सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अन्धवत्पङ्गुवत्कामं न तथा मुदमावहेत्।<br>कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते॥ ३२<br><br>न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि।<br>कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे॥ ३३लँगड़ेकी भाँति अकर्मण्य होकर प्रसन्नतापूर्वक पड़े रहना उचित नहीं है। पुरुषार्थ करनेपर भी यदि सिद्धि नहीं मिलती है तो इसमें उस व्यक्तिका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि प्रत्येक शरीरधारी सदा दैवके अधीन रहता है। कार्यकी सिद्धि न सेनासे, न मन्त्रसे, न मन्त्रणासे, न रथसे और न तो आयुधसे ही मिलती है। हे सुरेन्द्र! सफलता तो निश्चितरूपसे दैवके अधीन रहती है॥ ३१—३३ १/२॥
न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप।<br>बलवान्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते॥ ३४<br><br>बुद्धिमाञ्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिर्भोगवान्भवेत्।<br>कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम्॥ ३५<br><br>दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना।<br>उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप॥ ३६[ऐसा भी देखा जाता है कि] बलशाली कष्ट पाता है तथा बलहीन सुखोपभोग करता है, बुद्धिमान् भूखा ही सो जाता है तथा बुद्धिहीन अनेक उत्तम भोज्य पदार्थोंका सेवन करता है, कायर व्यक्तिकी जीत हो जाती है तथा वीर पराजित हो जाता है। हे सुराधिप! यह समस्त जगत् ही दैवके अधीन है, तो फिर चिन्ताकी आवश्यकता ही क्या? ऐसा दृढ़ विश्वास करके भाग्यको उद्योगके साथ संयोजित कर देना चाहिये॥ ३४—३६॥
दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत्।<br>दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्॥ ३७उद्योग करनेके बाद सुख प्राप्त हो अथवा दुःख—इन दोनोंके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। दुःख आनेपर अपनेसे अधिक दुःखीजनोंको तथा सुख आनेपर अधिक सुखी व्यक्तिको देखना चाहिये॥ ३७॥
आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्।<br>धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः॥ ३८अपने आपको शत्रुतुल्य हर्ष तथा शोकको अर्पित नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषोंको हर्ष या शोकके उपस्थित होनेपर धैर्यका अवलम्बन करना चाहिये॥ ३८॥
अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम्।<br>दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः॥ ३९अधीर हो जानेसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख धैर्य धारण करनेसे कभी नहीं होता। किंतु सुख तथा दुःखके अवसरपर सहनशील बने रहना अति दुर्लभ है॥ ३९॥
हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात्।<br>किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः॥ ४०जब हर्ष अथवा शोक उत्पन्न हों तब अपनी बुद्धिसे निश्चय करके उनसे अप्रभावित बने रहना चाहिये। वैसी परिस्थितिमें सोचना चाहिये कि दुःख क्या है; और यह दुःख किसे होता है? मैं तो सदा

५५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४ ]


चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखञ्च किम्।<br>प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्च्छने॥ ४१<br><br>जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्भिरहितः शिवः।<br>शोकमोहौ शरीरस्य गुणौ किं मेऽत्र चिन्तने॥ ४२गुणोंसे रहित और अविनाशी हूँ। मैं तो चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न आत्मतत्त्व हूँ, तब सुख अथवा दुःखसे मेरा क्या प्रयोजन? भूख तथा प्यासका सम्बन्ध प्राणसे, शोक तथा मोहका सम्बन्ध मनसे एवं जरा तथा मृत्युका सम्बन्ध शरीरसे है। मैं तो इन छहों ऊर्मियोंसे रहित कल्याणस्वरूप हूँ। शोक तथा मोह शरीरके गुण हैं; इनके विषयमें सोचनेकी मुझे क्या आवश्यकता?॥ ४०—४२॥
शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम्।<br>सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी॥ ४३<br><br>प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः।<br>इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः॥ ४४<br><br>उपायः प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो।<br>ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम्॥ ४५मैं न शरीर हूँ और न तो इससे मेरा कोई सम्बन्ध है। मैं तो महदादि सात विकृतियों, एक प्रकृति तथा सोलह विकारोंसे पृथक् रहनेवाला सदा सुखस्वरूप हूँ। मैं न प्रकृति हूँ और न तो विकृति हूँ; तब मुझे दुःख किस बातका? हे देवेश! अपने मनमें ऐसा निश्चय करके आप ममतारहित हो जाइये। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! आपके दुःखनाशका यही प्रधान उपाय है; क्योंकि ममता सबसे बड़ा दुःख है तथा निर्ममता सबसे बड़ा सुख है॥ ४३—४५॥
सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते।<br>अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल॥ ४६<br><br>ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप।<br>प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल॥ ४७हे शचीपते! सन्तोषसे बढ़कर सुखका कोई भी स्थान नहीं है। अथवा हे देवराज! यदि आपके पास ममताको नष्ट करनेवाले ज्ञानका अभाव हो तो प्रारब्धके विषयमें विवेकका आश्रय लेना परमावश्यक है। बिना भोगके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कभी नहीं हो सकता॥ ४६-४७॥
यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः।<br>सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्ध्या वा तव सत्तम॥ ४८हे आर्य! सभी देवता आपके सहायक हों अथवा केवल आपकी बुद्धि सहायक बने—जो होना है वह होकर रहेगा, तब सुख अथवा दुःखके विषयमें चिन्ता क्या?॥ ४८॥
सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष।<br>तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः॥ ४९हे महाभाग! सुखके उपभोगसे पुण्यका क्षय होता है और दुःख भोगनेसे पापका नाश होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको सुख-क्षयकी स्थितिमें हर प्रकारसे प्रसन्नताका अनुभव करना चाहिये॥ ४९॥
अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि।<br>कृते यत्ने महाराज भवितव्यं भविष्यति॥ ५०अथवा हे महाराज! यदि आपकी इच्छा हो तो विधिवत् परामर्श करके आप यत्न करनेमें तत्पर हो जाइये। प्रयत्न करनेपर भी जो होना होगा, वही होगा॥ ५०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भयात्तुरेन्द्रादिदेवैः सुरगुरुणा सह परामर्शवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
$\sim\sim\circ\sim\sim$