देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
८४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| द्वितीयेऽह्नि मुनिश्रेष्ठ पृष्टो मात्रा रहः पुनः।<br>भविष्यति सुतः पुत्र काशिराजसुतोदरे ॥ ५९<br><br>मयोक्ता जननी तत्र व्रीडानम्रमुखेन ह।<br>विनेत्रो भविता पुत्रो मातः शापान्ममैव हि ॥ ६०<br><br>तया निर्भर्त्सितस्तत्र कठोरवचसा मुने।<br>कथं पुत्र त्वया शप्ता पुत्रस्तेऽन्धो भविष्यति ॥ ६१ | हे मुनिवर! दूसरे दिन माताने एकान्तमें मुझसे फिर पूछा—हे पुत्र! क्या काशिराजकी पुत्री अम्बिकाके गर्भसे पुत्र उत्पन्न होगा? तब लज्जाके कारण मुख नीचे किये हुए मैंने मातासे कहा—हे माता! मेरे शापके प्रभावसे नेत्रहीन पुत्र उत्पन्न होगा॥ ५९-६०॥<br><br>हे मुने! इसपर माताने कठोर वाणीमें मेरी भर्त्सना की—'हे पुत्र! तुमने शाप क्यों दिया कि तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा'॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे अम्बिकायां नियोगोत्पुत्रोत्पादनाय गर्भधारणवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| वासवी चकिता जाता श्रुत्वा मे वाक्यमीदृशम्।<br>दाशेयी मामुवाचेदं पुत्रार्थे भृशमातुरा ॥ १<br><br>अम्बालिका वधूर्धन्या काशिराजसुता सुत।<br>भार्या विचित्रवीर्यस्य विधवा शोकसंयुता ॥ २<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्ना रूपयौवनशालिनी।<br>तस्यां जनय सङ्गं त्वं कृत्वा पुत्रं सुसम्मतम् ॥ ३ | मेरी वह बात सुनकर वासवराजकुमारी सत्यवती चकित हो गयीं और पुत्रके लिये अत्यन्त व्यग्र होकर मुझसे कहने लगीं—हे पुत्र! काशिराजकी श्रेष्ठ पुत्री वधू अम्बालिका विचित्रवीर्यकी भार्या है, जो विधवा तथा पतिशोकसे सन्तप्त है। वह सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और रूप तथा यौवनसे युक्त है। तुम उसके साथ संसर्ग करके प्रिय पुत्र उत्पन्न करो॥ १—३॥ |
| नान्धो राजाधिकारी स्यात्तस्मात्पुत्रं मनोहरम्।<br>उत्पादय राजपुत्र्यां वचनान्मम मानद ॥ ४ | नेत्रहीनको राजा बननेका अधिकार नहीं हो सकता। इसलिये हे मानद! मेरी बात मानकर तुम उस राजपुत्रीसे एक मनोहर पुत्र उत्पन्न करो॥ ४॥ |
| इत्युक्तोऽहं तदा मात्रा स्थितस्तत्र गजाह्वये।<br>यावदृतुमती जाता काशिराजसुता मुने ॥ ५<br><br>एकान्ते शयनागारे प्राप्ता सा मम सन्निधौ।<br>लज्जमाना सुकेशान्ता स्वश्वश्रूवचनात्तदा ॥ ६ | हे मुने! तब मैं माताजीके ऐसा कहनेपर वहीं हस्तिनापुरमें ठहर गया और जब सुन्दर केशपाशवाली काशिराजकी पुत्री अम्बालिका ऋतुमती हुई तो अपनी सासके कहनेपर वह एकान्त शयनकक्षमें लज्जित होती मेरे पास आयी॥ ५-६॥ |
| दृष्ट्वा मां जटिलं दान्तं तापसं रसवर्जितम्।<br>सा स्वेदवदना जाता पाण्डुरा विमना भृशम् ॥ ७ | वहाँ मुझ जटाधारी, इन्द्रियनिग्रही तथा शृङ्गाररससे अनभिज्ञ तपस्वीको देखकर उसके मुखपर पसीना आ गया, शरीर पीला पड़ गया और उसका मन बहुत खिन्न हो गया॥ ७॥ |
| अ० २५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुपितोऽहं तदा दृष्ट्वा कामिनीं निशि सङ्गताम्।<br>वेपमानां स्थितां पार्श्वे ह्यब्रुवं तामहं रुषा॥ ८<br><br>दृष्ट्वा मां यदि गर्वेण पाण्डुवर्णा समावृता।<br>अतस्ते तनयः पाण्डुर्भविष्यति सुमध्यमे॥ ९ | तत्पश्चात् रात्रिमें सम्पर्कके लिये आयी हुई उस सुन्दरीको अपने पासमें बैठी देखकर मैं कुपित हो गया और रोषपूर्वक बोला—सुमध्यमे! मुझे देखकर यदि तुम अभिमानसे पीली पड़ गयी हो तो तुम्हारा पुत्र भी पीतवर्णका होगा॥ ८-९॥ |
| इत्युक्त्वा निशि तत्रैव स्थितोऽम्बालिकया युतः।<br>भुक्त्वा तां निशि निर्यातः स्थानमापृच्छ्य मातरम्॥ १० | ऐसा कहकर मैं उस अम्बालिकाके साथ रातभर वहीं रहा और फिर मातासे आज्ञा लेकर अपने आश्रमके लिये प्रस्थित हो गया॥ १०॥ |
| ततस्ताभ्यां सुतौ काले प्रसूतावन्धपाण्डुरौ।<br>धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च प्रथितौ सम्बभूवतुः॥ ११ | तदनन्तर समय आनेपर उन दोनोंने अन्धे तथा पाण्डुवर्णके दो पुत्र उत्पन्न किये। वे दोनों धृतराष्ट्र तथा पाण्डु नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ११॥ |
| माता मे विमना जाता तादृशौ वीक्ष्य तौ सुतौ।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते मामाहूय तदाब्रवीत्॥ १२<br><br>द्वैपायन सुतौ जातौ राज्ययोग्यौ न तादृशौ।<br>अन्यं मनोहरं पुत्रं समुत्पादय मे प्रियम्॥ १३ | उन दोनों राजकुमारोंको इस प्रकारका देखकर मेरी माता खिन्नमनस्क हो गयीं। तत्पश्चात् एक वर्षके अनन्तर मुझे बुलाकर उन्होंने कहा—हे द्वैपायन! इस प्रकारके दोनों पुत्र राज्य करनेके योग्य नहीं हैं, अतएव तुम एक अन्य मनोहर पुत्र उत्पन्न करो, जो मुझे अत्यन्त प्रिय हो॥ १२-१३॥ |
| तथेति सा मया प्रोक्ता मुदिता जननी तदा।<br>अम्बिकां प्रार्थयामास सुतार्थे काल आगते॥ १४<br><br>पुत्रि व्यासं समालिङ्ग्य पुत्रमुत्पादयाद्भुतम्।<br>कुरुवंशस्य कर्तारं राज्ययोग्यं वरानने॥ १५ | 'वैसा ही होगा'—मेरे इस प्रकार कहनेपर माता अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं। इसके बाद ऋतुकाल आनेपर माताने पुत्रहेतु अम्बिकासे प्रार्थना की—हे पुत्रि! हे सुमुखि! व्यासके साथ समागम करके तुम कुरुवंश चलानेवाला तथा राज्य करनेयोग्य एक अद्वितीय पुत्र उत्पन्न करो॥ १४-१५॥ |
| वधूर्लज्जान्विता किञ्चिन्नोवाच वचनं तदा।<br>गतोऽहं शयनागारे मातुस्तद्वचनान्निशि॥ १६ | उस समय लज्जासे युक्त वधू अम्बिकाने कुछ भी नहीं कहा और मैं माताकी वह बात मानकर रातमें शयनागारमें चला गया॥ १६॥ |
| दासी विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनसंयुता।<br>प्रेषिताम्बिकया तत्र विचित्राभरणाम्बरा॥ १७ | तत्पश्चात् अम्बिकाने विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दासीको सुन्दर आभूषण तथा वस्त्र पहनाकर मेरे पास भेज दिया॥ १७॥ |
| चन्दनारक्तदेहा सा पुष्पमालाविभूषिता।<br>आयाता हावसंयुक्ता सुकेशी हंसगामिनी॥ १८ | शरीरपर चन्दन लगाये, फूलकी मालाओंसे विभूषित तथा सुन्दर केशोंवाली वह सुन्दरी हंसकी भाँति मन्द-मन्द चलती हुई बड़े हाव-भावसे मेरे पास आयी॥ १८॥ |
| पर्यङ्के मां समावेश्य संस्थिता प्रेमसंयुता।<br>प्रसन्नोऽहं तदा तस्या विलासेनाभवं मुने॥ १९ | मुझे पलंगपर बैठाकर वह भी प्रेमपूर्वक मेरे पास बैठ गयी। हे मुने! उसके इस प्रेमपूर्ण हाव-भावसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ १९॥ |