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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

२६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| न मिथ्या वेदवाक्यं वै कल्पनीयं कदाचन।<br>विरोधोऽयं मयात्यन्तं हृदये तु विशङ्कितः ॥ ४२<br><br>एकमेवाद्वितीयं यद् ब्रह्म वेदा वदन्ति वै।<br>सा किं त्वं वाप्यसौ वा किं सन्देहं विनिवर्तय ॥ ४३ | [यह सिद्धान्त है कि] वेद-वाक्यको कभी मिथ्या नहीं समझना चाहिये। वेद ब्रह्मको अद्वितीय और एक बताते हैं; तो फिर आप क्या हैं और वह ब्रह्म क्या है? यह विरोध मेरे हृदयमें महान् शंका उत्पन्न करता है। आप मेरे इस सन्देहका निवारण करें ॥ ४२-४३ ॥ |
| निःसंशयं न मे चेतः प्रभवत्यविशङ्कितम्।<br>द्वित्वैकत्वविचारेऽस्मिन्मग्नं क्षुल्लकं मनः ॥ ४४ | इस प्रकार द्वैत-अद्वैतके इस विचारमें डूबा हुआ मेरा क्षुद्र मन निश्चितरूपसे शंकारहित नहीं हो पा रहा है ॥ ४४ ॥ |
| स्वमुखेनापि सन्देहं छेत्तुमर्हसि मामकम्।<br>पुण्ययोगाच्च मे प्राप्ता सङ्गतिस्तव पादयोः ॥ ४५ | अब आप ही स्वयं अपने मुखसे मेरी इस शंकाका निवारण करनेकी कृपा करें; क्योंकि [अनेक जन्मोंके] पुण्ययोगसे ही आपके चरणोंका यह सांनिध्य मुझे प्राप्त हुआ है ॥ ४५ ॥ |
| पुमानसि त्वं स्त्री वासि वद विस्तरतो मम।<br>ज्ञात्वाहं परमां शक्तिं मुक्तः स्यां भवसागरात् ॥ ४६ | आप पुरुष हैं अथवा स्त्री—यह मुझे विस्तारपूर्वक बतायें, जिससे मैं आप परम शक्तिको जानकर भवसागरसे मुक्त हो जाऊँ ॥ ४६ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

भगवती जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा ‘महासरस्वती’, ‘महालक्ष्मी’ और ‘महाकाली’ नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना

| ब्रह्मोवाच<br>इति पृष्टा मया देवी विनयावनतेन च।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णमाद्या भगवती हि सा॥ १ | **ब्रह्माजी बोले—**अत्यन्त नम्र भावसे मेरे पूछनेपर वे आद्या भगवती मधुर वचन कहने लगीं ॥ १ ॥ |
| देव्युवाच<br>सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च।<br>योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात् ॥ २ | **देवी बोलीं—**मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं; कोई भेद नहीं है; क्योंकि जो वे हैं, वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ, वही वे हैं। बुद्धिभ्रमसे ही हम दोनोंमें भेद दिखायी पड़ता है ॥ २ ॥ |
| आवयोरन्तरं सूक्ष्मं यो वेद मतिमान्हि सः।<br>विमुक्तः स तु संसारान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ३ | इसलिये हम दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको जो बुद्धिमान् जानता है, वह संसारके बन्धनसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ |
| एकमेवाद्वितीयं वै ब्रह्म नित्यं सनातनम्।<br>द्वैतभावं पुनर्याति काल उत्पित्सुसंज्ञके ॥ ४ | ब्रह्म अद्वितीय, एक, नित्य एवं सनातन है; केवल सृष्टि-रचनाके समय वह पुनः द्वैतभावको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |

अ० ६ ]तृतीय स्कन्ध२६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यथाद्दीपस्तथोपाधेर्योगत्सञ्जायते द्विधा।<br>छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः॥ ५जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं॥ ५॥
भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज।<br>दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥ ६हे अज! जगत्‌का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है। तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके सृष्टि होना असम्भव है॥ ६॥
नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये।<br>सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः॥ ७सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ। परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है॥ ७॥
अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।<br>श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥ ८<br><br>कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा।<br>विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च॥ ९<br><br>वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता।<br>परा मध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधाश्च याः॥ १०मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं—वह सब मैं ही हूँ॥ ८-१०॥
किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।<br>सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥ ११हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन-सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूँ॥ ११॥
एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे।<br>तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम्॥ १२हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ॥ १२॥
नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम्।<br>भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम्॥ १३<br><br>गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।<br>वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी॥ १४<br><br>उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान्।<br>करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै॥ १५निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ और पराक्रम करती हूँ। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ। सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूँ॥ १३-१५॥
जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।<br>निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट होती हूँ॥ १६॥

२६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मया त्यक्तं विधे नूनं स्पन्दितुं न क्षमं भवेत्।<br>जीवजातं च संसारे निश्चयोऽयं ब्रुवे त्वयि॥ १७<br><br>अशक्तः शङ्करो हन्तुं दैत्यान्किल मयोज्झितः।<br>शक्तिहीनं नरं ब्रूते लोकश्चैवातिदुर्बलम्॥ १८हे विधे! इस संसारका कोई भी जीव मुझसे रहित होकर स्पन्दन भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यह मेरा निश्चय है। इसे मैं आपको बता दे रही हूँ। इसी प्रकार यदि मैं शिवको छोड़ दूँ तो वे शक्तिहीन होकर दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। इसीलिये तो संसारमें भी अत्यन्त दुर्बल पुरुषको लोग शक्तिहीन कहते हैं॥ १७-१८॥
रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल।<br>शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ १९<br><br>पतितः स्खलितो भीतः शान्तः शत्रुवशं गतः।<br>अशक्तः प्रोच्यते लोके नारुद्रः कोऽपि कथ्यते॥ २०लोग अधम मनुष्यको विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं। जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रुके वशीभूत हो गया हो—वह संसारमें अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही कहा जाता है॥ १९-२०॥
तद्विद्धि कारणं शक्तिर्यथा त्वं च सिसृक्षसि।<br>भविता च यदा युक्तः शक्त्या कर्ता तदाखिलम्॥ २१[हे ब्रह्मन्!] आप ही जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है, ऐसा जानिये। जब आप शक्तिसे युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं॥ २१॥
तथा हरिस्तथा शम्भुस्तथेन्द्रोऽथ विभावसुः।<br>शशी सूर्यो यमस्त्वष्टा वरुणः पवनस्तथा॥ २२इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी शक्ति-सम्पन्न होकर ही अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं॥ २२॥
धरा स्थिरा तदा धर्तुं शक्तियुक्ता यदा भवेत्।<br>अन्यथा चेदशक्ता स्यात्परमाणोश्च धारणे॥ २३<br><br>तथा शेषस्तथा कूर्मो येऽन्ये सर्वे च दिग्गजाः।<br>मद्युक्ता वै समर्थाश्च स्वानि कार्याणि साधितुम्॥ २४पृथ्‍वी भी जब शक्तिसे युक्त होती है, तब स्थिर होकर सबको धारण करनेमें समर्थ होती है। यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणुको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य सम्पन्न करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ २३-२४॥
जलं पिबामि सकलं संहरामि विभावसुम्।<br>पवनं स्तम्भयाम्यद्य यदिच्छामि तथाचरम्॥ २५यदि मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण संसारका जल पी जाऊँ, अग्निको नष्ट कर दूँ और वायुकी गति रोक दूँ; मैं जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ॥ २५॥
तत्त्वानां चैव सर्वेषां कदापि कमलोद्भव।<br>असतां भावसन्देहः कर्तव्यो न कदाचन॥ २६<br><br>कदाचित्प्रागभावः स्यात्प्रध्वंसाभाव एव वा।<br>मृत्पिण्डेषु कपालेषु घटाभावो यथा तथा॥ २७हे कमलोद्भव! सभी तत्त्वोंके अभावका सन्देह अब आप कभी न कीजिये; क्योंकि कभी-कभी किसी वस्तुविशेषका प्रागभाव (जिसका आदि न हो, पर अन्त हो) तथा प्रध्वंसाभाव (जिसका आदि हो, किंतु अन्त न हो) उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मिट्टीके पिण्डोंमें और कपालोंमें घटाभाव प्रतीत होता है॥ २६-२७॥