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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७
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अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७
| अहं गत्वा हनिष्यामि तं पापं वितथश्रमम्। | मूर्खतापूर्ण चेष्टा किसकी हो सकती है ? अब दूतगण इस शब्दके कारणका पता लगाकर मेरे पास शीघ्र आयें। तत्पश्चात् मैं स्वयं वहाँ जाकर ऐसा व्यर्थ कर्म करनेवाले उस पापीका वध कर दूँगा ॥ ३९—४४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते दूता देवीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ४५<br><br>अष्टादशभुजां दिव्यां सर्वार्भरणभूषिताम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां वरायुधधरां शुभाम् ॥ ४६<br><br>दधतीं चषकं हस्ते पिबन्तीं च मुहुर्मुधु।<br>संवीक्ष्य भयभीतास्ते जग्मुस्त्रस्ताः सुशङ्किताः ॥ ४७<br><br>सकाशे महिषस्याशु तमूचुः स्वनकारणम्। | व्यासजी बोले—महिषासुरके ऐसा कहनेपर वे दूत [शब्दके कारणका पता लगाते-लगाते] समस्त सुन्दर अंगोंवाली, अठारह भुजाओंवाली, दिव्य विग्रहमयी, सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, उत्तम आयुध धारण करनेवाली और हाथमें मधुपात्र लेकर बार-बार उसका पान करती हुई भगवतीके पास पहुँच गये। उन्हें देखकर वे भयभीत हो गये और व्याकुल तथा सशंकित होकर वहाँसे भाग चले। महिषासुरके पास आकर वे उससे ध्वनिका कारण बताने लगे॥ ४५—४७ १/२ ॥ |
| दूता ऊचुः<br>देवी दैत्येश्वर प्रौढा दृश्यते काचिदङ्गना ॥ ४८<br><br>सर्वाङ्गभूषणा नारी सर्वरत्नोपशोभिता।<br>न मानुषी नासुरी सा दिव्यरूपा मनोहरा ॥ ४९<br><br>सिंहारूढायुधधरा चाष्टादशकरा वरा।<br>सा नादं कुरुते नारी लक्ष्यते मदगर्विता ॥ ५०<br><br>सुरापानरता कामं जानीमो न सभर्तृका।<br>अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्ति मुदान्विताः ॥ ५१ | दूत बोले—हे दैत्येन्द्र! वह कोई प्रौढा स्त्री और देवीकी भाँति दिखायी देती है। उस स्त्रीके सभी अंगोंमें आभूषण विद्यमान हैं तथा वह सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है। वह स्त्री न तो मानवी है और न तो आसुरी है। दिव्यविग्रहवाली वह स्त्री बड़ी मनोहर है। अठारह भुजाओंवाली वह श्रेष्ठ नारी नानाविध आयुध धारण करके सिंहपर विराजमान है। वही स्त्री गर्जन कर रही है। वह मदोन्मत्त दिखायी दे रही है। वह निरन्तर मद्यपान कर रही है। हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह अभी विवाहिता नहीं है॥ ४८—५० १/२ ॥ |
| जयेति पाहि नश्चेति जहि शत्रूमिति प्रभो।<br>न जाने का वरारोहा कस्य वा सा परिग्रहः ॥ ५२<br><br>किमर्थमागता चात्र किं चिकीर्षति सुन्दरी।<br>द्रष्टुं नैव समर्थाः स्मस्तत्तेजःपरिकर्षिताः ॥ ५३<br><br>शृङ्गारवीरहासाढ्या रौद्राद्भुतरसान्विता।<br>दृष्ट्वैवंविविधां नारीमसम्भाष्य समागताः ॥ ५४<br><br>वयं त्वदाज्ञया राजन् किं कर्तव्यमतःपरम्। | देवतागण आकाशमें स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक उसकी इस प्रकार स्तुति कर रहे हैं—'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो' और 'शत्रुओंका वध करो'। हे प्रभो! मैं यह नहीं जानता कि वह सुन्दरी कौन है, किसकी पत्नी है, वह सुन्दरी यहाँ किसलिये आयी हुई है और वह क्या करना चाहती है? उस स्त्रीके तेजसे चकाचौंध हमलोग उसे देखनेमें समर्थ नहीं हो सके। वह स्त्री शृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत—इन सभी रसोंसे परिपूर्ण थी। इस प्रकारकी अद्भुत स्वरूपवाली नारीको देखकर हमलोग बिना कुछ कहे ही आपके आज्ञानुसार लौट आये। हे राजन्! अब इसके बाद क्या करना है?॥ ५१—५४ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 19 A
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| ५७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महिष उवाच<br>गच्छ वीर मयादिष्टो मन्त्रिश्रेष्ठ बलान्वितः ॥ ५५<br><br>सामादिभिरुपायैस्त्वं समानय शुभाननाम्।<br>नायाति यदि सा नारी त्रिभिः सामादिभिस्त्विह ॥ ५६<br><br>अहत्वा तां वरारोहां त्वमानय ममान्तिकम्।<br>करोमि पट्टमहिषीं तां मरालभ्रुवं मुदा ॥ ५७<br><br>प्रीतियुक्ता समायाति यदि सा मृगलोचना।<br>रसभङ्गो यथा न स्यात्तथा कुरु ममेप्सितम् ॥ ५८<br><br>श्रवणान्मोहितोऽस्म्यद्य तस्या रूपस्य सम्पदा। | महिषासुर बोला—हे वीर! हे मन्त्रिश्रेष्ठ! तुम मेरे आदेशसे सेना साथमें लेकर जाओ और साम आदि उपायोंसे उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको यहाँ ले आओ। यदि वह स्त्री साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे भी यहाँ न आये तो उस सुन्दरीको बिना मारे ही पकड़कर मेरे पास ले आओ, यदि वह मृगनयनी प्रीतिपूर्वक आयेगी तो मैं हंसके समान भौंहोंवाली उस स्त्रीको प्रसन्नतापूर्वक अपनी पटरानी बनाऊँगा। मेरी इच्छा समझकर जिस प्रकार रसभंग न हो, वैसा करना। मैं उसकी रूपराशिकी बात सुनकर मोहित हो गया हूँ॥ ५५–५८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>महिषस्य वचः श्रुत्वा पेशलं मन्त्रिसत्तमः ॥ ५९<br><br>जगाम तरसा कामं गजाश्वरथसंयुतः।<br>गत्वा दूरतरं स्थित्वा तामुवाच मनस्विनीम् ॥ ६०<br><br>विनयावनतः श्लक्ष्णं मन्त्री मधुरया गिरा। | व्यासजी बोले—महिषासुरकी यह कोमल वाणी सुनकर वह श्रेष्ठ मन्त्री हाथी, घोड़े और रथ साथ लेकर तुरंत चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर कुछ दूर खड़े होकर वह सचिव कोमल तथा मधुर वाणीमें विनम्रतापूर्वक उस दृढ़ निश्चयवाली नारीसे कहने लगा॥ ५९–६० १/२ ॥ |
| प्रधान उवाच<br>कासि त्वं मधुरालापे किमत्रागमनं कृतम् ॥ ६१ | प्रधान बोला—हे मधुरभाषिणि! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? हे महाभागे! मेरे मुखसे ऐसा कहलाकर मेरे स्वामीने तुमसे यह बात पूछी है॥ ६१ १/२ ॥ |
| पृच्छति त्वां महाभागे मन्मुखेन मम प्रभुः।<br>स जेता सर्वदेवानाभवध्यस्तु नरैः किल ॥ ६२<br><br>ब्रह्मणो वरदानेन गर्वितश्चारुलोचने।<br>दैत्येश्वरोऽसौ बलवान्कामरूपधरः सदा ॥ ६३ | उन्होंने समस्त देवताओंको जीत लिया है और वे मनुष्योंसे अवध्य हैं। हे चारुलोचने! ब्रह्माजीसे वरदान पानेके कारण वे बहुत गर्वयुक्त रहते हैं। वे दैत्यराज महिष बड़े बलवान् हैं और अपनी इच्छाके अनुसार वे सदा विविध रूप धारण कर सकते हैं॥ ६२–६३॥ |
| श्रुत्वा त्वां समुपायातां चारुवेषां मनोहराम्।<br>द्रष्टुमिच्छति राजा मे महिषो नाम पार्थिवः ॥ ६४<br><br>मानुषं रूपमादाय त्वत्समीपं समेष्यति।<br>यथा रुच्येत चार्वङ्गि तथा मन्यामहे वयम् ॥ ६५ | सुन्दर वेष तथा मनोहर विग्रहवाली आप यहाँ आयी हुई हैं—ऐसा सुनकर मेरे प्रभु महाराज महिषासुर आपको देखना चाहते हैं। वे मनुष्यका रूप धारण करके आपके पास आयेंगे। हे सुन्दर अंगोंवाली! आपकी जो इच्छा होगी, हम उसीको मान लेंगे॥ ६४–६५॥ |
| तर्हीहि मृगशावाक्षि समीपं तस्य धीमतः।<br>नो चेदिहानयाम्येनं राजानं भक्तितत्परम् ॥ ६६ | हे बालमृगके समान नेत्रोंवाली! अब आप उन बुद्धिमान् राजा महिषके पास चलें और नहीं तो मैं स्वयं जाकर आपके प्रेममें लीन राजा महिषको यहाँ ले आऊँ॥ ६६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 19 B