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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९

अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मात्पुत्र ममात्यर्थं दुःखं नाशितुमर्हसि।<br>त्रिशिरा मम चित्तात्तु नापसर्पति कर्हिचित् ॥ १६अतः हे पुत्र! तुम मेरे बहुत बड़े दुःखको दूर करनेमें समर्थ हो; त्रिशिरा मेरे चित्तसे कभी हटता नहीं है॥ १६॥
सुशीलः सत्यवादी च तापसो वेदवित्तमः।<br>अपराधं विना तेन निहतः पापबुद्धिना ॥ १७उस सुशील, सत्यवादी, तपस्वी और वेदवेत्ताको बिना किसी अपराधके ही पापबुद्धिवाले उस इन्द्रने मार डाला॥ १७॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा वृत्रः परमदुर्जयः।<br>रथमारुह्य तरसा निर्जगाम पितुर्गृहात् ॥ १८<br><br>रणदुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खनादं महाबलम्।<br>कारयित्वा प्रयाणं स चकार मदगर्वितः ॥ १९व्यासजी बोले— उनकी ऐसी बात सुनकर परम दुर्जय वृत्रासुर रथपर सवार हो शीघ्र ही [अपने] पिताके घरसे निकल पड़ा। रणभेरियोंकी ध्वनि तथा महान् शंखनाद कराकर उस मदोन्मत्तने प्रस्थान किया॥ १८-१९॥
निर्ययौ नयसंयुक्तः सेवकानिति संवदन्।<br>हत्वा शक्रं ग्रहीष्यामि सुरराज्यमकण्टकम् ॥ २०‘इन्द्रको मारकर निष्कण्टक देव-राज्य अधिकृत कर लूँगा’—ऐसा सेवकोंसे कहते हुए वह नीतिवान् वृत्र निकल पड़ा॥ २०॥
इत्युक्त्वा निर्जगामाशु स्वसैन्यपरिवारितः।<br>महता सैन्यनादेन भीषयन्नमरावतीम् ॥ २१ऐसा कहकर सैनिकोंके महान् घोषसे अमरावती (इन्द्रपुरी)-को भयभीत करता हुआ वह अपनी सेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक निकला॥ २१॥
तमागच्छन्तमाज्ञाय तुराषाडपि सत्वरः।<br>सेनोद्योगं भयत्रस्तः कारयामास भारत ॥ २२हे भारत! उसे आता हुआ जानकर भयभीत इन्द्र भी शीघ्रतापूर्वक सेनाकी तैयारी कराने लगे॥ २२॥
सर्वानाहूय तरसा लोकपालानरिन्दमः।<br>युद्धार्थं प्रेरयन्सर्वान्व्यरोचत महाद्युतिः ॥ २३उन शत्रुदमन इन्द्रने शीघ्र ही सभी लोकपालोंको बुलाकर उन्हें युद्धकी तैयारी करनेके लिये प्रेरित किया, उस समय वे अत्यन्त कान्तिमान् लग रहे थे॥ २३॥
गृध्रव्यूहं ततः कृत्वा संस्थितः पाकशासनः।<br>तत्राजगाम वेगात्तु वृत्रः परबलार्दनः ॥ २४तत्पश्चात् गृध्रव्यूहका निर्माण करके इन्द्र युद्धके लिये डट गये; उसी समय शत्रुसेनाका विध्वंस कर डालनेवाला वृत्रासुर भी वहाँ वेगपूर्वक आ पहुँचा॥ २४॥
देवदानवयोस्तावत्संग्रामस्तुमुलोऽभवत् ।<br>वृत्रवासवयोः संख्ये मनसा विजयैषिणोः ॥ २५तब युद्धक्षेत्रमें अपने-अपने मनमें विजयकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र तथा वृत्रासुरकी देव-दानव सेनाओंमें भीषण संग्राम होने लगा॥ २५॥
एवं परस्परं युद्धे सन्दीप्ते भयदे भृशम्।<br>आकूतं देवताः प्रापुर्दैत्याश्च परमां मुदम् ॥ २६इस प्रकार परस्पर युद्धके उग्र और भयंकर हो जानेपर देवगण व्याकुल और दानव अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ २६॥
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुपट्टिशैः।<br>जघ्नुः परस्परं देवदैत्याः स्वस्ववरायुधैः ॥ २७उस युद्धमें तोमर, भिन्दिपाल, तलवार, परशु और पट्टिश—इन अपने-अपने श्रेष्ठ आयुधोंसे देवता और दैत्य एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ २७॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 C

७४०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं युद्धे वर्तमाने दारुणे लोमहर्षणे।<br>शक्रं जग्राह सहसा वृत्रः क्रोधसमन्वितः॥ २८इस प्रकारके हो रहे रोमांचकारी और भयंकर संग्राममें क्रोधाभिभूत वृत्रासुरने अचानक इन्द्रको पकड़ लिया॥ २८॥
अपावृत्य मुखे क्षिप्त्वा स्थितो वृत्रः शतक्रतुम्।<br>मुदितोऽभून्महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ २९हे महाराज! वृत्रासुर इन्द्रको कवच-वस्त्र आदिसे रहित करके अपने मुखमें डालकर स्थित हो गया और पूर्ववैरका स्मरण करते हुए वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ २९॥
शक्रे ग्रस्तेऽथ वृत्रेण संभ्रान्ता निर्जरास्तदा।<br>चुक्रुशुः परमार्तास्ते हा शक्रेति मुहुर्मुहुः॥ ३०वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रको निगला गया देखकर देवता विस्मित हो गये और अत्यन्त दुःखी होकर 'हा इन्द्र! हा इन्द्र!' कहकर चिल्लाने लगे॥ ३०॥
अपावृतं मुखे शक्रं ज्ञात्वा सर्वे दिवौकसः।<br>बृहस्पतिं प्रणम्योचुर्दीना व्यथितचेतसः॥ ३१जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि इन्द्रको वृत्रने मुखमें रखकर छिपा लिया है तो वे अत्यन्त दुःखित होकर बृहस्पतिके पास गये और उनसे दीन वाणीमें बोले—॥ ३१॥
किं कर्तव्यं द्विजश्रेष्ठ त्वमस्माकं गुरुः परः।<br>शक्रो ग्रस्तस्तु वृत्रेण रक्षितो देवतान्तरैः॥ ३२हे द्विजश्रेष्ठ! देवसेनासे सुरक्षित इन्द्रको वृत्रासुरने अपने मुखमें रख लिया है। अब हम क्या करें? आप हमारे परम गुरु हैं॥ ३२॥
विना शक्रेण किं कुर्मः सर्वे हीनपराक्रमाः।<br>अभिचारं कुरु विभो सत्वरः शक्रमुक्तये॥ ३३इन्द्रके बिना हमलोग क्या करें, हम सब पराक्रमहीन हो गये हैं। हे विभो! इन्द्रकी मुक्तिके लिये आप शीघ्र ही अभिचार-क्रिया कीजिये॥ ३३॥
बृहस्पतिरुवाच<br>किं कर्तव्यं सुराः क्षिप्तो मुखमध्येऽस्ति वासवः।<br>वृत्रेणोत्सादितो जीवन्नस्ति कोष्ठान्तरे रिपोः॥ ३४बृहस्पति बोले—हे देवताओ! क्या किया जाय? उसने इन्द्रको मुखमें रख लिया है, वृत्रासुरके द्वारा पीड़ित वे इन्द्र उस शत्रुके मुखमें भी जीवित हैं॥ ३४॥
व्यास उवाच<br>देवाश्चिन्तातुराः सर्वे तुरासाहं तथाकृतम्।<br>दृष्ट्वा विमृश्य तरसा चक्रुर्यत्नं विमुक्तये॥ ३५व्यासजी बोले—इन्द्रको उस स्थितिमें प्राप्त देखकर चिन्तित देवताओंने भलीभाँति सोचकर उनकी मुक्तिके लिये शीघ्र ही एक उपाय किया॥ ३५॥
असृजन्त महासत्त्वां जृम्भिकां रिपुनाशिनीम्।<br>ततो विजृम्भमाणः स व्यावृतास्यो बभूव ह॥ ३६उन्होंने अत्यन्त शक्तिशाली और शत्रुनाशिनी जम्हाईका सृजन किया; इससे उसे जम्हाई आते ही उस वृत्रासुरका मुख खुल गया॥ ३६॥
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादवापतत्।<br>स्वान्यङ्गान्यपि संक्षिप्य निष्क्रान्तो बलसूदनः॥ ३७तत्पश्चात् जम्हाई लेते हुए वृत्रासुरके मुखसे बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले इन्द्र अपने अंगोंको संकुचित करके बाहर निकल आये॥ ३७॥
ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंस्थिता।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिर्गतम्॥ ३८उसी समयसे संसारके सभी प्राणियोंके शरीरमें जम्हाई विद्यमान रहने लगी। इन्द्रको बाहर निकला हुआ देखकर सभी देवता हर्षित हो उठे॥ ३८॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोर्लोकभयप्रदम्।<br>वर्षाणामयुतं यावद्दारुणं लोमहर्षणम्॥ ३९तब उन दोनोंमें तीनों लोकोंके लिये भयदायक, रोमांचकारी और भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया, जो दस हजार वर्षोंतक चला॥ ३९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 D