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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

[ पूर्वार्ध ]

प्रथमः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि।<br>बुद्धिं या नः प्रचोदयात्॥ १जो सर्वचेतनात्मकस्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें॥ १॥
शौनक उवाच<br>सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ।<br>यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः॥ २<br>अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ।<br>कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ॥ ३<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद।<br>त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ ४**शौनक बोले—**हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण-संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है। हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है॥ २–४॥
अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम्।<br>दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम्॥ ५<br>समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम्।<br>पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः॥ ६हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास-योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं। हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण-संहिताका श्रवण करना चाहता है। अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगोंसे उसका वर्णन कीजिये॥ ५-६॥
दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ७हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से रहित होकर दीर्घजीवी हों। हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें॥ ७॥
श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः।<br>न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते॥ ८<br>यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते।<br>तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः॥ ९हे सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं। जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त होता है॥ ८-९॥

| ७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः।<br>सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च॥१० | जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय?॥१०॥ |
| अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः।<br>वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः॥११ | अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं॥११॥ |
| येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम्।<br>व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः॥१२ | जिस किसी प्रकारसे समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोंका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है और विद्वानोंका समय शास्त्र-चिन्तनमें जाता है॥१२॥ |
| शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च।<br>(त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च।<br>वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च॥)<br>नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च॥१३ | शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क-वितर्कसे युक्त हैं। (पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद-विवाद तथा छल-प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत विस्तारवाले हैं॥१३॥ |
| सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम्।<br>तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम्॥१४ | उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि वह हेतुवादसे परिपूर्ण है॥१४॥ |
| तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः।<br>कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च॥१५ | इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा-भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं॥१५॥ |
| तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम्।<br>कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम्॥१६ | आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है॥१६॥ |
| उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम्।<br>मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा॥१७<br><br>विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात्।<br>श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम्॥१८ | उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये। उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं॥१७-१८॥ |
| त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल।<br>कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः॥१९ | हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं॥१९॥ |
| श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च।<br>नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापानेऽमरा यथा॥२० | जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं॥२०॥ |