देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| सृजसि पासि जगजगदम्बिके<br>स्वकलया कियदिच्छसि नाशितुम्।<br>रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा<br>तव गतिं न हि विद्म वयं शिवे॥ १२ | हे जगदम्बिके! आप अपनी कलासे जगत्की रचना तथा पालन करती हैं और जब चाहती हैं तब उसका संहार कर देती हैं। आप सदा अपने पति परमपुरुषको रमण कराती रहती हैं। हे शिवे! आपकी इस लीलाको हम नहीं जान सकते॥ १२॥ |
| जननि देहि पदाम्बुजसेवनं<br>युवतिभावगतानपि नः सदा।<br>पुरुषतामधिगम्य पदाम्बुजा-<br>द्विरहिताः क्व लभेम सुखं स्फुटम्॥ १३ | हे जननि! नारीभावको प्राप्त हमलोगोंको सदा अपने चरणकमलोंकी सेवा करनेका अवसर दें; क्योंकि कालान्तरमें पुनः पुंस्त्व प्राप्त होनेपर आपके चरणकमलोंसे पृथक् रहकर हमलोगोंको वह प्रत्यक्ष सुख कहाँ प्राप्त होगा!॥ १३॥ |
| न रुचिरस्ति ममाम्ब पदाम्बुजं<br>तव विहाय शिवे भुवनेष्वलम्।<br>निवसितुं नरदेहमवाप्य च<br>त्रिभुवनस्य पतित्वमवाप्य वै॥ १४ | हे अम्ब! हे शिवे! आपके चरणकमलोंको त्यागकर यह नरदेह प्राप्त करके तीनों लोकोंका स्वामित्व प्राप्त करके भी समस्त लोकोंमें कहीं भी रहनेकी मेरी रुचि नहीं है—चाहे मुझे त्रिभुवनका स्वामित्व ही क्यों न मिल जाय॥ १४॥ |
| सुदति नास्ति मनागपि मे रति-<br>र्युवतिभावमवाप्य तवान्तिके।<br>पुरुषता क्व सुखाय भवत्यलं<br>तव पदं न यदीक्षणगोचरम्॥ १५ | हे सुदति! आपके सांनिध्यमें स्त्रीभावको प्राप्त कर लेनेपर अब पुरुषभावमें मेरी थोड़ी भी रुचि नहीं है। जिसे पाकर आपके चरणारविन्दके दर्शनका सौभाग्य न मिले, वह पुरुषता कैसे सुख प्रदान कर सकती है?॥ १५॥ |
| त्रिभुवनेषु भवत्वियमम्बिके<br>मम सदैव हि कीर्तिरनाविला।<br>युवतिभावमवाप्य पदाम्बुजं<br>परिचितं तव संसृतिनाशनम्॥ १६ | हे अम्बिके! स्त्रीका रूप पाकर मैं भवबन्धनसे मुक्त करनेवाले आपके चरणकमलोंसे परिचित हो गया हूँ। आपकी कृपासे तीनों लोकोंमें मेरा सुयश स्थिर रहे॥ १६॥ |
| भुवि विहाय तवान्तिकसेवनं<br>क इह वाञ्छति राज्यमकण्टकम्।<br>त्रुटिरसौ किल याति युगात्मतां<br>न निकटं यदि तेऽङ्घ्रिसरोरुहम्॥ १७ | इस संसारमें ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके सांनिध्यका सेवन छोड़कर निष्कण्टक राज्य करना चाहेगा? क्योंकि जिसे आपके चरणकमलका सांनिध्य प्राप्त नहीं होता, उसके लिये क्षणांश भी युगके समान प्रतीत होता है॥ १७॥ |
| तपसि ये निरता मुनयोऽमला-<br>स्तव विहाय पदाम्बुजपूजनम्।<br>जननि ते विधिना किल वञ्चिताः<br>परिभवो विभवे परिकल्पितः॥ १८ | हे जननि! जो शुद्ध चित्तवाले मुनि आपके चरण-कमलकी सेवा त्यागकर केवल तपश्चर्यामें लगे रहते हैं, वे निश्चितरूपसे विधाताके द्वारा ठगे गये हैं और अपनी हानिको ही लाभ समझते हैं॥ १८॥ |
| न तपसा न दमेन समाधिना<br>न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा।<br>तव पदाब्जपरागनिषेवणा-<br>द्भवति मुक्तिरजे भवसागरात्॥ १९ | हे अजे! आपके पदारविन्दके परागकी सेवासे जैसी मुक्ति इस संसार-सागरसे प्राप्त होती है, वैसी मुक्ति तपस्या, इन्द्रियदमन, समाधि तथा विभिन्न वेदविहित यज्ञोंसे भी नहीं होती॥ १९॥ |
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६३ |
| :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुरु दयां दयसे यदि देवि मां<br>कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम्।<br>समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं<br>सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम् ॥ २० | हे देवि! यदि आप मेरे प्रति दयालु हैं तो मुझपर दया कीजिये और अपना निर्मल, अद्भुत, सर्वश्रेष्ठ एवं विशद नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) मुझे प्रदान कीजिये, जिससे उसका निरन्तर जप करके मैं सर्वदाके लिये सुखी हो जाऊँ॥ २०॥ |
| प्रथमजन्मनि चाधिगतो मया<br>तदधुना न विभाति नवाक्षरः।<br>कथय मां मनुमद्य भवार्णवा-<br>ज्जननि तारय तारय तारके ॥ २१ | पूर्वजन्ममें मैंने नवार्ण मन्त्रकी दीक्षा पायी थी; परंतु वह मुझे अब स्मरण नहीं रह गया है। इसलिये हे तारके! हे जननि! आज पुनः वह मन्त्र मुझे प्रदान कीजिये और भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये॥ २१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा।<br>उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्॥ २२<br>तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह।<br>प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] अद्भुत तेजस्वी शिवजीके ऐसा कहनेपर जगदम्बाने स्पष्ट शब्दोंमें नवाक्षर मन्त्रका उच्चारण किया। उस मन्त्रको ग्रहण करके शिवजी बहुत प्रसन्न हो गये और भगवतीके चरणोंमें प्रणाम करके वहींपर स्थित हो गये॥ २२-२३॥ |
| जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा।<br>बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा ॥ २४ | उस समय सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ, मुक्तिप्रदायक तथा शुभ उच्चारणसे सम्पन्न उस बीजयुक्त नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए शंकरजी वहाँ विराजमान रहे॥ २४॥ |
| तं तथावस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम्।<br>अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके॥ २५ | संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीको इस प्रकार बैठा देखकर मैं उन महामायाके चरणोंके समीप बैठ गया और उनसे कहने लगा॥ २५॥ |
| न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो<br>यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम्।<br>यदा स्वाहाभूता सकलमखहोमेषु विहिता<br>तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने ॥ २६ | हे जननि! वेद सभी लोगोंको धारण करनेवाली तथा सनातनी आप भगवतीकी कल्पना करनेमें अकुशल हैं—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि साधारण कार्योंमें उन्होंने आप भगवतीकी चर्चा नहीं की है। यदि वे आपको न जानते तो सभी यज्ञों तथा हवन-कार्योंमें आपको ही स्वाहादेवीके रूपमें प्रतिष्ठित कैसे करते? इसलिये आप तीनों लोकोंमें सर्वज्ञाके रूपमें विख्यात हुईं॥ २६॥ |
| कर्ताहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं<br>कोऽन्योऽस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान्।<br>धन्योऽस्म्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्मास्मि लोकातिगो<br>मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति ॥ २७ | मैं स्रष्टा हूँ, मैं अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका निर्माण करता हूँ, इस चराचर त्रिभुवनमें मुझसे बढ़कर समर्थ दूसरा पुरुष कौन है, मैं निस्संदेह धन्य हूँ, मैं लोकोत्तर ब्रह्मा हूँ—इस मिथ्या अहंकारके कारण मैं सर्वदा इस विस्तृत संसारसागरमें निमग्न रहता हूँ; तथापि आज आपके चरण-कमलोंकी पराग-प्राप्तिके |