देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं त्वमी यदसुभी रहिता न सन्ति<br>त्वच्चिन्तितेन दनुजाः प्रथितप्रभावाः।<br>येषां कृते जननि देहनिबन्धनं ते<br>क्रीडारसस्तव न चान्यतरोऽत्र हेतुः ॥ ११ | हे माता! बड़ी विलक्षण बात तो यह है कि विख्यात प्रभावोंवाले उन दैत्योंका संहार जो आपके संकल्पमात्रसे ही सम्भव था, इसके लिये आपको अवतार लेना पड़ा। यह शरीर धारण करके आप वास्तवमें इसीके सहारे लीला करती हैं; इसमें कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ ११ ॥ |
| प्राप्ते कलावहह दुष्तरे च काले<br>न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते।<br>धूर्तैः पुराणचतुरैर्हरिशङ्कराणां<br>सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम् ॥ १२ | जो मनुष्य इस विकराल कलिके उपस्थित होनेपर भी आपकी आराधना नहीं करते, अपितु आपके ही द्वारा निर्मित विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासनामें तत्पर रहते हैं, वे लोग पुराण-चतुर धूर्तजनोंके द्वारा निश्चित रूपसे ठग लिये गये हैं ॥ १२ ॥ |
| ज्ञात्वा सुरांस्तव वशानसुरादितांश्च<br>ये वै भजन्ति भुवि भावयुता विभग्नान्।<br>धृत्वा करे सुविमलं खलु दीपकं ते<br>कूपे पतन्ति मनुजा विजलेऽतिघोरे ॥ १३ | यह जानकर भी कि देवता आपके अधीन हैं तथा दैत्योंके द्वारा छिन्न-भिन्न और प्रताड़ित किये जाते हैं—जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूलोकमें अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो हाथमें अत्यन्त प्रकाशमान दीपक लेकर भी किसी जलरहित भयानक कूपमें जा गिरते हैं ॥ १३ ॥ |
| विद्या त्वमेव सुखदाऽसुखदाप्यविद्या<br>मातस्त्वमेव जननार्तिहरा नराणाम्।<br>मोक्षार्थिभिस्तु कलिता किल मन्दधीभि-<br>र्नाराधिता जननि भोगपरैस्तथाज्ञैः ॥ १४ | हे माता! आप ही सुखदायिनी विद्या तथा दुःखदायिनी अविद्या हैं और आप ही मनुष्योंके जन्म-मृत्युका दुःख दूर करनेवाली हैं। हे जननि! मोक्षकी कामना करनेवाले लोग तो आपकी आराधना करते हैं, किंतु मन्दबुद्धि अज्ञानी तथा विषयभोगपरायण मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते ॥ १४ ॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं शरण्यं<br>पादाम्बुजं तव भजन्ति सुरास्तथान्ये।<br>तद्वै न येऽल्पमतयो मनसा भजन्ति<br>भ्रान्ताः पतन्ति सततं भवसागरे ते ॥ १५ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवतागण आपके शरणदायक चरणकमलकी निरन्तर उपासना करते हैं, किंतु जो अल्पबुद्धि मनुष्य भ्रमित होकर मनसे आपकी आराधना नहीं करते, वे संसार-सागरमें बार-बार गिरते हैं ॥ १५ ॥ |
| चण्डि त्वदङ्घ्रिजलजोत्थरजःप्रसादै-<br>र्ब्रह्मा करोति सकलं भुवनं भवादौ।<br>शौरिश्च पाति खलु संहरते हरस्तु<br>त्वां सेवते न मनुजस्त्विह दुर्भगोऽसौ ॥ १६ | हे चण्डिके! आपके चरण-कमलसे उत्पन्न हुई धूलिके प्रभावसे ही ब्रह्मा सृष्टिके प्रारम्भमें सम्पूर्ण भुवनकी रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिवजी संहार करते हैं। इस लोकमें जो मनुष्य आपकी उपासना नहीं करता, वह अभागा है ॥ १६ ॥ |
| वाग्देवता त्वमसि देवि सुरासुराणां<br>वक्तुं न तेऽमरवराः प्रभवन्ति शक्ताः।<br>त्वं चेन्मुखे वससि नैव यदैव तेषां<br>यस्माद्वदन्ति मनुजा न हि तद्विहीनाः ॥ १७ | हे देवि! आप ही देवताओं तथा दैत्योंकी वाग्देवता हैं। यदि आप मुखमें विराजमान न रहतीं, तो बड़े-बड़े देवता भी बोलनेमें समर्थ नहीं हो सकते थे। मुख होनेपर भी मनुष्य उस वाक्शक्तिके बिना बोल नहीं सकता ॥ १७ ॥ |
| ६३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शप्तो हरिस्तु भृगुणा कुपितेन कामं<br>मीनो बभूव कमठः खलु सूकरस्तु।<br>पश्चान्नृसिंह इति यश्छलकृद्धरायां<br>तान्सेवतां जननि मृत्युभयं न किं स्यात्॥ १८ | हे जननि! महर्षि भृगुने कुपित होकर भगवान् विष्णुको शाप दे दिया, जिससे उन्हें पृथ्वीपर बारम्बार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और छली वामनका अवतार लेना पड़ा। तो फिर [एक ऋषिके शापसे अपनी रक्षा न कर पानेवाले ऐसे विष्णु आदि] उन देवताओंकी उपासना करनेवाले लोगोंको मृत्युका भय क्यों नहीं बना रहेगा?॥ १८॥ |
| शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धं<br>शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य।<br>तं ये नरा भुवि भजन्ति कपालिनं तु<br>तेषां सुखं कथमहापि परत्र मातः॥ १९ | हे माता! सम्पूर्ण संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि भृगुमुनिके काननमें गये हुए भगवान् शिवका लिंग मुनिके शापके कारण कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था। अतः जो मनुष्य पृथ्वीपर उन कापालिक शिवको ही भजते हैं, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें भी सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ १९॥ |
| योऽभूद् गजाननगणाधिपतिर्महेशा-<br>त्तं ये भजन्ति मनुजा वितथप्रपन्नाः।<br>जानन्ति ते न सकलार्थफलप्रदात्रीं<br>त्वां देवि विश्वजननीं सुखसेवनीयाम्॥ २० | शिवसे जो गणोंके अधिपति गणेश उत्पन्न हुए हैं—उन गणेशको जो लोग भजते हैं, उनकी यह शरणागति व्यर्थ है। हे देवि! वे लोग सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली तथा सुखपूर्वक आराधनीय आप जगज्जननीको नहीं जानते हैं॥ २०॥ |
| चित्रं त्वयारिजनतापि दयार्द्रभावा-<br>द्धत्वा रणे शितशरैर्गमिता द्युलोकम्।<br>नोचेत्स्वकर्मनिचिते निरये नितान्तं<br>दुःखातिदुःखगतिमापदमापतेत्सा ॥ २१ | यह बड़ी विचित्र बात है कि आपने अपने शत्रु-दैत्योंपर भी दया करके उन्हें तीक्ष्ण बाणोंसे रणमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया। यदि आप ऐसा न करतीं तो वे अपने कर्मोंके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले घोर नरकमें बड़े-से-बड़े दुःख और विपत्तिमें पड़ जाते॥ २१॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्युत गर्वभावा-<br>ज्जानन्ति तेऽपि विबुधा न तव प्रभावम्।<br>केऽन्ये भवन्ति मनुजा विदितुं समर्थाः<br>सम्मोहितास्तव गुणैरमितप्रभावैः॥ २२ | जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी अहंकारके कारण आपकी महिमा नहीं जानते, तब आपके अमित प्रभाववाले गुणोंसे मोहित तुच्छ मनुष्य आपकी महिमाको कैसे जान सकेंगे?॥ २२॥ |
| क्लिश्यन्ति तेऽपि मुनयस्तव दुर्विभाव्यं<br>पादाम्बुजं न हि भजन्ति विमूढचित्ताः।<br>सूर्याग्निसेवनपराः परमार्थतत्त्वं<br>ज्ञातं न तैः श्रुतिशतैरपि वेदसारम्॥ २३ | जो मुनिगण आपके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे ध्यानमें आनेवाला समझकर आपके चरणकमलकी उपासना नहीं करते; अपितु सूर्य, अग्नि आदिकी उपासनामें लगे रहते हैं, वे मूढ़बुद्धि अनेकविध कष्ट पाते हैं। समस्त श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित वेदसारस्वरूप परमार्थतत्त्वको वे नहीं जान पाते॥ २३॥ |
* इस पुराणमें जगदम्बा पराशक्तिकी विशिष्टता प्रदर्शित करनेके लिये ही अन्य देवोंकी उपासनासे विरत रहनेकी बात कही गयी है। वैसे तो भगवती एवं ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि देवगण भी परमात्मप्रभुके ही स्वरूप हैं; उनमें कोई भेद नहीं है।
| अ० १९ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३३ |
|---|
| मन्ये गुणास्तव भुवि प्रथितप्रभावाः<br>कुर्वन्ति ये हि विमुखान्ननु भक्तिभावात्।<br>लोकान्स्वबुद्धिरचितैर्विविधागमैश्च<br>विष्ण्वीशभास्करगणेशपरान्विधाय ॥ २४ | मैं तो यही समझता हूँ कि अद्भुत प्रभावोंवाले जो आपके सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे ही मनुष्योंको उन्हींकी अपनी ही बुद्धिद्वारा विरचित अनेक प्रकारके शास्त्रोंमें उलझाकर उन्हें विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश आदिका उपासक बनाकर आपके भक्तिभावसे सर्वथा विमुख कर देते हैं॥ २४॥ |
| कुर्वन्ति ये तव पदाद्विमुखान्नराग्या-<br>न्स्वोक्तागमैर्हरिहरार्चनभक्तियोगैः ।<br>तेषां न कुप्यसि दयां कुरुषेऽम्बिके त्वं<br>तान्मोहमन्त्रनिपुणान्प्रथयस्यलं च॥ २५ | हे अम्बिके! जो लोग विष्णु तथा शिवकी पूजा और भक्तिसे परिपूर्ण शास्त्रोंके उपदेशद्वारा ब्राह्मणोंको आपके चरणोंसे विमुख कर देते हैं, उनके ऊपर भी आप क्रोध नहीं करती हैं, बल्कि दया ही करती हैं और इसके अतिरिक्त मोहन आदि मन्त्रोंके ज्ञाताओंको भी आप संसारमें बहुत प्रसिद्ध बना देती हैं॥ २५॥ |
| तुर्ये युगे भवति चातिबलं गुणस्य<br>तुर्यस्य तेन मथितान्यसदागमानि।<br>त्वां गोपयन्ति निपुणाः कवयः कलौ वै<br>त्वत्कल्पितान्सुरगणानपि संस्तुवन्ति॥ २६ | सत्ययुगमें सत्त्वगुणकी प्रबलता रहती है, अतः उस युगमें असत्-शास्त्रोंपर आस्था नहीं हो पाती। किंतु कलिमें तो कवित्वके अभिमानी लोग आपकी उपेक्षा करते हैं और आपहीके द्वारा बनाये गये देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २६॥ |
| ध्यायन्ति मुक्तिफलदां भुवि योगसिद्धां<br>विद्यां पराञ्च मुनयोऽतिविशुद्धसत्त्वाः।<br>ते नाप्नुवन्ति जननीजठरे तु दुःखं<br>धन्यास्त एव मनुजास्त्वयि ये विलीनाः॥ २७ | इस पृथवीतलपर अत्यन्त शुद्ध अन्तःकरणवाले जो सात्त्विक मुनिगण मुक्ति-फल प्रदान करनेवाली योगसिद्धा एवं पराविद्यास्वरूपिणी आप भगवतीका ध्यान करते हैं, वे पुनः माताके गर्भमें आकर कष्ट नहीं पाते। जो मनुष्य आपमें ध्यानमग्न हैं, वे धन्य हैं॥ २७॥ |
| चिच्छक्तिरस्ति परमात्मनि येन सोऽपि<br>व्यक्तो जगत्सु विदितो भवकृत्यकर्ता।<br>कोऽन्यस्त्वया विरहितः प्रभवत्यमुष्मिन्<br>कर्तुं विहर्तुमपि सञ्चलितुं स्वशक्त्या॥ २८ | आप चित्-शक्ति हैं और वही चित्-शक्ति परमात्मामें विद्यमान है, जिसके कारण वे भी [नाम और रूपसे] अभिव्यक्त होकर इस जगत्के सृजन, पालन एवं संहाररूपी कार्योंके कर्ताके रूपमें लोकोंमें प्रसिद्ध होते हैं। उन परमात्माके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो आपसे रहित होकर अपनी शक्तिसे इस जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेमें समर्थ हो सकता है?॥ २८॥ |
| तत्त्वानि चिद्विरहितानि जगद्विधातुं<br>किं वा क्षमाणि जगदम्ब यतो जडानि।<br>किं चेन्द्रियाणि गुणकर्मयुतानि सन्ति<br>देवि त्वया विरहितानि फलं प्रदातुम्॥ २९ | हे जगदम्बे! क्या चित्-शून्य तत्त्व जगत्की रचना करनेमें समर्थ हो सकते हैं? चूंकि तत्त्व जड़ हैं, अतः वे जगत्की रचनामें समर्थ नहीं हैं। हे देवि! यद्यपि इन्द्रियाँ गुण तथा कर्मसे युक्त हैं, फिर भी आपसे रहित होकर क्या वे फल प्रदान कर सकती हैं?॥ २९॥ |
| ६३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| देवा मखेष्वपि हुतं मुनिभिः स्वभागं<br>गृहीयुरम्ब विधिवत्प्रतिपादितं किम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि तत्र निमित्तभूता<br>तस्मात्त्वमेव ननु पालयसीव विश्वम्॥ ३० | हे माता! यदि आप यज्ञोंमें 'स्वाहा' के रूपमें निमित्त न बनतीं तो क्या देवगण उन यज्ञोंमें मुनियोंके द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति-रूप यज्ञभाग प्राप्त करते? अतः यह निश्चय हो गया कि आप ही विश्वका पालन करती हैं॥ ३०॥ |
| सर्वं त्वयेदमखिलं विहितं भवादौ<br>त्वं पासि वै हरिहरप्रमुखान्दिगीशान्।<br>कालेऽत्सि विश्वमपि ते चरितं भवाद्यं<br>जानन्ति नैव मनुजाः क्व नु मन्दभाग्याः॥ ३१ | सृष्टिके प्रारम्भमें इस सम्पूर्ण जगत्की रचना आपने ही की है, आप ही विष्णु-शिव आदि प्रमुख देवताओं तथा दिक्पालोंकी रक्षा करती हैं और प्रलयकालमें आप ही सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें विलीन कर लेती हैं। [हे देवि!] जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपके आद्य चरित्रको नहीं जान पाते, तब मन्दभाग्य हम देवता उसे कैसे जान सकते हैं?॥ ३१॥ |
| हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं<br>मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम्।<br>कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो<br>वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः॥ ३२ | हे माता! आपने महिषका रूप धारण करनेवाले अत्यन्त उग्र असुरका वध करके इस देवसमुदायकी रक्षा की है। हे जननि! जब वेद भी यथार्थरूपसे आपकी गतिको नहीं जान पाये, तब हम मन्दबुद्धि देवता उसे कैसे जान सकते हैं, हम कैसे आपकी स्तुति करें?॥ ३२॥ |
| कार्यं कृतं जगति नो यदसौ दुरात्मा<br>वैरी हतो भुवनकण्टकदुर्विभाव्यः।<br>कीर्तिः कृता ननु जगत्सु कृपा विधेया-<br>प्यस्मांश्च पाहि जननि प्रथितप्रभावे॥ ३३ | विख्यात प्रभाववाली हे जननि! आपने जगत्में महान् कार्य किया है जो कि आपने संसारके अचिन्त्य कण्टकस्वरूप हमारे शत्रु दुरात्मा महिषासुरका वध कर दिया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी कीर्ति स्थापित कर दी है, अब आप सारे संसारपर अनुग्रह करें और हमारी रक्षा करें॥ ३३॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तानुवाच मृदुस्वरा।<br>अन्यत्कार्यं च दुःसाध्यं ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः॥ ३४<br><br>यदा यदा हि देवानां कार्यं स्यादतिदुर्घटम्।<br>स्मर्तव्याहं तदा शीघ्रं नाशयिष्यामि चापदम्॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवीने मधुर स्वरमें उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवतागण! इसके अतिरिक्त भी कोई दुःसाध्य कार्य हो तो उसे आपलोग बता दीजिये। जब-जब आप देवताओंके सामने कोई महान् दुःसाध्य कार्य उपस्थित हो, तब-तब आपलोग मेरा स्मरण कीजियेगा; मैं उस संकटको शीघ्र ही दूर कर दूँगी॥ ३४-३५॥ |
| देवा ऊचुः<br>सर्वं कृतं त्वया देवि कार्यं नः खलु साम्प्रतम्।<br>यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः॥ ३६ | देवता बोले— हे देवि! इस समय आपने हमारा सारा कार्य पूर्ण कर दिया है जो कि आपके द्वारा हमारा शत्रु यह महिषासुर मार डाला गया॥ ३६॥ |
| अ० २० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३५ |
|---|
| स्मरिष्यामो यथा तेऽम्ब सदैव पदपङ्कजम्।<br>तथा कुरु जगन्मातर्भक्तिं त्वय्यप्यचञ्चलाम्॥ ३७ | हे अम्ब! हे जगज्जननि! अब आप हमारे मनमें अपने प्रति ऐसी अविचल भक्ति स्थापित कीजिये कि हम सदा आपके चरण-कमलका स्मरण करते रहें॥ ३७॥ |
| अपराधसहस्राणि मातैव सहते सदा।<br>इति ज्ञात्वा जगद्योनिं न भजन्ते कुतो जनाः॥ ३८ | माता ही [अपनी सन्तानके] हजारों अपराध सह सकती है—ऐसा समझकर लोग जगत्की उत्पत्तिस्वरूपा भगवतीकी उपासना क्यों नहीं करते?॥ ३८॥ |
| द्वौ सुपर्णौ तु देहेऽस्मिंस्तयोः सख्यं निरन्तरम्।<br>नान्यः सखा तृतीयोऽस्ति योऽपराधं सहेत हि॥ ३९<br><br>तस्माज्जीवः सखायं त्वां हित्वा किं नु करिष्यति।<br>पापात्मा मन्दभाग्योऽसौ सुरमानुषयोनिषु॥ ४०<br><br>प्राप्य देहं सुदुष्प्रापं न स्मरेत्त्वां नराधमः।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रूमः सत्यं पुनः पुनः॥ ४१ | इस देहरूपी वृक्षपर जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षी रहते हैं। उन दोनोंमें सर्वदा मित्रता बनी रहती है, किंतु उनका तीसरा सखा ऐसा कोई भी नहीं है, जो अपराधको सह सके। अतएव यह जीव आप-जैसे मित्रको त्यागकर क्या करेगा? देवताओं और मानवोंकी योनिमें वह प्राणी पापी, मन्दभागी और अधम है, जो अत्यन्त दुर्लभ देह पाकर भी आपका स्मरण नहीं करता॥ ३९-४० १/२॥ |
| सुखे वाप्यथवा दुःखे त्वं नः शरणमद्भुतम्।<br>पाहि नः सततं देवि सर्वैस्तव वरायुधैः॥ ४२<br><br>अन्यथा शरणं नास्ति त्वत्पादाम्बुजरेणुतः। | हम मन, वाणी और कर्मसे बार-बार यह सत्य कह रहे हैं कि सुख अथवा दुःख—प्रत्येक परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे लिये अद्भुत शरण हैं। हे देवि! आप अपने समस्त श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा हमारी निरन्तर रक्षा करें। आपके चरणकमलोंकी धूलिको छोड़कर हमारे लिये कोई दूसरा शरण नहीं है॥ ४१-४२ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तत्रैवान्तरधीयत।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवास्तां वीक्ष्य निर्गताम्॥ ४३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवती जगदम्बा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब उन्हें अन्तर्हित देखकर देवता बड़े विस्मयमें पड़ गये॥ ४३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीसान्त्वनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना
| जनमेजय उवाच<br>अथाद्भुतं वीक्ष्य मुने प्रभावं<br>देव्या जगच्छान्तिकरं परञ्च।<br>न तृप्तिरस्ति द्विजवर्य शृण्वतः<br>कथामृतं ते मुखपद्मजातम्॥ १ | जनमेजय बोले— हे मुने! अब मैंने भगवतीके अत्यन्त अद्भुत तथा जगत्को शान्ति प्रदान करनेवाले प्रभावको तो देख लिया, फिर भी हे द्विजवर! आपके मुखारविन्दसे निकली हुई सुधामयी कथाको बार-बार |