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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९

अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अद्यात्र पृथिवी नास्ति क्व गतेति विचारणे।<br>सञ्जाता इति विज्ञेया अस्यास्तु परमाणवः॥ २८आज यहाँ पृथ्‍वी नहीं है, तब वह कहाँ चली गयी ? इसपर विचार करनेपर वह पृथ्‍वी परमाणुरूपसे विद्यमान तो है ही—ऐसा जानना चाहिये॥ २८॥
शाश्वतं क्षणिकं शून्यं नित्यानित्यं सकर्तृकम्।<br>अहंकाराग्रिमञ्चैव सप्तभेदैर्विवक्षितम्॥ २९<br>गृहाणाज महत्तत्त्वमहङ्कारस्तदुद्भवः।<br>ततः सर्वाणि भूतानि रचयस्व यथा पुरा॥ ३०शाश्वत, क्षणिक, शून्य, नित्य, अनित्य, सकर्तृक और अहंकार—इन सात भेदोंमें सृष्टिका वर्णन विवक्षित है। इसलिये हे अज! अब आप उस महत्तत्त्वको ग्रहण कीजिये, जिससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् आप पूर्वकी भाँति समस्त प्राणियोंकी रचना कीजिये॥ २९-३०॥
व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्यानि विरच्य निवसन्तु वः।<br>स्वानि स्वानि च कार्याणि कुर्वन्तु दैवभाविताः॥ ३१अब आपलोग जाइये तथा अपने-अपने लोकोंकी रचना करके निवास कीजिये और दैवका चिन्तन करते हुए अपने-अपने कार्य कीजिये॥ ३१॥
गृहाणेमां विधे शक्तिं सुरूपां चारुहासिनीम्।<br>महासरस्वतीं नाम्ना रजोगुणयुतां वराम्॥ ३२<br>श्वेताम्बरधरां दिव्यां दिव्यभूषणभूषिताम्।<br>वरासनसमारूढां क्रीडार्थं सहचारिणीम्॥ ३३हे विधे! सुन्दर रूपवाली, दिव्य हासवाली, रजोगुणसे युक्त, श्रेष्ठ श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली, अलौकिक, दिव्याभूषणोंसे विभूषित, उत्तम आसनपर विराजमान इस महासरस्वती नामक शक्तिको क्रीडाविहारके लिये अपनी सहचरीके रूपमें स्वीकार कीजिये॥ ३२-३३॥
एषा सहचरी नित्यं भविष्यति वराङ्गना।<br>मावमंस्था विभूतिं मे मत्वा पूज्यतमां प्रियाम्॥ ३४<br>गच्छ त्वमनया सार्धं सत्यलोकं बताशु वै।<br>बीजाच्चतुर्विधं सर्वं समुत्पादय साम्प्रतम्॥ ३५यह सुन्दरी सदा आपकी सहचरी बनकर रहेगी। इस पूज्यतम प्रेयसीको मेरी विभूति समझकर कभी भी इसका तिरस्कार न कीजियेगा। अब आप शीघ्र ही इसे साथ लेकर सत्यलोकमें प्रस्थान करें और तत्त्वबीजसे चार प्रकारकी समस्त सृष्टि करनेमें तत्पर हो जायँ॥ ३४-३५॥
लिङ्गकोशाश्च जीवैस्तैः सहिताः कर्मभिस्तथा।<br>वर्तन्ते संस्थिताः काले तान्कुरु त्वं यथा पुरा॥ ३६<br>कालकर्मस्वभावाख्यैः कारणैः सकलं जगत्।<br>स्वभावस्वगुणैर्युक्तं पूर्ववत्सचराचरम्॥ ३७समस्त जीवों और कर्मोंके साथ जो लिंगकोश हैं, उन्हें पूर्वकी भाँति आप प्रतिष्ठित कर दें। काल, कर्म और स्वभाव नामवाले—इन कारणोंसे समस्त चराचर सृष्टिको पूर्वकी भाँति अपने-अपने स्वभाव और गुणोंसे युक्त कर दीजिये॥ ३६-३७॥
माननीयस्त्वया विष्णुः पूजनीयश्च सर्वदा।<br>सत्त्वगुणप्रधानत्वादधिकः सर्वतः सदा॥ ३८विष्णु आपके सदा माननीय और पूजनीय हैं; क्योंकि सत्त्वगुणकी प्रधानताके कारण वे सर्वदा सब प्रकारसे श्रेष्ठ हैं॥ ३८॥
यदा यदा हि कार्यं वो भविष्यति दुरत्ययम्।<br>करिष्यति पृथिव्यां वै अवतारं तदा हरिः॥ ३९जब-जब आपलोगोंका कोई कठिन कार्य उपस्थित होगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पृथ्‍वीपर अवतार ग्रहण करेंगे॥ ३९॥
तिर्यग्योनावथान्यात्र मानुषीं तनुमाश्रितः।<br>दानवानां विनाशं वै करिष्यति जनार्दनः॥ ४०कहीं तिर्यक्-योनिमें तथा कहीं मानवयोनिमें शरीर धारण करके ये भगवान् जनार्दन दानवोंका अवश्य विनाश करेंगे॥ ४०॥
२७०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भवोऽयं ते सहायश्च भविष्यति महाबलः।<br>समुत्पाद्य सुरान्सर्वान्विहरस्व यथासुखम्॥ ४१ये महाबली शंकरजी भी आपकी सहायता करेंगे। अब आप समस्त देवताओंका सृजन करके स्वेच्छया सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४१॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नानायज्ञैः सदक्षिणैः।<br>यजिष्यन्ति विधानेन सर्वान्वः सुसमाहिताः॥ ४२ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यलोग दक्षिणायुक्त नानाविध यज्ञोंसे विधिपूर्वक पूर्ण मनोयोगके साथ आप सबकी पूजा करेंगे॥ ४२॥
मन्नामोच्चारणात्सर्वे मखेषु सकलेषु च।<br>सदा तृप्ताश्च सन्तुष्टा भविष्यध्वं सुराः किल॥ ४३हे देवो! सभी यज्ञोंमें मेरे नामका उच्चारण करते ही आप सभी लोग निश्चितरूपसे सदैव तृप्त एवं सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४३॥
शिवश्च माननीयो वै सर्वथा यत्ततोगुणः।<br>यज्ञकार्येषु सर्वेषु पूजनीयः प्रयत्नतः॥ ४४आपलोग तमोगुणसम्पन्न शंकरजीका सब प्रकारसे सम्मान कीजियेगा और सभी यज्ञकार्योंमें प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा कीजियेगा॥ ४४॥
यदा पुनः सुराणां वै भयं दैत्याद्भविष्यति।<br>शक्तयो मे तदोत्पन्ना हरिष्यन्ति सुविग्रहाः॥ ४५<br><br>वाराही वैष्णवी गौरी नारसिंही सदाशिवा।<br>एताश्चान्याश्च कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४६जब कभी भी देवताओंके समक्ष दैत्योंसे भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपोंवाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य देवियोंके रूपमें मेरी शक्तियाँ प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी। अतः हे कमलोद्भव! अब आप अपने कार्य करें॥ ४५-४६॥
नवाक्षरमिमं मन्त्रं बीजध्यानयुतं सदा।<br>जपन्सर्वाणि कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४७हे कमलोद्भव! बीज तथा ध्यानसे युक्त मेरे इस नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए आप समस्त कार्य कीजिये॥ ४७॥
मन्त्राणामुत्तमोऽयं वै त्वं जानीहि महामते।<br>हृदये ते सदा धार्यः सर्वकामार्थसिद्धये॥ ४८हे महामते! आप इस मन्त्रको सभी मन्त्रोंसे श्रेष्ठ जानिये। सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आपको इस मन्त्रको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये॥ ४८॥
इत्युक्त्वा मां जगन्माता हरिं प्राह शुचिस्मिता।<br>विष्णो व्रज गृहाणेमां महालक्ष्मीं मनोहराम्॥ ४९मुझसे ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली जगज्जननीने भगवान् विष्णुसे कहा—हे विष्णो! अब आप इन मनोहर महालक्ष्मीको स्वीकार कीजिये और यहाँसे प्रस्थान कीजिये॥ ४९॥
सदा वक्षःस्थले स्थाने भविता नात्र संशयः।<br>क्रीडार्थं ते मया दत्ता शक्तिः सर्वार्थदा शिवा॥ ५०ये आपके वक्षःस्थलमें सदा निवास करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। आपके लीलाविनोदके लिये मैंने आपको यह सभी मनोरथ प्रदान करनेवाली कल्याणमयी शक्ति अर्पित की है॥ ५०॥
त्वयेयं नावमन्तव्या माननीया च सर्वदा।<br>लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं योगो वै विहितो मया॥ ५१आप इनका सर्वदा सम्मान करते रहियेगा और कभी भी तिरस्कार न कीजियेगा। लक्ष्मीनारायण नामक यह संयोग मेरे द्वारा ही रचा गया है॥ ५१॥
अ० ६ ]तृतीय स्कन्ध२७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जीवनार्थं कृता यज्ञा देवानां सर्वथा मया।<br>अविरोधेन सङ्गेन वर्तितव्यं त्रिभिः सदा॥ ५२मैंने देवताओंकी जीविकाके लिये ही यज्ञोंकी रचना की है। आप तीनों विरोधभावनासे रहित होकर व्यवहार कीजिये॥ ५२॥
त्वं च वेधाः शिवस्त्वेते देवा मद्गुणसम्भवाः।<br>मान्याः पूज्याश्च सर्वेषां भविष्यन्ति न संशयः॥ ५३आप (विष्णु), ब्रह्मा, शिव तथा ये सभी देवता मेरे ही प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव निस्सन्देह आपलोग सभी प्राणियोंके मान्य एवं पूज्य होंगे॥ ५३॥
ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः।<br>निरयं ते गमिष्यन्ति विभेदान्नात्र संशयः॥ ५४जो अज्ञानी मनुष्य इनमें भेदभाव करेंगे, वे इस विभेदके कारण नरकमें पड़ेंगे। इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥
यो हरिः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स स्वयं हरिः।<br>एतयोर्भेदमातिष्ठन्नरकाय भवेन्नरः॥ ५५जो विष्णु हैं, वे ही साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं, वे ही स्वयं विष्णु हैं। इन दोनोंमें भेद रखनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है॥ ५५॥
तथैव द्रुहिणो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा।<br>अपरो गुणभेदोऽस्ति शृणु विष्णो ब्रवीमि ते॥ ५६ब्रह्माजीके सम्बन्धमें भी ऐसा ही जानिये; इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे विष्णो! गुणोंके कारण इनमें जो भेद हैं; उन्हें आपको बता रही हूँ, आप सुनें॥ ५६॥
मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु परमात्मविचिन्तने।<br>गौणत्वेऽपि परौ ख्यातौ रजोगुणतमोगुणौ॥ ५७<br><br>लक्ष्म्‍या सह विकारेषु नानाभेदेषु सर्वदा।<br>रजोगुणयुतो भूत्वा विहरस्वानया सह॥ ५८परमात्म-चिन्तनकी दृष्टिसे आपका मुख्य गुण सत्त्वगुण है। दूसरे रजोगुण तथा तमोगुण आपके लिये गौण हैं। अतएव विभिन्न भेदयुक्त विकारोंमें रजोगुणसे सम्पन्न होकर आप इन लक्ष्मीके साथ विहार कीजिये॥ ५७-५८॥
वाग्बीजं कामराजं च मायाबीजं तृतीयकम्।<br>मन्त्रोऽयं त्वं रमाकान्त मद्दत्तः परमार्थदः॥ ५९<br><br>गृहीत्वा जप तं नित्यं विहरस्व यथासुखम्।<br>न ते मृत्युभयं विष्णो न कालप्रभवं भयम्॥ ६०हे लक्ष्मीकान्त! मेरे द्वारा आपको दिया गया वाग्बीज (ऐं), कामराज (क्लीं) तथा तृतीय मायाबीज (ह्रीं) इनसे युक्त यह मन्त्र परमार्थ प्रदान करनेवाला है। आप इसे ग्रहण करके निरन्तर इसका जप कीजिये तथा सुखपूर्वक विहार कीजिये। हे विष्णो! ऐसा करनेसे आपको न तो मृत्युभय होगा और न कालजनित भय ही होगा॥ ५९-६०॥
यावदेष विहारो मे भविष्यति सुनिश्चितः।<br>संहरिष्याम्यहं सर्वं यदा विश्वं चराचरम्॥ ६१<br><br>भवन्तोऽपि तदा नूनं मयि लीना भविष्यथ।<br>स्मर्तव्योऽयं सदा मन्त्रः कामदो मोक्षदस्तथा॥ ६२जबतक मैं विहार करती रहूँगी, तबतक यह सृष्टि निश्चितरूपसे रहेगी और जब मैं सम्पूर्ण चराचर जगत्‌का संहार कर दूँगी, उस समय आपलोग भी मुझमें समाहित हो जायँगे। आपलोग समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मन्त्रका अनवरत स्मरण करते रहें॥ ६१-६२॥
उद्गीथेन च संयुक्तः कर्तव्यः शुभमिच्छता।<br>कारयित्वाथ वैकुण्ठं वस्तव्यं पुरुषोत्तम॥ ६३<br><br>विहरस्व यथाकामं चिन्तयन्मां सनातनीम्।अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको इस मन्त्रके साथ 'ओंकार' जोड़कर चतुरक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। हे पुरुषोत्तम! अब आप वैकुण्ठका निर्माण कराकर उसीमें निवास कीजिये और मुझ सनातनीका सतत ध्यान करते हुए इच्छापूर्वक विहार कीजिये॥ ६३ ½ ॥

| २७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा वासुदेवं सा त्रिगुणा प्रकृतिः परा ॥ ६४<br>निर्गुणा शङ्करं देवमवोचदमृतं वचः ।ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] विष्णुसे ऐसा कहकर उस त्रिगुणात्मिका तथा निर्गुणा परा प्रकृतिने देवाधिदेव शंकरसे अमृतमय वचन कहा ॥ ६४ १/२ ॥
देव्युवाच<br>गृहाण हर गौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम् ॥ ६५<br>कैलासं कारयित्वा च विहरस्व यथासुखम्।<br>मुख्यस्तमोगुणस्तेऽस्तु गौणौ सत्त्वरजोगुणौ ॥ ६६**देवी बोलीं—**हे हर ! आप इन मनोहरा महाकाली गौरीको अंगीकार कीजिये और कैलासशिखरकी रचना कराकर वहाँ सुखपूर्वक विहार कीजिये। तमोगुण आपमें प्रधानगुणके रूपमें विद्यमान रहेगा और सत्त्वगुण तथा रजोगुण आपमें गौणरूपसे व्याप्त रहेंगे ॥ ६५-६६ ॥
विहरासुरनाशार्थं रजोगुणतमोगुणौ।<br>तपस्तप्तं तथा कर्तुं स्मरणं परमात्मनः ॥ ६७<br>शर्व सत्त्वगुणः शान्तो गृहीतव्यः सदानघ।<br>सर्वथा त्रिगुणा यूयं सृष्टिस्थित्यन्तकारकाः ॥ ६८रजोगुण और तमोगुणके द्वारा दैत्योंके विनाशके लिये आप वहाँ विहार करें और हे शर्व ! परमात्माका स्मरण-ध्यान करनेके लिये आप तप कर चुके हैं। आप शान्तिप्रधान सत्त्वगुणका अवलम्बन कीजिये। हे अनघ ! त्रिगुणात्मक आप तीनों देवता सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं ॥ ६७-६८ ॥
एभिर्विहीनं संसारे वस्तु नैवात्र कुत्रचित्।<br>वस्तुमात्रं तु यद् दृश्यं संसारे त्रिगुणं हि तत् ॥ ६९संसारमें कहीं भी कोई भी वस्तु इन तीनों गुणोंसे रहित नहीं है। जगत्की जितनी भी दृश्य वस्तुएँ हैं, वे सब त्रिगुणात्मिका हैं ॥ ६९ ॥
दृश्यं च निर्गुणं लोके न भूतं नो भविष्यति।<br>निर्गुणः परमात्मासौ न तु दृश्यः कदाचन ॥ ७०इस संसारमें ऐसी कोई भी दृश्य वस्तु गुणरहित न तो हुई और न होगी। निर्गुण तो एकमात्र वह परमात्मा ही है और वह कभी दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ ७० ॥
सगुणा निर्गुणा चाहं समये शङ्करोत्तमा।<br>सदाहं कारणं शम्भो न च कार्यं कदाचन ॥ ७१हे शंकर ! समय आनेपर मैं श्रेष्ठरूपा ही वह सगुणा या निर्गुणा हो जाती हूँ। हे शम्भो ! मैं सर्वदा कारण हूँ, कार्य कभी नहीं ॥ ७१ ॥
सगुणा कारणत्वाद्धै निर्गुणा पुरुषान्तिकै।<br>महत्तत्त्वमहङ्कारो गुणाः शब्दादयस्तथा ॥ ७२<br>कार्यकारणरूपेण संसरन्ते त्वहर्निशम्।<br>सदुद्भूतस्त्वहङ्कारस्तेनाहं कारणं शिवा ॥ ७३किसी कारणविशेषसे मैं सगुणा होती हूँ तो उस परमपुरुषके सांनिध्यमें निर्गुणा रहती हूँ। महत्तत्त्व, अहंकार, तीनों गुण और शब्द आदि विषय कार्यकारणभावसे निरन्तर गतिशील रहते हैं। सत्से अहंकार उत्पन्न होता है; इसीलिये मैं शिवा सबका कारण हूँ ॥ ७२-७३ ॥
अहङ्कारश्च मे कार्यं त्रिगुणोऽसौ प्रतिष्ठितः।<br>अहङ्कारान्महत्तत्त्वं बुद्धिः सा परिकीर्तिता ॥ ७४अहंकार मेरा कार्य है और वह त्रिगुणात्मक रूपमें प्रतिष्ठित है। उस अहंकारसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है; उसीको बुद्धि कहा गया है ॥ ७४ ॥
महत्तत्त्वं हि कार्यं स्यादहङ्कारो हि कारणम्।<br>तन्मात्राणि त्वहङ्कारादुत्पद्यन्ते सदैव हि ॥ ७५वह महत्तत्त्व कार्य है तथा अहंकार उसका कारण है। इसी अहंकारसे तन्मात्राओंकी सदा
अ० ६ ]तृतीय स्कन्ध२७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कारणं पञ्चभूतानां तानि सर्वसमुद्भवे।<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च॥ ७६<br><br>महाभूतानि पञ्चैव मनः षोडशमेव च।<br>कार्यञ्च कारणञ्चैव गणोऽयं षोडशात्मकः॥ ७७उत्पत्ति होती है। वे तन्मात्राएँ [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूतोंका कारण हैं। सबके सृजनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और सोलहवाँ मन—यह षोडशात्मक समूह कार्य और कारणरूप होता है॥ ७५–७७॥
परमात्मा पुमानाद्यो न कार्यं न च कारणम्।<br>एवं समुद्भवः शम्भो सर्वेषामादिसम्भवे॥ ७८वह आदिपुरुष परमात्मा न कार्य है और न कारण। हे शिव! सबकी प्रारम्भिक सृष्टिके उत्पत्तिका यही क्रम है॥ ७८॥
संक्षेपेण मया प्रोक्तस्तव तत्र समुद्भवः।<br>व्रजन्त्वद्य विमानेन कार्यार्थं मम सत्तमाः॥ ७९अभी मैंने आपलोगोंकी यह उत्पत्ति-परम्परा संक्षेपमें कही। इसलिये हे श्रेष्ठदेव! अब आपलोग मेरा कार्य सम्पन्न करनेके लिये इस विमानसे प्रस्थान करें॥ ७९॥
स्मरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येऽहं विषमे स्थिते।<br>स्मर्त्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः॥ ८०<br><br>उभयोः स्मरणादेव कार्यसिद्धिरसंशयम्।जब आपलोगोंपर कोई संकट आयेगा, तब मैं स्मरणमात्रसे तत्काल आपलोगोंको दर्शन दूँगी। अतः हे देवो! आपलोग सर्वदा मेरा तथा सनातन परमात्माका स्मरण करते रहें। हम दोनोंके स्मरणसे ही निःसन्देह आपलोगोंकी कार्यसिद्धि होगी॥ ८० १/२॥
ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विससर्जास्मान्दत्त्वा शक्तीः सुसंस्कृताः॥ ८१<br>विष्णोवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च।<br><br>महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः॥ ८२ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर भगवतीने अपनी अद्भुत शक्तियाँ प्रदानकर हमें विदा किया। विष्णुको महालक्ष्मी, शिवको महाकाली और मुझे महासरस्वती प्रदान करके उस स्थानसे विदा कर दिया॥ ८१-८२॥
स्थलान्तरं समासाद्य ते जाताः पुरुषा वयम्।<br>चिन्तयन्तः स्वरूपं तत्प्रभावं परमाद्भुतम्॥ ८३उनके स्वरूप तथा अत्यन्त अद्भुत प्रभावका स्मरण करते हुए अन्य स्थानपर पहुँचकर हमलोग पुनः पुरुषरूपमें हो गये॥ ८३॥
विमानं तत्समासाद्य संरूढास्तत्र वै त्रयः।<br>न द्वीपोऽसौ न सा देवी सुधासिन्धुस्तथैव च।<br>पुनर्दृष्टं विमानं वै तत्रास्माभिर्न चान्यथा॥ ८४तब लौटकर हम तीनों पुनः उसी विमानमें बैठ गये। [हमने देखा कि] वहाँ न तो वह मणिद्वीप है, न वे महामाया हैं और न वह सुधासागर है। उस समय वहाँ उस विमानके अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ ८४॥
आसाद्य तस्मिन्वितते विमाने<br>प्राप्ता वयं पङ्कजसन्निधौ च।<br>महार्णवे यत्र हतौ दुरत्ययौ<br>मुरारिणा तौ मधुकैटभाख्यौ॥ ८५उस विशाल विमानमें बैठकर हम तीनों पुनः उसी महासागरमें विद्यमान उस कमलके निकट पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ नामक दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया था॥ ८५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
ब्रह्मणे श्रीदेव्या उपदेशवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥