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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३७१

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३७१

मन्त्रिणस्तु नृपं श्रुत्वा हतं शत्रुजितं मृधे।<br>जितं सुदर्शनञ्चैव बभूवुः प्रेमसंयुताः ॥ ४६राजा शत्रुजित् युद्धमें मारा गया और सुदर्शन विजयी हुए—यह सुनकर मन्त्रीलोग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे ॥ ४६ ॥
आगच्छन्तं नृपं श्रुत्वा तं साकेतनिवासिनः।<br>उपायनान्युपादाय प्रययुः सम्मुखे जनाः ॥ ४७<br><br>तथा प्रकृतयः सर्वे नानोपायनपाणयः।<br>ध्रुवसन्धिसुतं मत्वा मुदिताः प्रययुः प्रजाः ॥ ४८राजा सुदर्शनके आगमनका समाचार सुनकर साकेतके निवासी विविध प्रकारके उपहार लेकर उनके सम्मुख उपस्थित हुए और सब राजकर्मचारीगण भी हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर आये। महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शनको राजाके रूपमें जानकर अयोध्याकी समस्त प्रजा आनन्दविभोर हो गयी ॥ ४७-४८ ॥
स्त्रियोपसंयुतः सोऽथ प्राप्यायोध्यां सुदर्शनः।<br>सम्मान्य सर्वलोकांश्च ययौ राजा निवेशनम् ॥ ४९<br><br>बन्दिभिः स्तूयमानस्तु वन्द्यमानश्च मन्त्रिभिः।<br>कन्याभिः कीर्यमाणश्च लाजैः सुमनसैस्तथा ॥ ५०अपनी स्त्रीके साथ अयोध्यामें पहुँचकर सब लोगोंका सम्मान करके राजा सुदर्शन राजभवनमें गये। उस समय बन्दीजन उनकी स्तुति कर रहे थे, मन्त्रीगण उनकी वन्दना कर रहे थे और कन्याएँ उनके ऊपर लाजा (धानका लावा) तथा पुष्प बिखेर रही थीं ॥ ४९-५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुदर्शनेन देवीमहिमवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना

व्यास उवाच<br>गत्वायोध्यां नृपश्रेष्ठो गृहं राज्ञः सुहृद्वृतः।<br>शत्रुजिन्मातरं प्राह प्रणम्य शोकसंकुलाम् ॥ १<br><br>मातर्न ते मया पुत्रः संग्रामे निहतः किल।<br>न पिता ते युधाजिच्च शपे ते चरणौ तथा ॥ २व्यासजी बोले—अयोध्या पहुँचकर नृपश्रेष्ठ सुदर्शन अपने मित्रोंके साथ राजभवनमें गये। वहाँपर शत्रुजित्की परम शोकाकुल माताको प्रणामकर उन्होंने कहा—हे माता! मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके पुत्र तथा आपके पिता युधाजित्को युद्धमें मैंने नहीं मारा है ॥ १-२ ॥
दुर्गया तौ हतौ संख्ये नापराधो ममात्र वै।<br>अवश्यंभाविभावेषु प्रतीकारो न विद्यते ॥ ३स्वयं भगवती दुर्गाने रणभूमिमें उनका वध किया है; इसमें मेरा अपराध नहीं है। होनी तो अवश्य होकर रहती है, उसे टालनेका कोई उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
न शोकोऽत्र त्वया कार्यों मृतपुत्रस्य मानिनी।<br>स्वकर्मवशगो जीवो भुङ्क्ते भोगान्सुखासुखान् ॥ ४हे मानिनि! अपने मृत पुत्रके विषयमें आप शोक न करें; क्योंकि जीव अपने पूर्वकर्मोंके अधीन होकर सुख-दुःखरूपी भोगोंको भोगता है ॥ ४ ॥

३७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

दासोऽस्मि तव भो मातर्यथा मम मनोरमा।<br>तथा त्वमपि धर्मज्ञे न भेदोऽस्ति मनागपि॥ ५हे माता! मैं आपका दास हूँ। जैसे मनोरमा मेरी माता हैं, वैसे ही आप भी मेरी माता हैं। हे धर्मज्ञे! आपमें और उनमें मेरे लिये कुछ भी भेद नहीं है॥ ५॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>तस्मान्न शोचितव्यं ते सुखे दुःखे कदाचन॥ ६अपने किये हुए शुभ तथा अशुभ कर्मोंका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। अतएव सुख-दुःखके विषयमें आपको कभी भी शोक नहीं करना चाहिये॥ ६॥
दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्।<br>आत्मानं शोकहर्षाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्॥ ७मनुष्यको चाहिये कि दुःखकी स्थितिमें अधिक दुःखवालोंको तथा सुखकी स्थितिमें अधिक सुखवालोंको देखे; अपने आपको हर्ष-शोकरूपी शत्रुओंके अधीन न करे। यह सब दैवके अधीन है, अपने अधीन कभी नहीं। अतएव बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि शोकसे अपनी आत्माको न सुखाये॥ ७-८॥
दैवाधीनमिदं सर्वं नात्माधीनं कदाचन।<br>न शोकेन तदात्मानं शोषयेन्मतिमान्नरः॥ ८
यथा दारुमयी योषा नटादीनां प्रचेष्टते।<br>तथा स्वकर्मवशगो देही सर्वत्र वर्तते॥ ९जैसे कठपुतली नट आदिके संकेतपर नाचती है, उसी प्रकार जीवको भी अपने कर्मके अधीन होकर सर्वत्र रहना पड़ता है॥ ९॥
अहं वनगतो मातर्नाभवं दुःखमानसः।<br>चिन्तयन्स्वकृतं कर्म भोक्तव्यमिति वेद्मि च॥ १०हे माता! अपने किये हुए कर्मका फल भोगना ही पड़ता है—यह सोचते हुए मैं वनमें गया था, इसलिये मेरे मनमें दुःख नहीं हुआ। इस बातको मैं अभी भी जानता हूँ॥ १०॥
मृतो मातामहोऽत्रैव विधुरा जननी मम।<br>भयातुरा गृहीत्वा मां निर्ययौ गहनं वनम्॥ ११इसी अयोध्यामें मेरे नाना मारे गये, माता विधवा हो गयी। भयसे व्याकुल वह मुझे लेकर घोर वनमें चली गयी। रास्तेमें चोरोंने उसे लूट लिया, उसके वस्त्रतक उतार लिये और समस्त राह-सामग्री छीन ली। वह बालपुत्रा निराश्रय होकर मुझे लिये हुए भारद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँची। ये मन्त्री विदल्ल तथा अबला दासी हमारे साथ गये थे॥ ११-१३॥
लुण्ठिता तस्करैर्मार्गे वस्त्रहीना तथा कृता।<br>पाथेयञ्च हृतं सर्वं बालपुत्रा निराश्रया॥ १२
माता गृहीत्वा मां प्राप्ता भारद्वाजाश्रमं प्रति।<br>विदल्लोऽयं समायातस्तथा धात्रेयिकाबला॥ १३
मुनिभिर्मुनिपत्नीभिर्दयायुक्तैः समन्ततः।<br>पोषिताः फलनीवारैर्वयं तत्र स्थितास्त्रयः॥ १४आश्रमके मुनियों और मुनिपत्नियोंने दया करके नीवार तथा फलोंसे भलीभाँति हमारा पालन किया और हम तीनों वहीं रहने लगे॥ १४॥
दुःखं न मे तदा ह्यासीत्सुखं नाद्य धनागमे।<br>न वैरं न च मात्सर्यं मम चित्ते तु कर्हिचित्॥ १५उस समय निर्धन होनेके कारण न मुझे दुःख था और न अब धन आ जानेपर सुख ही है। मेरे मनमें कभी भी वैर तथा ईर्ष्याकी भावना नहीं रहती॥ १५॥
नीवारभक्षणं श्रेष्ठं राजभोगात्परन्तपे।<br>तदाशी नरकं याति न नीवाराशनः क्वचित्॥ १६हे परन्तपे! राजसी भोजनकी अपेक्षा नीवारभक्षण श्रेष्ठ है; क्योंकि राजस अन्न खानेवाला नरकमें जा सकता है, किंतु नीवारभोजी कभी नहीं॥ १६॥
अ० २५ ]तृतीय स्कन्ध३७३
धर्मस्याचरणं कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>सञ्जितेन्द्रियवर्गं वै यथा न नरकं व्रजेत्॥ १७इन्द्रियोंपर सम्यक् नियन्त्रण करके विज्ञ पुरुषको धर्मका आचरण करना चाहिये, जिससे उसे नरकमें न जाना पड़े॥ १७॥
मानुष्यं दुर्लभं मातः खण्डेऽस्मिन्भारते शुभे।<br>आहारादिसुखं नूनं भवेत्सर्वासु योनिषु॥ १८<br>प्राप्य तं मानुषं देहं कर्तव्यं धर्मसाधनम्।<br>स्वर्गमोक्षप्रदं नृणां दुर्लभं चान्ययोनिषु॥ १९हे माता! इस पवित्र भारतवर्षमें मानवजन्म दुर्लभ है। आहारादिका सुख तो निश्चय ही सभी योनियोंमें मिल सकता है। स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मनुष्यतनको पाकर धर्मसाधन करना चाहिये; क्योंकि अन्य योनियोंमें यह दुर्लभ है॥ १८-१९॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा तदा तेन लीलावत्यतिलज्जिता।<br>पुत्रशोकं परित्यज्य तमाहाश्रुविलोचना॥ २०व्यासजी बोले— उस सुदर्शनके यह कहनेपर लीलावती बहुत लज्जित हुई और पुत्रशोक त्यागकर आँखोंमें आँसू भरके बोली—॥ २०॥
सापराधास्मि पुत्रांहं कृता पित्रा युधाजिता।<br>हत्वा मातामहं तेऽत्र हतं राज्यं तु येन वै॥ २१हे पुत्र! मेरे पिता युधाजित्ने मुझे अपराधिनी बना दिया। उन्होंने ही तुम्हारे नानाका वध करके राज्यका हरण कर लिया था॥ २१॥
न तं वारयितुं शक्ता तदाहं न सुतं मम।<br>यत्कृतं कर्म तेनैव नापराधोऽस्ति मे सुत॥ २२हे तात! उस समय मैं उन्हें तथा अपने पुत्रको रोकनेमें समर्थ नहीं थी। उन्होंने जो कुछ किया, उसमें मेरा अपराध नहीं था॥ २२॥
तौ मृतौ स्वकृतेनैव कारणं त्वं तयोर्न च।<br>नाहं शोचामि तं पुत्रं सदा शोचामि तत्कृतम्॥ २३वे दोनों अपने ही कर्मसे मृत्युको प्राप्त हुए हैं। उनकी मृत्युमें तुम कारण नहीं हो। अतएव मैं अपने उस पुत्रके लिये शोक नहीं करती। मैं सदा उसके किये कर्मकी चिन्ता करती रहती हूँ॥ २३॥
पुत्रस्त्वमसि कल्याण भगिनी मे मनोरमा।<br>न च क्रोधो न शोको मे त्वयि पुत्र मनागपि॥ २४हे कल्याण! अब तुम्हीं मेरे पुत्र हो और मनोरमा मेरी बहन है। हे पुत्र! तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी शोक या क्रोध नहीं है॥ २४॥
कुरु राज्यं महाभाग प्रजाः पालय सुव्रत।<br>भगवत्याः प्रसादेन प्राप्तमेतदकण्टकम्॥ २५हे महाभाग! अब तुम राज्य करो और प्रजाका पालन करो। हे सुव्रत! भगवतीकी कृपासे ही तुम्हें यह अकंटक राज्य प्राप्त हुआ है॥ २५॥
तदाकर्ण्य वचो मातर्नत्वा तां नृपनन्दनः।<br>जगाम भवनं रम्यं यत्र पूर्वं मनोरमा॥ २६<br><br>न्यवसत्तत्र गत्वा तु सर्वानाहूय मन्त्रिणः।<br>दैवज्ञानथ पप्रच्छ मुहूर्तं दिवसं शुभम्॥ २७<br><br>सिंहासनं तथा हैमं कारयित्वा मनोहरम्।<br>सिंहासने स्थितां देवीं पूजयिष्ये सदाप्यहम्॥ २८<br><br>स्थापयित्वासने देवीं धर्मार्थकाममोक्षदाम्।<br>राज्यं पश्चात्करिष्यामि यथा रामादिभिः कृतम्॥ २९माता लीलावतीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम करके राजकुमार सुदर्शन उस भव्य भवनमें गये, जहाँ पहले उनकी माता मनोरमा रहा करती थीं। वहाँ जाकर उन्होंने सब मन्त्रियों तथा ज्योतिषियोंको बुलाकर शुभ दिन और मुहूर्त पूछा और कहा कि सोनेका सुन्दर सिंहासन बनवाकर उसपर विराजमान देवीका मैं नित्य पूजन करूँगा। उस सिंहासनपर धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्थापना करनेके बाद ही मैं राज्यकार्य संचालित करूँगा, जैसा मेरे पूर्वज श्रीराम आदिने किया है। सभी नागरिकजनोंको चाहिये
३७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २५

| पूजनीया सदा देवी सर्वैर्नागरिकैर्जनैः।<br>माननीया शिवा शक्तिः सर्वकामार्थसिद्धिदा॥ ३० | कि वे सभी प्रकारके काम, अर्थ और सिद्धि प्रदान करनेवाली कल्याणमयी भगवती आदिशक्तिका पूजन तथा सम्मान करते रहें॥ २६—३०॥ |
| इत्युक्ता मन्त्रिणस्ते तु चक्रुर्वै राजशासनम्।<br>प्रासादं कारयामासुः शिल्पिभिः सुमनोरमम्॥ ३१ | राजा सुदर्शनके ऐसा कहनेपर मन्त्रीगण राजाज्ञाके पालनमें तत्पर हो गये। उन्होंने शिल्पियोंद्वारा एक बहुत सुन्दर मन्दिर तैयार कराया॥ ३१॥ |
| प्रतिमां कारयित्वाथ मुहूर्तेऽथ शुभे दिने।<br>द्विजानाहूय वेदज्ञांस्थापयामास भूपतिः॥ ३२ | तदनन्तर राजाने देवीकी प्रतिमा बनवाकर शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें वैदिक विद्वानोंको बुलाकर उसकी स्थापना की॥ ३२॥ |
| हवनं विधिवत्कृत्वा पूजयित्वाथ देवताम्।<br>प्रासादे मतिमान् देव्याः स्थापयामास भूमिपः॥ ३३ | तत्पश्चात् विधिवत् हवन तथा देवपूजन करके बुद्धिमान् राजाने उस मन्दिरमें देवीकी प्रतिमा स्थापित की॥ ३३॥ |
| उत्सवस्तत्र संवृत्तो वादित्राणां च निःस्वनैः।<br>ब्राह्मणानां वेदघोषैर्गानैस्तु विविधैर्नृप॥ ३४ | हे राजन्! उस समय ब्राह्मणोंके वेदघोष, विविध गानों तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया॥ ३४॥ |
| व्यास उवाच<br>प्रतिष्ठाप्य शिवां देवीं विधिवद्वेदवादिभिः।<br>पूजां नानाविधां राजा चकारातिविधानतः॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार वेदवादी विद्वानोंद्वारा कल्याणमयी देवीकी विधिवत् स्थापना कराकर राजा सुदर्शनने बड़े विधानके साथ नाना प्रकारकी पूजा सम्पन्न की॥ ३५॥ |
| कृत्वा पूजाविधिं राजा राज्यं प्राप्य स्वपैतृकम्।<br>विख्यातश्चाम्बिका देवी कोसलेषु बभूव ह॥ ३६ | इस प्रकार राजा सुदर्शन भगवतीकी पूजा करके अपना पैतृक राज्य प्राप्तकर विख्यात हो गये और कोसल देशमें अम्बिकादेवी भी विख्यात हो गयीं॥ ३६॥ |
| राज्यं प्राप्य नृपः सर्वं सामन्तकनृपानथ।<br>वशे चक्रेऽतिधर्मिष्ठांस्सद्धर्मविजयी नृपः॥ ३७ | सम्पूर्ण राज्य प्राप्त करनेके बाद सद्धर्मसे विजय प्राप्त करनेवाले राजा सुदर्शनने सभी धर्मात्मा सामन्त राजाओंको अपने अधीन कर लिया॥ ३७॥ |
| यथा रामः स्वराज्येऽभूद्दिलीपस्य रघुर्यथा।<br>प्रजानां वै सुखं तद्वन्मर्यादापि तथाभवत्॥ ३८ | जिस प्रकार अपने राज्यमें राम हुए और जिस प्रकार दिलीपके पुत्र राजा रघु हुए उसी प्रकार सुदर्शन भी हुए। जैसे उनके राज्यमें प्रजाओंको सुख था और मर्यादा थी, वैसा ही राजा सुदर्शनके राज्यमें भी था॥ ३८॥ |
| धर्मो वर्णाश्रमाणां च चतुष्पादभवत्तथा।<br>नाधर्मे रमते चित्तं केषामपि महीतले॥ ३९ | उनके राज्यमें वर्णाश्रमधर्म चारों चरणोंसे समृद्ध हुआ। उस समय धरातलपर किसीका भी मन अधर्ममें लिप्त नहीं होता था॥ ३९॥ |
| ग्रामे ग्रामे च प्रासादांश्चक्रुः सर्वे जनाधिपाः।<br>देव्याः पूजा तदा प्रीत्या कोसलेषु प्रवर्तिता॥ ४० | कोसलदेशके सभी राजाओंने प्रत्येक ग्राममें देवीके मन्दिर बनवाये। तबसे समस्त कोसलदेशमें प्रेमपूर्वक देवीकी पूजा होने लगी॥ ४०॥ |

अ० २६ ]तृतीय स्कन्ध३७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुबाहुरपि काश्यां तु दुर्गायाः प्रतिमां शुभाम् ।<br>कारयित्वा च प्रासादं स्थापयामास भक्तितः ॥ ४१महाराज सुबाहुने भी काशीमें मन्दिरका निर्माण कराकर भक्तिपूर्वक दुर्गादेवीकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की ॥ ४१ ॥
तत्र तस्या जनाः सर्वे प्रेमभक्तिपरायणाः ।<br>पूजां चक्रुर्विधानेन यथा विश्वेश्वरस्य ह ॥ ४२काशीके सभी लोग प्रेम और भक्तिमें तत्पर होकर विधिवत् दुर्गादेवीकी उसी प्रकार पूजा करने लगे, जैसे भगवान् विश्वनाथजीकी करते थे ॥ ४२ ॥
विख्याता सा बभूवाथ दुर्गा देवी धरातले ।<br>देशे देशे महाराज तस्या भक्तिर्व्यवर्धत ॥ ४३हे महाराज! तबसे इस धरातलपर देश-देशमें भगवती दुर्गा विख्यात हो गयीं और लोगोंमें उनकी भक्ति बढ़ने लगी। उस समय भारतवर्षमें सब जगह सभी वर्णोंमें भवानी ही सबकी पूजनीया हो गयीं ॥ ४३-४४ ॥
सर्वत्र भारते लोके सर्ववर्णेषु सर्वथा ।<br>भजनीया भवानी तु सर्वेषामभवत्तदा ॥ ४४
शक्तिभक्तिरताः सर्वे मानिनश्चाभवन्नृप ।<br>आगमोक्तैरथ स्तोत्रैर्जपध्यानपरायणाः ॥ ४५हे नृप! सभी लोग भगवती शक्तिको मानने लगे, उनकी भक्तिमें निरत रहने लगे और वेद-वर्णित स्तोत्रोंके द्वारा उनके जप तथा ध्यानमें तत्पर हो गये। इस प्रकार भक्तिपरायण लोग सभी नवरात्रोंमें विधानपूर्वक भगवतीका पूजन, हवन तथा यज्ञ करने लगे ॥ ४५-४६ ॥
नवरात्रेषु सर्वेषु चक्रुः सर्वे विधानतः ।<br>अर्चनं हवनं यागं देव्या भक्तिपरा जनाः ॥ ४६

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीस्थापनवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥


अथ षड्विंशोऽध्यायः

नवरात्रव्रत-विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>नवरात्रे तु सम्प्राप्ते किं कर्तव्यं द्विजोत्तम ।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि शरत्काले विशेषतः ॥ १**जनमेजय बोले—**हे द्विजश्रेष्ठ! नवरात्रके आनेपर और विशेष करके शारदीय नवरात्रमें क्या करना चाहिये? उसका विधान आप मुझे भलीभाँति बताइये ॥ १ ॥
किं फलं खलु कस्तत्र विधिः कार्यो महामते ।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि कृपया द्विजसत्तम ॥ २हे महामते! उस पूजनका क्या फल है और उसमें किस विधिका पालन करना चाहिये। हे द्विजवर! कृपया विस्तारके साथ मुझे यह सब बताइये ॥ २ ॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।<br>शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥ ३**व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं पवित्र नवरात्रव्रतके विषयमें बता रहा हूँ, सुनिये। शरत्कालके नवरात्रमें विशेष करके यह व्रत करना चाहिये ॥ ३ ॥
वसन्ते च प्रकर्तव्यं तथैव प्रेमपूर्वकम् ।<br>द्वावृतू यमदंष्ट्राख्यौ नूनं सर्वजनेषु वै ॥ ४उसी प्रकार प्रेमपूर्वक वसन्त ऋतुके नवरात्रमें भी इस व्रतको करे। ये दोनों ऋतुएँ सब प्राणियोंके लिये यमदंष्ट्रा कही गयी हैं ॥ ४ ॥

| ३७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह।<br>तस्माद्यत्नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता॥ ५शरत् तथा वसन्त नामक ये दोनों ऋतुएँ संसारमें प्राणियोंके लिये दुर्गम हैं। अतएव आत्मकल्याणके इच्छुक व्यक्तिको बड़े यत्नके साथ यह नवरात्रव्रत करना चाहिये॥ ५॥
द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम्।<br>वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ॥ ६<br><br>तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः।<br>चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ७ये वसन्त तथा शरद्—दोनों ही ऋतुएँ बड़ी भयानक हैं और मनुष्योंके लिये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं। ये सबका विनाश कर देनेवाली हैं। अतएव हे राजन्! बुद्धिमान् लोगोंको शुभ चैत्र तथा आश्विनमासमें भक्तिपूर्वक चण्डिकादेवीका पूजन करना चाहिये॥ ६-७॥
अमावास्यां च सम्प्राप्य सम्भारं कल्पयेच्छुभम्।<br>हविष्यं चाशनं कार्यमेकभुक्तं तु तद्दिने॥ ८अमावस्या आनेपर व्रतकी सभी शुभ सामग्री एकत्रित कर ले और उस दिन एकभुक्त व्रत करे और हविष्य ग्रहण करे॥ ८॥
मण्डपस्तु प्रकर्तव्यः समे देशे शुभे स्थले।<br>हस्तषोडशमानेन स्तम्भध्वजसमन्वितः॥ ९किसी समतल तथा पवित्र स्थानमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े और स्तम्भ तथा ध्वजाओंसे सुसज्जित मण्डपका निर्माण करना चाहिये॥ ९॥
गौरमृद्गोमयाभ्याञ्च लेपनं कारयेत्ततः।<br>तन्मध्ये वेदिका शुभ्रा कर्तव्या च समा स्थिरा॥ १०उसको सफेद मिट्टी और गोबरसे लिपवा दे। तत्पश्चात् उस मण्डपके बीचमें सुन्दर, चौरस और स्थिर वेदी बनाये॥ १०॥
चतुर्हस्ता च हस्तोच्छा पीठार्थं स्थानमुत्तमम्।<br>तोरणानि विचित्राणि वितानञ्च प्रकल्पयेत्॥ ११वह वेदी चार हाथ लम्बी-चौड़ी और हाथभर ऊँची होनी चाहिये। पीठके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करे तथा विविध रंगोंके तोरण लटकाये और ऊपर चाँदनी लगा दे॥ ११॥
रात्रौ द्विजानथामन्त्र्य देवीतत्त्वविशारदान्।<br>आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ १२<br><br>प्रतिपद्दिवसे कार्यं प्रातःस्नानं विधानतः।<br>नद्यां नदे तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽथवा॥ १३रात्रिमें देवीका तत्त्व जाननेवाले, सदाचारी, संयमी और वेद-वेदांगके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल नदी, नद, तड़ाग, बावली, कुआँ अथवा घरपर ही विधिवत् स्नान करे॥ १२-१३॥
प्रातर्नित्यं पुरः कृत्वा द्विजानां वरणं ततः।<br>अर्घ्यपाद्यादिकं सर्वं कर्तव्यं मधुपूर्वकम्॥ १४प्रातःकालके समय नित्यकर्म करके ब्राह्मणोंका वरण-कर उन्हें मधुपर्क तथा अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पण करे॥ १४॥
वस्त्रालङ्करणादीनि देयानि च स्वशक्तितः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं विभवे सति कर्हिचित्॥ १५अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें वस्त्र, अलंकार आदि प्रदान करे। धन रहते हुए इस काममें कभी कृपणता न करे॥ १५॥
विप्रैः सन्तोषिताैः कार्यं सम्पूर्णं सर्वथा भवेत्।<br>नव पञ्च त्रयश्चैको देव्याः पाठे द्विजाः स्मृताः॥ १६सन्तुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा किया हुआ कर्म सम्यक् प्रकारसे परिपूर्ण होता है। देवीका पाठ करनेके लिये नौ, पाँच, तीन अथवा एक ब्राह्मण बताये गये हैं॥ १६॥

| अ० २६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३७७ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वरयेद् ब्राह्मणं शान्तं पारायणकृते तदा।<br>स्वस्तिवाचनकं कार्यं वेदमन्त्रविधानतः॥ १७देवीभागवतका पारायण करनेके कार्यमें किसी शान्त ब्राह्मणका वरण करे और वैदिक मन्त्रोंसे स्वस्तिवाचन कराये॥ १७॥
वेद्यां सिंहासनं स्थाप्यं क्षौमवस्त्रसमन्वितम्।<br>तत्र स्थाप्याम्बिका देवी चतुर्हस्तायुधान्विता॥ १८<br><br>रत्नभूषणसंयुक्ता मुक्ताहारविराजिता।<br>दिव्याम्बरधरा सौम्या सर्वलक्षणसंयुता॥ १९<br><br>शङ्खचक्रगदापद्मधरा सिंहे स्थिता शिवा।<br>अष्टादशभुजा वापि प्रतिष्ठाप्या सनातनी॥ २०वेदीपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित सिंहासन स्थापित करे। उसके ऊपर चार भुजाओं तथा उनमें आयुधोंसे युक्त देवीकी प्रतिमा स्थापित करे। भगवतीकी प्रतिमा रत्नमय भूषणोंसे युक्त, मोतियोंके हारसे अलंकृत, दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित, शुभलक्षणसम्पन्न और सौम्य आकृतिकी हो। वे कल्याणमयी भगवती शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए हों और सिंहपर सवार हों; अथवा अठारह भुजाओंसे सुशोभित सनातनी देवीको प्रतिष्ठित करे॥ १८-२०॥
अर्चाभावे तथा यन्त्रं नवार्णमन्त्रसंयुतम्।<br>स्थापयेत्पीठपूजार्थं कलशं तत्र पार्श्वतः॥ २१भगवतीकी प्रतिमाके अभावमें नवार्णमन्त्रयुक्त यन्त्रको पीठपर स्थापित करे और पीठपूजाके लिये पासमें कलश भी स्थापित कर ले॥ २१॥
पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्।<br>सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥ २२वह कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रोंसे भलीभाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थके जलसे पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्नमय होना चाहिये॥ २२॥
पार्श्वे पूजार्थसम्भारान्परिकल्प्य समन्ततः।<br>गीतवादित्रनिर्घोषान्कारयेन्मङ्गलाय वै॥ २३पासमें पूजाकी सब सामग्रियाँ रखकर उत्सवके निमित्त गीत तथा वाद्योंकी ध्वनि भी करानी चाहिये॥ २३॥
तिथौ हस्तान्वितायां च नन्दायां पूजनं वरम्।<br>प्रथमे दिवसे राजन् विधिवत्कामदं नृणाम्॥ २४हस्तनक्षत्रयुक्त नन्दा (प्रतिपदा) तिथिमें पूजन श्रेष्ठ माना जाता है। हे राजन्! पहले दिन विधिवत् किया हुआ पूजन मनुष्योंका मनोरथ पूर्ण करनेवाला होता है॥ २४॥
नियमं प्रथमं कृत्वा पश्चात्पूजां समाचरेत्।<br>उपवासेन नक्तेन चैकभुक्तेन वा पुनः॥ २५सबसे पहले उपवासव्रत, एकभुक्तव्रत अथवा नक्तव्रत—इनमेंसे किसी एक व्रतके द्वारा नियम करनेके पश्चात् ही पूजा करनी चाहिये॥ २५॥
करिष्यामि व्रतं मातर्नवरात्रमनुत्तमम्।<br>साहाय्यं कुरु मे देवि जगदम्ब ममाखिलम्॥ २६[पूजनके पहले प्रार्थना करते हुए कहे—] हे माता! मैं सर्वश्रेष्ठ नवरात्रव्रत करूँगा। हे देवि! हे जगदम्बे! [इस पवित्र कार्यमें] आप मेरी सम्पूर्ण सहायता करें॥ २६॥
यथाशक्ति प्रकर्तव्यो नियमो व्रतहेतवे।<br>पश्चात्पूजा प्रकर्तव्या विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ २७इस व्रतके लिये यथाशक्ति नियम रखे। उसके बाद मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् भगवतीका पूजन करे॥ २७॥
चन्दनागुरुकर्पूरैः कुसुमैश्च सुगन्धिभिः।<br>मन्दारकरजाशोकचम्पकैः करवीरकैः॥ २८<br><br>मालतीब्रह्मकापुष्पैस्तथा बिल्वदलैः शुभैः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं धूपैर्दीपैर्विधानतः॥ २९चन्दन, अगरु, कपूर तथा मन्दार, करंज, अशोक, चम्पा, कText (कनैल), मालती, ब्राह्मी आदि सुगन्धित पुष्पों, सुन्दर बिल्वपत्रों और धूप-दीपसे विधिवत् भगवती जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥