! भवनोंके ऊपरी भागमें रातमें रोती हुई राक्षसियोंका महाभयानक शब्द सुनायी देता है। हे मानद! हवाके बिना ही ध्वजाएँ टूट-टूटकर गिर पड़ती हैं। स्वर्ग, पृथ्वी और आकाशमें महान् उत्पात हो रहे हैं। काले वस्त्र धारण की हुई भयानक मुखवाली स्त्रियाँ ‘निकल जाओ; घरसे शीघ्र निकल जाओ’—ऐसा कहती हुई घर-घरमें घूमती हैं। रातमें अपने घरमें सोयी हुई स्त्रियोंको भयभीत करती हुई भयानक राक्षसियाँ स्वप्नोंमें उनके बाल नोचती हैं॥ ८—१४॥
एवंविधानि देवेश भूकम्पोल्कादयस्तथा।<br>गोमायवो रुदन्ति स्म निशायां भवनाङ्गणे॥ १५<br><br>सरटानां च जालानि प्रभवन्ति गृहे गृहे।<br>अङ्गप्रस्फुरणादीनि दुर्निमित्तानि सर्वशः॥ १६हे देवेन्द्र! इसी प्रकार भूकम्प और उल्कापात आदि उपद्रव भी हो रहे हैं, रात्रिमें हमारे भवनोंके आँगनमें सियार रुदन करते हैं। गिरगिटोंके समूह घर-घरमें उत्पन्न हो रहे हैं, सर्वथा अनिष्टके सूचक अंग-प्रस्फुरण आदि भी होते हैं॥ १५-१६॥
७३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
संस्कृतहिन्दी
व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा चिन्तामाप सुरेश्वरः ।<br>बृहस्पतिं समाहूय पप्रच्छ च मनोगतम् ॥ १७व्यासजी बोले—उन लोगोंका यह वचन सुनकर इन्द्र चिन्तित हो उठे और बृहस्पतिको बुलाकर उन्होंने अपनी मनोगत बात पूछी॥ १७॥
इन्द्र उवाच<br>ब्रह्मन् किमुत घोराणि निमित्तानि भवन्ति वै ।<br>वाताश्च दारुणा वान्ति प्रपतन्त्युल्काः खतः ॥ १८<br>सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थो विघ्ननाशने ।<br>बुद्धिमाञ्छास्त्रतत्त्वज्ञो देवतानां गुरुस्तथा ॥ १९<br>कुरु शान्तिं विधानज्ञ शत्रुक्षयविधायिनीम् ।<br>यथा मे न भवेद्दुःखं तथा कार्यं विधीयताम् ॥ २०इन्द्र बोले—हे ब्रह्मन्! ये भयानक अपशकुन क्यों हो रहे हैं? भयानक आँधियाँ चलती हैं और आकाशसे उल्कापात होते हैं। हे महाभाग! आप सर्वज्ञ, विघ्नका नाश करनेमें समर्थ, बुद्धिमान्, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाले और देवताओंके गुरु हैं। इसलिये हे विधानज्ञ! आप हमारी शान्तिके लिये शत्रुओंका नाश करनेवाला कोई शान्तिकर्म कीजिये। जिस प्रकार मुझे दुःख न हो, आप वैसा कार्य कीजिये॥ १८—२०॥
बृहस्पतिरुवाच<br>किं करोमि सहस्राक्ष त्वयाद्य दुष्कृतं कृतम् ।<br>अनागसं मुनिं हत्वा किं फलं समुपार्जितम् ॥ २१बृहस्पति बोले—हे सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र! मैं क्या करूँ? तुमने बहुत बड़ा पाप कर डाला है। निरपराध मुनिको मारकर तुमने क्या लाभ प्राप्त कर लिया?॥ २१॥
अत्युग्रं पुण्यपापानां फलं भवति सत्वरम् ।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं तद्भूतिमिच्छता ॥ २२<br>परोपतापनं कर्म न कर्तव्यं कदाचन ।<br>न सुखं विन्दते प्राणी परपीडापरायणः ॥ २३पुण्य और पापका अत्यन्त उग्र फल शीघ्र ही प्राप्त होता है, इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवालोंको विचारपूर्वक कार्य करना चाहिये। दूसरेको कष्ट पहुँचानेका कृत्य कभी नहीं करना चाहिये। दूसरेको कष्ट देनेमें संलग्न प्राणी कभी सुख नहीं पाता॥ २२-२३॥
मोहाल्लोभाद् ब्रह्महत्या कृता शक्र त्वयाधुना ।<br>तस्य पापस्य सहसा फलमेतदुपागतम् ॥ २४हे इन्द्र! तुमने मोह और लोभके वशीभूत होकर ब्रह्महत्या कर डाली, उसी पापका यह फल आज सहसा उपस्थित हो गया है॥ २४॥
अवध्यः सर्वदेवानां जातोऽसौ वृत्रसंज्ञकः ।<br>हन्तुं त्वां स समायाति दानवैर्बहुभिर्वृतः ॥ २५वृत्र नामवाला यह असुर जन्मसे ही देवताओंसे अवध्य है; बहुत-से दानवोंसे घिरा हुआ वह तुम्हें मारनेके लिये चला आ रहा है॥ २५॥
आयुधानि च सर्वाणि वज्रतुल्यानि वासव ।<br>त्वष्ट्रा दत्तानि दिव्यानि गृहीत्वा समुपस्थितः ॥ २६हे इन्द्र! त्वष्टाके द्वारा दिये हुए उन सभी वज्रतुल्य तथा दिव्य आयुधोंको लेकर वह उपस्थित हो रहा है॥ २६॥
समागच्छति दुर्धर्षो रथारूढः प्रतापवान् ।<br>देवेन्द्र प्रलयं कुर्वन्नास्य मृत्युर्भविष्यति ॥ २७दुर्धर्ष तथा प्रतापी वह रथपर आरूढ़ होकर प्रलय मचाते हुए चला आ रहा है। हे देवेन्द्र! उसकी मृत्यु नहीं होगी॥ २७॥
कोलाहलस्तदा जातस्तथा ब्रुवति वाक्पतौ ।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मुनयश्च तपोधनाः ॥ २८<br>सदनानि विहायैवामराः सर्वे पलायिताः ।<br>तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं शक्रश्चिन्तापरायणः ॥ २९बृहस्पति ऐसा कह ही रहे थे कि वहाँ कोलाहल मच गया। गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मुनि, तपस्वी और सभी देवता अपने-अपने भवन छोड़कर भाग चले। उस महान् आश्चर्यको देखकर इन्द्र चिन्तित हो उठे॥ २८-२९॥
अ० ३ ]षष्ठ स्कन्ध७३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आज्ञापयामास तदा सेनोद्योगाय सेवकान्।<br>आनयध्वं वसून् रुद्रानश्विनौ च दिवाकरान् ॥ ३०<br>पूषणं च भगं वायुं कुबेरं वरुणं यमम्।<br>विमानेषु समारुह्य सायुधाः सुरसत्तमाः ॥ ३१<br>समागच्छन्तु तरसा शत्रुरायाति साम्प्रतम्।<br>इत्याज्ञाप्य सुरपतिः समारुह्य गजोत्तमम् ॥ ३२तब उन्होंने सेवकोंको सेना तैयार करनेका आदेश दिया। 'वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों, आदित्यों, पूषा, भग, वायु, कुबेर, वरुण और यमको बुलाओ। सभी श्रेष्ठ देवता आयुधोंके साथ विमानोंपर आरूढ़ होकर यहाँ शीघ्र आ जायें; क्योंकि अब शत्रु आने ही वाला है'—ऐसी आज्ञा देकर देवराज अपने श्रेष्ठ गजराज ऐरावतपर सवार होकर बृहस्पतिको आगे करके अपने भवनसे बाहर निकले ॥ ३०—३२ १/२ ॥
बृहस्पतिं पुरोधाय निर्गतो निजमन्दिरात्।<br>तथैव त्रिदशाः सर्वे स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ३३<br>युद्धाय कृतसंकल्पा निर्ययुः शस्त्रपाणयः।<br>वृत्रोऽथ दानवैर्युक्तः सम्प्राप्तो मानसोत्तरम् ॥ ३४<br>पर्वतं देवतावासं रम्यं पादपशोभितम्।<br>इन्द्रोऽप्यागत्य संग्रामं चकार मानसोत्तरे ॥ ३५वैसे ही अन्य सभी देवता भी हाथोंमें शस्त्र लेकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धका संकल्प करके चल पड़े। उधर वृत्रासुर भी विशाल दानवी सेनाके साथ वृक्षोंसे सुशोभित, रमणीय तथा देवताओंसे सेवित मानसरोवरके उत्तरवर्ती पर्वतपर आ गया। बृहस्पतिको आगे करके सभी देवताओंके साथ इन्द्रने भी उस मानसोत्तर पर्वतपर आकर संग्राम किया ॥ ३३—३५ १/२ ॥
पर्वते देवतायुक्तो वाचस्पतिपुरःसरः।<br>तत्राभूद्दारुणं युद्धं वृत्रवासवयोस्तदा ॥ ३६<br>गदास परिघैः पाशैर्बाणैः शक्तिपरश्वधैः।<br>मानुषेण प्रमाणेन संग्रामः शरदां शतम् ॥ ३७तब गदा, तलवार, परिघ, पाश, बाण, शक्ति और परशु आदि युद्धास्त्रोंके द्वारा वृत्रासुर और इन्द्रमें भयानक युद्ध हुआ। मनुष्यों और विशुद्ध हृदयवाले ऋषियोंके लिये अत्यन्त भयकारी वह युद्ध मानववर्षकी गणनासे सौ वर्षोंतक चला ॥ ३६—३७ १/२ ॥
बभूव भयदो नृणामृषीणां भावितात्मनाम्।<br>वरुणः प्रथमं भग्नस्ततो वायुगणः किल ॥ ३८<br>यमो विभावसुः शक्रः सर्वे ते निर्गता रणात्।<br>पलायनपरान्दृष्ट्वा देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३९<br>वृत्रोऽपि पितरं प्रागादाश्रमस्थं मुदान्वितम्।<br>प्रणम्य प्राह त्वष्टारं पितः कार्यं मया कृतम् ॥ ४०उस युद्धमें सबसे पहले वरुण और उसके बाद मरुद्गण पलायन कर गये। इसी प्रकार यम, अग्नि, इन्द्र—जो भी थे वे सभी युद्धसे निकल भागे। इन्द्र आदि प्रमुख देवताओंको भागकर जाते देखकर वृत्रासुर भी प्रसन्नतापूर्वक आश्रमस्थित अपने पिताके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—हे पिताजी! मैंने [आपका] कार्य कर दिया ॥ ३८—४० ॥
देवा विनिर्जिताः सर्वे सेन्द्राः समरसंस्थिताः।<br>विद्रुतास्ते गताः स्थानं यथा सिंहान्मृगा गजाः ॥ ४१<br>इन्द्रः पदातिरगमन्मयानीतो गजोत्तमः।<br>ऐरावतोऽयं भगवन् गृहाण द्विरदोत्तमम् ॥ ४२युद्धभूमिमें आये हुए इन्द्रसहित सभी देवता मुझसे पराजित हो गये। वे सब उसी प्रकार भयभीत होकर अपने स्थानोंको भाग गये, जैसे सिंहसे डरकर हाथी और मृग भाग जाते हैं। इन्द्र तो पैदल ही भाग गये; मैं हाथियोंमें श्रेष्ठ इस ऐरावतको ले आया हूँ। हे भगवन्! आप इस गजश्रेष्ठको ग्रहण करें ॥ ४१-४२ ॥
न हतास्ते मया यस्मादयुक्तं भीतमारणम्।<br>आज्ञापय पुनस्तात किं करोमि तवेप्सितम् ॥ ४३मैंने उन सबको इसलिये नहीं मारा; क्योंकि डरे हुएको मारना अनुचित होता है। हे तात! आप पुनः आज्ञा कीजिये कि मैं आपका कौन-सा इच्छित कार्य करूँ? ॥ ४३ ॥

| ७३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| निर्जरा निर्गताः सर्वे भयभीताः श्रमातुराः।<br>इन्द्रोऽप्यैरावतं त्यक्त्वा भयभीतः पलायितः॥ ४४ | सभी देवता भयभीत और युद्धश्रमसे क्लान्त होकर भाग गये; भयभीत इन्द्र भी ऐरावत छोड़कर भाग गया॥ ४४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पुत्रवचः श्रुत्वा त्वष्टा प्राह मुदान्वितः।<br>पुत्रवानद्य जातोऽस्मि सफलं मम जीवितम्॥ ४५ | व्यासजी बोले— पुत्रका यह वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न होकर कहा—आज मैं पुत्रवान् हो गया हूँ; मेरा जीवन सफल हो गया॥ ४५॥ |
| त्वयाहं पावितः पुत्र गतो मे मानसो ज्वरः।<br>निश्चलं मे मनो जातं दृष्ट्वा वीर्यं तवाद्भुतम्॥ ४६ | हे पुत्र! तुमने आज मुझे पवित्र कर दिया; मेरा मानसिक सन्ताप चला गया। तुम्हारे अद्भुत पराक्रमको देखकर मेरा मन शान्त हो गया॥ ४६॥ |
| शृणु वक्ष्याम्यहं पुत्र हितं तेऽद्य निशामय।<br>तपः कुरु महाभाग सावधानः स्थिरासनः॥ ४७ | हे पुत्र! सुनो, अब मैं तुम्हारे हितकी बात कह रहा हूँ। हे महाभाग! अब तुम दृढ़तापूर्वक आसनपर बैठकर सावधान होकर तपस्या करो॥ ४७॥ |
| विश्वासो नैव कर्तव्यः केषाञ्चित्पाकशासनः।<br>शत्रुस्ते छलकर्तास्ति नानाभेदविशारदः॥ ४८ | किसीका भी विश्वास मत करना। वह तुम्हारा शत्रु इन्द्र छल करनेवाला तथा अनेक प्रकारकी भेदनीतिमें निपुण है॥ ४८॥ |
| तपसा प्राप्यते लक्ष्मीस्तपसा राज्यमुत्तमम्।<br>तपसा बलवृद्धिः स्यात्संग्रामे विजयस्तथा॥ ४९ | तपसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है, तपसे उत्तम राज्यकी प्राप्ति होती है। तपसे बलकी वृद्धि होती है और संग्राममें विजयकी प्राप्ति होती है॥ ४९॥ |
| आराध्य द्रुहिणं देवं लब्ध्वा वरमनुत्तमम्।<br>जहि शक्रं दुराचारं ब्रह्महत्यासमावृतम्॥ ५० | भगवान् ब्रह्माकी आराधना करके उनसे उत्तम वर प्राप्तकर तुम उस दुराचारी और ब्राह्मणके हत्यारे इन्द्रको मार डालो॥ ५०॥ |
| सावधानः स्थिरो भूत्वा दातारं भज शङ्करम्।<br>वाञ्छितं स वरं दद्यात्सन्तुष्टश्चतुराननः॥ ५१ | तुम सावधान और स्थिर होकर कल्याणकारी तथा वरदाता ब्रह्माजीकी आराधना करो। प्रसन्न होनेपर चार मुखवाले वे ब्रह्माजी तुम्हें अभीष्ट वरदान देंगे॥ ५१॥ |
| तोषयित्वा विश्वयोनिं ब्रह्माणममितौजसम्।<br>अविनाशित्वमासाद्य जहि शक्रं कृतागसम्॥ ५२ | विश्वकी सृष्टि करनेवाले अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको प्रसन्न करके अमरत्व प्राप्तकर तुम अपराधी इन्द्रको मार डालो॥ ५२॥ |
| वैरं मनसि मे पुत्र वर्तते सुतघातजम्।<br>न शान्तिमनुगच्छामि न स्वपामि सुखेन ह॥ ५३ | हे पुत्र! मेरे मनमें उस पुत्रघातीके प्रति वैर बना हुआ है, न मुझे शान्ति प्राप्त होती है और न ही मैं सुखसे सो पाता हूँ॥ ५३॥ |
| तापसो मे हतः पुत्रो निरागाः पाप्मना यतः।<br>न विन्दामि सुखं वृत्र त्वं मामुद्धर दुःखितम्॥ ५४ | उस पापीने मेरे निर्दोष तपस्वी पुत्रको मार डाला है, इसलिये मुझे शान्ति नहीं मिलती। हे वृत्र! तुम मुझ दुःखीका उद्धार करो॥ ५४॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य पितुर्वाक्यं वृत्रः क्रोधयुतस्तदा।<br>आज्ञामादाय च पितुर्जगाम तपसे मुदा॥ ५५ | व्यासजी बोले— तब पिताका वचन सुनकर वृत्रासुर कुपित हो उठा। पितासे आज्ञा लेकर वह प्रसन्नतापूर्वक तपस्या करनेके लिये चला गया॥ ५५॥ |

अ० ४ ]षष्ठ स्कन्ध७३७

| गन्धमादनमासाद्य पुण्यां देवधुनीं शुभाम्।<br>स्नात्वा कुशासनं कृत्वा संस्थितश्च स्थिरासनः॥ ५६ | गन्धमादनपर्वतपर पहुँचकर पवित्र और मंगलकारिणी देवनदी गंगाजीमें स्नान करके कुशका आसन बिछाकर वह दृढ़तापूर्वक बैठ गया॥ ५६॥ |
| त्यक्त्वाऽन्नं वारिपानं च योगाभ्यासपरायणः।<br>ध्यायन्विश्वसृजं चित्ते सोपविष्टः स्थिरासने॥ ५७ | अन्न और जलका त्याग करके योगाभ्यासमें तत्पर होकर मनमें विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीका ध्यान करता हुआ वह दृढ़भावसे आसनपर बैठा रहा॥ ५७॥ |
| मघवा तं तपस्यन्तं ज्ञात्वा चिन्तातुरो ह्यभूत्।<br>गन्धर्वान्प्रेषयामास विघ्नार्थं पाकशासनः॥ ५८<br>यक्षांश्च पन्नगान्सर्पान्किन्नरानमितौजसः।<br>विद्याधरानप्सरसो देवदूताननेकणः॥ ५९<br>उपायैस्तैः कृताः सम्यक् तपोविघ्नाय मायिभिः।<br>न चचाल ततो ध्यानात्त्वाष्ट्रः परमतापसः॥ ६० | उसे तपस्या करता हुआ जानकर इन्द्र चिन्तासे व्यग्र हो उठे। तब [उसके तपमें] विघ्न डालनेके लिये इन्द्रने गन्धर्वों, अत्यन्त ओजस्वी यक्षों, नागों, सर्पों, किन्नरों, विद्याधरों, अप्सराओं और अनेक देवदूतोंको भेजा। उन मायावियोंद्वारा तपमें विघ्नके लिये भलीभाँति उपाय किये गये, किंतु परम तपस्वी त्वष्टापुत्र वृत्र ध्यानसे विचलित नहीं हुआ॥ ५८-६०॥ |

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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मणः<br>समाराधनाय त्वष्ट्रा वृत्रोपदेशवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः

तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना

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व्यास उवाचव्यासजी बोले—
निर्गतास्ते परावृत्तास्तपोविघ्नकराः सुराः।<br>निराशाः कार्यसंसिद्धौ तं दृष्ट्वा दृढचेतसम्॥ १उस वृत्रासुरको दृढ़प्रतिज्ञ देखकर तपमें विघ्न डालनेके लिये गये हुए देवगण अपने कार्यकी सिद्धिसे निराश होकर वापस लौट आये॥ १॥
जाते वर्षशते पूर्णे ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>तत्राजगाम तरसा हंसारूढश्चतुर्मुखः॥ २सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्मा हंसपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक उसके पास आये॥ २॥
आगत्य तमुवाचेदं त्वष्टृपुत्र सुखी भव।<br>त्यक्त्वा ध्यानं वरं ब्रूहि ददामि तव वाञ्छितम्॥ ३आकर उन्होंने उससे यह कहा—हे त्वष्टाके पुत्र! तुम सुखी होओ, ध्यानका त्यागकर वरदान माँगो, मैं तुम्हारा इच्छित वर दूँगा॥ ३॥
तपसा तेऽद्य तुष्टोऽस्मि त्वां दृष्ट्वा चातिकर्शितम्।<br>वरं वरय भद्रं ते मनोऽभिलषितं तव॥ ४तुम्हें तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय देखकर मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोभिलषित वर माँग लो॥ ४॥
व्यास उवाच<br>वृत्रस्तदातिविशदां पुरतो निशम्य<br>वाचं सुधासमरसां जगदेककर्तुः।<br>सन्त्यज्य योगकलनां सहसोदतिष्ठ-<br>त्तज्जातहर्षणयनाश्रुकलाकलापः ॥ ५**व्यासजी बोले—**अपने समक्ष खड़े जगत्के एकमात्र स्रष्टा [ब्रह्माजी]-की अत्यन्त गम्भीर और अमृतरसतुल्य वाणी सुनकर वह वृत्रासुर योग-ध्यान त्यागकर सहसा उठ खड़ा हुआ। हर्षातिरेकसे उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी॥ ५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 A

७३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पादौ प्रणम्य शिरसा प्रणयाद्विधातु-<br>र्बद्धाञ्जलिः पुरत एव समाससाद।<br>प्रोवाच तं सुवरदं तपसा प्रसन्नं<br>प्रेम्णातिगद्गदगिरा विनयेन नम्रः॥ ६प्रेमपूर्वक विधाता ब्रह्माजीके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वह उनके समक्ष स्थित हो गया और तपस्यासे प्रसन्न तथा उत्तम वर देनेवाले ब्रह्माजीसे विनयावनत होकर प्रेमपूर्ण गद्गद वाणीमें कहने लगा— ॥ ६॥
प्राप्तं मया सकलदेवपदं प्रभोऽद्य<br>यद्दर्शनं तव सुदुर्लभमाशु जातम्।<br>वाञ्छास्ति नाथ मनसि प्रवणे दुरापा<br>तां ब्रब्रवीमि कमलासन वेत्सि भावम्॥ ७हे प्रभो! मैंने आज समस्त देवताओंका पद प्राप्त कर लिया जो कि मुझे शीघ्र ही आपका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया। हे नाथ! हे कमलासन! आप सबके मनके भाव जानते हैं, फिर भी मेरे भक्तिपूर्ण मनमें एक दुर्लभ अभिलाषा है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ७॥
मृत्युश्च मा भवतु मे किल लोहकाष्ठ-<br>शुष्कार्द्रवंशनिचयैरपरैश्च शस्त्रैः।<br>वृद्धिं प्रयातु मम वीर्यमतीव युद्धे<br>यस्माद्द्भवामि सबलैर्म्मरैरजेयः॥ ८लोहे, काष्ठ, सूखे या गीले बाँसद्वारा निर्मित तथा अन्य किसी शस्त्रसे मेरी कभी मृत्यु न हो। मेरा पराक्रम अत्यन्त बढ़ जाय, जिससे युद्धमें मैं उन बलवान् देवताओंसे अजेय हो जाऊँ॥ ८॥
व्यास उवाच<br>इत्थं सम्प्रार्थितो ब्रह्मा तमाह प्रहसन्निव।<br>उत्तिष्ठ गच्छ भद्रं ते वाञ्छितं सफलं सदा॥ ९व्यासजी बोले— उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजी उससे हँसते हुए बोले—[हे वत्स!] उठो और [घर] जाओ, तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। तुम्हारा कल्याण हो॥ ९॥
न शुष्केण न चार्द्रेण न पाषाणेन दारुणा।<br>भविष्यति च ते मृत्युरिति सत्यं ब्रवीम्यहम्॥ १०न सूखी, न गीली वस्तुसे, न तो पत्थर या लकड़ीद्वारा निर्मित शस्त्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी—यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ १०॥
इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा जगाम भुवनं परम्।<br>वृत्रस्तु तं वरं लब्ध्वा मुदितः स्वगृहं ययौ॥ ११ऐसा वरदान देकर ब्रह्माजी अपने दिव्य लोकको चले गये और वृत्रासुर भी वरदान प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर चला गया॥ ११॥
शशंस पितुरग्रे तद्वरदानं महामतिः।<br>त्वष्टा तु मुदितः प्राप्तं पुत्रं प्राप्तवरं तदा॥ १२महाबुद्धिमान् वृत्रासुरने पिताके सम्मुख उस वरदानको सुनाया, तब त्वष्टा भी पुत्रके वरदान प्राप्त करनेसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १२॥
स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग जहि शक्रं रिपुं मम।<br>हत्वागच्छ त्रिशिरसो हन्तारं पापसंयुक्तम्॥ १३उन्होंने कहा—हे महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो, मेरे शत्रु और त्रिशिराके हत्यारे पापी इन्द्रको मार डालो; उसे मारकर आ जाओ॥ १३॥
भव त्वं त्रिदशाधीशः सम्प्राप्य विजयं रणे।<br>ममाधिं छिन्धि विपुलं पुत्रनाशसमुद्भवम्॥ १४युद्धमें विजय प्राप्तकर तुम देवताओंके अधिपति बनो। पुत्रहत्यासे उत्पन्न मेरे महान् मानसिक सन्तापको तुम दूर करो॥ १४॥
जीवतो वाक्यकरणात्क्षयाहे भूरिभोजनात्।<br>गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ १५जीवित [अवस्थामें] पिताकी आज्ञाका पालन करने, मृत्युकतिथिपर पर्याप्त भोजन कराने तथा गयामें पिण्डदान करने—इन तीनोंसे ही पुत्रका पुत्रत्व सार्थक होता है॥ १५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 B