सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९

कबन्धस्तस्य दैत्यस्य भ्रमन्वै पतितः क्षितौ।<br>जयशब्दश्च देवानां बभूव सुखवर्धनः॥ ६६धड़ घूमता हुआ भूमिपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंके [मुखसे] सुखकी वृद्धि करनेवाला विजयघोष होने लगा॥ ६४–६६॥
सिंहस्त्वतिबलस्तत्र पलायनपरानथ।<br>दानवान्भक्षयामास क्षुधार्त इव सङ्गरे॥ ६७अब भगवतीका महाबली सिंह मानो भूखसे व्याकुल होकर रणभूमिमें भागते हुए दानवोंको खाने लगा॥ ६७॥
मृते च महिषे क्रूरे दानवा भयपीडिताः।<br>मृतशेषाश्च ये केचित्पातालं ते ययुर्नृप॥ ६८हे नृप! क्रूर महिषासुरके मर जानेपर जो कोई दानव मरनेसे शेष बच गये थे, वे भयसे सन्त्रस्त होकर पाताल चले गये॥ ६८॥
आनन्दं परमं जग्मुर्देवास्तस्मिन्निपातिते।<br>मुनयो मानवाश्चैव ये चान्ये साधवः क्षितौ॥ ६९उसके मर जानेपर भूमण्डलपर जो भी देवता, मुनिगण, मनुष्य और साधुजन थे, वे परम आनन्दित हो गये॥ ६९॥
चण्डिकापि रणं त्यक्त्वा शुभे देशेऽथ संस्थिता।<br>देवास्तत्राययुः शीघ्रं स्तोतुकामाः सुखप्रदाम्॥ ७०भगवती चण्डिका भी रणभूमि छोड़कर एक पवित्र स्थानमें विराजमान हो गयीं। देवता भी उन सुख प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्तुति करनेकी इच्छासे शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ७०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
महिषासुरवधो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति

व्यास उवाच<br>अथ प्रमुदिताः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>महिषं निहतं दृष्ट्वा तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्॥ १व्यासजी बोले—महिषासुरका संहार देखकर इन्द्र आदि प्रधान देवता परम प्रसन्न हुए और वे जगदम्बाकी स्तुति करने लगे॥ १॥
देवा ऊचुः<br>ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरिदं महेशः<br>शक्त्या तवैव हरते ननु चान्तकाले।<br>ईशा न तेऽपि च भवन्ति तया विहीना-<br>स्तस्मात्त्वमेव जगतः स्थितिनाशकर्त्री॥ २देवता बोले—हे देवि! आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा इस जगत्का सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु पालन करते हैं और शिवजी प्रलयकालमें संहार करते हैं। आपकी शक्तिसे रहित हो जानेपर वे कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। अतः जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेवाली आप ही हैं॥ २॥
कीर्तिर्मतिः स्मृतिगती करुणा दया त्वं<br>श्रद्धा धृतिश्च वसुधा कमलाजपा च।<br>पुष्टिः कलाथ विजया गिरिजा जया त्वं<br>तुष्टिः प्रमा त्वमसि बुद्धिरुमा रमा च॥ ३इस संसारमें कीर्ति, मति, स्मृति, गति, करुणा, दया, श्रद्धा, धृति, वसुधा, कमला, अजपा, पुष्टि, कला, विजया, गिरिजा, जया, तुष्टि, प्रमा, बुद्धि, उमा, रमा,
६३०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विद्या क्षमा जगति कान्तरिपीह मेधा<br>सर्वं त्वमेव विदिता भुवनत्रयेऽस्मिन्।<br>आभिर्विना तव तु शक्तिभिराशु कर्तुं<br>को वा क्षमः सकललोकनिवासभूमे॥ ४विद्या, क्षमा, कान्ति और मेधा—ये सब शक्तियाँ आप ही हैं। इस त्रिलोकीमें आप विख्यात हैं। सम्पूर्ण जगत्‌को आश्रय देनेवाली हे देवि! आपकी इन शक्तियोंके बिना कौन व्यक्ति कुछ भी स्वयं कर सकनेमें समर्थ है?॥ ३-४॥
त्वं धारणा ननु न चेदसि कूर्मनागौ<br>धर्तुं क्षमौ कथमिलामपि तौ भवेताम्।<br>पृथ्वी न चेत्त्वमसि वा गगने कथं स्था-<br>स्यत्येतदम्ब निखिलं बहुभारयुक्तम्॥ ५हे अम्ब! धारणा शक्ति भी निश्चितरूपसे आप ही हैं, अन्यथा कच्छप और शेषनाग इस पृथ्वीको धारण कर सकनेमें कैसे समर्थ हो पाते? पृथ्वी-शक्ति भी आप ही हैं। यदि आप इस रूपमें न होतीं तो प्रचुर भारसे सम्पन्न यह सम्पूर्ण जगत् आकाशमें कैसे ठहर सकता था॥ ५॥
ये वा स्तुवन्ति मनुजा अमरान्विमूढा<br>मायागुणैस्तव चतुर्मुखविष्णुरुद्रान्।<br>शुभ्रांशुवह्लियमवायुगणेशमुख्यान्<br>किं त्वामृते जननि ते प्रभवन्ति कार्ये॥ ६हे जननि! जो मनुष्य मायाके गुणोंसे प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चन्द्रमा, अग्नि, यम, वायु, गणेश आदि प्रमुख देवताओंकी स्तुति करते हैं, वे अज्ञानी ही हैं; क्योंकि क्या वे देवता भी आपकी कृपाशक्तिके बिना उन मनुष्योंको कार्य-फल प्रदान करनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ६॥
ये जुह्वति प्रविततेऽल्पधियोऽम्ब यज्ञे<br>वह्लौ सुरान्समधिकृत्य हविः समृद्धम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि ते कथमापुरुद्धा<br>त्वामेव किं न हि यजन्ति ततो हि मूढाः॥ ७हे अम्ब! जो लोग सुविस्तृत यज्ञमें देवताओंको अधिकृत करके अग्निमें पुष्कल आहुति देते हैं, वे मन्दमति हैं; क्योंकि यदि स्वाहाके रूपमें आप न होतीं, तो वे देवता हविर्द्रव्यको कैसे पाते? तब फिर वे मूढ़ आपका ही यजन क्यों नहीं करते?॥ ७॥
भोगप्रदासि भवतीह चराचराणां<br>स्वांशैर्ददासि खलु जीवनमेव नित्यम्।<br>स्वीयान्सुराञ्जननि पोषयसीह यद्व-<br>त्तद्वत्परानपि च पालयसीति हेतोः॥ ८आप जगत्के चराचर प्राणियोंको भोग प्रदान करती हैं और अपने अंशोंसे उन्हें नित्य जीवन देती हैं। हे जननि! जिस प्रकार आप अपने प्रिय देवताओंका पोषण करती हैं, उसी प्रकार अपने शत्रुओंका भी पालन करती हैं॥ ८॥
मातः स्वयं विरचितान्विपिने विनोदा-<br>द्वन्ध्यान्पलाशलहितांश्च कटूंश्च वृक्षान्।<br>नोच्छेदयन्ति पुरुषा निपुणाः कथञ्चि-<br>त्तस्मात्त्वमप्यतितरां परिपासि दैत्यान्॥ ९हे माता! बुद्धिमान् पुरुष विनोदके लिये उद्यानमें लगाये गये वृक्षोंमेंसे कुछ वृक्षोंके फल और पत्तोंसे रहित हो जाने अथवा उन वृक्षोंका रस कडुवा निकल जानेपर भी उन्हें कभी भी नहीं काटते, उसी प्रकार आप भी [अपने ही बनाये हुए] दैत्योंकी भलीभाँति रक्षा करती हैं॥ ९॥
यत्त्वं तु हंसि रणमूर्धिन शरैरराती-<br>न्देवाङ्गनासुरतकेलिमतीन्विदित्वा ।<br>देहान्तरेऽपि करुणारसमाददाना<br>तत्ते चरित्रमिदमीप्सितपूरणाय॥ १०करुणारससे ओत-प्रोत हृदयवाली आप रणभूमिमें बाणोंद्वारा शत्रुओंका जो संहार करती हैं, वह भी उनका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये ही होता है; क्योंकि दूसरे जन्ममें देवांगनाओंके साथ क्रीड़ा-विहार करनेकी इच्छावाला उन्हें जानकर ही आपके द्वारा ऐसा किया जाता है; ऐसा आपका अद्भुत चरित्र है॥ १०॥