देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारय मूढ किम्।<br>पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवं स्त्रीवेषधारिणी॥ ३२ | हे मूर्ख! तुमने जो यह कहा कि 'तुम स्त्रीस्वभाववाली हो', तो अब तुम इस बातपर जरा विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूँ? वस्तुतः उसीके स्वभाववाली मैं इस समय स्त्रीवेषधारिणी हो गयी हूँ॥ ३२॥ |
| याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा।<br>तस्मान्मन्येऽतिमूढोऽसौ न वीररसवित्तमः॥ ३३ | तुम्हारे स्वामी महिषासुरने पूर्वकालमें जो स्त्रीसे मारे जानेका वरदान माँगा था, उसीसे मैं समझती हूँ कि वह महामूर्ख है। वह वीररसका थोड़ा भी जानकार नहीं है॥ ३३॥ |
| कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम्।<br>प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना॥ ३४<br><br>तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता।<br>कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः॥ ३५ | स्त्रीके द्वारा मारा जाना पराक्रमहीनके लिये भले ही सुखकर हो, किंतु वीरके लिये यह कष्टप्रद होता है। महिषकी अपनी जो बुद्धि हो सकती है, उसीके अनुसार तुम्हारे स्वामीने ऐसा वरदान माँगा। इसीलिये मैं स्त्री-रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। मैं तुम्हारे धर्मशास्त्र-विरोधी वचनोंसे क्यों डरूँ?॥ ३४-३५॥ |
| विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत्।<br>विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा॥ ३६ | जब दैव प्रतिकूल होता है, तब एक तिनका भी वज्र-तुल्य हो जाता है और जब वह दैव अनुकूल होता है, तब वज्र भी तूल (रूई)-के समान कोमल हो जाता है॥ ३६॥ |
| किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः।<br>मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम्॥ ३७ | जिसकी मृत्यु सन्निकट हो उसके लिये सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा किलेकी सुरक्षा, सैन्यबल आदि प्रपंचोंसे क्या लाभ!॥ ३७॥ |
| यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः।<br>तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः॥ ३८<br><br>यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम्।<br>तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः॥ ३९ | जब कालयोगसे देहके साथ जीवका सम्बन्ध स्थापित होता है, उसी समय विधाताके द्वारा सुख, दुःख तथा मृत्यु—सब कुछ निर्धारित कर दिया जाता है। दैवने जिस प्राणीकी मृत्यु जिस प्रकारसे निश्चित कर दी है, उसकी मृत्यु उसी प्रकारसे होगी, इसके विपरीत नहीं; यह पूर्ण सत्य है॥ ३८-३९॥ |
| ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते।<br>तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते॥ ४०<br><br>ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः।<br>मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः॥ ४१ | जिस प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित किये गये रहते हैं, समय आनेपर उसी प्रकारसे उनका भी जन्म-मरण होता है तब अन्य लोगोंके विषयमें विचार ही क्या! उन ब्रह्मा आदि मरणधर्माके वरदानसे गर्वित होकर जो लोग यह समझते हैं कि 'हम नहीं मरेंगे' वे मूर्ख तथा अल्पबुद्धिवाले हैं॥ ४०-४१॥ |
अ० १०] पञ्चम स्कन्ध ५८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम्।<br>यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल॥ ४२<br><br>मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः।<br>यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥ ४३<br><br>अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः॥ ४४ | अतएव अब तुम शीघ्र जाओ और अपने राजासे मेरी बात कह दो। इसके बाद तुम्हारे राजा जैसी आज्ञा दें, तुम वैसा करो। इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हो जाय और देवताओंको यज्ञका भाग मिलने लगे। तुमलोग यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताललोक चले जाओ और हे मूर्ख! यदि दुष्टात्मा महिषासुरका विचार विपरीत हो, तो वह मरनेके लिये तैयार होकर मेरे साथ युद्ध करे॥ ४२—४४॥ |
| मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः॥ ४५ | यदि तुम यह मानते हो कि विष्णु आदि प्रधान देवता तो युद्धमें पहले ही परास्त किये जा चुके हैं, तो उस समय उसका कारण था—विपरीत भाग्य तथा ब्रह्माजीका वरदान॥ ४५॥ |
| व्यास उवाच<br>इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः।<br>किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति॥ ४६ | व्यासजी बोले—देवीका यह वचन सुनकर वह दानव सोचने लगा—अब मुझे क्या करना चाहिये? मैं इसके साथ युद्ध करूँ या राजा महिषके पास लौट चलूँ॥ ४६॥ |
| विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै।<br>तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ॥ ४७ | [किंतु यह भी है कि] कामातुर महाराज महिषने विवाहके लिये [उसे राजी करनेकी] मुझे आज्ञा दी है तो फिर रसभंग करके मैं राजाके पास लौटकर कैसे जाऊँ?॥ ४७॥ |
| इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना।<br>यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम्॥ ४८<br><br>स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः।<br>करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह॥ ४९ | अन्तमें अब मुझे यही विचार उचित प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही राजाके पास शीघ्र चला जाऊँ और जैसा सामने उपस्थित है, वैसा उनको बता दूँ। उसके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा महिष अपने चतुर मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करके जो उचित समझेंगे, उसे करेंगे॥ ४८-४९॥ |
| सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह।<br>जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत्॥ ५० | मुझे अचानक इस स्त्रीके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि जय अथवा पराजय—इन दोनोंमें राजाका अप्रिय हो सकता है॥ ५०॥ |
| यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः।<br>येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल॥ ५१<br><br>तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम्।<br>यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः॥ ५२ | यदि यह सुन्दरी मुझे मार डाले अथवा मैं ही जिस किसी उपायसे इसको मार डालूँ, तब भी राजा महिष निश्चितरूपसे कुपित होंगे। अतः अब मैं वहींपर चलकर इस सुन्दरीके द्वारा आज जो कुछ कहा गया है, वह सब राजा महिषको बता दूँगा। तत्पश्चात् उनकी जैसी रुचि होगी, वैसा वे करेंगे॥ ५१-५२॥ |
| ५८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**ऐसा विचार करके वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा (महिष)-के पास गया और उसे प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगा— ॥ ५३॥ |
| मन्त्र्युवाच<br>राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता।<br>अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा॥ ५४ | **मन्त्री बोला—**हे राजन्! सुन्दर रूपवाली वह देवी सिंहपर आरूढ़ है, उस मनोहर देवीकी अठारह भुजाएँ हैं और उस श्रेष्ठ देवीने उत्तम कोटिके आयुध धारण कर रखे हैं॥ ५४॥ |
| सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि।<br>महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया॥ ५५<br><br>पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः।<br>स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति॥ ५६<br><br>त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने।<br>महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव॥ ५७ | हे महाराज! मैंने उससे कहा—हे भामिनि! तुम राजा महिषसे प्रेम कर लो और तीनों लोकोंके स्वामी उन महाराजकी प्रिय पटरानी बन जाओ। केवल तुम्हीं उनकी पटरानी बननेयोग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं है। वे तुम्हारे आज्ञाकारी बनकर सदा तुम्हारे अधीन रहेंगे। हे सुमुखि! महाराज महिषको पतिरूपमें प्राप्त करके तुम चिरकालतक तीनों लोकोंके ऐश्वर्यका उपभोगकर समस्त स्त्रियोंमें सौभाग्यवती बन जाओ॥ ५५–५७॥ |
| इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता।<br>मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५८<br><br>महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल।<br>बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया॥ ५९ | मेरा यह वचन सुनकर विशाल नयनोंवाली वह सुन्दरी गर्वके आवेगसे विमोहित होकर मुसकराती हुई मुझसे यह बात बोली—मैं देवताओंका हित करनेके विचारसे महिषीके गर्भसे उत्पन्न उस अधम पशु (महिष)-को देवीके लिये बलि चढ़ा दूँगी॥ ५८-५९॥ |
| का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत्।<br>मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह॥ ६० | हे मन्दबुद्धे! इस संसारमें भला कौन मूर्ख स्त्री महिषको पतिरूपमें स्वीकार कर सकती है? क्या मुझ-जैसी स्त्री पशुस्वभाववाले उस महिषासुरसे प्रेम कर सकती है?॥ ६०॥ |
| महिषी महिषं नाथं सश्रृङ्गा शृङ्गसंयुतम्।<br>कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा॥ ६१<br><br>करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम्।<br>गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ६२ | हे मूर्ख! सींगवाली तथा जोर-जोरसे चिल्लानेवाली कोई महिषी ही उस श्रृंगधारी महिषको अपना पति बना सकती है; किंतु मैं वैसी मूर्ख नहीं हूँ। [देवीने पुनः कहलाया है] मैं तो देवताओंके शत्रु तुझ महिषासुरके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूँगी। हे दुष्ट! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा है, तो अभी पाताललोक चले जाओ॥ ६१-६२॥ |
| परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया।<br>तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः॥ ६३ | हे राजन्! उस मदमत्त स्त्रीने ऐसी बहुत कठोर बात मुझसे कही। उसे सुनकर बार-बार विचार करनेके बाद मैं यहाँ लौट आया हूँ॥ ६३॥ |
| अ० ११] | पञ्चम स्कन्ध | ५८५ |
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| रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम्।<br>आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम्॥ ६४ | आपका रसभंग न हो—यह सोचकर मैंने उसके साथ युद्ध नहीं किया और फिर आपकी आज्ञाके बिना मैं व्यर्थ ही युद्ध कैसे कर सकता था? ॥ ६४॥ |
| सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी।<br>भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति॥ ६५ | हे राजन्! वह स्त्री सदा अपने बलसे अत्यन्त उन्मत्त रहती है। होनीके विषयमें मैं नहीं जानता; आगे न जाने क्या होगा! इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं। इसमें परामर्श देना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। इस समय हमारे लिये युद्ध करना अथवा पलायन कर जाना—इन दोनोंमें कौन श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ॥ ६५-६६॥ |
| कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः।<br>युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम्॥ ६६ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे मन्त्रीद्वारा महिषासुरेण देव्या सह विवाहप्रस्तावो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
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अथैकादशोऽध्यायः
महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः।<br>मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत्॥ १ | व्यासजी बोले—मन्त्रीकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त राजा महिषासुर अपने वयोवृद्ध मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे यह वचन कहने लगा॥ १॥ |
| राजोवाच<br>मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम्।<br>आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम्॥ २ | राजा बोला—हे मन्त्रिगण! आपलोग निर्भीकता-पूर्वक मुझे शीघ्र बतायें कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? आपलोग इस कार्यमें प्रवीण हैं, साथ ही साम तथा दण्ड आदि नीतियोंमें भी कुशल हैं। कहीं देवताओंके द्वारा रची गयी शाम्बरी मायाके रूपमें तो यह नहीं आयी हुई है? अतः आपलोग मुझे यह बतायें कि इस समय किस नीतिका सहारा लिया जाय? ॥ २-३॥ |
| कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः।<br>सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च॥ ३ | |
| मन्त्रिण ऊचुः<br>सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम।<br>कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल॥ ४ | मन्त्रिगण बोले—हे नृपश्रेष्ठ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा सत्य और प्रिय बोलना चाहिये तथा सम्यक् विचार करके हितकर कार्य करना चाहिये॥ ४॥ |
| सत्यं च हितकृद्राजन्नप्रियं चाहितकृद्भवेत्।<br>यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम्॥ ५ | हे राजन्! सत्य वचन कल्याणकारी होता है और प्रिय वचन [प्रायः] अहितकर होता है। इस लोकमें अप्रिय वचन भी मनुष्योंके लिये उसी प्रकार हितकारक होता है, जैसे औषधि अरुचिकर होते हुए भी मनुष्योंके रोगोंका नाश करनेवाली होती है॥ ५॥ |
| सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते।<br>वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः॥ ६ | हे पृथिवीपते! सत्य बातको सुनने तथा माननेवाला दुर्लभ है। सत्य बोलनेवाला तो परम दुर्लभ है; किंतु चाटुकारितापूर्ण बातें करनेवाले बहुत-से लोग हैं॥ ६॥ |
| ५८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये॥ ७ | हे राजन्! इस गूढ़ विषयमें हमलोग कुछ कैसे कह सकते हैं, और फिर इस त्रिलोकीमें भविष्यमें होनेवाले शुभ अथवा अशुभ परिणामके विषयमें कौन जान सकता है?॥७॥ |
| राजोवाच<br>स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक्।<br>येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम्॥ ८<br>बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः।<br>यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः॥ ९ | राजा बोला—आपलोग अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार अलग-अलग विचार प्रकट करें। जिसका जो भाव होगा, उसे सुनकर मैं स्वयं विचार करूँगा; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अनेक लोगोंके मन्तव्य सुनकर और फिर उनपर बार-बार विचार करके उनमेंसे अपने लिये जो कल्याणप्रद हो, उसी कामको करें॥८-९॥ |
| व्यास उवाच<br>तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः।<br>उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम्॥ १० | व्यासजी बोले—उसकी यह बात सुनकर महाबली विरूपाक्ष राजा महिषको प्रसन्न करते हुए शीघ्र कहने लगा॥१०॥ |
| विरूपाक्ष उवाच<br>राजनारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता।<br>विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया॥ ११ | विरूपाक्ष बोला—हे राजन्! वह बेचारी स्त्री मदमत्त होकर जो कुछ बोल रही है, उन बातोंको आप केवल धमकीभर समझें॥११॥ |
| को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः।<br>अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम्॥ १२ | यह जानते हुए कि झूठ और साहस स्त्रियोंकी आदत होती है, भला कौन एक स्त्रीके कहे हुए युद्धोन्मादी कठोर वाक्योंसे डरेगा?॥१२॥ |
| जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै।<br>दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत्॥ १३ | हे राजन्! तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके भी आज आप स्त्रीके भयसे ग्रस्त हो गये हैं! उसकी अधीनता स्वीकार कर लेनेपर इस लोकमें अवश्य ही आप-जैसे वीरकी अपकीर्ति होगी॥१३॥ |
| तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति।<br>हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम्॥ १४ | अतएव हे महाराज! मैं अकेला ही उस चण्डिकासे युद्ध करनेके लिये जा रहा हूँ और उसे निश्चितरूपसे मार डालूँगा। अब आप भयमुक्त हो जायँ॥१४॥ |
| सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल।<br>निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ १५<br>बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम॥ १६ | अपनी सेनाके साथ वहाँ जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे मैं उस दुःसह तथा प्रचण्ड पराक्रमसम्पन्न चण्डिकाका निश्चय ही वध कर दूँगा अथवा उसे नागपाशमें बाँधकर जीवित दशामें ही आपके पास ले आऊँगा, जिससे वह सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाय। हे राजन्! अब आप मेरा पराक्रम देखिये॥१५-१६॥ |
| अ० ११ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>विरूपाक्षवचः श्रुत्वा दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्।<br>सत्यमुक्तं वचो राजन् विरूपाक्षेण धीमता॥ १७<br><br>ममापि वचनं श्लक्ष्णं श्रोतव्यं धीमता त्वया।<br>कामातुरैषा सुदती लक्ष्यतेऽप्यनुमानतः॥ १८<br><br>भवत्येवंविधा कामं नायिका रूपगर्विता।<br>भीषयित्वा वरारोहा त्वां वशे कर्तुमिच्छति॥ १९ | व्यासजी बोले— विरूपाक्षकी बात सुनकर दुर्धरने कहा—हे राजन्! बुद्धिमान् विरूपाक्षने यथार्थ बात कही है। प्रतिभासम्पन्न आप अब मेरी भी उत्तम बात सुन लें। अनुमानसे ऐसा प्रतीत होता है कि सुन्दर दाँतोंवाली यह स्त्री कामातुर है। अपने रूपके गर्वमें चूर इस प्रकारकी नायिकाएँ अपने प्रियको डरा-धमकाकर वशमें करनेका प्रयास करती हैं; वैसे ही यह सुन्दरी भी आपको धमकाकर अपने वशमें करना चाहती है॥ १७–१९॥ |
| हावोऽयं मानिनीनां वै तं वेत्ति रसवित्तमः।<br>वक्रोक्तिरेषा कामिन्याः प्रियं प्रति परायणम्॥ २०<br><br>वेत्ति कोऽपि नरः कामं कामशास्त्रविचक्षणः।<br>यदुक्तं नाम बाणैस्त्वां वधिष्ये रणमूर्धनि॥ २१<br><br>हेतुगर्भमिदं वाक्यं ज्ञातव्यं हेतुवित्तमैः।<br>बाणास्तु मानिनीनां वै कटाक्षा एव विश्रुताः॥ २२<br><br>पुष्पाञ्जलिमयाश्चान्ये व्यंग्यानि वचनानि च।<br>का शक्तिरन्यबाणानां प्रेरणे त्वयि पार्थिव॥ २३<br><br>तादृशीनां न सा शक्तिर्ब्रह्मविष्णुहरादिषु।<br>ययोक्तं नेत्रबाणैस्त्वां हनिष्ये मन्द पार्थिवम्॥ २४ | यह तो मानिनी स्त्रियोंका हाव-भाव होता है और रसका महान् ज्ञाता ही उस हाव-भावको समझ पाता है। आसक्त प्रेमीके प्रति किसी स्त्रीकी ऐसी वक्रोक्ति होती ही है, जिसे कामशास्त्रका विद्वान् कोई विरला पुरुष ही समझ पाता है। जैसे उसने कहा है—'मैं तुम्हें युद्धक्षेत्रमें बाणोंसे मार डालूँगी', इस कथनमें बहुत बड़ा रहस्य निहित है, जिसे रहस्यविद् ही भलीभाँति समझ सकते हैं। मानिनी स्त्रियोंके बाण तो उनके कटाक्ष ही कहे गये हैं और हे राजन्! उनके व्यंग्यपूर्ण वचन दूसरे पुष्पांजलिमय बाण हैं; क्योंकि कटाक्षको छोड़कर वह अन्य प्रकारके बाण भला आपपर क्या चला सकेगी? जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिमें आपपर बाण चलानेकी शक्ति नहीं है, तब वैसी स्त्रियोंमें अन्य बाण चलानेकी शक्ति कहाँ है? उसने अमात्यसे जो कहा था—'हे मन्द! मैं तुम्हारे राजाको अपने नेत्रबाणोंसे बेध डालूँगी' इस कथनका तात्पर्य उन रसज्ञानसे विहीन मन्त्रीने विपरीत ही समझ लिया था॥ २०–२४ १/२॥ |
| विपरीतं परिज्ञातं तेनारसविदा किल।<br>पातयिष्यामि शय्यायां रणमय्यां पतिं तव॥ २५<br><br>विपरीतरतिक्रीडाभाषणं ज्ञेयमेव तत्।<br>करिष्ये विगतप्राणं यदुक्तं वचनं तया॥ २६<br><br>वीर्यं प्राणा इति प्रोक्तं तद्विहीनं न चान्यथा। | उसने प्रधान अमात्यसे जो यह कहा था कि 'मैं तुम्हारे स्वामीको रणमयी शय्यापर गिरा दूँगी'— इस कथनका तात्पर्य उस स्त्रीके द्वारा विपरीत रतिक्रीडाका किया जाना समझना चाहिये। साथ ही उसने जो यह बात कही थी कि 'मैं उन्हें प्राणहीन कर दूँगी'—तो [हे राजन्!] पुरुषोंमें वीर्यको ही प्राण कहा गया है, अतः उस स्त्रीके कथनका तात्पर्य आपको वीर्यहीन कर देनेसे है, इसके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं॥ २५–२६ १/२॥ |