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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
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७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम्।<br>वेदशास्त्रार्थविज्ञानात्तद्द्भवेद् बुद्धियोगतः॥ ५१<br>विकल्पास्तत्र बहवो भवन्ति मतिकल्पिताः।<br>( कुतर्ककल्पिताः केचित्सुतर्ककल्पिताः परे।<br>वितर्कैर्विभ्रमोत्पत्तिर्विभ्रमाद् बुद्धिभ्रंशता।<br>बुद्धिभ्रंशाज्ज्ञाननाशः प्राणिनां परिकीर्तितः।)<br>अनुभवाख्यं द्वितीयं तु ज्ञानं तद्दुर्लभं नृप॥ ५२<br>तत्तदा प्राप्यते तस्य वेत्तुः सङ्गो यदा भवेत्।<br>शब्दज्ञानान्न कार्यस्य सिद्धिर्भवति भारत॥ ५३<br>तस्मान्नानुभवज्ञानं सम्भवत्यतिमानुषम्।<br>अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शब्दबोधो हि न क्षमः॥ ५४<br>यथा न नश्यति तमः कृत्यया दीपवार्तया। | ज्ञान भी दो प्रकारका कहा गया है। प्रथम शाब्दिक ज्ञान बताया गया है। वह ज्ञान बुद्धिकी सहायतासे वेद और शास्त्रके अर्थविज्ञानद्वारा प्राप्त हो जाता है। बुद्धिवैभिन्न्यके अनुसार इस ज्ञानके भी बहुत-से भेद हो जाते हैं। (इनमेंसे कुछ ज्ञान कुतर्कसे और कुछ सुतर्कसे कल्पित होते हैं। कुतर्कोंसे भ्रान्तिकी उत्पत्ति होती है और विभ्रमसे बुद्धिनाश हो जाता है। बुद्धिनाशसे प्राणियोंका ज्ञान नष्ट हो जाना कहा गया है।) हे राजन्! अनुभव नामक वह दूसरा ज्ञान तो दुर्लभ होता है। वह ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब उसके जाननेवालेका संग हो जाय। हे भारत! शब्दज्ञानसे कार्यकी सिद्धि नहीं होती, इसलिये अनुभवज्ञान अत्यन्त अलौकिक होता है। शब्दज्ञान अन्तःकरणके अन्धकारको दूर करनेमें उसी प्रकार समर्थ नहीं है जैसे दीपकसम्बन्धी वार्ता करनेसे अन्धकार नष्ट नहीं होता॥ ५१–५४ १/२ ॥ |
| तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये॥ ५५<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।<br>शीलं परहितत्वं च कोपाभावः क्षमा धृतिः॥ ५६<br>सन्तोषश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्।<br>विद्यया तपसा वापि योगाभ्यासेन भूपते॥ ५७<br>विना कामादिशत्रूणां नैव नाशः कदाचन।<br>( मनस्तु चञ्चलं राजन्स्वभावादतिदुर्ग्रहम्।<br>तद्वशः सर्वथा प्राणी त्रिविधो भुवनत्रये।)<br>कामक्रोधादयो भावाश्चित्तजाः परिकीर्तिताः॥ ५८<br>ते तदा न भवन्त्येव यदा वै निर्जितं मनः।<br>तस्मात्तु निमिना राजन् क्षमा विहिता मुनौ॥ ५९<br>यथा ययातिना पूर्वं कृता शुक्रे कृतागसि।<br>भृगुपुत्रेण शप्तोऽपि ययातिर्नृपसत्तमः॥ ६०<br>न शशाप मुनिं क्रोधाज्जरां राजा गृहीतवान्। | कर्म वही है, जो बन्धन न करे और विद्या वही है जो मुक्तिके लिये हो। अन्य कर्म तो मात्र परिश्रमके लिये होता है तथा दूसरी विद्या तो मात्र शिल्पसम्बन्धी कौशल है। शील, परोपकार, क्रोधका अभाव, क्षमा, धैर्य और सन्तोष—यह सब विद्याका अत्यन्त उत्तम फल है। हे भूपते! विद्या, तपस्या अथवा योगाभ्यासके बिना काम आदि शत्रुओंका नाश कभी नहीं हो सकता। (हे राजन्! मन चंचल और स्वभावतः अति दुर्ग्रह होता है, तीनों लोकोंमें तीनों प्रकारके प्राणी उसी मनके वशमें रहते हैं) काम-क्रोध आदि भाव चित्तजन्य कहे गये हैं। ये सब उस समय नहीं उत्पन्न होते, जब मनपर विजय पा ली जाती है। हे राजन्! इसीलिये निमिने मुनिको उस प्रकार क्षमा नहीं किया, जिस प्रकार ययातिने अपराध करनेपर भी शुक्राचार्यको क्षमा कर दिया था। पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्यने नृपश्रेष्ठ ययातिको शाप दे दिया था, लेकिन राजाने क्रोधित होकर मुनिको शाप नहीं दिया और स्वयं वृद्धावस्थाको स्वीकार कर लिया था॥ ५५–६० १/२ ॥ |
| कश्चित्सौम्यो भवेत्कश्चित्क्रूरो भवति पार्थिवः॥ ६१<br>स्वभावभेदान्नृपते कस्य दोषोऽत्र कल्प्यते।<br>हैहया भार्गवान्पूर्वं धनलोभात्पुरोहितान्॥ ६२ | हे राजन्! कोई राजा शान्तस्वभाव और कोई क्रूर होता है। स्वभावमें भेद होनेके कारण इसमें किसका दोष कहा जाय? पूर्वकालमें हैहयवंशी क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याजनित पापकी उपेक्षा करके धनके |
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अ० १६ ] षष्ठ स्कन्ध ७९९
| ब्राह्मणामूलतः सर्वांश्चच्छिदुः क्रोधमूर्च्छिताः।<br>पातकं पृष्ठतः कृत्वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम् ॥ ६३ | लोभसे भृगुवंशी ब्राह्मण पुरोहितोंका कोपाविष्ट होकर समूलोच्छेद कर दिया था॥ ६१-६३॥ |
|---|
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीमहिम्नि नानाभाववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार
| जनमेजय उवाच | जनमेजय बोले— |
|---|---|
| कुले कस्य समुत्पन्नाः क्षत्रिया हैहयाश्च ते।<br>ब्रह्महत्यामनादृत्य निजघ्नुर्भार्गवांश्च ये ॥ १ | जिन हैहय क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याकी लेशमात्र भी चिन्ता न करके भृगुवंशी ब्राह्मणोंका वध कर दिया, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए थे? ॥ १॥ |
| वैरस्य कारणं तेषां किं मे ब्रूहि पितामह।<br>निमित्तेन विना क्रोधं कथं कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ २ | हे पितामह ! उनके वैरका क्या कारण था, आप मुझे बतलाइये। श्रेष्ठजन किसी कारणविशेषके बिना क्रोध कैसे कर सकते हैं ? ॥ २ ॥ |
| वैरं पुरोहितैः सार्धं कस्मात्तेषामजायत ।<br>नाल्पहेतोर्हि तद्वैरं क्षत्रियाणां भविष्यति ॥ ३ | अपने ही पुरोहितोंके साथ उनकी शत्रुता किसलिये हो गयी थी ? सम्भवतः उन क्षत्रियोंकी उस शत्रुताके पीछे कोई महान् कारण रहा होगा। अन्यथा पापसे भयभीत रहनेवाले वे पराक्रमी क्षत्रिय निरपराध एवं पूजनीय ब्राह्मणोंकी हत्या क्यों करते ? ॥ ३-४॥ |
| अन्यथा ब्राह्मण्यान्पूज्यान्कथं जघ्नुरनागसः।<br>बाहुजा बलवन्तोऽपि पापभीताः कथं न ते ॥ ४ | |
| स्वल्पेऽपराधे को हन्याद्ब्राह्मणांक्षत्रियर्षभः।<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ कारणं वक्तुमर्हसि ॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कौन श्रेष्ठ क्षत्रिय होगा, जो अल्प अपराधके कारण ब्राह्मणोंका वध करेगा ? मुझे तो इस विषयमें महान् शंका हो रही है, इसका कारण बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| इति पृष्टस्तदा तेन राज्ञा सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमप्रीतः कथां संस्मृत्य चेतसा ॥ ६ | तब राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर सत्यवतीनन्दन व्यासजी परम प्रसन्न हुए और मनमें उस वृत्तान्तका स्मरण करके कहने लगे ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| शृणु पारिक्षिते वार्तां क्षत्रियाणां पुरातनीम् ।<br>आश्चर्यकारिणीं सम्यग्विदितां च पुरा मया ॥ ७ | हे जनमेजय ! मेरे द्वारा पूर्वकालमें सम्यक् प्रकारसे ज्ञात, क्षत्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली इस आश्चर्यजनक प्राचीन कथाको आप सुनिये ? ॥ ७ ॥ |
| कार्तवीर्येति नाम्नाभूद्धैहयः पृथिवीपतिः।<br>सहस्त्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्परः ॥ ८ | कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशीय राजा हो चुके हैं। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन बलवान् राजाकी हजार भुजाएँ थीं, वे सहस्रार्जुन भी कहे जाते थे ॥ ८ ॥ |
| दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेरिव ।<br>सिद्धः सर्वार्थदः शाक्तो भृगूणां याज्य एव सः ॥ ९ | वे भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप, दत्तात्रेयके शिष्य, भगवतीके उपासक, परम सिद्ध, सब कुछ देनेमें समर्थ तथा भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे ॥ ९ ॥ |
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| ८०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्वा परमधर्म्मिष्ठः सदा दानपरायणः।<br>ददौ वित्तं भृगुभ्योऽसौ कृत्वा यज्ञाननेकशः॥ १०<br><br>धनिनस्ते द्विजा जाता भृगवो नृपदानतः।<br>हयरत्नसमृद्ध्याढ्याः सञ्जाताः प्रथिता भुवि॥ ११ | वे यज्ञ करनेवाले, धर्मनिष्ठ तथा सदैव दान देनेमें रुचि रखनेवाले थे। उन्होंने अनेक यज्ञ करके अपनी विपुल सम्पदा भृगुवंशी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी। राजाके द्वारा दिये गये दानसे वे भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े धनी हो गये। घोड़े तथा रत्न आदि सम्पदासे युक्त हो जानेके कारण जगत्में वे अतीव प्रसिद्ध हो गये॥ १०-११॥ |
| स्वर्याते नृपशार्दूले कार्तवीर्यार्जुने पुनः।<br>हैहया निर्धना जाताः कालेन महता नृप॥ १२ | हे राजन्! नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यार्जुनके दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् उनके स्वर्ग चले जानेपर हैहयवंशी क्षत्रिय धनहीन हो गये॥ १२॥ |
| धनकार्यं समुत्पन्नं हैहयानां कदाचन।<br>याचिष्णावोऽभिजग्मुस्तान्भृगूंस्ते हैहया नृप॥ १३ | हे राजन्! किसी समय हैहय क्षत्रियोंको कार्य-विशेषके लिये धनकी आवश्यकता पड़ गयी। तब वे धन माँगनेकी इच्छासे भृगुवंशी ब्राह्मणोंके पास गये॥ १३॥ |
| विनयं क्षत्रियाः कृत्वाप्ययाचन्त धनं बहु।<br>न ददुस्तेऽतिलोभार्ता नास्ति नास्तीतिवादिनः॥ १४ | उन क्षत्रियोंने अत्यधिक विनम्रतापूर्वक उन ब्राह्मणोंसे धनकी याचना की, किंतु लोभके वशीभूत उन ब्राह्मणोंने कुछ नहीं दिया और बार-बार कहते रहे—'मेरे पास नहीं है, मेरे पास नहीं है'॥ १४॥ |
| भूमौ च निदधुः केचिद् भृगवो धनमुत्तमम्।<br>ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम्॥ १५ | हैहयवंशी क्षत्रियोंसे भयभीत होकर कुछ भृगुवंशी ब्राह्मणोंने अपनी प्रचुर सम्पत्ति जमीनमें गाड़ दी और कुछने अन्य ब्राह्मणोंको दे दी॥ १५॥ |
| कृत्वा स्थानान्तरे द्रव्यं ब्राह्मणा भयविह्वलाः।<br>त्यक्त्वाश्रमान्ययुः सर्वे भृगवस्तृष्णयान्विताः॥ १६ | भयाक्रान्त तथा लोभके वशीभूत वे सभी भृगुवंशी ब्राह्मण अपना-अपना धन स्थानान्तरित करके अपने आश्रम छोड़कर अन्यत्र चले गये॥ १६॥ |
| याज्यांश्च दुःखितान्दृष्ट्वा न ददुर्लोभमोहिताः।<br>पलायित्वा गताः सर्वे गिरिदुर्गानुपाश्रिताः॥ १७ | अपने यजमानोंको दुःखित देखकर भी लोभसे विमोहित ब्राह्मणोंने उन्हें कुछ भी नहीं दिया। उन सभीने भागकर पर्वतकी गुफाओंका आश्रय ग्रहण किया॥ १७॥ |
| ततस्ते हैहयास्तात दुःखिताः कार्यगौरवात्।<br>भृगूणामाश्रमाञ्जग्मुर्द्रव्यार्थं क्षत्रियर्षभाः॥ १८ | हे तात! तत्पश्चात् कष्ट झेल रहे अनेक हैहय क्षत्रियप्रमुख विशेष कार्यवश द्रव्यप्राप्तिके लिये भृगुवंशी ब्राह्मणोंके आश्रमोंपर पहुँचे॥ १८॥ |
| भृगूंस्तु निर्गतान्वीक्ष्य शून्यांस्त्यक्त्वा गृहानथ।<br>चखनुर्भूतलं तत्र द्रव्यार्थं हैहया भृशम्॥ १९ | अपने-अपने आश्रमको सुनसान छोड़कर भृगुवंशी ब्राह्मणोंको बाहर गया हुआ देखकर वे हैहय क्षत्रिय धनके लिये वहाँकी जमीन खोदने लगे॥ १९॥ |
| खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि।<br>ददृशुः क्षत्रियाः सर्वे तद्वित्तं श्रमकर्शिताः॥ २०<br><br>यत्र यत्र समुत्पन्नं भूरि द्रव्यं महीतलात्।<br>तदा ते पार्श्वभागस्थब्राह्मणानां गृहाण्यपि॥ २१ | तत्पश्चात् किसी ब्राह्मणके घरमें जमीन खोद रहे किसी क्षत्रियने कुछ पाया। अब परिश्रमके कारण क्षीणकाय सभी क्षत्रियोंने उस धनको देख लिया। उस समयसे जहाँ-जहाँ भी पता चलता, वे जमीन खोदकर समस्त धन ले लेते थे। धनके लोभसे आस-पास रहनेवाले ब्राह्मणोंके भी घरोंको खोदनेपर उन |
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| अ० १६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्भिद्य हैहया द्रव्यं ददृशुर्धनलिप्सया।<br>ब्राह्मणाश्चुक्रुशुः सर्वे भीताश्च शरणं गताः॥ २२ | क्षत्रियोंको पर्याप्त धन दिखलायी पड़ा। इसपर सभी ब्राह्मण रोने-चिल्लाने लगे और भयभीत होकर क्षत्रियोंके शरणागत हो गये॥ २०-२२॥ |
| अतिचिन्वत्सु विप्राणां भवनान्निःसृतं बहु।<br>निजघ्नुस्ताञ्छरैः कोपाद्भाडवाञ्छरणान्गतान्॥ २३ | बार-बार खोजते रहनेपर उन ब्राह्मणोंके घरसे प्रायः सभी धन निकल चुका था। फिर भी वे क्षत्रिय उन शरणागत ब्राह्मणोंपर कोप करके बाणोंसे प्रहार करते रहे॥ २३॥ |
| ययुस्ते गिरिदुर्गांश्च यत्र वै भृगवः स्थिताः।<br>आगर्भादनुकृन्तन्तश्चेरुरुश्चैव महीमिमाम्॥ २४ | इसके पश्चात् वे उन पर्वतकी गुफाओंमें पहुँच गये, जहाँ भृगुवंशी ब्राह्मण स्थित थे। इस प्रकार गर्भस्थ शिशुओंसहित ब्राह्मणोंको नष्ट करते हुए क्षत्रिय इस पृथ्वीमण्डलपर घूमने लगे॥ २४॥ |
| प्राप्तानप्राप्तान्भृगून्सर्वान्निजघ्नुर्निशितैः शरैः।<br>आबालवृद्धानपरानवमन्य च पातकम्॥ २५ | उन्हें जहाँ कहीं भृगुवंशी बालक, वृद्ध तथा अन्य भी मिल जाते थे, वे पापकी परवा किये बिना उन सभीको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालते थे॥ २५॥ |
| एवमुत्पाट्यमानेषु भार्गवेषु यतस्ततः।<br>हन्युर्गभांश्च नारीणां गृहीत्वा हैहया भृशम्॥ २६<br><br>रुरुदुस्ताः स्त्रियः कामं कुरर्य इव दुःखिताः।<br>गर्भाश्च कृन्तिता यासां क्षत्रियैः पापनिश्चयैः॥ २७ | इस प्रकार इधर-उधर सभी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके मार दिये जानेपर उन हैहय क्षत्रियोंने स्त्रियोंको पकड़-पकड़कर उनका गर्भ नष्ट कर डाला। पापकृत्यपर तुले हुए क्षत्रियोंके द्वारा जिन स्त्रियोंके गर्भ नष्ट कर दिये जाते थे, वे बेचारी अत्यन्त दुःखित होकर कुररी पक्षीकी भाँति विलाप करने लगती थीं॥ २६-२७॥ |
| अन्येऽप्याहुश्च तान्दृप्तान्मुनयस्तीर्थवासिनः।<br>मुञ्चन्तु क्षत्रियाः क्रोधं ब्राह्मणेषु भयावहम्॥ २८<br><br>अयुक्तमेतदारब्धं भवद्भिः कर्म गर्हितम्।<br>यद् गर्भान्भृगुपत्नीनां निहन्युः क्षत्रियर्षभाः॥ २९<br><br>अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमाप्नुयात्।<br>तस्माज्जुगुप्सितं कर्म त्यक्तव्यं भूतिमिच्छता॥ ३० | तब अन्य तीर्थवासी मुनियोंने भी अभिमानमें चूर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंसे कहा—हे क्षत्रियो! तुमलोग ब्राह्मणोंपर ऐसा भयंकर क्रोध करना छोड़ दो। हे श्रेष्ठ क्षत्रियो! तुमलोगोंने तो अत्यन्त निन्दनीय तथा अनुचित कार्य आरम्भ कर दिया है जो कि तुमलोग भृगुवंशी ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका गर्भोच्छेद कर रहे हो। अत्यन्त उग्र पाप अथवा पुण्यका फल इसी लोकमें प्राप्त हो जाता है। इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको गर्हित कर्मका परित्याग कर देना चाहिये॥ २८-३०॥ |
| तानाहुर्हैहयाः क्रुद्धा मुनीनथ दयापरान्।<br>भवन्तः साधवः सर्वे नार्थज्ञाः पापकर्मणाम्॥ ३१ | तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन हैहय क्षत्रियोंने उन परम दयालु मुनियोंसे कहा—आप सभी लोग साधु हैं, अतः पापकर्मोंका रहस्य नहीं जानते॥ ३१॥ |
| एभिर्हृतं धनं सर्वं पूर्वजानां महात्मनाम्।<br>वञ्चयित्वा छलाभिज्ञैर्मार्गे पाटच्चरैरिव॥ ३२ | छल-छद्मको जाननेवाले इन ब्राह्मणोंने कपट करके हमारे महात्मा पूर्वजोंका सारा धन उसी प्रकार छीन लिया था जैसे कोई लुटेरा किसी पथिकका धन छीन लेता है॥ ३२॥ |
| एते प्रतारका दम्भास्तादृशा बकवृत्तयः।<br>उत्पन्ने च महाकार्ये प्रार्थिता विनयेन ते॥ ३३ | ये सभी ठग, दम्भी तथा बकवृत्तिवाले (पाखण्डी) हैं। आवश्यक कार्य पड़नेपर हमने विनम्रतापूर्वक इनसे धनकी याचना की थी, किंतु इन्होंने नहीं दिया। |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 A
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| ८०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न ददुः प्रार्थितं विप्राः पादवृद्ध्यापि याचिताः।<br>नास्तीतिवादिनः स्तब्धाः दुःखितान्वीक्ष्य याज्यकान्॥ ३४ | यहाँतक कि चतुर्थांशवृद्धिपर भी धन माँगनेपर हम याचकोंको अत्यन्त दुःखित देखकर इन निष्ठुर ब्राह्मणोंने ‘हमारे पास नहीं है’—ऐसा कहा॥ ३३-३४॥ |
| धनं प्राप्तं कार्तवीर्याद्रक्षितं केन हेतुना।<br>न कृताः क्रतवः किं तैर्दानं चार्थिषु भूरिशः॥ ३५ | महाराज कार्तवीर्यसे धन प्राप्त करके इन्होंने किस प्रयोजनसे धनकी रक्षा की? इन्होंने न तो यज्ञ किये और न तो याचकोंको ही प्रचुर दान दिया॥ ३५॥ |
| न सञ्चितव्यं विप्रैस्तु धनं क्वापि कदाचन।<br>यष्टव्यं विधिवद्धेयं भोक्तव्यं च यथासुखम्॥ ३६ | ब्राह्मणोंको कभी भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यज्ञ करने, दान देने तथा सुखोपभोगमें यथेच्छ धनका उपयोग करना चाहिये॥ ३६॥ |
| द्रव्ये चौरभयं प्रोक्तं तथा राजभयं द्विजाः।<br>वह्नेर्भयं महाघोरं तथा धूर्तभयं महत्॥ ३७ | हे विप्रो! पासमें धन रहनेपर चोर, राजा, अग्नि तथा धूर्तोंसे महान् भय कहा गया है॥ ३७॥ |
| येन केनाप्युपायेन धनं त्यजति रक्षकम्।<br>अथवासौ मृतो याति द्रव्यं त्यक्त्वा ह्यसद्गतिम्॥ ३८ | जिस किसी भी उपायसे अपनी ही रक्षा करनेवालेको धन छोड़ देता है अथवा वह व्यक्ति धन छोड़कर स्वयं मर जाता है और दुर्गतिको प्राप्त होता है॥ ३८॥ |
| पादवृद्ध्या तथास्माभिः प्रार्थितं विनयान्वितैः।<br>तथापि लोभसन्दिग्धैर्न दत्तं नः पुरोहितैः॥ ३९ | हम सबने बड़ी विनम्रताके साथ इन लोगोंसे चतुर्थांशवृद्धिपर धन माँगा था, फिर भी लोभके कारण संशयमें पड़े हुए पुरोहितोंने हमें धन नहीं दिया॥ ३९॥ |
| दानं भोगस्तथा नाशो धनस्य गतिरीदृशी।<br>दानभोगौ कृतीनां च नाशः पापात्मनां किल॥ ४० | दान, भोग तथा नाश—धनकी इस प्रकारकी गति होती है। पुण्यशाली प्राणियोंके धनकी गति दान तथा भोग है और दुष्ट आत्मावाले प्राणियोंके धनकी गति नाश है। |
| न दाता न च यो भोक्ता कृपणो गुप्तितत्परः।<br>राज्ञासौ सर्वथा दण्ड्यो वञ्चको दुःखभाङ्नरः॥ ४१ | जो कृपण व्यक्ति न दान करता है और न धनका उपभोग करता है, अपितु केवल धनके संग्रहमें लगा रहता है, वह वंचक प्राणी राजाके द्वारा सर्वथा दण्डनीय है और दुःखका भागी होता है॥ ४०-४१॥ |
| तस्माद्वयं गुरूनेतान्वञ्चकान्ब्राह्मणाधमान्।<br>हन्तुं समुद्यताः सर्वे न क्रोधव्यं महात्मभिः॥ ४२ | इसीलिये इन वंचक गुरुओं तथा अधम ब्राह्मणोंको मारनेके लिये हम सभी उद्यत हुए हैं। आप महात्माजन इसके लिये हमपर कोप न करें॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा हेतुमद्वाक्यं तानाश्वास्य मुनीनथ।<br>विचेरुश्च विचिन्वाना भृगुदाराननेकशः॥ ४३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार सहेतुक वचन कहकर उन मुनियोंको पूर्ण आश्वस्त करनेके बाद वे पुनः भृगुकुलकी स्त्रियोंको खोजते हुए भ्रमण करने लगे॥ ४३॥ |
| भयार्ता भृगुपत्न्यस्तु हिमवन्तं धराधरम्।<br>प्रपेदिरे रुदन्त्यश्च वेपमानाः कृशा भृशम्॥ ४४ | भयार्त तथा अत्यन्त कृश शरीरवाली भृगुवंशीय पत्नियाँ हिमवान् पर्वतपर रोती तथा काँपती हुई पहुँचीं॥ ४४॥ |
| एवं ते हैहयैर्विप्राः पीडिता धनकामुकैः।<br>निहताश्च यथाकामं संरब्धैः पापकर्मभिः॥ ४५ | इस प्रकार धनलोलुप तथा पापकर्मोंसे अभिभूत हैहयोंने उन ब्राह्मणोंको बहुत पीड़ित किया तथा उनका संहार किया॥ ४५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 B