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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३

अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३

इत्युक्त्वा पर्णशालायां गता सा वह्निसन्निधौ।<br>गच्छ गच्छेति वदती रावणं लोकरावणम्॥ ४ऐसा कह करके वे सीताजी जगत्को रुलानेवाले रावणके प्रति ‘चले जाओ, चले जाओ’ इस प्रकार बोलती हुई पर्णशालामें अग्निकुण्डके पास चली गयीं॥ ४॥
सोऽथ कृत्वा निजं रूपं जगामोटजमन्तिकम्।<br>बलाज्जग्राह तां बालां रुदतीं भयविह्वलाम्॥ ५इतनेमें वह रावण अपना वास्तविक रूप धारण करके तुरन्त पर्णशालामें उनके पास जा पहुँचा और उसने भयसे व्याकुल होकर रोती हुई उस बाला सीताको बलपूर्वक पकड़ लिया॥ ५॥
रामरामेति क्रन्दन्तीं लक्ष्मणेति मुहुर्मुहुः।<br>गृहीत्वा निर्गतः पापो रथमारोप्य सत्वरः॥ ६<br><br>गच्छन्नरुणपुत्रेण मार्गे रुद्धो जटायुषा।<br>संग्रामोऽभून्महोरौद्रस्तयोस्तत्र वनान्तरे॥ ७हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!—ऐसा बार-बार कहकर विलाप करती हुई सीताको पकड़कर और उन्हें अपने रथपर बैठाकर रावण शीघ्रतापूर्वक निकल गया। तब अरुणपुत्र जटायुने जाते हुए उस रावणको मार्गमें रोक दिया। उस वनमें दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ ६-७॥
हत्वा तं तां गृहीत्वा च गतोऽसौ राक्षसाधिपः।<br>लङ्कायां क्रन्दती तात कुररीव दुरात्मना॥ ८<br><br>अशोकवनिकायां सा स्थापिता राक्षसीयुता।<br>स्ववृत्तान्नैव चलिता सामदानादिभिः किल॥ ९हे तात! अन्तमें वह राक्षसराज रावण जटायुको मारकर और सीताको साथ लेकर चला गया। तदनन्तर उस दुष्टात्माने कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई सीताको लंकामें अशोकवाटिका में रख दिया और उसकी रखवालीके लिये राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया। उस राक्षसके साम-दान आदि उपायोंसे भी सीताजी अपने सतीत्वसे विचलित नहीं हुईं॥ ८-९॥
रामोऽपि तं मृगं हत्वा जगामादाय निर्वृतः।<br>आयान्तं लक्ष्मणं वीक्ष्य किं कृतं तेऽनुजासमम्॥ १०<br><br>एकाकिनीं प्रियां हित्वा किमर्थं त्वमिहागतः।<br>श्रुत्वा स्वनं तु पापस्य राघवस्त्वब्रवीदिदम्॥ ११उधर श्रीराम भी स्वर्ण-मृगको शीघ्र मारकर उसे लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक [आश्रमकी ओर] चल पड़े। मार्गमें आते हुए लक्ष्मणको देखकर वे बोले—भाई! यह तुमने कैसा विषम कार्य कर दिया? वहाँ प्रिया सीताको अकेली छोड़कर तथा इस पापीकी पुकार सुनकर तुम इधर क्यों चले आये?॥ १०-११॥
सौमित्रिस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतावाग्बाणपीडितः।<br>प्रभोऽत्राहं समायातः कालयोगान्न संशयः॥ १२तब सीताके वचनरूपी बाणसे आहत लक्ष्मणने कहा—प्रभो! मैं कालकी प्रेरणासे यहाँ चला आया हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२॥
तदा तौ पर्णशालायां गत्वा वीक्ष्यातिदुःखितौ।<br>जानक्यन्वेषणे यत्नमुभौ कर्तुं समुद्यतौ॥ १३तदनन्तर वे दोनों पर्णशालामें जाकर वहाँकी स्थिति देखकर अत्यन्त दुःखित हुए और जानकीको खोजनेका प्रयत्न करने लगे॥ १३॥
मार्गमाणौ तु सम्प्राप्तौ यत्रासौ पतितः खगः।<br>जटायुः प्राणशेषस्तु पतितः पृथिवीतले॥ १४<br><br>तेनोक्तं रावणेनाद्य हृतासौ जनकात्मजा।<br>मया निरुद्धः पापात्मा पातितोऽहं मृधे पुनः॥ १५खोजते हुए वे उस स्थानपर पहुँचे जहाँ पक्षिराज ‘जटायु’ गिरा पड़ा था। वह पृथिवीपर मृतप्राय पड़ा हुआ था। उसने बताया कि रावण जानकीको अभी हर ले गया है। मैंने उस पापीको रोका, किंतु उसने युद्धमें मुझे मारकर गिरा दिया॥ १४-१५॥

| ३९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
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| इत्युक्त्वासौ गतप्राणः संस्कृतो राघवेण वै।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं रामलक्ष्मणौ निर्गतौ ततः॥ १६ | ऐसा कहकर वह जटायु मर गया। तब श्रीरामने उसका दाह-संस्कार किया। उसकी समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके श्रीराम और लक्ष्मण वहाँसे आगे बढ़े॥ १६॥ |
| कबन्धं घातयित्वासौ शापाच्चामोचयत्प्रभुः।<br>वचनात्तस्य हरिणा सख्यं चक्रेऽथ राघवः॥ १७ | मार्गमें कबन्धका वध करके भगवान् श्रीरामने उसे शापसे छुड़ाया और उसीके कथनानुसार उन्होंने सुग्रीवसे मित्रता की॥ १७॥ |
| हत्वा च वालिनं वीरं किष्किन्धाराज्यमुत्तमम्।<br>सुग्रीवाय ददौ रामः कृतसख्याय कार्यतः॥ १८ | तदनन्तर पराक्रमी वालीका वध करके श्रीरामने कार्यसाधनहेतु किष्किन्धाका उत्तम राज्य अपने सखा सुग्रीवको दे दिया॥ १८॥ |
| तत्रैव वार्षिकान्मासांस्तस्थौ लक्ष्मणसंयुतः।<br>चिन्तयञ्जानकीं चित्ते दशाननहृतां प्रियाम्॥ १९ | वहींपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने रावणके द्वारा अपहृत अपनी प्रिया जानकीके विषयमें मनमें सोचते हुए वर्षाके चार मास व्यतीत किये॥ १९॥ |
| लक्ष्मणां प्राह रामस्तु सीताविरहपीडितः।<br>सौमित्रे कैकयसुता जाता पूर्णमनोरथा॥ २०<br><br>न प्राप्ता जानकी नूनं नाहं जीवामि तां विना।<br>नागमिष्याम्ययोध्यायामृते जनकनन्दिनीम्॥ २१ | सीताके विरहमें अत्यन्त दुःखित श्रीरामने एक दिन लक्ष्मणसे कहा—हे सौमित्रे! कैकेयीकी कामना पूरी हो गयी। अभीतक जानकी नहीं मिली, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। जनकतनया सीताके बिना मैं अयोध्या नहीं जाऊँगा॥ २०-२१॥ |
| गतं राज्यं वने वासो मृतस्तातो हृता प्रिया।<br>पीडयन्मां स दुष्टात्मा दैवोग्रे किं करिष्यति॥ २२ | राज्य चला गया, वनवास करना पड़ा, पिताजी मृत हो गये और प्रिया सीता भी हर ली गयी। इस प्रकार मुझे पीड़ित करता हुआ दुर्देव आगे न जाने क्या करेगा?॥ २२॥ |
| दुर्ज्ञेयं भवितव्यं हि प्राणिनां भरतानुज।<br>आवयोः का गतिस्तात भविष्यति सुदुःखदा॥ २३ | हे भरतानुज! प्राणियोंके प्रारब्धको जान पाना अत्यन्त कठिन है। हे तात! अब हम दोनोंकी न जाने कौन-सी दुःखद गति होगी?॥ २३॥ |
| प्राप्य जन्म मनोर्वंशे राजपुत्रावुभौ किल।<br>वनेऽतिदुःखभोक्तारौ जातौ पूर्वकृतेन च॥ २४ | मनुके कुलमें जन्म पाकर हम राजकुमार हुए; फिर भी हमलोग पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके कारण वनमें अत्यधिक दुःख भोग रहे हैं॥ २४॥ |
| त्यक्त्वा त्वमपि भोगांस्तु मया सह विनिर्गतः।<br>दैवयोगाच्च सौमित्रे भुंक्ष्व दुःखं दुरत्ययम्॥ २५ | हे सौमित्रे! तुम भी भोगोंका परित्याग करके दैवयोगसे मेरे साथ निकल पड़े; तो फिर अब यह कठिन कष्ट भोगो॥ २५॥ |
| न कोऽप्यस्मत्कुले पूर्वं मत्Count मत्समो दुःखभाङ्नरः।<br>अकिञ्चनोऽक्षमः क्लिष्टो न भूतो न भविष्यति॥ २६ | हमारे कुलमें मेरे समान दुःख भोगनेवाला, अकिंचन, असमर्थ तथा क्लेशयुक्त व्यक्ति न हुआ है और न होगा॥ २६॥ |
| किं करोम्यद्य सौमित्रे मग्नोऽस्मि दुःखसागरे।<br>न चास्ति तरणोपायो ह्यसहायस्य मे किल॥ २७ | हे लक्ष्मण! अब मैं क्या करूँ? मैं शोकसागरमें डूब रहा हूँ, मुझ असहायको इससे पार होनेका कोई |

| अ० २९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३९५ |
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| न वित्तं न बलं वीर त्वमेकः सहचारकः।<br>कोपं कस्मिन्करोम्यद्य भोगेऽस्मिन्स्वकृतेऽनुज॥ २८ | उपाय नहीं सूझता। हे वीर! मेरे पास न धन है, न बल; एकमात्र तुम ही मेरा साथ देनेवाले हो। हे अनुज! अपने ही द्वारा किये इस कर्मभोगके विषयमें अब मैं किसपर क्रोध करूँ?॥ २७-२८॥ |
| गतं हस्तगतं राज्यं क्षणादिन्द्रसमोपमम्।<br>वने वासस्तु सम्प्राप्तः को वेद विधिनिर्मितम्॥ २९ | इन्द्र और यमके राज्यकी तरह हाथमें आया हुआ राज्य क्षणभरमें चला गया और वनवास प्राप्त हुआ; विधिकी रचनाको कौन जान सकता है?॥ २९॥ |
| बालभावाच्च वैदेही चलिता चावयोः सह।<br>नीता दैवेन दुष्टेन श्यामा दुःखतरां दशाम्॥ ३० | बाल-स्वभावके कारण सीता भी हम दोनोंके साथ चली आयी। दुष्ट दैवने उस सुन्दरीको अत्यधिक दुःखपूर्ण स्थितिमें पहुँचा दिया॥ ३०॥ |
| लङ्केशस्य गृहे श्यामा कथं दुःखे भविष्यति।<br>पतिव्रता सुशीला च मयि प्रीतियुता भृशम्॥ ३१ | वह सुन्दरी जानकी लंकापति रावणके घरमें किस प्रकार दुःखित जीवन व्यतीत करती होगी? वह पतिव्रता है, शीलवती है और मुझसे अत्यधिक अनुराग रखती है॥ ३१॥ |
| न च लक्ष्मण वैदेही सा तस्य वशगा भवेत्।<br>स्वैरिणीव वरारोहा कथं स्याज्जनकात्मजा॥ ३२ | हे लक्ष्मण! वह जनकनन्दिनी उस रावणके वशमें कभी नहीं हो सकती, सुन्दर शरीरवाली वह विदेहतनया सीता स्वैरिणीकी भाँति भला किस प्रकार आचरण करेगी?॥ ३२॥ |
| त्यजेत्प्राणान्नियंतृत्वे मैथिली भरतानुज।<br>न रावणस्य वशगा भवेदिति सुनिश्चितम्॥ ३३ | हे भरतानुज! वह मैथिली अधिक नियन्त्रण किये जानेपर अपने प्राण त्याग देगी, किंतु यह सुनिश्चित है कि वह रावणकी वशवर्तिनी नहीं होगी॥ ३३॥ |
| मृता चेज्जानकी वीर प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्।<br>मृता चेदसितापाङ्गी किं मे देहेन लक्ष्मण॥ ३४ | हे वीर! यदि जानकी मर गयी तो मैं भी निस्सन्देह अपने प्राण त्याग दूँगा; क्योंकि हे लक्ष्मण! श्यामनयना सीताके मृत हो जानेपर मुझे अपने देहसे क्या लाभ?॥ ३४॥ |
| एवं विलपमानं तं रामं कमललोचनम्।<br>लक्ष्मणः प्राह धर्मात्मा सान्त्वयन्नृतया गिरा॥ ३५ | इस प्रकार विलाप करते हुए उन कमलनयन रामको सत्यपूर्ण वाणीसे सान्त्वना प्रदान करते हुए धर्मात्मा लक्ष्मणने कहा—॥ ३५॥ |
| धैर्यं कुरु महाबाहो त्यक्त्वा कातरतामिह।<br>आनयिष्यामि वैदेहीं हत्वा तं राक्षसाधमम्॥ ३६ | हे महाबाहो! आप इस समय दैन्यभाव छोड़कर धैर्य धारण कीजिये। मैं उस अधम राक्षसको मारकर जानकीको वापस ले आऊँगा॥ ३६॥ |
| आपदि सम्पदि तुल्या धैर्याद्भवन्ति ते धीराः।<br>अल्पधियस्तु निमग्नाः कष्टे भवन्ति विभवेऽपि॥ ३७ | विपत्ति तथा सम्पत्ति—इन दोनों ही स्थितियोंमें धैर्य धारण करते हुए जो एक समान रहते हैं, वे ही धीर होते हैं, किंतु अल्प बुद्धिवाले लोग तो सम्पत्तिकी दशामें भी कष्टमें पड़े रहते हैं॥ ३७॥ |
| संयोगो विप्रयोगश्च दैवाधीनावुभावपि।<br>शोकस्तु कीदृशस्तत्र देहेऽनात्मनि च क्वचित्॥ ३८ | संयोग तथा वियोग—ये दोनों ही दैवके अधीन होते हैं। शरीर तो आत्मासे भिन्न है, अतः उसके लिये शोक कैसा?॥ ३८॥ |

३९६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राज्याद्यथा वने वासो वैदेह्या हरणं यथा।<br>तथा काले समीचीने संयोगोऽपि भविष्यति॥ ३९जिस प्रकार [प्रतिकूल समय आनेपर] राज्यसे निर्वासित होकर हमें वनवास भोगना पड़ा तथा सीताहरण हुआ, उसी प्रकार अनुकूल समय आनेपर संयोग भी हो जायगा॥ ३९॥
प्राप्तव्यं सुखदुःखानां भोगान्निर्वर्तनं क्वचित्।<br>नान्यथा जानकीजाने तस्माच्छोकं त्यजाधुना॥ ४०हे सीतापते! सुखों तथा दुःखोंके भोगसे छुटकारा कहाँ? वह तो निःसन्देह भोगना ही पड़ता है। अतः आप इस समय शोकका त्याग कर दीजिये॥ ४०॥
वानराः सन्ति भूयांसो गमिष्यन्ति चतुर्दिशम्।<br>शुद्धिं जनकनन्दिन्या आनयिष्यन्ति ते किल॥ ४१<br><br>ज्ञात्वा मार्गस्थितिं तत्र गत्वा कृत्वा पराक्रमम्।<br>हत्वा तं पापकर्माणमानयिष्यामि मैथिलीम्॥ ४२बहुतसे वानर हैं; वे चारों दिशाओंमें जायँगे और जानकीकी खोज-खबर ले आयेंगे। [पता लग जानेपर] मार्गकी जानकारी करके मैं स्वयं वहाँ जाऊँगा और आक्रमण करके उस पापकर्मवाले रावणका वध करके जानकीजीको अवश्य ले आऊँगा॥ ४१-४२॥
ससैन्यं भरतं वापि समाहूय सहानुजम्।<br>हनिष्यामो वयं शत्रुं किं शोचसि वृथाग्रज॥ ४३अथवा हे अग्रज! यदि इससे कार्य न चलेगा, तो मैं भरत तथा शत्रुघ्नको भी सेनासमेत बुला लूँगा और हमलोग उस शत्रुको मार डालेंगे; आप वृथा क्यों चिन्ता कर रहे हैं?॥ ४३॥
रघुणैकरथेनैव जिताः सर्वा दिशः पुरा।<br>तद्वंशजः कथं शोकं कर्तुमर्हसि राघव॥ ४४पूर्वकालमें राजा रघुने केवल एक रथसे ही चारों दिशाओंको जीत लिया था। हे राघवेन्द्र! आप उसी वंशके होकर शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ४४॥
एकोऽहं सकलाञ्जेतुं समर्थोऽस्मि सुरासुरान्।<br>किं पुनः ससहायो वै रावणं कुलपांसनम्॥ ४५अकेला मैं सभी देवताओं तथा दानवोंको जीतनेमें समर्थ हूँ, तब फिर आप-जैसे सहायकके रहते उस कुलकलंकी रावणका वध करनेमें क्या कठिनाई है?॥ ४५॥
जनकं वा समानीय साहाय्ये रघुनन्दन।<br>हनिष्यामि दुराचारं रावणं सुरकण्टकम्॥ ४६अथवा हे रघुनन्दन! मैं महाराज जनकको सहायताके लिये बुलाकर देवताओंके कण्टकस्वरूप उस दुराचारी रावणका वध कर डालूँगा॥ ४६॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम्।<br>चक्रनेमिरिवैकं तन्न भवेद्रघुनन्दन॥ ४७<br><br>मनोऽतिकातारं यस्य सुखदुःखसमुद्भवे।<br>स शोकसागरे मग्नो न सुखी स्यात्कदाचन॥ ४८हे रघुनन्दन! सुखके बाद दुःख तथा दुःखके बाद सुख पहियेकी धुरीकी तरह आया-जाया करते हैं। सदा एक स्थिति नहीं रहती। सुख-दुःखके आनेपर जिसका मन कातर हो जाता है, वह शोकसागरमें निमग्न रहता है और कभी सुखी नहीं रह सकता॥ ४७-४८॥
इन्द्रेण व्यसनं प्राप्तं पुरा वै रघुनन्दन।<br>नहुषः स्थापितो देवैः सर्वैर्मघवतः पदे॥ ४९<br><br>स्थितः पङ्कजमध्ये च बहुवर्षगणानपि।<br>अज्ञातवासं मघवा भीतस्त्यक्त्वा निजं पदम्॥ ५०हे राघव! पूर्वकालमें इन्द्रके ऊपर भी विपत्ति आयी थी, तब सभी देवताओंने उनके स्थानपर राजा नहुषको स्थापित कर दिया था। उस समय इन्द्रने भयवश अपना पद त्यागकर बहुत दिनोंतक कमलवनमें छिपकर अज्ञातवास किया था। समय बदलनेपर
अ० ३० ]तृतीय स्कन्ध३९७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुनः प्राप्तं निजं स्थानं काले विपरिवर्तिते।<br>नहुषः पतितो भूमौ शापादजगराकृतिः॥ ५१<br><br>इन्द्राणीं कामयानस्तु ब्राह्मणानवमन्य च।<br>अगस्तिकोपात्सञ्जातः सर्पदेहो महीपतिः॥ ५२उन्होंने पुनः अपना पद प्राप्त कर लिया और नहुषको शापवश अजगरके रूपमें होकर पृथ्वीपर गिरना पड़ा। ब्राह्मणोंका अपमान करके इन्द्राणीको पानेकी इच्छाके कारण ही अगस्त्यमुनिके कोपपूर्वक शाप देनेसे राजा नहुष सर्पदेहवाले हो गये थे॥ ४९–५२॥
तस्माच्छोको न कर्तव्यो व्यसने सति राघव।<br>उद्यमे चित्तमास्थाय स्थातव्यं वै विपश्चिता॥ ५३अतः हे राघव! दुःख आनेपर शोक नहीं करना चाहिये। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि ऐसी परिस्थितिमें मनको उद्यमशील बनाकर समयकी प्रतीक्षा करता रहे॥ ५३॥
सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थोऽसि जगत्पते।<br>किं प्राकृत इवात्यर्थं कुरुषे शोकमात्मनि॥ ५४हे महाभाग! आप सर्वज्ञ हैं। हे जगत्पते! आप सर्वसमर्थ हैं; तब एक प्राकृत पुरुषकी भाँति आप अपने मनमें अत्यन्त शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ५४॥
व्यास उवाच<br>इति लक्ष्मणवाक्येन बोधितो रघुनन्दनः।<br>त्यक्त्वा शोकं तथात्यर्थं बभूव विगतज्वरः॥ ५५व्यासजी बोले— इस प्रकार लक्ष्मणकी बातोंसे रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना मिली और वे शोक त्यागकर बिलकुल निश्चिन्त हो गये॥ ५५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे लक्ष्मणकृतरामशोकसान्त्वनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥


अथ त्रिंशोऽध्यायः

श्रीराम और लक्ष्मणके पास नारदजीका आना और उन्हें नवरात्रव्रत करनेका परामर्श देना, श्रीरामके पूछनेपर नारदजीका उनसे देवीकी महिमा और नवरात्रव्रतकी विधि बतलाना, श्रीरामद्वारा देवीका पूजन और देवीद्वारा उन्हें विजयका वरदान देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एवं तौ संविदं कृत्वा यावत्तूष्णीं बभूवतुः।<br>आजगाम तदाकाशान्नारदो भगवानृषिः॥ १इस प्रकार राम और लक्ष्मण परस्परमें परामर्श करके ज्यों ही चुप हुए, त्यों ही आकाशमार्गसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये॥ १॥
रणयन्महतीं वीणां स्वरग्रामविभूषिताम्।<br>गायन्बृहद्रथं साम तदा तमुपतस्थिवान्॥ २उस समय वे स्वर तथा ग्रामसे विभूषित अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा बृहद्रथन्तर सामका गायन करते हुए उनके समीप पहुँचे॥ २॥
दृष्ट्वा तं राम उत्थाय ददावथ वृषं शुभम्।<br>आसनं चार्घपाद्यञ्च कृतवानमितद्युतिः॥ ३उन्हें देखते ही अमित तेजवाले श्रीरामने उठकर उन्हें श्रेष्ठ पवित्र आसन प्रदान किया और तत्पश्चात् अर्घ्य तथा पाद्यसे उनकी पूजा की॥ ३॥
पूजां परमिकां कृत्वा कृताञ्जलिरुपस्थितः।<br>उपविष्टः समीपे तु कृताज्ञो मुनिना हरिः॥ ४भलीभाँति पूजा करनेके बाद भगवान् श्रीराम हाथ जोड़कर खड़े हो गये और फिर मुनिके आज्ञा देनेपर उनके पास ही बैठ गये॥ ४॥

३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३०
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उपविष्टं तदा रामं सानुजं दुःखमानसम्।<br>पप्रच्छ नारदः प्रीत्या कुशलं मुनिसत्तमः॥ ५ | तब अपने अनुज लक्ष्मणके साथ बैठे हुए खिन्न-मनस्क रामसे मुनीन्द्र नारदजी प्रेमपूर्वक कुशलक्षेम पूछने लगे॥ ५॥
कथं राघव शोकार्तो यथा वै प्राकृतो नरः।<br>हृतां सीतां च जानामि रावणेन दुरात्मना॥ ६<br><br>सुरसद्मगतश्चाहं श्रुत्वाञ्जनकात्मजाम्।<br>पौलस्त्येन हृतां मोहान्मरणं स्वमजानता॥ ७ | नारदजी बोले—हे राघव! आप इस समय साधारण मनुष्यके समान शोकाकुल क्यों हैं? मैं यह जानता हूँ कि दुष्ट रावण सीताको हर ले गया है। जब मैं देवलोकमें गया था, तभी मैंने वहाँ सुना कि अपनी मृत्युको न जाननेसे ही मोहके वशीभूत होकर रावणने जनकनन्दिनीका हरण कर लिया है॥ ६-७॥
तव जन्म च काकुत्स्थ पौलस्त्यनिधनाय वै।<br>मैथिलीहरणं जातमेतदर्थं नराधिप॥ ८ | हे काकुत्स्थ! आपका जन्म ही रावणके निधनके लिये हुआ है। हे नराधिप! इसी कार्यसिद्धिके लिये सीताका हरण हुआ है॥ ८॥
पूर्वजन्मनि वैदेही मुनिपुत्री तपस्विनी।<br>रावणेन वने दृष्टा तपस्यन्ती शुचिस्मिता॥ ९<br><br>प्रार्थिता रावणेनासौ भव भार्येति राघव।<br>तिरस्कृतस्तयासौ वै जग्राह कबरं बलात्॥ १० | पूर्वजन्ममें ये वैदेही एक मुनिकी तपस्विनी कन्या थीं। उस पवित्र मुसकानवाली कन्याको रावणने वनमें तप करते हुए देखा। हे राघव! तब रावणने उससे प्रार्थना की कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। इसपर उसके द्वारा तिरस्कृत किये गये रावणने बलपूर्वक उसके केश पकड़ लिये॥ ९-१०॥
शशाप तत्क्षणं राम रावणं तापसी भृशम्।<br>कुपिता त्यक्तुमिच्छन्ती देहं संस्पर्शदूषितम्॥ ११<br><br>दुरात्मंस्तव नाशार्थं भविष्यामि धरातले।<br>अयोनिजा वरा नारी त्यक्त्वा देहं जहावपि॥ १२ | हे राम! रावणके स्पर्शसे दूषित अपनी देहको त्यागनेकी आकांक्षा रखती हुई उस तापसी मुनिकन्याने अत्यन्त कुपित होकर उसे तत्काल यह घोर शाप दे दिया कि हे दुरात्मन्! तुम्हारे विनाशके लिये मैं भूतलपर गर्भसे जन्म न लेकर एक श्रेष्ठ स्त्रीके रूपमें प्रकट होऊँगी—ऐसा कहकर उस तापसीने अपना शरीर त्याग दिया॥ ११-१२॥
सेयं रंमांशसम्भूता गृहीता तेन रक्षसा।<br>विनाशार्थं कुलस्यैव व्याली स्रगिव सम्भ्रमात्॥ १३ | लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न यह सीता वही है; जिसे भ्रमवश माला समझकर नागिनको धारण करनेवाले व्यक्तिकी भाँति रावणने अपने ही वंशका नाश करनेके लिये हर लिया है॥ १३॥
तव जन्म च काकुत्स्थ तस्य नाशाय चामरैः।<br>प्रार्थितस्य हरेरंशादजवंशेऽप्यजन्मनः॥ १४ | हे काकुत्स्थ! आपका भी जन्म उसी रावणके नाशके लिये देवताओंके प्रार्थना करनेपर अनादि भगवान् विष्णुके अंशसे अजवंशमें हुआ है॥ १४॥
कुरु धैर्यं महाबाहो तत्र सा वर्ततेऽवशा।<br>सतीधर्मरता सीता त्वां ध्यायन्ती दिवानिशम्॥ १५ | हे महाबाहो! आप धैर्य धारण करें; वे किसी दूसरेके वशमें नहीं हो सकतीं! वे सतीधर्मपरायण सीता लंकामें दिन-रात आपका ध्यान करती हुई रह रही हैं॥ १५॥

| अ० ३० ] | तृतीय स्कन्ध | ३९९ |
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| कामधेनुपयः पात्रे कृत्वा मघवता स्वयम्।<br>पानार्थं प्रेषितं तस्याः पीतं चैवामृतं तथा॥ १६<br>सुरभीदुग्धपानात्सा क्षुत्तृड्दुःखविवर्जिता।<br>जाता कमलपत्राक्षी वर्तते वीक्षिता मया॥ १७ | स्वयं इन्द्रने एक पात्रमें कामधेनुका दूध सीताको पीनेके लिये भेजा था, उस अमृततुल्य दूधको उन्होंने पी लिया है। वे कामधेनुके दुग्धपानसे भूख-प्यासके दुःखसे रहित हो गयी हैं। मैंने उन कमलनयनीको स्वयं देखा है॥ १६-१७॥ |
| उपायं कथयाम्यद्य तस्य नाशाय राघव।<br>व्रतं कुरुष्व श्रद्धावानाश्विने मासि साम्प्रतम्॥ १८ | हे राघवेन्द्र! मैं उस रावणके नाशका उपाय बताता हूँ। अब आप इसी आश्विनमासमें श्रद्धापूर्वक नवरात्रव्रत कीजिये॥ १८॥ |
| नवरात्रोपवासञ्च भगवत्याः प्रपूजनम्।<br>सर्वसिद्धिकरं राम जपहोमविधानतः॥ १९<br>मेध्यैश्च पशुभिर्देव्या बलिं दत्त्वा विशंसितैः।<br>दशांशं हवनं कृत्वा सुशक्तस्त्वं भविष्यसि॥ २० | हे राम! नवरात्रमें उपवास तथा जप-होमके विधानसे किया गया भगवती-पूजन समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। देवीको पवित्र बलि देकर तथा दशांश हवन करके आप पूर्ण शक्तिशाली बन जायँगे॥ १९-२०॥ |
| विष्णुना चरितं पूर्वं महादेवेन ब्रह्मणा।<br>तथा मघवता चीर्णं स्वर्गमध्यस्थितेन वै॥ २१ | पूर्वकालमें भगवान् विष्णु, शिव, ब्रह्मा तथा स्वर्ग-लोकमें विराजमान इन्द्रने भी इसका अनुष्ठान किया था॥ २१॥ |
| सुखिना राम कर्तव्यं नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>विशेषेण च कर्तव्यं पुंसा कष्टगतेन वै॥ २२ | हे राम! सुखी मनुष्यको इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये और कष्टमें पड़े हुए मनुष्यको तो यह व्रत विशेषरूपसे करना चाहिये॥ २२॥ |
| विश्वामित्रेण काकुत्स्थ कृतमेतन्न संशयः।<br>भृगुणाथ वसिष्ठेन कश्यपेन तथैव च॥ २३<br>गुरुणा हृतदारेण कृतमेतन्महाव्रतम्।<br>तस्मात्त्वं कुरु राजेन्द्र रावणस्य वधाय च॥ २४<br>इन्द्रेण वृत्रनाशाय कृतं व्रतमनुत्तमम्।<br>त्रिपुरस्य विनाशाय शिवेनापि पुरा कृतम्॥ २५<br>हरिणा मधुनाशाय कृतं मेरौ महामते।<br>विधिवत्कुरु काकुत्स्थ व्रतमेतदतन्द्रितः॥ २६ | हे काकुत्स्थ! विश्वामित्र, भृगु, वसिष्ठ और कश्यप भी इस व्रतको कर चुके हैं; इसमें सन्देह नहीं है। इसी प्रकार हरण की गयी पत्नीवाले गुरु बृहस्पतिने भी इस व्रतको किया था। इसलिये हे राजेन्द्र! रावणके वध तथा सीताकी प्राप्तिके लिये आप इस व्रतको कीजिये। पूर्वकालमें इन्द्रने वृत्रासुरके वधके लिये तथा शिवने त्रिपुरदैत्यके वधके लिये यह सर्वश्रेष्ठ व्रत किया था। हे महामते! इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी मधुदैत्यके वधके लिये सुमेरुपर्वतपर यह व्रत किया था, अतः हे काकुत्स्थ! आप भी आलस्यरहित होकर विधिपूर्वक यह व्रत कीजिये॥ २३-२६॥ |
| श्रीराम उवाच<br>का देवी किंप्रभावा सा कुतो जाता किमाह्वया।<br>व्रतं किं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २७ | श्रीराम बोले—हे दयानिधे! आप सर्वज्ञ हैं, अतः मुझे विधिपूर्वक बताइये कि वे कौन देवी हैं, उनका प्रभाव क्या है, वे कहाँसे उत्पन्न हुई हैं, उनका नाम क्या है तथा वह व्रत कौन-सा है?॥ २७॥ |
| नारद उवाच<br>शृणु राम सदा नित्या शक्तिराद्या सनातनी।<br>सर्वकामप्रदा देवी पूजिता दुःखनाशिनी॥ २८ | नारदजी बोले—हे राम! सुनिये—वे देवी नित्य, सनातनी और आद्याशक्ति हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर देती हैं और अपनी आराधनासे सभी प्रकारके कष्ट दूर कर देती हैं॥ २८॥ |

४००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३०

| कारणं सर्वजन्तूनां ब्रह्मादीनां रघूद्वह।<br>तस्याः शक्तिं विना कोऽपि स्पन्दितुं न क्षमो भवेत्॥ २९ | हे रघुनन्दन! वे ब्रह्मा आदि देवताओं तथा समस्त जीवोंकी कारणस्वरूपा हैं। उनसे शक्ति पाये बिना कोई हिल-डुल सकनेमें भी समर्थ नहीं है॥ २९॥ |
| विष्णोः पालनशक्तिः सा कर्तृशक्तिः पितुर्मम।<br>रुद्रस्य नाशशक्तिः सा त्वन्या शक्तिः परा शिवा॥ ३० | वे ही मेरे पिता ब्रह्माकी सृष्टि-शक्ति हैं, विष्णुकी पालन-शक्ति हैं तथा शंकरकी संहार-शक्ति हैं। वे कल्याणमयी पराम्बा अन्य शक्तिरूपा भी हैं॥ ३०॥ |
| यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्भुवनत्रये।<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिस्तदुत्पत्तिः कुतो भवेत्॥ ३१ | इन तीनों लोकोंमें जो कुछ भी कहीं भी सत् या असत् पदार्थ है, उसकी उत्पत्तिमें निमित्तकारण इस देवीके अतिरिक्त और कौन हो सकता है?॥ ३१॥ |
| न ब्रह्मा न यदा विष्णुर्न रुद्रो न दिवाकरः।<br>न चेन्द्राद्याः सुराः सर्वे न धरा न धराधराः॥ ३२<br>तदा सा प्रकृतिः पूर्णा पुरुषेण परेण वै।<br>संयुता विहरत्येव युगादौ निर्गुणा शिवा॥ ३३ | इस सृष्टिके आरम्भमें जब ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्रादि देवता, पृथ्वी और पर्वत आदि कुछ भी नहीं रहता, तब उस समय वे निर्गुणा, कल्याणमयी, परा प्रकृति ही परमपुरुषके साथ विहार करती हैं॥ ३२-३३॥ |
| सा भूत्वा सगुणा पश्चात्करोति भुवनत्रयम्।<br>पूर्वं संसृज्य ब्रह्मादीन्दत्त्वा शक्तींश्च सर्वशः॥ ३४ | वे ही बादमें सगुणा शक्ति बनकर सर्वप्रथम ब्रह्मा आदिका सृजन करके और उन्हें शक्तियाँ प्रदानकर तीनों भुवनोंकी सम्यक् रचना करती हैं॥ ३४॥ |
| तां ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।<br>सा विद्या परमा ज्ञेया वेदाद्या वेदकारिणी॥ ३५ | उन आदिशक्तिको जानकर प्राणी संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। विद्यास्वरूपा, वेदोंकी आदिकारण, वेदोंको प्रकट करनेवाली तथा परमा उन भगवतीको अवश्य जानना चाहिये॥ ३५॥ |
| असंख्यातानि नामानि तस्या ब्रह्मादिभिः किल।<br>गुणकर्मविधानैस्तु कल्पितानि च किं ब्रुवे॥ ३६<br>अकारादिक्षकारान्तैः स्वरैर्वर्णैस्तु योजितैः।<br>असंख्येयानि नामानि भवन्ति रघुनन्दन॥ ३७ | ब्रह्मादि देवताओंने गुण-कर्मके विधानानुसार उनके असंख्य नाम कल्पित किये हैं, मैं कहाँतक बताऊँ? हे रघुनन्दन! ‘अ’ कारसे लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त सभी स्वरों तथा वर्णोंके संयोगसे उनके असंख्य नाम बनते हैं॥ ३६-३७॥ |
| श्रीराम उवाच<br>विधिं मे ब्रूहि विप्रर्षे व्रतस्यास्य समासतः।<br>करोम्यद्यैव श्रद्धावाञ्छ्रीदेव्याः पूजनं तथा॥ ३८ | श्रीराम बोले— हे देवर्षे! इस नवरात्रव्रतका विधान मुझे संक्षेपमें बताइये; मैं आज ही श्रद्धापूर्वक श्रीदेवीका विधिवत् पूजन करूँगा॥ ३८॥ |
| नारद उवाच<br>पीठं कृत्वा समे स्थाने संस्थाप्य जगदम्बिकाम्।<br>उपवासान्नवैव त्वं कुरु राम विधानतः॥ ३९<br>आचार्योऽहं भविष्यामि कर्मण्यस्मिन्महीपते।<br>देवकार्यविधानार्थमुत्साहं प्रकरोम्यहम्॥ ४० | नारदजी बोले— हे राम! किसी समतल भूमिपर पीठासन बनाकर उसपर भगवती जगदम्बिकाकी स्थापना करके विधानपूर्वक नौ दिन उपवास कीजिये। हे राजन्! इस कार्यमें मैं आचार्य बनूँगा; क्योंकि देवताओंके कार्य करनेमें मैं अधिक उत्साह रखता हूँ॥ ३९-४०॥ |

अ० ३० ]तृतीय स्कन्ध४०१
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं मत्वा रामः प्रतापवान्।<br>कारयित्वा शुभं पीठं स्थापयित्वाम्बिकां शिवाम्॥ ४१<br><br>विधिवत्पूजनं तस्याश्चकार व्रतवान् हरिः।<br>सम्प्राप्ते चाश्विने मासि तस्मिन्गिरिवरे तदा॥ ४२<br><br>उपवासपरो रामः कृतवान्व्रतमुत्तमम्।<br>होमञ्च विधिवत्तत्र बलिदानञ्च पूजनम्॥ ४३<br><br>भ्रातरौ चक्रतुः प्रेम्णा व्रतं नारदसम्मतम्।<br>अष्टम्यां मध्यरात्रे तु देवी भगवती हि सा॥ ४४<br><br>सिंहारूढा ददौ तत्र दर्शनं प्रतिपूजिता।<br>गिरिशृङ्गे स्थितोवाच राघवं सानुजं गिरा॥ ४५<br><br>मेघगम्भीरया चेदं भक्तिभावेन तोषिता।नारदजीका वचन सुनकर प्रतापी श्रीरामने उसे सत्य मानकर तदनुसार एक सुन्दर पीठासन बनवाकर उसपर अम्बिकाकी स्थापना की। व्रतधारी भगवान् श्रीरामने आश्विनमास लगनेपर उस श्रेष्ठ पर्वतपर उन भगवतीका पूजन किया। उपवासपरायण श्रीरामने यह श्रेष्ठ व्रत करते हुए विधिवत् होम, बलिदान और पूजन किया। इस प्रकार दोनों भाइयोंने नारदजीके द्वारा बताये गये इस व्रतको प्रेमपूर्वक सम्पन्न किया। उनसे सम्यक् पूजित होकर अष्टमीकी मध्यरात्रिकी वेलामें भगवती दुर्गाने सिंहपर सवार होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। तदनन्तर भक्तिभावसे प्रसन्न उन भगवतीने पर्वतके शिखरपर स्थित होकर लक्ष्मणसहित रामसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ ४१–४५ ½ ॥
देव्युवाचदेवी बोलीं—
राम राम महाबाहो तुष्टास्म्यद्य व्रतेन ते॥ ४६<br><br>प्रार्थयस्व वरं कामं यत्ते मनसि वर्तते।<br>नारायणांशसम्भूतस्त्वं वंशे मानवेऽनघे॥ ४७<br><br>रावणस्य वधायैव प्रार्थितस्त्वममरैरसि।<br>पुरा मत्स्यतनुं कृत्वा हत्वा घोरञ्च राक्षसम्॥ ४८<br><br>त्वया वै रक्षिता वेदाः सुराणां हितमिच्छता।<br>भूत्वा कच्छपरूपस्तु धृतवान्मन्दरं गिरिम्॥ ४९<br><br>अकूपारं प्रमन्थानं कृत्वा देवानपोषयः।<br>कोलरूपं परं कृत्वा दशनाग्रेण मेदिनीम्॥ ५०<br><br>धृतवानसि यद्राम हिरण्याक्षं जघान च।<br>नारसिंहीं तनुं कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुरा॥ ५१<br><br>प्रह्लादं राम रक्षित्वा हतवानसि राघव।<br>वामनं वपुरास्थाय पुरा छलितवान्बलिम्॥ ५२<br><br>भूत्वेन्द्रस्यानुजः कामं देवकार्यप्रसाधकः।<br>जमदग्निसुतस्त्वं मे विष्णोरंशेन सङ्गतः॥ ५३हे राम! हे महाबाहो! इस समय मैं आपके व्रतसे सन्तुष्ट हूँ। आपके मनमें जो भी हो, उस अभिलषित वरको माँग लीजिये। आप पवित्र मनुवंशमें नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। हे राम! देवताओंके प्रार्थना करनेपर रावणके वधके लिये आप अवतरित हुए हैं। पूर्वकालमें मत्स्यरूप धारणकर भयानक राक्षसका वध करके देवताओंके हितकी इच्छावाले आपने ही वेदोंकी रक्षा की थी। पुनः कच्छपके रूपमें अवतार लेकर मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया, जिससे समुद्रका मन्थन करके [अमृतपान कराकर] देवताओंका पोषण किया था। हे राम! आपने वराहका रूप धारणकर अपने दाँतोंकी नोंकपर पृथ्वीको रख लिया और हिरण्याक्षका वध किया था। हे राघव! हे राम! पूर्वकालमें नरसिंहका रूप धारणकर प्रह्लादकी रक्षा करके आपने हिरण्यकशिपुका वध किया था। इसी प्रकार पूर्वकालमें वामनका रूप धारण करके आपने बलिको छला था। उस समय इन्द्रका लघु भ्राता बनकर आपने देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया था। पुनः भगवान् विष्णुके अंशसे जमदग्निके

| ४०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| कृत्वान्तं क्षत्रियाणां तु दानं भूमेरदाद् द्विजे।<br>तथेदानीं तु काकुत्स्थ जातो दशरथात्मजः ॥ ५४<br><br>प्रार्थितस्तु सुरैः सर्वै रावणेनातिपीडितैः।<br>कपयस्ते सहाया वै देवांशा बलवत्तराः ॥ ५५ | पुत्र परशुरामके रूपमें अवतरित होकर क्षत्रियोंका अन्त करके आपने सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दे दी थी। उसी प्रकार हे काकुत्स्थ! रावणके द्वारा अत्यधिक सताये गये सभी देवताओंके प्रार्थना करनेपर इस समय आप ही दशरथपुत्र श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ४६—५४ १/२ ॥ |
| भविष्यन्ति नरव्याघ्र मच्छक्तिसंयुता ह्यमी।<br>शेषांशोऽप्यनुजस्तेऽयं रावणात्मजनाशकः ॥ ५६<br><br>भविष्यति न सन्देहः कर्तव्योऽत्र त्वयानघ।<br>वसन्ते सेवनं कार्यं त्वया तत्रातिश्रद्धया ॥ ५७ | हे नरोत्तम! देवताओंके अंशसे उत्पन्न ये परम बलशाली वानर मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर आपके सहायक होंगे। शेषनागके अंशस्वरूप आपके ये अनुज लक्ष्मण रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले होंगे। हे अनघ! इस विषयमें आपको सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ५५-५६ १/२ ॥ |
| हत्वाथ रावणं पापं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एकादशसहस्त्राणि वर्षाणि पृथिवीतले ॥ ५८<br><br>कृत्वा राज्यं रघुश्रेष्ठ गन्तासि त्रिदिवं पुनः। | वसन्त ऋतुके नवरात्रमें आप परम श्रद्धाके साथ [पुनः] मेरी पूजा कीजिये। तत्पश्चात् पापी रावणका वध करके आप सुखपूर्वक राज्य कीजिये। हे रघुश्रेष्ठ! इस प्रकार ग्यारह हजार वर्षोंतक भूतलपर राज्य करके पुनः आप देवलोकके लिये प्रस्थान करेंगे ॥ ५७-५८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी रामस्तु प्रीतमानसः ॥ ५९<br><br>समाप्य तद् व्रतं चक्रे प्रयाणं दशमीदिने।<br>विजयापूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥ ६० | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न मनसे उस व्रतका समापन करके दशमी तिथिको विजयापूजन करके तथा अनेकविध दान देकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ५९-६० ॥ |
| कपिपतिबलयुक्तः सानुजः श्रीपतिश्च<br>प्रकटपरमशक्त्या प्रेरितः पूर्णकामः।<br>उदधितटगतोऽसौ सेतुबन्धं विधाया-<br>प्यहनदमरशत्रुं रावणं गीतकीर्तिः ॥ ६१ | वानरराज सुग्रीवकी सेनाके साथ अपने अनुजसहित विख्यात यशवाले तथा पूर्णकाम लक्ष्मीपति श्रीराम साक्षात् परमा शक्तिकी प्रेरणासे समुद्रतटपर पहुँचे। वहाँ सेतु-बन्धन करके उन्होंने देवशत्रु रावणका संहार किया ॥ ६१ ॥ |
| यः शृणोति नरो भक्त्या देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>स भुक्त्वा विपुलाम्भोगाम्प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ६२ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देवीके उत्तम चरित्रका श्रवण करता है, वह अनेक सुखोंका उपभोग करके परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ |
| सन्त्यन्यानि पुराणानि विस्तराणि बहूनि च।<br>श्रीमद्द्भागवतस्यास्य न तुल्यानीति मे मतिः ॥ ६३ | यद्यपि अन्य बहुतसे विस्तृत पुराण हैं, किंतु वे इस श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणके तुल्य नहीं हैं, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ६३ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामाय देवीवरदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥


॥ तृतीयः स्कन्धः समाप्तः ॥