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सर्वकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 889 में से

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पृष्ठ 459
४५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह।<br>ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः॥ १तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो। दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु सदा प्रत्यनरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे। जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ १-३॥
विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः।<br>वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः॥ २
यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा॥ ३
न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम्।<br>जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ॥ ४मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो सको। अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ समयतक प्रतीक्षा करो। मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ दानवो! महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥ ४-६॥
तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः।<br>अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै॥ ५
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम्।<br>युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः॥ ६
दैत्या ऊचुःदैत्यों ने कहा—
पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम।<br>शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम्॥ ७हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अतः उतने समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ७-८॥
निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः।<br>नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः॥ ८
शुक्र उवाचशुक्राचार्य बोले—
यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात्।<br>तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः॥ ९जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो॥ ९॥
सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः।<br>देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः॥ १०विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं॥ १०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 15 B