देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
| २३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे।<br>पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः ॥ ६३<br><br>क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम्।<br>रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम् ॥ ६४<br><br>मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः।<br>शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत ॥ ६५<br>यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः ॥ ६६ | अग्निमें अत्यधिक दग्ध हो रहा है, मैं क्या करूँ ? मुझको बतलाइये। मुझ मन्दभाग्यके पिता और अर्जुनपौत्र परीक्षित् अकाल-मृत्युको प्राप्त हुए हैं। हे महाभाग ! युद्धमें होनेवाली मृत्यु ही क्षत्रियोंके लिये श्रेष्ठ होती है। हे व्यासजी ! रणमें अथवा घरमें विधिपूर्वक होनेवाली मृत्यु ही अच्छी मानी जाती है, किंतु मेरे पिताका वैसा मरण नहीं हुआ। वे तो असहाय अवस्थामें अन्तरिक्षमें मृत्युको प्राप्त हुए। हे सत्यवतीपुत्र ! आप उनकी शान्ति-प्राप्तिका कोई उपाय बतलाइये, जिससे दुर्गति को प्राप्त मेरे पिताजी शीघ्र ही स्वर्ग चले जायँ॥ ६२—६६॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप
</div>| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**राजा जनमेजयका वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासने सभामें उन राजासे कहा—॥ १॥ |
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| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम्।<br>पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम् ॥ २ | **व्यासजी बोले—**हे राजन् ! सुनिये, मैं आपसे एक पुनीत, कल्याणकारक, रहस्यमय, अद्भुत तथा विविध कथानकोंसे युक्त देवीभागवत नामक पुराण कहूँगा॥ २॥ |
| अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै।<br>श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम ॥ ३ | मैंने पूर्वकालमें उसे अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया था। हे राजन् ! मैं अपने परम रहस्यमय पुराणका श्रवण आपको कराऊँगा॥ ३॥ |
| धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल।<br>शुभदं सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम् ॥ ४ | सभी वेदों एवं शास्त्रोंके सारस्वरूप तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके कारणभूत इस पुराणका श्रवण करनेसे यह मंगल तथा आनन्द प्रदान करनेवाला होता है॥ ४॥ |
| जनमेजय उवाच<br>आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः।<br>प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो ॥ ५ | **जनमेजय बोले—**हे प्रभो ! यह आस्तीक किसका पुत्र था और यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये क्यों आया ? यज्ञमें सर्पोंकी रक्षा करनेके पीछे इसका क्या उद्देश्य था ? ॥ ५ ॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम्।<br>पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत ॥ ६ | हे महाभाग ! उस आख्यानको विस्तारपूर्वक बताइये। हे सुव्रत ! उस सम्पूर्ण पुराणको भी विस्तारके साथ कहिये ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम्।<br>तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमानाः स्वपूर्वजाः ॥ ७ | व्यासजी बोले— जरत्कारु एक शान्त स्वभाववाले ऋषि थे, उन्होंने गार्हस्थ्य-जीवन अंगीकार नहीं किया था। उन्होंने एक बार वनमें एक गड्ढेके भीतर अपने पूर्वजोंको लटकते हुए देखा ॥ ७ ॥ |
| ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा-<br>न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः।<br>स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता<br>वयं सदाचारयुते सुते वै ॥ ८ | तदनन्तर पूर्वजोंने उनसे कहा—हे पुत्र! तुम विवाह कर लो, जिससे हमारी परम तृप्ति हो सके। तुझ सदाचारी पुत्रके ऐसा करनेपर हम-लोग निश्चितरूपसे दुःखमुक्त होकर स्वर्गकी प्राप्ति कर लेंगे ॥ ८ ॥ |
| स तानुवाचाथ लभे समाना-<br>मयाचितां चातिवशानुगां च।<br>तदा गृहारम्भमहं करोमि<br>ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै ॥ ९ | तब उन जरत्कारुने उनसे कहा—हे मेरे पूर्वजो ! जब मुझे अपने समान नामवाली तथा अत्यन्त वशवर्तिनी कन्या बिना माँगे ही मिलेगी तभी मैं विवाह करके गृहस्थी बसाऊँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ९ ॥ |
| इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः।<br>तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति ॥ १० | उनसे ऐसा कहकर ब्राह्मण जरत्कारु तीर्थाटनके लिये चल पड़े। उसी समय सर्पोंको उनकी माताने शाप दे दिया कि वे अग्निमें गिर जायँ ॥ १० ॥ |
| कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा।<br>दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम् ॥ ११ | कश्यपऋषिकी कद्रू और विनता नामक दो पत्नियाँ थीं। सूर्यके रथमें जुते हुए घोड़ेको देखकर वे आपसमें वार्तालाप करने लगीं ॥ ११ ॥ |
| तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत्।<br>किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम् ॥ १२ | उस घोड़ेको देखकर कद्रूने विनतासे यह कहा—हे कल्याणि ! यह घोड़ा किस रंगका है ? यह मुझे शीघ्र ही सही-सही बताओ ॥ १२ ॥ |
| विनतोवाच<br>श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे।<br>ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे ॥ १३ | विनता बोली— यह अश्वराज श्वेत रंगका है। हे शुभे ! तुम इसे किस रंगका मानती हो ? तुम भी इसका रंग बता दो। तब हम दोनों आपसमें इसपर शर्त लगायें ॥ १३ ॥ |
| कद्रुरुवाच<br>कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते।<br>एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि ॥ १४ | कद्रू बोली— हे शुभ मुसकानवाली ! मैं तो इस घोड़ेको कृष्णवर्णका समझती हूँ। हे भामिनि ! आओ, मेरे साथ शर्त लगाओ कि जो हारेगी, वह दूसरेकी दासी होना स्वीकार करेगी ॥ १४ ॥ |
| २३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ ] |
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| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**कद्रूने अपने सभी आज्ञाकारी सर्पपुत्रोंसे कहा कि तुम सभी लिपटकर उस घोड़ेके शरीरमें जितने बाल हैं, उन्हें काला कर दो॥ १५॥ |
| कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान्।<br>बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतोऽश्वशरीरके॥ १५ | |
| नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह।<br>जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम्॥ १६ | उनमेंसे कुछ सर्पोंने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे। उन सर्पोंको कद्रूने शाप दे दिया कि तुम लोग जनमेजयके यज्ञमें हवनकी अग्निमें गिर पड़ोगे॥ १६॥ |
| अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः।<br>वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया॥ १७ | अन्य सर्पोंने माताको प्रसन्न करनेकी कामनासे उस घोड़ेकी पूँछमें लिपटकर अपने विभिन्न रंगोंसे घोड़ेको चितकबरा कर दिया॥ १७॥ |
| भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम्।<br>कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता॥ १८ | तदनन्तर दोनों बहिनोंने साथ-साथ जाकर घोड़ेको देखा। उस घोड़ेको चितकबरा देखकर विनता बहुत दुःखी हुई॥ १८॥ |
| तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः।<br>स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः॥ १९ | उसी समय सर्पोंका आहार करनेवाले महाबली विनतापुत्र गरुडजी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी माताको दुःखित देखकर उनसे पूछा—॥ १९॥ |
| मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे।<br>जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ॥ २०<br><br>दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने।<br>किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता॥ २१<br><br>शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम्। | हे माता! आप बहुत उदास क्यों हैं? आप मुझे रोती हुई प्रतीत हो रही हैं। हे सुनयने! मेरे एवं सूर्यसारथि अरुणसदृश पुत्रोंके जीवित रहते यदि आप दुःखी हैं, तब हमारे जीवनको धिक्कार है! यदि माता ही परम दुःखी हों तो पुत्रके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ? हे माता! आप मुझे अपने दुःखका कारण बताइये, मैं आपको दुःखसे मुक्त करूँगा॥ २०-२१ १/२॥ |
| विनतोवाच<br>सपल्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता॥ २२<br><br>वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत। | **विनता बोली—**हे पुत्र! मैं अपनी सौतकी दासी हो गयी हूँ। अब व्यर्थमें मारी गयी मैं क्या कहूँ? वह मुझसे अब कह रही है कि मैं उसे अपने कन्धेपर ढोऊँ। हे पुत्र! मैं इसीसे दुःखी हूँ॥ २२ १/२॥ |
| गरुड उवाच<br>वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका॥ २३<br><br>मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम्। | **गरुडजी बोले—**वे जहाँ भी जानेकी कामना करेंगी, मैं उन्हें ढोकर वहाँ ले जाऊँगा। हे कल्याणि! आप शोक न करें, मैं आपको निश्चिन्त कर देता हूँ॥ २३ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा॥ २४ | **व्यासजी बोले—**गरुडद्वारा ऐसा कहे जानेपर विनता उसी समय कद्रूके पास चली गयी। महाबली गरुड भी अपनी माता विनताको दास्य- |