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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१
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अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१
| व्यास उवाच | |
|---|---|
| संशयोऽयं महान्साधो श्रुत्वा ते वचनं किल।<br>कथं नारीत्वमापन्नस्त्वं मुने ज्ञानवान्भृशम्॥ ५३ | व्यासजी बोले— हे साधो! हे मुने! आपकी बात सुनकर मुझे यह महान् सन्देह हो रहा है कि आप महान् ज्ञानी होते हुए भी नारी-रूपमें कैसे परिणत हो गये? आप पुनः पुरुष किस प्रकार हुए? यह सब पूर्णरूपसे बताइये। आपने पुत्र कैसे उत्पन्न किये तथा किस राजाके घरमें आप भलीभाँति रहे?॥ ५३-५४॥ |
| कथं च पुरुषो जातो ब्रूहि सर्वमशेषतः।<br>कथं पुत्रास्त्वया जाताः कस्य राज्ञो गृहेऽज्जसा॥ ५४ | |
| एतदाख्याहि चरितं मायाया महदद्भुतम्।<br>मोहितं च यया सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्॥ ५५ | आप उन महामायाके अत्यन्त अद्भुत चरित्रका वर्णन कीजिये, जिन्होंने स्थावर-जंगमात्मक समग्र जगत्को विमोहित कर रखा है॥ ५५॥ |
| न तृप्तिमधिगच्छामि शृण्वंस्तव कथामृतम्।<br>सर्वग्रन्थार्थतत्त्वं च सर्वसंशयनाशनम्॥ ५६ | सभी ग्रन्थोंके अर्थतत्त्वोंसे युक्त तथा समस्त संशयोंका नाश करनेवाले आपके कथामृतका श्रवण करता हुआ मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ ५६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य मायादमयन्त्या सह विवाहवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय-निवेदन करना
| नारद उवाच | |
|---|---|
| निशामय मुनिश्रेष्ठ गदतो मम सत्कथाम्।<br>मायाबलं सुदुर्जेयं मुनिभिर्योगवित्तमैः॥ १ | नारदजी बोले— हे मुनिवर! अब आप मेरे द्वारा कही जा रही सत्कथाका श्रवण कीजिये। श्रेष्ठ योगवेत्ता मुनियोंके लिये भी मायाका बल अत्यन्त दुर्जेय है॥ १॥ |
| मायया मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमजया दुर्विभाव्यया॥ २ | उस अजेय तथा दुश्चिन्त्य मायाने ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत्को मोहित कर रखा है॥ २॥ |
| कदाचित्सत्यलोकाद्वै श्वेतद्वीपे मनोहरे।<br>गतोऽहं दर्शनाकाङ्क्षी हरेरद्भुतकर्मणः॥ ३ | किसी समय मैं स्वर तथा तानसे विभूषित महती वीणा बजाता हुआ एवं सप्त स्वरोंसे युक्त गायत्र-सामका गान करता हुआ अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके दर्शनकी अभिलाषासे सत्यलोकसे मनोहर श्वेतद्वीपमें गया था॥ ३-४॥ |
| वादयन्महतीं वीणां स्वरतानविभूषिताम्।<br>गायत्रं गायमानस्तु साम सप्तस्वरान्वितम्॥ ४ | |
| दृष्टो मया देवदेवश्चक्रपाणिर्गदाधरः।<br>कौस्तुभोद्भासितोरस्को मेघश्यामश्चतुर्भुजः॥ ५ | वहाँ मैंने देवाधिदेव विष्णुभगवान्को देखा। वे हाथमें चक्र तथा गदा धारण किये हुए थे, उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रही थी, वे मेघ-सदृश श्याम वर्णवाले थे, उनकी चार भुजाएँ थीं। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे, मुकुट तथा बाजूबन्दसे सुशोभित थे तथा वे विलासमयी लक्ष्मीके साथ प्रमुदित होकर क्रीडा कर रहे थे॥ ५-६॥ |
| पीताम्बरपरीधानो मुकुटाङ्गदराजितः।<br>लक्ष्म्या सह विलासिन्या क्रीडमानो मुदा युतः॥ ६ |
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८६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८
| वीक्ष्य मां कमला देवी गतान्तर्धानमन्तिकात्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वभूषणभूषिता॥ ७<br><br>नारीणां प्रवरा कान्ता रूपयौवनगर्विता।<br>सुप्रिया वासुदेवस्य वरचामीकरप्रभा॥ ८ | सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, कान्तियुक्त, अपने रूप-यौवनपर गर्व करनेवाली, नारियोंमें सर्वश्रेष्ठ, भगवान् विष्णुको अतिप्रिय तथा स्वर्णके समान आभावाली भगवती लक्ष्मी मुझे देखकर उनके पाससे अन्तःपुरमें चली गयीं॥ ७-८॥ |
| अन्तर्गृहं गतां दृष्ट्वा सिन्धुजां व्यञ्जनान्विताम्।<br>मया पृष्टो देवदेवो वनमाली जगत्प्रभुः॥ ९<br><br>भगवन्देवदेवेश पद्मनाभ सुरारिहन्।<br>कथं च मा गता दृष्ट्वा मामागच्छन्तमन्तिकात्॥ १०<br><br>नाहं विटो न वा धूर्तः तापसोऽहं जगद्गुरो।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितमायो जनार्दन॥ ११ | व्यंजित अंगोंवाली लक्ष्मीजीको भवनमें गयी देखकर मैंने वनमाला धारण करनेवाले देवाधिदेव जगन्नाथ विष्णुसे पूछा—हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे पद्मनाभ! हे असुरविनाशन! मुझे आते हुए देखकर माता लक्ष्मीजी आपके पाससे क्यों चली गयीं? हे जगद्गुरो! मैं न तो कोई नीच हूँ और न धूर्त! हे जनार्दन! मैं इन्द्रियों, क्रोध तथा मायाको जीत लेनेवाला एक तपस्वी हूँ॥ ९-११॥ |
| नारद उवाच<br>निशम्य वचनं किञ्चिद् गर्वयुक्तं जनार्दनः।<br>उवाच मां स्मितं कृत्वा वीणावण्मधुरां गिरम्॥ १२ | **नारदजी बोले—**मेरा कुछ-कुछ अभिमानपूर्ण वचन सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराकर वीणाके समान मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे॥ १२॥ |
| विष्णुरुवाच<br>नारदैवंविधा नीतिर्न स्थातव्यं कदाचन।<br>पतिं विनान्यसान्निध्ये कस्यचिद्योषया क्वचित्॥ १३ | **भगवान् विष्णु बोले—**हे नारद! ऐसी नीति है कि पतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी पुरुषके सांनिध्यमें स्त्रीको कभी नहीं रहना चाहिये॥ १३॥ |
| माया सुदुर्जया विद्वन् योगिभिर्जितमारुतैः।<br>सांख्यविद्भिर्निराहारैस्तापसैश्च जितेन्द्रियैः॥ १४<br><br>देवैश्च मुनिशार्दूल यत्त्वयोक्तं वचोऽधुना।<br>जितमायोऽस्मि गीतज्ञ नैवं वाच्यं कदाचन॥ १५ | हे विद्वन्! वायु (श्वास)-को जीत लेनेवाले योगियों, सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओं, निराहार रहनेवाले तपस्वियों तथा जितेन्द्रिय पुरुषों एवं देवताओंके लिये भी माया अत्यन्त दुर्जय है। हे मुनिवर! अभी आपने जो कहा है कि ‘मैंने मायापर विजय प्राप्त कर ली है’ तो हे गीतज्ञ! आपको ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिये॥ १४-१५॥ |
| नाहं शिवो न वा ब्रह्मा जेतुं तां प्रभवोऽप्यजाम्।<br>मुनयः सनकाद्याश्च कस्त्वं केऽन्ये क्षमा जये॥ १६ | जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा मायापर विजय नहीं प्राप्त कर सके तब आप तथा अन्य कौन हैं, जो उसे जीतनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ १६॥ |
| देवदेहं नृदेहं वा तिर्यग्देहमथापि वा।<br>बिभृयाद्यः शरीरं च स कथं तां जयेदजाम्॥ १७ | देवता, मानव तथा पशु-पक्षी अथवा जो कोई शरीर धारण करनेवाला प्राणी हो, वह उस अजन्मा मायाको कैसे जीत सकता है?॥ १७॥ |
| त्रियुतस्तां कथं मायां जेतुं शक्तः पुमान्भवेत्।<br>वेदविद्योगविद्वापि सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः॥ १८ | वेदका ज्ञाता, योगी, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय एवं सत्त्व-रज-तमसे युक्त कोई भी पुरुष मायाको जीतनेमें कैसे समर्थ हो सकता है?॥ १८॥ |
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| अ० २८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कालोऽपि तस्या रूपं हि रूपहीनः स्वरूपकृत्।<br>तद्वशे वर्तते देही विद्वान्मूर्खोऽथ मध्यमः॥ १९ | काल भी उसी मायाका ही रूप है। वह रूपहीन होते हुए भी स्वरूप धारण कर लेता है। विद्वान्, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणीका कोई भी व्यक्ति हो, वह उसके वशमें रहता है॥ १९॥ |
| कालः करोति धर्मज्ञं कदाचिद्विकलं पुनः।<br>स्वभावात्कर्मतो वापि दुर्ज्ञेयं तस्य चेष्टितम्॥ २० | कभी-कभी काल धर्मज्ञ पुरुषको भी उद्विग्न कर देता है। स्वभाव अथवा कर्मसे उस कालकी चेष्टा नहीं जानी जा सकती॥ २०॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा विरतो विष्णुरहं विस्मयमानसः।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्॥ २१<br><br>रमापते कथंरूपा माया सा कीदृशी पुनः।<br>कियद्बला क्वसंस्थाना कस्याधारा वदस्व मे॥ २२<br><br>द्रष्टुकामोऽस्मि तां मायां दर्शयाशु महीधर।<br>ज्ञातुमिच्छामि तां सम्यक्प्रसादं कुरु मापते॥ २३ | **नारदजी बोले—**ऐसा कहकर विष्णुके चुप हो जानेपर मेरा मन सन्देहसे भर गया और मैंने उन जगन्नाथ सनातन वासुदेवसे पूछा—हे रमाकान्त! आप मुझे यह बतायें कि उस मायाका रूप क्या है, उसकी आकृति कैसी है, उसमें कितनी शक्ति है, वह कहाँ रहती है तथा उसका आधार क्या है? हे महीधर! मैं उस मायाको देखना चाहता हूँ, अतः मुझे उसका शीघ्र दर्शन कराइये। हे लक्ष्मीकान्त! मैं उसके विषयमें सम्यक् जानना चाहता हूँ; मुझपर कृपा कीजिये॥ २१—२३॥ |
| विष्णुरुवाच<br>त्रिगुणा साखिलाधारा सर्वज्ञा सर्वसम्मता।<br>अजेयानेकरूपा च सर्वं व्याप्य स्थिता जगत्॥ २४ | **भगवान् विष्णु बोले—**अखिल जगत्को धारण करनेवाली वह माया त्रिगुणात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वसम्मता, अजेया, अनेकरूपा तथा सम्पूर्ण संसारको अपनेमें व्याप्त करके स्थित है॥ २४॥ |
| दिदृक्षा यदि ते चित्ते नारदारोहणं कुरु।<br>गरुडे मत्समेतोऽद्य गच्छावोऽन्यत्र साम्प्रतम्॥ २५ | हे नारद! यदि तुम्हारे मनमें उस मायाको देखनेकी इच्छा है तो मेरे साथ अभी गरुडपर आरूढ़ हो जाओ; हम दोनों अन्य लोकमें इसी समय चलते हैं॥ २५॥ |
| दर्शयिष्यामि ते मायां दुर्जयामजितात्मभिः।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मपुत्र त्वं विषादे मा मनः कृथाः॥ २६ | हे ब्रह्मपुत्र! वहाँ मैं तुम्हें अजितात्माओंके लिये अजेय मायाका दर्शन कराऊँगा, किंतु उसे देखकर तुम अपने मनको विषादग्रस्त मत होने देना॥ २६॥ |
| इत्युक्त्वा देवदेवो मां सस्मार विनतासुतम्।<br>स्मृतमात्रस्तु गरुडस्तदागाद्धरिसन्निधौ॥ २७ | मुझसे ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने विनतापुत्र गरुडका स्मरण किया। स्मरण करते ही गरुड भगवान् विष्णुके समक्ष उपस्थित हो गये॥ २७॥ |
| आगतं गरुडं वीक्ष्य आरुरोह जनार्दनः।<br>समारोप्य च मां पृष्ठे गमनाय कृतादरः॥ २८ | गरुडको आया हुआ देखकर भगवान् विष्णु मुझे अत्यन्त आदरपूर्वक पीछे बैठाकर प्रस्थान करनेके लिये उसपर आरूढ़ हो गये॥ २८॥ |
| चलितो विनतापुत्रो वैकुण्ठाद्वायुवेगवान्।<br>प्रेरितो यत्र कृष्णेन गन्तुकामेन काननम्॥ २९ | जिस वन-प्रदेशमें भगवान् विष्णु जाना चाहते थे, वहाँके लिये प्रेरित किये गये वायुसदृश वेगवान् विनतापुत्र गरुडने वैकुण्ठसे प्रस्थान किया॥ २९॥ |
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| ८६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महावनानि दिव्यानि सरांसि सरितस्तथा।<br>पुरग्रामाकरादींश्च खेटखर्वटगोव्रजान्॥ ३०<br>मुनीनामाश्रमान् रम्यान् वापीश्च सुमनोहराः।<br>पल्वलानि विशालानि ह्रदान् पङ्कजभूषितान्॥ ३१<br>मृगाणां च वराहाणां वृन्दान्यप्यवलोक्य च।<br>गतावावां कान्यकुब्जसमीपं गरुडासनौ॥ ३२ | गरुडपर आसीन हम दोनों बहुत-से विशाल वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम-नगरों, पर्वतके आस-पासकी बस्तियों, गायोंके गोष्ठों, मुनियोंके मनोहर आश्रमों, सुन्दर बावलियों, छोटे-बड़े तालाबों, कमलोंसे सुशोभित विस्तृत तथा गहरे ह्रदों एवं मृगों तथा वराहोंके बहुतसे समूहोंको देखते हुए कान्यकुब्जनगरके पास पहुँच गये॥ ३०—३२॥ |
| तत्र रम्यं सरो दिव्यं दृष्टं पङ्कजमण्डितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्॥ ३३<br>नानावर्णैः प्रफुल्लैश्च पङ्कजैरुपराजितम्।<br>शुचि मिष्टजलं भृङ्गयूथनादविराजितम्॥ ३४ | वहाँ कमलोंसे मण्डित, हंस तथा सारसोंसे युक्त, चक्रवाकोंसे सुशोभित, अनेक वर्णोंवाले खिले हुए कमलोंसे शोभायमान, झुण्ड-के-झुण्ड भौरोंकी ध्वनिसे गुंजित एवं पवित्र तथा मधुर जलवाला एक दिव्य तथा रमणीय सरोवर दिखायी पड़ा॥ ३३-३४॥ |
| मामाह भगवान् वीक्ष्य तडागं परमाद्भुतम्।<br>स्पर्धकं चोदधेः क्षीरं मिष्टं वारि विशेषतः॥ ३५ | क्षीरसागरके मधुर दुग्धकी समानता करनेवाले विशिष्ट जलसे युक्त उस परम अद्भुत सरोवरको देखकर भगवान् विष्णु मुझसे कहने लगे॥ ३५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>पश्य नारद गम्भीरं सरः सारसनादितम्।<br>सर्वत्र पङ्कजैश्छन्नं स्वच्छनीरप्रपूरितम्॥ ३६ | श्रीभगवान् बोले— हे नारद! सर्वत्र कमलोंसे आच्छादित, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा सारसकी ध्वनिसे निनादित हो रहे इस अगाध सरोवरको देखो॥ ३६॥ |
| अत्र स्नात्वा गमिष्यावः कान्यकुब्जं पुरोत्तमम्।<br>इत्युक्त्वा गरुडादाशु मामुत्तार्य व्यतारयत्॥ ३७ | इसीमें स्नान करके हमलोग श्रेष्ठ नगर कान्यकुब्जमें चलेंगे—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु मुझे शीघ्र ही गरुडसे उतारकर आगे ले गये॥ ३७॥ |
| विहस्य भगवांस्तत्र जग्राह मम तर्जनीम्।<br>स्तुवन्सरोवरं भूयस्तीरे मामनयत्प्रभुः॥ ३८ | उन्होंने हँसते हुए मेरी तर्जनी अँगुली पकड़ी और बार-बार उस सरोवरकी प्रशंसा करते हुए वे मुझे तीरपर ले गये॥ ३८॥ |
| विश्रम्य तटभागे तु स्निग्धच्छाये मनोहरे।<br>मामुवाच मुने स्नानं कुरु त्वं विमले जले॥ ३९<br>पश्चादहं करिष्यामि तडागेऽस्मिन्सुपावने।<br>साधूनामिव चेतांसि जलानि निर्मलानि च॥ ४०<br>सुरभीणि परागैस्तु पङ्कजानां विशेषतः। | वृक्षोंकी घनी छायावाले मनोहर तटभागपर कुछ समय विश्राम करनेके बाद भगवान् विष्णुने मुझसे कहा—हे मुने! आप इस स्वच्छ जलमें पहले स्नान कर लें, तत्पश्चात् मैं इस परम पवित्र सरोवरमें स्नान करूँगा। इस सरोवरका जल साधुजनोंके चित्तकी भाँति निर्मल तथा कमलोंके परागसे विशेषरूपसे सुगन्धित है॥ ३९-४० १/२॥ |
| इत्युक्तोऽहं भगवता मुक्त्वा वीणां मृगाजिनम्॥ ४१ | भगवान्के ऐसा कहनेपर मैंने स्नान करनेका मन बना लिया और अपनी वीणा तथा मृगचर्म वहीं रखकर मैं प्रेमपूर्वक तटपर चला गया॥ ४१ १/२॥ |
| स्नानाय कृतधीस्तीरे गतः प्रेमसमन्वितः।<br>पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च शिखां बद्ध्वा कुशग्रहम्॥ ४२<br>कृत्वाचम्य शुचिस्तोये स्नातवानस्मि तज्जले। | हाथ-पैर धोकर और शिखा बाँधकर मैंने हाथमें कुश ले लिया। पुनः पवित्र जलसे आचमन करके मैं उस जलमें स्नान करने लगा। जब मैं उस मनोहर |