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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

तृतीयः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना

जनमेजय उवाच<br>भगवन् भवता प्रोक्तं यज्ञमम्बाभिधं महत्।<br>सा का कथं समुत्पन्ना कुत्र कस्माच्च किंगुणा॥ १जनमेजय बोले—हे भगवन्! आपने महान् अम्बा-यज्ञके विषयमें कहा है। वे अम्बा कौन हैं, वे कैसे, कहाँ और किसलिये उत्पन्न हुई हैं और वे कौन-कौनसे गुणोंवाली हैं?॥ १॥
कीदृशश्च मखस्तस्याः स्वरूपं कीदृशं तथा।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २उनका यह यज्ञ कैसा है और उसका क्या स्वरूप है? हे दयानिधान! आप सब कुछ जाननेवाले हैं; उस यज्ञका विधान सम्यक् रूपसे बताइये॥ २॥
ब्रह्माण्डस्य तथोत्पत्तिं वद विस्तरतस्तथा।<br>यथोक्तं यादृशं ब्रह्मन्नखिलं वेत्सि भूसुर॥ ३हे ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका भी वर्णन कीजिये। हे भूसुर! इस विषयमें अन्य ज्ञानियोंने जैसा कहा है, वह सब कुछ भी आप भलीभाँति जानते हैं॥ ३॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवा मया श्रुताः।<br>सृष्टिपालनसंहारकारकाः सगुणास्त्वमी॥ ४मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों देवताओंके विषयमें सुना है कि ये सगुण रूपमें सम्पूर्ण जगत्का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं॥ ४॥
स्वतन्त्रास्ते महात्मानः पाराशर्य वदस्व मे।<br>आहोस्वित्परतन्त्रास्ते श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्॥ ५हे पराशरसुत व्यासजी! वे तीनों देवश्रेष्ठ स्वाधीन हैं अथवा पराधीन; आप मुझे बताइये, मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ ५॥
मृत्युधर्मांश्च ते नो वा सच्चिदानन्दरूपिणः।<br>अधिभूतादिभिर्युक्ता न वा दुःखैस्त्रिधात्मकैः॥ ६वे सच्चिदानन्दस्वरूप देवगण मरणधर्मा हैं अथवा नहीं; और वे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंसे युक्त हैं अथवा नहीं?॥ ६॥
कालस्य वशगा नो वा ते सुरेन्द्रा महाबलाः।<br>कथं ते वै समुत्पन्नाः कस्मादिति च संशयः॥ ७वे तीनों महाबली देवेश कालके वशवर्ती हैं अथवा नहीं; और वे कैसे तथा किससे आविर्भूत हुए, मेरी यह भी एक शंका है॥ ७॥

| २४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| हर्षशोकयुतास्ते वै निद्रालस्यसमन्विताः।<br>सप्तधातुमयास्तेषां देहाः किं वान्यथा मुने॥ ८ | हे मुने! क्या वे हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वोंसे युक्त हैं, क्या वे निद्रा एवं प्रमाद आदिसे प्रभावित हैं तथा क्या उनके शरीर सप्त धातुओं (अन्नरस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य)-से निर्मित हैं अथवा नहीं?॥ ८॥ |
| कैर्द्रव्यैर्निर्मितास्ते वै कैर्गुणैरिन्द्रियैस्तथा।<br>भोगश्च कीदृशस्तेषां प्रमाणमायुषस्तथा॥ ९ | वे किन द्रव्योंसे निर्मित हैं, वे किन-किन गुणोंको धारण करते हैं, उनमें कौन-कौन-सी इन्द्रियाँ अवस्थित हैं, उनका भोग कैसा होता है तथा उनकी आयुका परिमाण क्या है?॥ ९॥ |
| निवासस्थानमप्येषां विभूतिं च वदस्व मे।<br>श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् विस्तरेण कथामिमाम्॥ १० | इनके निवास-स्थान एवं विभूतियोंके भी विषयमें मुझको बतलाइये। हे ब्रह्मन्! इस कथाको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है॥ १०॥ |
| व्यास उवाच<br>दुर्गमः प्रश्नभारोऽयं कृतो राजंस्त्वयाधुना।<br>ब्रह्मादीनां समुत्पत्तिः कस्मादिति महामते॥ ११ | व्यासजी बोले—हे महामति राजन्! ब्रह्मादि देवोंकी उत्पत्ति किससे हुई, इस समय आपने यह बड़ा दुर्गम प्रश्न किया है॥ ११॥ |
| एतदेव मया पूर्वं पृष्टोऽसौ नारदो मुनिः।<br>विस्मितः प्रत्युवाचेदमुत्थितः शृणु भूपते॥ १२ | हे राजन्! पूर्वमें मैंने यही प्रश्न देवर्षि नारदजीसे पूछा था। तब विस्मित होकर वे उठ खड़े हुए और उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसे आप सुनें॥ १२॥ |
| कस्मिंश्च समये चाहं गङ्गातीरे स्थितं मुनिम्।<br>अपश्यं नारदं शान्तं सर्वज्ञं वेदवित्तमम्॥ १३ | किसी समय मैंने शान्त, सर्ववेत्ता तथा वेद-विद्वानोंमें श्रेष्ठ नारदमुनिको गंगाके किनारे विद्यमान देखा॥ १३॥ |
| दृष्ट्वाहं मुदितो भूत्वा पादयोरपतं मुनेः।<br>तेनाज्ञप्तः समीपेऽस्य संविष्टश्च वरासने॥ १४ | मुनिको देखकर तथा प्रसन्न होकर मैं उनके चरणोंपर गिर पड़ा। तदनन्तर उनके द्वारा आज्ञा देनेपर मैं उनके पासमें ही एक सुन्दर आसनपर बैठ गया॥ १४॥ |
| श्रुत्वा कुशलवार्तां वै तमपृच्छं विधेः सुतम्।<br>निविष्टं जाह्नवीतीरे निर्जने सूक्ष्मवालुके॥ १५ | कुशल-क्षेमकी वार्ता सुन करके सूक्ष्म बालूवाले गंगा-तटके निर्जन स्थानपर बैठे हुए ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारदसे मैंने पूछा—॥ १५॥ |
| मुनेऽतिविततस्यास्य ब्रह्माण्डस्य महामते।<br>कः कर्ता परमः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि विधानतः॥ १६ | हे महामति मुनिदेव! इस अति विस्तीर्ण ब्रह्माण्डका प्रधान कर्ता कौन कहा गया है? उसे आप मुझे सम्यक् रूपसे बताइये॥ १६॥ |
| कस्मादेतत्त्समुत्पन्नं ब्रह्माण्डं मुनिसत्तम।<br>अनित्यं वा तथा नित्यं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम॥ १७ | हे मुनिश्रेष्ठ! इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति किससे हुई है? हे विप्रवर! आप मुझे यह भी बताइये कि यह ब्रह्माण्ड नित्य है अथवा अनित्य?॥ १७॥ |
| एककर्तृकमेतद्वा बहुकर्तृकमन्यथा।<br>अकर्तृकं न कार्यं स्याद्विरोधोऽयं विभाति मे॥ १८ | यह ब्रह्माण्ड किसी एकके द्वारा विरचित है अथवा अनेक कर्ताओंद्वारा मिलकर इसका निर्माण किया गया है? किसी कर्ताके बिना कार्यकी सत्ता सम्भव नहीं है। इस विषयमें मुझे अत्यन्त सन्देह हो रहा है॥ १८॥ |