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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ३०] षष्ठ स्कन्ध ८७३
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अ० ३०] षष्ठ स्कन्ध ८७३
| मा शोकं कुरु राजेन्द्र कालो हि दुरतिक्रमः।<br>कालयोगं समासाद्य भुङ्क्ष्व भोगान् गृहे यथा॥ १९<br><br>यथागता गता सा तु तथैव वरवर्णिनी।<br>यथा पूर्वं तथा तत्र गच्छ कार्यं कुरु प्रभो॥ २० | अतः हे राजेन्द्र! शोक मत कीजिये। कालका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। अपने घर जाकर समयानुसार प्राप्त भोगोंका उपभोग कीजिये। वह सुन्दरी जैसे आयी थी वैसे ही चली भी गयी। आप जैसे पहले थे, अब वैसे ही हो गये। हे राजन्! अब आप घर जाइये और अपना कार्य कीजिये॥ १९-२०॥ |
|---|---|
| रुदितेन तवाद्यैव नागमिष्यति कामिनी।<br>वृथा शोचसि पृथ्धीश योगयुक्तो भवाधुना॥ २१ | आपके इस तरह रोनेसे वह स्त्री अब लौट तो आयेगी नहीं। आप व्यर्थ चिन्ता कर रहे हैं। हे पृथ्वीपते! अब आप योगयुक्त बनिये॥ २१॥ |
| भोगः कालवशादेति तथैव प्रतियाति च।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यो निष्फले भववर्त्मनि॥ २२ | समयानुसार जिस प्रकार भोग आता है, उसी प्रकार चला भी जाता है। अतएव इस सारहीन भवमार्गके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये॥ २२॥ |
| नैकत्र सुखसंयोगो दुःखयोगस्तु नैकतः।<br>घटिकायन्त्रवत्कामं भ्रमणं सुखदुःखयोः॥ २३ | न तो अकेले सुखका संयोग होता है और न तो दुःखका; घटीयन्त्रकी भाँति सुख तथा दुःखका भ्रमण होता रहता है॥ २३॥ |
| मनः कृत्वा स्थिरं भूप कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>अथवा न्यस्य दायादे वनं सेवय साम्प्रतम्॥ २४ | हे राजन्! अब आप मनको स्थिर करके सुखपूर्वक राज्य कीजिये अथवा अपने उत्तराधिकारीको राज्य सौंपकर वनमें निवास कीजिये॥ २४॥ |
| दुर्लभो मानुषो देहः प्राणिनां क्षणभङ्गुरः।<br>तस्मिन्प्राप्ते तु कर्तव्यं सर्वथैवात्मसाधनम्॥ २५ | क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाला यह मानवशरीर प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। इसके प्राप्त होनेपर सम्यक् प्रकारसे आत्मकल्याण कर लेना चाहिये॥ २५॥ |
| जिह्वोपस्थरसो राजन् पशुयोनिषु वर्तते।<br>ज्ञानं मानुषदेहे वै नान्यासु च कुयोनिषु॥ २६ | हे राजन्! जिह्वा तथा जननेन्द्रियका आस्वाद तो पशुयोनियोंमें भी सुलभ होता है, किंतु ज्ञान केवल मानव-योनिमें ही सुलभ है, अन्य क्षुद्र योनियोंमें नहीं॥ २६॥ |
| तस्माद् गच्छ गृहं त्यक्त्वा शोकं कान्तासमुद्भवम्।<br>मायेयं भगवत्यास्तु यया सम्मोहितं जगत्॥ २७ | अतएव आप पत्नीवियोगसे उत्पन्न शोकका परित्याग करके घर चले जाइये। यह सब उन्हीं भगवतीकी माया है, जिससे सम्पूर्ण जगत् मोहित है॥ २७॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्तो हरिणा राजा प्रणम्य कमलापतिम्।<br>कृत्वा स्नानविधिं सम्यग्जगाम निजमन्दिरम्॥ २८<br><br>दत्त्वा राज्यं स्वपौत्राय प्राप्य निर्वेदमद्भुतम्।<br>वनं जगाम भूपालस्तत्त्वज्ञानमवाप च॥ २९ | नारदजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुके कहनेपर राजा तालध्वज उन लक्ष्मीपतिको प्रणाम करके भलीभाँति स्नान-विधि सम्पन्न करके अपने घर चले गये। अद्भुत वैराग्यको प्राप्त करके उन राजाने अपने पौत्रको राज्य सौंपकर वनके लिये प्रस्थान किया और उन्होंने तत्त्वज्ञान प्राप्त किया॥ २८-२९॥ |
| गते राजन्यहं वीक्ष्य भगवन्तमधोक्षजम्।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं हसन्तं मां पुनः पुनः॥ ३० | राजा तालध्वजके चले जानेपर मुझको देखकर बार-बार हँस रहे उन जगत्पति भगवान् विष्णुसे मैंने कहा॥ ३०॥ |
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८७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वञ्चितोऽहं त्वया देव ज्ञातं मायाबलं महत्।<br>स्मरामि चरितं सर्वं स्त्रीदेहे यत्कृतं मया॥ ३१ | हे देव! आपने मुझे भ्रमित कर दिया था; अब मायाकी महान् शक्तिको मैंने जान लिया। स्त्रीका शरीर प्राप्त होनेपर मैंने जो भी कार्य किया था, वह सब मैं अब याद कर रहा हूँ॥ ३१॥ |
| ब्रूहि मे देवदेवेश प्रविष्टोऽहं सरोवरे।<br>विगतं पूर्वविज्ञानं स्नानादेव कथं हरे॥ ३२ | हे देवाधिदेव! हे हरे! आप मुझे यह बताइये कि जब मैं सरोवरमें प्रविष्ट हुआ तब स्नान करते ही मेरी पूर्वस्मृति क्यों नष्ट हो गयी थी?॥ ३२॥ |
| योषिद्देहं समासाद्य मोहितोऽहं जगद्गुरो।<br>पतिं प्राप्य नृपश्रेष्ठं पुलोमी वासवं यथा॥ ३३ | हे जगद्गुरो! स्त्रीशरीर पानेके पश्चात् उन उत्तम नरेश तालध्वजको पतिरूपमें प्राप्त करके मैं उसी प्रकार मोहित हो गया था, जैसे इन्द्रको पाकर शची॥ ३३॥ |
| मनस्तदेव तच्चित्तं देहः स च पुरातनः।<br>लिङ्गं तदेव देवेश स्मृतेर्नाशः कथं हरे॥ ३४ | हे देवेश! मेरा मन वही था, चित्त वही था, वही प्राचीन देह था तथा वही लिंगरूप लक्षण भी था; तब हे हरे! मेरी स्मृतिका नाश कैसे हो गया?॥ ३४॥ |
| विस्मयोऽयं महान्मेऽत्र ज्ञाननाशं प्रति प्रभो।<br>कथयाद्य रमाकान्त कारणं परमं च यत्॥ ३५ | हे प्रभो! उस समय अपने ज्ञानके नष्ट हो जानेके विषयमें मुझे अब महान् आश्चर्य हो रहा है। हे रमाकान्त! इसका वास्तविक कारण बताइये॥ ३५॥ |
| नारीदेहं मया प्राप्य भुक्ता भोगा ह्यनेकशः।<br>सुरापानं कृतं नित्यं विधिहीनं च भोजनम्॥ ३६<br><br>मया तदेव न ज्ञातं नारदोऽहमिति स्फुटम्।<br>जानाम्यद्य यथा सर्वं विविक्तं न तथा तदा॥ ३७ | स्त्रीशरीर पाकर मैंने अनेक प्रकारके भोगोंका आनन्द लिया, नित्य मद्य-पान किया तथा निषिद्ध भोजन किया। उस समय मैं स्पष्टरूपसे यह नहीं जान सका कि मैं नारद हूँ। इस समय मैं जिस प्रकार जान रहा हूँ, वैसा उस समय मैं नहीं जानता था॥ ३६-३७॥ |
| विष्णुरुवाच<br>पश्य नारद मायावी विलासोऽयं महामते।<br>देहेषु सर्वजन्तूनां दशाभेदा ह्यनेकशः॥ ३८<br><br>जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीया देहिनां दशा।<br>तथा देहान्तरे प्राप्ते सन्देहः कीदृशः पुनः॥ ३९<br><br>सुप्तो नरो न जानाति न शृणोति वदत्यपि।<br>पुनः प्रबुद्धो जानाति सर्वं ज्ञातमशेषतः॥ ४०<br><br>निद्रया चाल्यते चित्तं भवन्ति स्वप्नसम्भवाः।<br>नानाविधा मनोभेदा मनोभावा ह्यनेकशः॥ ४१<br><br>गजो मां हन्तुमायाति न शक्तोऽस्मि पलायने।<br>किं करोमि न मे स्थानं यत्र गच्छामि सत्वरः॥ ४२ | विष्णु बोले—हे महामते नारद! देखो, यह सब खेल महामायाजनित है। उसीके प्रभावसे प्राणियोंके शरीरमें अनेक प्रकारकी अवस्थाएँ उपस्थित होती रहती हैं। जैसे शरीरधारियोंमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय—ये अवस्थाएँ होती हैं, उसी प्रकार दूसरे शरीरकी प्राप्ति भी होती है; इसमें सन्देह कैसा?। सोया हुआ प्राणी न जानता है, न सुनता है और न तो बोलता ही है, किंतु जाग जानेपर वही अपने सम्पूर्ण ज्ञात विषयोंको फिरसे जान लेता है। निद्रासे चित्त विचलित हो जाता है और स्वप्नसे उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकारके मनोभाव तथा मनोभेद उपस्थित होते रहते हैं। उस अवस्थामें प्राणी सोचता है कि हाथी मुझे मारने आ रहा है, किंतु मैं भागनेमें समर्थ नहीं हूँ। क्या करूँ? मेरे लिये कोई स्थान नहीं है, जहाँ मैं शीघ्र भाग चलूँ॥ ३८—४२॥ |