१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
About this granth
This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.
As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.
The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.
प्रपाठक २ मन्त्र ६ ३८५
प्रपाठक २ मन्त्र ६ ३८५
हे राजन्! जिस (अविनाशी ब्रह्मविद्या) का सभी उपनिषदें एक स्वर से उपदेश करती हैं, उस
ब्रह्मविद्या के ज्ञान को भगवान् मैत्रेय ने मुझे बताया है, वही श्रेष्ठ ज्ञान मैं तुम्हें बतलाता हूँ। साधना द्वारा
जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे तेजस्वी एवं ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने वाले मुनि वालखिल्य के
नाम से जाने जाते हैं। ऐसा ही एक बार उन श्रेष्ठ मुनि ने ब्रह्मा जी से प्रश्न किया- हे ब्रह्मन् ! यह शरीर गाड़ी
की भाँति अचेतन है, तो फिर ऐसा कौन सा अतीन्द्रिय तत्त्व है, किस श्रेष्ठ तत्त्व की ऐसी महिमा है ? जिससे
कि यह शरीर चैतन्य की भाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इस शरीर को जो प्रेरित करता है, उसे वाणी से भी
परे (श्रेष्ठ) बताया गया है। हे भगवन् ! उसी (श्रेष्ठ तत्त्व) को हमारे समक्ष बताने की कृपा करें ॥ ३ ॥
यो ह खलु वाचोपरिस्थः श्रूयते स वा एष शुद्धः पूतः शून्यः शान्तः प्राणोऽनी-
शात्माऽनन्तोऽक्षय्यः स्थिरः शाश्वतोऽजः स्वतन्त्रः स्वे महिम्नि तिष्ठत्यनेनेदं शरीरं
चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयिता चैषोऽस्येति ते होचुर्भगवन्कथमनेनेदृशेनानिच्छेनैतद्विधमिदं
चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयिता चैषोऽस्येति कथमिति तान्होवाच ॥ ४ ॥
(ब्रह्मा जी ने मुनि से कहा) उस श्रेष्ठ तत्त्व को शुद्ध, पवित्र, शून्य, शान्त, जीवन प्रदान करने वाला,
अनन्त, अविनाशी, शाश्वत, सनातन, स्थिर, अजन्मा एवं स्वतन्त्र रूप से निवास करने वाला आत्मा कहा
जाता है। उसी की ही यह महान् महिमा है। उस आत्मा से ही इस अचेतन शरीर को चेतन की भाँति प्रतिष्ठा
प्राप्त होती है। वही चेतन आत्म तत्त्व प्रेरणा प्रदान करने वाला है। यह सुनने के बाद महामुनि वालखिल्य
जी ने पुनः प्रश्न किया- हे भगवन् ! यह आत्मा अनिच्छित होते हुए भी चैतन्यरूप से इस शरीर में कैसे स्थिर
है ? इस शरीर को यह प्रेरित क्यों करता है ? तथा इस आत्मा की यह महिमा किस प्रकार की है ? ॥ ४ ॥
स वा एष सूक्ष्मोऽग्राह्योऽदृश्यः पुरुषसंज्ञको बुद्धिपूर्वमिहैवावर्ततेऽशेन सुषुप्तस्यैव
बुद्धिपूर्वं निबोधयत्यथ यो ह खलु वावैतस्यांशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपूरुषं क्षेत्रज्ञः
संकल्पाध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिर्विश्वाक्षस्तेन चेतनेनेदं शरीरं चेतनवत्प्रतिष्ठापितं
प्रचोदयिता चैषोऽस्येति ते होचुर्भगवन्नीदृशस्य कथमंशेन वर्तनमिति तान्होवाच ॥ ५ ॥
ब्रह्मा जी ने कहा - (हे मुने !) यह आत्मा सूक्ष्म, अग्राह्य और अदृश्य रूप है, इस कारण
इसे 'पुरुष' नाम की संज्ञा द्वारा जाना जाता है। यह आत्मा अपने एक अंश से इस शरीर में अपने
प्रयोजन के अभाव में भी बुद्धिपूर्वक सतत आता रहता है। सोते हुए को वह युक्तिपूर्वक बोध
कराते हुए चैतन्य रूप से सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित करता है। वही प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप
में प्रतिष्ठित है; वही प्रकाश, संकल्प, प्रयास, अहंकार, लिंग (पुरुष-स्त्री आदि) और प्रजापति के
रूप में समस्त विश्व को देखने वाला है। उसी की चेतना से शरीर चैतन्ययुक्त है। वही इस शरीर को
क्रियान्वयन हेतु प्रेरित करता है। वालखिल्य ने पुनः प्रश्न किया - हे भगवन् ! यह आत्मा अखण्ड
होने पर भी किस तरह अंश रूप में यहाँ स्थिर है ? ॥ ५ ॥
प्रजापतिर्वा एषोऽग्रेऽतिष्ठत्स नारमतैकः स आत्मानमभिध्यायद्बह्वीः प्रजा असृजत्ता
अस्यैवात्मप्रबुद्धा अप्राणा स्थाणुरिव तिष्ठमाना अपश्यत्स नारमत सोऽमन्यतैतासां
प्रतिबोधनायाभ्यन्तरं प्राविशानीत्यथ स वायुमिवात्मानं कृत्वाभ्यन्तरं प्राविशतस एको
नाविशतस पञ्चधात्मानं प्रविभज्योच्यते यः प्राणोऽपानः समान उदानो व्यान इति ॥ ६ ॥
३८६ मैत्रायण्युपनिषद्
ब्रह्माजी ने कहा- हे महर्षे ! सर्वप्रथम एकमात्र प्रजापति ही एकाकी रूप में थे। वे अकेले रमण
(अपने को सन्तुष्ट) नहीं कर सके, तब उन्होंने अपनी आत्मा का ध्यान किया। इसके फलस्वरूप उन्होंने
विभिन्न रूपों में प्रजा का सृजन किया। अपने द्वारा उत्पन्न किये वे प्राणी उन्हें (स्वयं को) निष्प्राण एवं खम्भे
की भाँति (निश्चेष्ट) मालूम पड़े। तदनन्तर (ऐसी उस क्रिया, ज्ञान एवं शक्ति से रहित प्रजा को देखकर)
उन्होंने विचार किया कि इस प्रजा को (क्रिया, ज्ञान और शक्ति से युक्त) सचेतन करने के लिए मैं
(प्रजापति) इनके अन्तःकरण में प्रविष्ट करूँ। ऐसा सोचकर उन्होंने स्वयं को वायु रूप में परिणत करके,
उन सभी (अपने द्वारा उत्पन्न किए हुए प्राणियों) में प्रविष्ट हो गये । वे एक होते हुए भी पाँच रूपों में
विभक्त हो गये। जो प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान के रूप में जाने गये ॥ ६॥
अथ योऽयमूर्ध्वमुत्क्रामतीत्येष वाव स प्राणोऽथ योयमवाञ्चं संक्रामत्येष वाव
सोऽपानोऽथ योऽयं स्थविष्ठमन्नधातुमपाने स्थापयत्यणिष्ठं चाङ्गेऽङ्गे समं नयत्येष वाव स
समानोऽथ योऽयं पीताशितमुद्गिरति निगिरतीति चैष वाव स उदानोऽथ येनैताः शिरा
अनुव्याप्ता एष वाव स व्यानः ॥ ७॥
जो ऊर्ध्व की ओर गमन करता है, वह प्राण कहलाता है। जो नीचे की ओर जाता है, वह अपान
के नाम से जाना जाता है। जो अत्यन्त स्थूल अन्न एवं धातु को पाचन तन्त्र (ऊर्जा को) के माध्यम से अपान
में प्रतिष्ठित करता है तथा सूक्ष्म रूप से अंग-प्रत्यंग में समान रूप से पहुँच जाए, उसे समान कहते हैं। जो
खाये-पिये पदार्थ को उगलता और निगलता है, उसे उदान कहते हैं और जिस वायु से समस्त नाड़ियाँ
परिपूर्ण हैं, वही व्यान कहलाता है ॥ ७॥
अथोपांशुरन्तर्याम्यभिभवत्यन्तर्याममुपांशुमेतयोरन्तराले चौष्ण्यं प्रास्रवद्यदौष्ण्यं स
पुरुषोऽथ यः पुरुषः सोऽग्निर्वैश्वानरोऽप्यन्यत्राप्युक्तमयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषो
येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यदेतत्कर्णावपिधाय शृणोति
सयदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषं शृणोति ॥ ८॥
जो समीप रहते हुए भी अन्तर्यामी (अन्तरिक्ष को जानने वाला) है तथा जो एक प्रहर के अन्तराल
में पराभव कर देता है, ऐसे उन दोनों के मध्य में जो उष्णता बरसती है, वह उष्णता ही पुरुष है। जो पुरुष
है, वही वैश्वानर नामक अग्नि है। अन्यत्र भी यह कहा गया है कि अन्तःकरण में विद्यमान 'पुरुष' ही
वैश्वानर रूप 'अग्निपुरुष' के नाम से जाना जाता है। इस (वैश्वानर रूप अग्नि) से खाया हुआ भोजन पचता
है। जो ग्रहण किया गया है, उसी का शब्द अन्तःकरण में सुनाई पड़ता है। कानों को बन्द करने पर यही
ध्वनि अन्दर से आती हुई सुनाई पड़ती है। जब शरीर से प्राणों के निकलने का समय होता है, तब यह
ध्वनि स्पष्ट रूप से सुनायी नहीं पड़ती ॥ ८ ॥
स वा एष पञ्चधात्मानं प्रविभज्य निहितो गुहायां मनोमयः प्राणशरीरो बहुरूपः सत्यसंकल्प
आत्मेति स वा एषोऽस्य हृदन्तरे तिष्ठन्नकृतार्थोऽमन्यतार्थानसानि तत्स्वानीमानि भित्त्वोदितः पञ्चभी
रश्मिभिर्विषयानत्तीति बुद्धीन्द्रियाणि यानीमान्येतान्यस्य रश्मयः कर्मेन्द्रियाण्यस्य हया रथः शरीरं
मनो नियन्ता प्रकृतिमयोऽस्य प्रतोदनेन खल्वीरितं परिभ्रमतीदं शरीरं चक्रमिव मृते च नेदं शरीरं
चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयिता चैषोऽस्येति ॥ ९॥
प्रपाठक ३ मन्त्र १ ३८७
प्रपाठक ३ मन्त्र १ ३८७
वह यह प्रजापति रूपी आत्मा स्वयं ही अपने को पाँच भागों में विभक्त करके हृदयरूपी गुहा
(गुफा) क्षेत्र में प्रतिष्ठित है। यही आत्मा मनोमय रूप में, प्राणमय रूप में एवं तेजोमय रूप में, संकल्प रूप
में तथा आकाशात्म रूप में अवस्थित है। इस प्रकार यह आत्मा हृदय प्रदेश में स्थित रहते हुए इन्द्रियों का
अनुभव न करता हुआ स्वयं को अकृतार्थ अनुभव करने लगा। तदनन्तर अपने आप को कृतकृत्य करने हेतु
पाँच द्वारों (इन्द्रियों) का बेधन करके प्रादुर्भूत हुआ। ये पाँच द्वार ही (श्रोत्रादि) पाँच इन्द्रियों के रूप में
परिणत हो गये, जिनसे वह विषयों का उपभोग करता है। ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ लगाम हैं तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ
घोड़े हैं। शरीर को रथ एवं मन को सारथि की संज्ञा प्रदान की गई है और स्वभाव (प्रकृति) को चाबुक
कहा गया है। इस चाबुक से प्रेरणा प्राप्त करके यह शरीर चक्र की भाँति गमन करता है। इस प्रकार यह
आत्मा ही इस शरीर को सचेतन बनाए हुए है तथा इसे प्रेरित करता रहता है ॥ ९॥
स वा एष आत्मेत्यदो वशं नीत एव सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमान
इव प्रतिशरीरेषु चरत्यव्यक्तत्वात्सूक्ष्मत्वाददृश्यत्वादग्राह्यत्वान्निर्ममत्वाच्चानव-
स्थोऽकर्ता कर्तेवावस्थितः ॥ १०॥
ऐसा प्रतीत होता है कि यह आत्मा ही शरीर के वशीभूत होकर शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप बन्धन
में फँस गया है। इसी कारण वह (आत्मा) विविध शरीरों में संचरित होता रहता है, परन्तु चिन्तन करने पर
ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में वह अव्यक्त, सूक्ष्म, अदृश्य, अग्राह्य, ममता से रहित एवं अवस्था
(जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) रहित है। अतः वह (आत्मा) अकर्त्ता होते हुए भी कर्त्तारूप में प्रतीत होता है ॥ १० ॥
स वा एष शुद्धः स्थिरोऽचलश्चालेपोऽव्यग्रो निःस्पृहः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्य
चरितभुग्गुणमयेन पटेनात्मानमन्तर्धायावस्थित इत्यवस्थित इति ॥ ११ ॥
यह (आत्मा) शुद्ध, स्थिर, अचल, निर्लिप्त, उद्विग्रता रहित, निःस्पृह द्रष्टा की भाँति रहते हुए अपने
द्वारा किये गये कर्मों के फल का उपभोग करता हुआ-सा प्रतीत होता है। साथ ही यह भी प्रतीत होता है
कि उस आत्मा ने अपने रूप को तीन गुणों (सत्, रज, तम,) रूपी वस्त्र द्वारा आच्छादित कर रखा है ॥ ११ ॥
॥ तृतीयः प्रपाठकः॥
ते होचुर्भगवन्यद्येवमस्यात्मनो महिमानं सूचयसीत्यन्यो वा परः कोऽयमात्मा
सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमानः सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वां वा गतिं
द्वन्द्वैरभिभूयमानः परिभ्रमतीति कतम एष इति तान्होवाच ॥ १ ॥
महर्षि ने पुनः प्रश्न किया - हे भगवन् ! इस आत्मा की महिमा का वर्णन यदि इस प्रकार है, तो पुनः
वह (आत्मा) श्रेष्ठ एवं निकृष्ट कर्मों के बन्धन में बँधा हुआ तथा अच्छी-बुरी योनियों में घूमता हुआ क्या
कोई अन्य आत्मा है ? सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अभिभूत ऊर्ध्वगामी अथवा अधोगामी गतियों में विचरण
करने वाला कौन है ? ॥ १ ॥
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमानः
सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वां गतिं द्वन्द्वैरभिभूयमानः परिभ्रमतीत्यस्योपव्याख्यानं
पञ्च तन्मात्राणि भूतशब्देनोच्यन्ते पञ्च महाभूतानि भूतशब्देनोच्यन्तेऽथ तेषां यः समुदायः
३८८ मैत्रायण्युपनिषद्
शरीरमित्युक्तमथ यो ह खलु वाव शरीरमित्युक्तं स भूतात्मेत्युक्तमथास्ति तस्यात्मा बिन्दुरिव
पुष्कर इति स वा एषोऽभिभूतः प्राकृतैर्गुणैरित्यतोऽभिभूतत्वात्संमूढत्वं प्रयातस्संमूढत्वादा-
त्मस्थं प्रभुं भगवन्तं कारयितारं नापश्यद्गुणौघैस्तृप्यमानः कलुषीकृतश्चास्थिरश्चञ्चलो
लोलुप्यमानः सस्पृहो व्यग्रश्चाभिमानत्वं प्रयात इत्यहं सो ममेदमित्येवं मन्यमानो
निबध्नात्यात्मनात्मानं जालेनेव खचरः कृतस्यानुफलैरभिभूयमानः परिभ्रमतीति ॥ २ ॥
(हे श्रेष्ठ महर्षे!) जो शुभ - अशुभ कर्मों के कारण अधोगामी हुआ है, वह तो दूसरा भूतात्मा
(जीवात्मा) के नाम से जाना जाता है तथा वह कर्मानुसार अच्छी-बुरी योनियों में गमन करता है, ऊँची-
नीची गतियों को प्राप्त करता है, साथ ही सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से प्रभावित होता है। पंचभूतों और तन्मात्राओं
को 'भूत' कहा जाता है। इनका समुच्चय ही शरीर है। इस कारण से इस शरीर को भूतात्मा (भूतात्मक)
कहा जाता है। शरीर में निवास करने वाली यह आत्मा तो कमल के पत्तों में रहने वाली बूंदों की भाँति है;
किन्तु वह अपने प्राकृतिक गुणों से प्रभावित-पराजित होकर मूढ़ बन गया है। इस कारण वह अपने अन्दर
उपस्थित प्रेरक परमात्मतत्त्व को नहीं देख सकता। इस तरह वह सद्गुणों से तृप्त होता हुआ पापयुक्त,
अस्थिर, चञ्चल, लोलुप, विषयासक्त, व्यग्र एवं अभिमानी होकर अहंकार युक्त हो जाता है। उसके अन्दर
यह भाव आने लगते हैं कि 'यह मैं हूँ' 'यह मेरा है', इस प्रकार वह पक्षी की भाँति जालरूपी विकारों में
फँस जाता है। वह अपने द्वारा कृत-कर्मों के फलस्वरूप खुद ही आबद्ध होकर विचरण करता है ॥ २ ॥
अथान्यत्राप्युक्तं यः कर्ता सोऽयं वै भूतात्मा करणैः कारयितान्तःपुरुषोऽथ
यथाग्निनायःपिण्डो वाभिभूतः कर्तृभिर्हन्यमानो नानात्वमुपैत्येवं वाव खल्वसौ
भूतात्मान्तःपुरुषेणाभिभूतो गुणैर्हन्यमानो नानात्वमुपैत्यथ यत्त्रिगुणं चतुरशीतिलक्ष-
योनिपरिणतं भूतत्रिगुणमेतद्वै नानात्वस्य रूपं तानि ह वा इमानि गुणानि पुरुषेणेरितानि
चक्रमिव चक्रिणेत्यथ यथायःपिण्डे हन्यमाने नाग्निरभिभूयत्येवं नाभिभूयत्यसौ
पुरुषोऽभिभूयत्ययं भूतात्मोपसंश्लिष्टत्वादिति ॥ ३ ॥
अन्य स्थलों पर भी कहा गया है कि कर्त्तापन तो इस भूतात्मा का ही है। अन्तःकरण में विद्यमान
रहने वाली पवित्रात्मा तो मात्र प्रेरणा प्रदान करने वाली है। जिस प्रकार लोहे को अग्नि में तप्त करके लुहार
उसे विभिन्न रूपों में परिणत कर देता है, उसी प्रकार यह भूतात्मा शुद्ध आत्मा के द्वारा तप्त तथा सद्गुणों के
द्वारा सतत प्रहार करने पर वह अन्य अनेक रूपों में परिणत हो जाता है। अर्थात् वह गुणों से युक्त हो चौरासी
लाख योनियों में भ्रमण करता रहता है, यही अनेकत्व का स्वरूप है। जिस प्रकार चक्र (चाक) को
संचालित करने वाला कुम्हार चाक से अलग रहता है, उसी तरह आत्मा (सत्, रज और तम) इन तीनों
गुणों से पृथक् है। जिस प्रकार लौह खण्ड को पीटने से उसमें स्थित अग्नि नहीं पीटी जाती, वैसे ही शुद्ध
आत्मा विकाररहित होता है, परन्तु उस (शुद्ध आत्मा) को भूतात्मा के संसर्ग का दोष लग जाता है ॥ ३ ॥
[ लाल गर्म लोहा अग्नि जैसा दिखने लगता है, उसी स्थिति में उसे हथौड़े से पीटकर इच्छित आकार दिया जा
सकता है। इसी प्रकार आत्म तत्त्व के संसर्ग से पंचभूत जब चेतनायुक्त दिखते हैं, तभी उन्हें गुणों के प्रहार या दबाव
से इच्छित आकार दिया जाता है।]
अथान्यत्राप्युक्तं शरीरमिदं मैथुनादेवोद्भूतं संविद्धयुपेतं निरय एव मूत्रद्वारेण
निष्क्रान्तमस्थिभिश्चतं मांसेनानुलिप्तं चर्मणावबद्धं विण्मूत्रे पित्तकफमज्जामेदोवसाभिरन्यैश्च
मलैर्बहुभिः परिपूर्णं कोश इवावसन्नेति ॥ ४ ॥
प्रपाठक ४ मन्त्र २ ३८९
प्रपाठक ४ मन्त्र २ ३८९
इसके अतिरिक्त एक अन्य स्थल पर यह भी संकेत मिलता है कि स्त्री-पुरुष के संयोग से जिस
शरीर का प्रादुर्भाव होता है, वह चेतना शून्य है तथा नरक जैसा प्रतीत होता है। मूत्र द्वार से बहिर्गमन होने
वाला यह शरीर हड्डियों के द्वारा गठित किया गया है। मांस से अनुलिप्त है तथा चर्म के द्वारा आबद्ध किया
गया है। मल, मूत्र, पित्त, कफ, मज्जा, मेद, वसा आदि से युक्त है। इसके अतिरिक्त अन्य कई तरह के मलों
से भी परिपूर्ण है। यह शरीर ऐसा लगता है कि सभी विकार युक्त पदार्थों का कोषागार ही है॥४॥
अथान्यत्राप्युक्तं संमोहो भयं विषादो निद्रा तन्द्री व्रणो जरा शोकः क्षुत्पिपासा
कार्पण्यं क्रोधो नास्तिक्यमज्ञानं मात्सर्यं वैकारुण्यं मूढत्वं निर्व्रीडत्वं निकृतत्वमुद्धतत्वमस-
मत्वमिति तामसान्वितस्तृष्णा स्नेहो रागो लोभो हिंसा रतिर्दृष्टिर्व्यापृतत्वमीर्ष्या काममस्थिरत्वं
चञ्चलत्वं जिहीर्षाऽर्थोपार्जनं मित्रानुग्रहणं परिग्रहावलम्बोऽनिष्टेष्विन्द्रियार्थेषु
द्विष्टिरिष्टेष्वभिषङ्ग इति राजसान्वितैः परिपूर्ण एतैरभिभूत इत्ययं भूतात्मा तस्मान्नाना-
रूपाण्याप्नोतीत्याप्नोतीति॥ ५॥
एक अन्य स्थान में यह भी कहा गया है कि मोह, भय, विषाद, निद्रा, तन्द्रा, वृद्धावस्था, शोक,
दुःख, भूख, प्यास, कार्पण्य (दीनता), क्रोध, नास्तिकता, अज्ञान, मात्सर्य, विकार, मूढ़ता, निर्लज्जता,
उद्धतता, विषमता, कृतघ्नता आदि तमोगुण के विकारों से यह शरीर परिपूर्ण है। इसके अतिरिक्त तृष्णा,
स्नेह, रोग, लोभ, हिंसा, काम-दृष्टि, व्यापार, ईर्ष्या, स्वेच्छाचारिता, चंचलता, किसी की वस्तु को ग्रहण
करने की इच्छा, धनोपार्जन की इच्छा, मित्रों का अनुग्रह, परिग्रह का आश्रय, इन्द्रियों का अप्रिय विषयों से
द्वेष और प्रिय विषयों से आसक्ति आदि रजोगुण से युक्त विकार भी उस भूतात्मा में विद्यमान रहते हैं। इन
सभी विकारों के द्वारा यह भूतात्मा पराभव को प्राप्त होता है तथा पुनः अनेक रूपों को प्राप्त करता है ॥५॥
॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥
ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसोऽतिविस्मिता अतिसमेत्योचुर्भगवन्नमस्ते त्वं नः शाधि
त्वमस्माकं गतिरन्या न विद्यत इत्यस्य कोऽतिथिर्भूतात्मनो येनेदं हित्वात्मन्येव सायुज्यमुपैति
तान्होवाच ॥ १ ॥
ब्रह्मा जी के द्वारा दिये हुए उपदेश को सुनकर ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचारी) श्रेष्ठ मुनि वालखिल्य
जी अत्यधिक विस्मित हुए एवं निकट में जाकर कहा- हे भगवन्! आपको नमस्कार है। आप ही हमें शरण
देने वाले हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कोई हमारा शरण स्थल नहीं। अतः आप हमें यह समझाएँ कि इस
भूतात्मा का अतिथि कौन है, जिसके लिए यह सर्वस्व त्यागकर आत्मा में ही सायुज्य प्राप्त करता है ? ॥ १॥
अथान्यत्राप्युक्तं महानदीभूरमय इव निवर्तकमस्य यत्पुराकृतं समुद्रवेलेव दुर्निवार्यमस्य
मृत्योरागमनं सदसत्फलमयैर्हि पाशैः पशुरिव बद्धं बन्धनस्थस्येवास्वातन्त्र्यं यमविषयस्थ-
स्येव बहुभयावस्थं मदिरोन्मत्त इवामोदमदिरोन्मत्तं पाप्मना गृहीत इव भ्राम्यमाणं महोरगदष्ट
इव विपद्दष्टं महान्धकार इव रागान्धमिन्द्रजालमिव मायामयं स्वप्न इव मिथ्यादर्शनं कदली-
गर्भ इवासारं नट इव क्षणवेषं चित्रभित्तिरिव मिथ्यामनोरममित्यथोक्तम् । शब्दस्पर्शादयो
येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः । येष्वासक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् ॥ २ ॥
३९० मैत्रायण्युपनिषद्
ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि हे श्रेष्ठ मुने ! एक अन्य स्थान में कहा गया है कि जैसे बड़ी-बड़ी नदियों
में तरंगें उठती रहती हैं, वैसे ही भूतात्मा में पूर्वकाल में किये हुए कर्म पाये जाते हैं। उन किये हुए कर्मों
का फल इसे भोगना ही पड़ता है। पुनः जिस तरह समुद्र का किनारा लहरों के अन्त होने के लिए आवश्यक
है, उसी तरह भूतात्मा के लिए मृत्यु भी अति आवश्यक है, वह शुभ व अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप
बन्धनों में पशुओं की तरह आबद्ध हुआ परतन्त्र- सा बन गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह (भूतात्मा)
यम के राज्य में ही निवास करता है। इस तरह वह भूतात्मा हमेशा डरा हुआ सा ही बना रहता है। विषय-
वासना की सुखरूपी मदिरा का पान करके वह मतवाला हो जाता है। पापरूपी भूत के द्वारा आवेशित हुआ
वह यत्र-तत्र भटकता रहता है। इस प्रकार वह विपत्ति में विषधर सर्प-दंश की भाँति दुःख भोगता है।
विषय-वासनाओं की इच्छा के अनुरूप घने अन्धकार में रहता हुआ वह अन्धा ही हो जाता है। जादूगर के
जादू की भाँति वह माया से परिपूर्ण है, स्वप्नवत् वह मिथ्या ही परिलक्षित होता है। केले के वृक्ष के अन्तः
भाग की भाँति वह सार रहित है और नट (तमाशा दिखाने वाले) की भाँति वह प्रतिक्षण नवीन से नवीनतम
वेशों को धारण करता रहता है तथा चित्रों से सुसज्जित दीवार की तरह उसका बाह्य आवरण ही सुन्दर रहता
है। इसके पश्चात् यह भी कहा गया है कि शब्द, स्पर्श आदि विषय साररहित हैं। उन सार रहित विषयों में
आसक्त हुआ भूतात्मा स्वयं को ही यथार्थतया स्मरण नहीं रख पाता है ॥ २॥
अयं वाव खल्वस्य प्रतिविधिर्भूतात्मनो यदेव विद्याधिगमस्य धर्मस्यानुचरणं
स्वाश्रमेष्वेवानुक्रमणं स्वधर्म एव सर्वं धत्ते स्तम्बशाखेवेतराण्यनेनोर्ध्वभागभवत्यन्यथाधः
पतत्येष स्वधर्माभिभूतो यो वेदेषु न स्वधर्मातिक्रमेणाश्रमी भवत्याश्रमेष्वेवावस्थितस्तपस्वी
चेत्युच्यत एतदप्युक्तं नातपस्कस्यात्मध्यानेऽधिगमः कर्मशुद्धिर्वेत्येवं ह्याह। तपसा प्राप्यते
सत्त्वं सत्त्वात्संप्राप्यते मनः । मनसा प्राप्यते त्वात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तत इति ॥ ३॥
इस भूतात्मा की मुक्ति का उपाय ब्रह्मा जी इस प्रकार बताते हैं- ज्ञान की प्राप्ति जिस धर्म से हो
सके, ऐसे श्रेष्ठ धर्म का आचरण करना चाहिए तथा अपने आश्रम धर्म का सदा पालन करना चाहिए। अन्य
धर्म तो गुल्म (तृण) की शाखा की भाँति असत्य हैं। अतः वह (भूतात्मा) अपने धर्म के द्वारा ही प्रगति
को प्राप्त करता है, अन्य तरह के धर्मों से तो उसे अवनति की ओर ही जाना पड़ता है। वेद में वर्णित स्वधर्म
का परित्याग करने वाला आश्रमी नहीं कहा जा सकता। जो (व्यक्ति) आश्रम धर्म का निर्वाह करता है,
वही तपस्वी है। यह भी कहा गया है कि जो तपस्वी नहीं है, उसका ध्यान आत्मा में नहीं एकाग्र होता।
इस कारण से उसकी कर्म शुद्धि नहीं हो पाती। तप के माध्यम से ज्ञान की उपलब्धि होती है और ज्ञान की
प्राप्ति होने पर मन अपने वश में हो जाता है। मन के वशीभूत होने पर आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है और
आत्मा की उपलब्धि से इस संसार सागर से मुक्ति मिल जाती है ॥ ३ ॥
[ आश्रम का अर्थ होता है, जहाँ आश्रित-स्थित है। जो चेतना अग्नि में स्थित है, वह अग्नि के अनुरूप धर्म
का पालन करती है, जो जल में अथवा वायु में है; वह उसी के अनुरूप धर्म का पालन करती है। इसी तरह मनुष्य
शरीरस्थ चेतना-आत्मा को मानव धर्म का तथा उसके अन्तर्गत देश, काल, पात्र के अनुरूप धर्म का पालन करना
चाहिए। इसी धर्म पालन रूप तप से कर्मशुद्धि द्वारा मोक्ष का अधिकार बनता है।]
अत्रैते श्लोका भवन्ति-
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति ।
तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥ क ॥
यहाँ ब्रह्मा जी ने कुछ श्लोकों के द्वारा भी श्रेष्ठ मुनि वालखिल्य जी को समझाने का प्रयास किया है-
प्रपाठक ४ मन्त्र ३ ३९१
प्रपाठक ४ मन्त्र ३ ३९१
जैसे अग्नि में लकड़ी के जलकर समाप्त होने पर अग्नि स्वयं ही अपने स्थान में शान्त हो जाती है,
वैसे ही वृत्तियों का क्षय होने पर चित्त स्वयं ही अपने उत्पत्ति स्थल में शान्त हो जाता है ॥ क ॥
स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यगामिनः ।
इन्द्रियार्था विमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥ ख ॥
अपने उद्गम स्थल में शान्त मन जब सत्य की ओर गमन करता है, तब कर्म के वशीभूत इन्द्रियों
के प्रति आसक्ति आदि भोग विषय उसे असत्य प्रतीत होते हैं ॥ ख ॥
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् ।
यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥ ग ॥
चित्त ही संसार है, इस कारण प्रयत्नपूर्वक चित्त का शोधन करना चाहिए। जिस प्रकार (व्यक्ति) का
चित्त होता है, उसी प्रकार ही उसे गति (दशा) प्राप्त होती है। यही सनातन नियम है ॥ ग ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमव्ययमश्नुते ॥ घ ॥
चित्त के शान्त होने पर शुभ और अशुभ कर्म विनष्ट हो जाते हैं। चित्त के द्वारा शान्त हुआ व्यक्ति जब
(चिन्तन के माध्यम से) आत्मा में स्थित होता है, तभी उसे अक्षय आनन्द की अनुभूति होती है ॥ घ ॥
समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे ।
यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ ङ ॥
मनुष्य का चित्त जितना अधिक विषय-वासनाओं (भोगों) में आसक्त होता है, यदि उतना ही कहीं
(उसका चित्त) 'ब्रह्म' के प्रति आसक्त हो जाए, तो फिर उसे वासनादि विषयों के बन्धन से मुक्ति क्यों
न मिल जाए ? ॥ ङ ॥
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च ।
अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ च ॥
शुद्ध और अशुद्ध यह दो स्थितियाँ मन की कही गयी हैं। कामनाओं के संकल्प से युक्त (मन)
अशुद्ध है तथा कामनाओं का परित्याग कर देने वाला मन ही शुद्ध है ॥ च ॥
लयविक्षेपरहितं मनः कृत्वा सुनिश्चलम्।
यदा यात्यमनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ छ ॥
लय और विक्षेपरहित 'मन' पूर्णरूपेण निश्चल (स्थिर) हो जाता है और जब मनोभावों (कामनाओं)
का समापन हो जाता है, तभी वह परम-पद रूप को प्राप्त होता है ॥ छ ॥
तावदेव निरोद्धव्यं हृदि यावत्क्षयं गतम्।
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रन्थविस्तराः ॥ ज ॥
जब तक मन का क्षय (विनाश) न हो, तब तक ही उसका हृदय में निरोध करना चाहिए। मात्र
यही ज्ञान एवं मोक्ष का सार है, अन्य शेष का तो ग्रन्थों में विस्तार किया गया है ॥ ज ॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं लभेत् ।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥ झ ॥
३१२ मैत्रायण्युपनिषद्
समाधि के द्वारा जिसके मल का परिशोधन हो गया है तथा जो आत्मा में विलीन हो गया है, ऐसा
'चित्त' ही आनन्दानुभूति की प्राप्ति कर सकता है। तब उसका वर्णन वाणी के द्वारा करने में कोई भी समर्थ
नहीं है, उसको तो मात्र अन्तःकरण के द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है ॥ झ॥
अपामपोऽग्निरग्नौ वा व्योम्नि व्योम न लक्षयेत्।
एवमन्तर्गतं चित्तं पुरुषः प्रतिमुच्यते ॥ ञ ॥
जैसे जल में जल, अग्नि में अग्नि और आकाश में आकाश का विलय हो जाने पर उसके सभी
भिन्न-भिन्न रूप परिलक्षित नहीं होते, वैसे ही चित्त का (आत्मा में) विलय हो जाने पर 'पुरुष' मुक्ति को
प्राप्त कर लेता है ॥ ञ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतमिति ॥ ट ॥
'मन' ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त हुआ मन ही बन्धन का
कारण है तथा विषयों से रहित अर्थात् विषयों में आसक्त न रहने वाला 'मन' ही मुक्ति का कारण है ॥ ट ॥
अथ यथेयं कौत्सायनिस्तुतिः-त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वं प्रजापतिः। त्वमग्निर्वरुणो वायुस्त्वमिन्द्रस्त्वं निशाकरः ॥ ठ॥
इसी प्रकार कौत्सायनि ऋषि की भी प्रशंसोक्ति है-'तुम ब्रह्मा हो, विष्णु हो, रुद्र हो। तुम प्रजापति
हो, तुम अग्नि हो, तुम वरुण हो, तुम वायु हो, तुम इन्द्र हो और तुम्हीं निशाकर (चन्द्रमा) हो' ॥ ठ॥
त्वं मनुस्त्वं यमश्च त्वं पृथिवी त्वमथाच्युतः।
स्वार्थे स्वाभाविकेडर्थे च बहुधा तिष्ठसे दिवि ॥ ड ॥
तुम मनु हो, तुम यम हो, तुम पृथ्वी हो, तुम अच्युत हो, तुम्हीं अपने विषय रूप में स्वाभाविक अर्थ
हो तथा तुम्हीं स्वयं अपने-आप में भी विभिन्न रूपों में प्रतिष्ठित रहते हो ॥ ड ॥
विश्वेश्वर नमस्तुभ्यं विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।
विश्वभुग्विश्वमायस्त्वं विश्वक्रीडारतिः प्रभुः ॥ ढ ॥
हे सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ही सम्पूर्ण विश्व की आत्मा हैं, विश्व के समस्त कार्यों को
करने वाले हैं। सभी के भरण-पोषण करने वाले हैं। सब प्रकार की माया को धारण करने वाले, सर्वत्र
विश्व-क्रीड़ा में प्रेम रखने वाले आप सभी के प्रभु हैं॥ ढ॥
नमः शान्तात्मने तुभ्यं नमो गुह्यतमाय च।
अचिन्त्यायाप्रमेयाय अनादिनिधनाय चेति ॥ ण ॥ ४ ॥
हे शान्त आत्मा वाले! आपको नमस्कार है। अतिशय गूढ़, अचिन्त्य, प्रमाणों से न जान सकने योग्य
एवं आदि-अन्त रहित आपके लिए नमन-वंदन है॥ ण॥ ४॥
तमो वा इदमेकमास तत्पश्चात्त्तत्परेणेरितं विषयत्वं प्रयात्येतद्वै रजसो रूपं तद्रजः
खल्वीरितं विषमत्वं प्रयात्येतद्वै तमसो रूपं तत्ततः खल्वीरितं तमसःसंप्रास्रवत्येतद्वै सत्त्वस्य
रूपं तत्सत्त्वमेवेरितं तत्सत्त्वात्संप्रास्रवत्सोंऽशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः
संकल्पाध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिस्तस्य प्रोक्ता अग्यास्तनवो ब्रह्मा रुद्रो
प्रपाठक ५ मन्त्र १ ३९३
प्रपाठक ५ मन्त्र १ ३९३
विष्णुरित्यथ यो ह खलु वावास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं ब्रह्माथ यो ह खलु वावास्य
तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं रुद्रोऽथ यो ह खलु वावास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स एव विष्णुः
स वा .एष एकस्त्रिधाभूतोऽष्टधैकादशधा द्वादशधाऽपरिमितधा चोद्भूत उद्भूतत्वाद्भूतेषु
चरति प्रतिष्ठा सर्वभूतानामधिपतिर्बभूवेत्यसावात्मान्तर्बहिश्चान्तर्बहिश्च ॥ ५ ॥
सृष्टि-रचना के पूर्व यह (भूतात्मा) केवल अन्धकार (अज्ञान) रूप ही था। तत्पश्चात् परमात्मा द्वारा
प्रेरणा प्राप्त करके इन्द्रियों के विषय रूप में परिणत हो गया । इन (रूपों) में से यह वस्तु रजोगुण के रूप
में है। यह तमोगुण का भी स्वरूप है अर्थात् प्रेरणा प्राप्त तमोगुण ही तमोगुण में से प्रकट होता है। यह सत्त्व
गुण का भी रूप है अर्थात् प्रेरणा प्राप्त हुआ सत्त्वगुण ही सत्त्वगुणों में से स्रवित हुआ है। जो यह चेतन सत्ता
हर भूत-प्राणियों में क्षेत्रज्ञ जीव रूप से स्थिर है और परमात्मा का अंश है। वह संकल्प युक्त और
अध्यवसायी, दृढ़निश्चयी है, अहंकार रूप (मैं पन) से पहचाना जाने वाला तथा समस्त प्रजा का पति है।
ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र को ही परमात्मा का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ शरीर कहा गया है। उस परमात्मा के
रजोगुण अंश को 'ब्रह्मा' कहा गया है, तमोगुण अंश को 'रुद्र' और जो सतोगुण अंश है, उसे 'विष्णु' कहा
गया है। इस कारण से वह एक ही परमात्मा तीन (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) रूपों में, आठ (अष्टवसु) रूप में,
ग्यारह (रुद्र) रूपों में, बारह (आदित्य) रूपों में तथा अन्य (असंख्य संसारी जन रूप) अगणित रूपों में
उत्पन्न हुआ है। वह इस तरह 'उद्भूत' होते हुए भी प्रत्येक भूतों-प्राणियों में स्थित है। वही समस्त प्राणियों
का अधिष्ठाता है और वही अन्दर-बाहर आत्मा के रूप में विद्यमान है। वही अन्दर और बाहर है ॥ ५ ॥
॥ पंचमः प्रपाठकः ॥
द्विधा वा एष आत्मानं बिभर्त्ययं यः प्राणो यश्चासावादित्योऽथ द्वौ वा एतावास्तां
पञ्चधा नामान्तर्बहिश्चाहोरात्रे तौ व्यावर्तते असौ वा आदित्यो बहिरात्मान्तरात्मा प्राणो
बहिरात्मागत्यान्तरात्मनानुमीयते । गतिरित्येवं ह्याह यः कश्चिद्विद्वानपहतपाप्मा-
ध्यक्षोऽवदातमनास्तन्निष्ठ आवृत्तचक्षुः सोऽन्तरात्मागत्या बहिरात्मनोनुमीयते गतिरित्येवं
ह्याहाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो यः पश्यति मां हिरण्यवत्स एषोऽन्तरे हृत्पुष्कर
एवाश्रितोऽन्नमत्ति ॥ १ ॥
वह परमात्मा दो प्रकार की आत्माओं (स्वरूपों) को ग्रहण करता है। यह जो प्राण है तथा जो सूर्य
है, यही दोनों सर्वप्रथम उत्पन्न हुए है। यह सूर्य बाह्य आत्मा है और प्राण अन्तः की आत्मा है। इसकी गति
को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि यह अन्तरात्मा ही है। वेदों में कहा गया है कि यह आत्मा
गतिरूप ही है। जिस विद्वान् के पापों का शमन हो चुका है, वह सभी का अध्यक्ष होता है। उसका मन
पवित्र होता है तथा उसकी स्थिति परमात्मा में ही रहती है। उस (विद्वान्) का ज्ञान-चक्षु जाग्रत् हो जाता
है तथा वह अन्तरात्मा में ही स्थिर रहता है। वह गतिशील होता हुआ बहिर्गमन कर जाता है। आत्मा की
गति का अनुमान लगाया जा सकता है, ऐसा वेदों ने भी प्रतिपादित किया है। सूर्य के मध्य भाग में जो
'पुरुष' स्वर्ण के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जो हमें हिरण्यमय अर्थात् प्रकाश स्वरूप दृष्टिगोचर होता है,
वही (पुरुष) हृदयरूपी कमल में स्थित रहते हुए अन्न को ग्रहण करता है ॥ १ ॥
३९४ मैत्रायण्युपनिषद्
[ आत्मा को गति रूप कहा गया है। सुचालक (कन्डक्टर) में इलैक्ट्रॉन तो हर समय उपस्थित रहते हैं,
जब वे गतिशील होते हैं, तो विद्युत् प्रवाह का आभास होता है। इसी प्रकार आत्म-तत्त्व, परमात्म-तत्त्व सभी जगह
कण-कण में विद्यमान है, जब वह संकल्पपूर्वक गतिशील होता है, तभी चेतना का आभास होता है। यह ऋषियों
की अनुभूति से प्रकट हुआ तथ्य है।]
अथ य एषोऽन्तरे हृत्पुष्कर एवाश्रितोऽन्नमत्ति स एषोऽग्निर्दिवि श्रितः सौरः काला-
ख्योऽदृश्यःसर्वभूतान्नमत्ति कः पुष्करः किमयं वेद वा व तत्पुष्करं योऽयमाकाशो-
ऽस्येमाश्चतस्रो दिशश्चतस्र उपदिशः संस्था अयमर्वागग्निः परत एतौ प्राणादित्यावेता-
वुपासीतोमित्यक्षरेण व्याहृतिभिः सावित्र्या चेति ॥ २॥
जो (पुरुष) हृदय-कमल में विद्यमान एवं अन्न ग्रहण करता है, वही (पुरुष) इस सूर्य की अग्नि
के रूप में आकाश में प्रतिष्ठित है। यही काल-नाम से युक्त (पुरुष) है। वह अदृश्य होते हुए भी सर्वभूत
रूपी अन्न का भक्षण करता है। यह कमल क्या है ? यह क्या जानकारी रखता है ? इसका उत्तर यह है कि
जो यह आकाश है, यही कमल है और इसमें निवास करने वाला वह समस्त प्रकार की जानकारी रखता
है, वह इन चारों दिशाओं एवं उपदिशाओं में प्रतिष्ठित है। वह सभी से परे अर्थात् श्रेष्ठ है। इस प्राण और
आदित्य की ॐकार से युक्त एवं व्याहृतियों सहित गायत्री-सावित्री महामन्त्र से उपासना करनी चाहिए॥
[ ब्रह्मा को उत्पत्ति कमल से कही गयी है, उस आलंकारिक उक्ति को ऋषि स्पष्ट करते हुए आकाश को
ही कमल कहते हैं। परम व्योम में सुप्त स्थिति में परमात्मतत्त्व के नाभिक से स्फुरणा उभरी, वह कमल नाल
कहलायी। जिस क्षेत्र में स्फुरणा हुई, वह कमल कहलाया। उसी में विकसित सृजन चेतना-ब्रह्मा ने सृष्टि की।]
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चामूर्तं चाथ यन्मूर्तं तदसत्यं यदमूर्तं तत्सत्यं तद्ब्रह्म
यद्ब्रह्म तज्ज्योतिर्यज्ज्योतिः स आदित्यः स वा एष ओमित्येतदात्मा स त्रेधात्मानं व्यकुरुत
ओमिति तिस्रो मात्रा एताभिः सर्वमिदमोतं प्रोतं चैवास्मिन्नित्येवं ह्याहैतद्वा आदित्य
ओमित्येवं ध्यायंस्तथात्मानं युञ्जीतेति ॥ ३॥
ब्रह्म के दो रूप हैं- मूर्त और अमूर्त। जो मूर्तरूप है, वह असत्य है और जो अमूर्त रूप है, वह सत्य
है, वही (यथार्थ) ब्रह्म है। जो ब्रह्म है, वही ज्योति है और जो ज्योति है, वही आदित्य है। वही ॐकार
(प्रणव) है, वही आत्मा है। उसने अपने स्वरूप को तीन प्रकार से प्रकट किया है। ॐकार तीन मात्राओं
से युक्त है। इसी ॐकार में सभी तत्त्व विद्यमान हैं, इस तरह श्रुति में वर्णन मिलता है। आदित्य ही ॐकार
स्वरूप ब्रह्म है, ऐसा ध्यान करते हुए पुरुष को चाहिए कि वह आत्मा का उसके साथ संयोजन करे ॥ ३॥
अथान्यत्राप्युक्तमथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसावादित्य
उद्गीथ एव प्रणव इत्येवं ह्याहोद्गीथः प्रणवाख्यं प्रणेतारं नामरूपं विगतनिद्रं विजरमविमृत्युं
पुनः पञ्चधा ज्ञेयं निहितं गुहायामित्येवं ह्याहोर्ध्वमूलं वा आब्रह्मशाखा आकाश-
वाय्वग्न्युदकभूम्यादय एकेनाक्षमेतद्ब्रह्म तत्तस्यैतत्ते यदसावादित्य ओमित्येतदक्षरस्य
चैतत्स्मादोमित्यनेनैतदुपासीताजस्रमित्येकोऽस्य रसं बोधयीत इत्येवं ह्याहैतदेवाक्षरं
पुण्यमेतदेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ ४॥
तत्पश्चात् एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि जो उद्गीथ (उद्= प्राण, गीथ= अभिव्यक्ति)
है। वही ॐकार है। जो ॐकार (प्रणव) है, वही उद्गीथ है। जो प्रारम्भिक नाम से युक्त तत्त्व है, वही
प्रपाठक ५ मन्त्र ६ ३९५
प्रपाठक ५ मन्त्र ६ ३९५
सभी को प्रादुर्भूत करने वाला है। वह नाम तथा रूप से युक्त है, निद्रारहित और वृद्धावस्था से रहित हैं, मृत्यु
रहित हैं। इस प्रकार से उसे पाँच भागों (रूपों) में जानना चाहिए। वह हृदय रूप गुफा में ही निवास करता
है, ऐसा श्रुति का मत है। इस ॐकार रूप परमात्मा का मूल ऊर्ध्व की ओर और जहाँ तक ब्रह्म है, वहाँ
तक इसकी शाखाएँ फैली हुई हैं। वे समस्त शाखाएँ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी आदि के रूप
में हैं। इस एक ही तत्त्व के माध्यम से यह सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। वही ब्रह्म है। यह समस्त
विश्व उस (ॐकार) का ही स्वरूप हैं। यह सूर्य भी ॐकार का ही रूप है। अतः ॐकार के द्वारा उस
(सूर्य) की सदा प्रार्थना करनी चाहिए। इसी एकमात्र ॐकार से ही उसके रस का बोध किया जा सकता
है, ऐसा श्रुतियों का मत हैं। यही पवित्र 'अक्षर रूप ब्रह्म है', इसी ॐकाररूप अक्षर का बोध करके मनुष्य
जो भी चाहे, इच्छानुसार प्राप्त कर सकता है ॥ ४ ॥
अथान्यत्राप्युक्तं स्तनयत्येषास्य तनूर्या ओमिति स्त्रीपुंनपुंसकमिति लिङ्गवत्-
येषाथाग्निर्वायुरादित्य इति भास्वत्येषाथ रुद्रो विष्णुरित्यधिपतिरित्येषाथ गार्हपत्यो
दक्षिणाग्निराहवनीय इति मुखवत्येषाथ ऋग्यजुःसामेति विज्ञानात्येषाथ भूर्भुवः स्वरिति
लोकवत्येषाथ भूतं भव्यं भविष्यदिति कालवत्येषाथ प्राणोऽग्निः सूर्य इति प्रतापवत्येषा-
थान्नमापश्चन्द्रमा इत्याप्यायनवत्येषाथ बुद्धिर्मनोऽहंकार इति चेतनवत्येषाथ प्राणोऽपानो
व्यान इति प्राणवत्येके त्यजामीत्युक्तैताह प्रस्तोतार्पिता भवतीत्येवं ह्याहैतद्वै सत्यकाम परं
चापरं च यदोमित्येतदक्षरमिति ॥ ५ ॥
पुनः इसके पश्चात् अन्यत्र कहा गया हैं कि इस (ब्रह्मा) का शरीर जो शब्द उच्चारित करता हैं, उसे
ॐ कहते हैं। यह (ॐकार) स्त्री-पुरुष एवं नपुंसक इन तीनों लिङ्गों से युक्त है। अग्नि, वायु एवं सूर्य के
रूप में यह प्रकाश देने वाला है तथा ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु के रूप में अधिपति स्वरूप है। गार्हपत्य,
दक्षिणाग्नि और आहवनीय ये ही तीनों अग्नियाँ उसके तीन मुख हैं तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को
भी वह जानने में समर्थ है। भूः, भुवः और स्वः ये तीन लोक भी इसी के रूप हैं। उस ॐकार रूप ब्रह्म
के भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीन काल हैं। प्राण, अग्नि और आदित्य उसके प्रताप हैं। अन्न, जल और
चन्द्रमा उसके पोषक तत्त्व हैं। बुद्धि, मन और अहंकार ये तीनों उसकी चेतना हैं तथा प्राण, अपान एवं
व्यान उसके प्राण हैं। ऐसा ही अनेकों ने कहा है। यह स्तुति करने वाला तथा स्वयं अर्पित करनेवाला कहा
गया है, ऐसा श्रुति का वचन है। हे सत्य कामना वाले ! यही (ॐकार) पर एवं अपर रूप ब्रह्म हैं। यह
ॐकार ही अक्षर है ॥ ५ ॥
अथ व्यात्तं वा इदमासीत्सत्यं प्रजापतिस्तपस्तप्त्वा अनुव्याहरद्भूभुर्वः स्वरित्येषा
हाथ प्रजापतेः स्थविष्ठा तनूर्वा लोकवतीति स्वरित्यस्याः शिरो नाभिर्भुवो भूः पादा
आदित्यश्चक्षुरायत्तः पुरुषस्य महतो मात्राश्चक्षुषा ह्ययं मात्राश्चरति सत्यं वै
चक्षूरक्षिण्युपस्थितो हि पुरुषः सर्वार्थेषु वदत्येतस्माद्भूभुर्वः स्वरित्युपासीतान्नं हि प्रजापति-
र्विश्वात्मा विश्वचक्षुरिवोपासितो भवतीत्येवं ह्याहैषा वै प्रजापतिर्विश्वभृत्तनूरेतस्यामिदं
सर्वमन्तर्हितमस्मिंश्च सर्वस्मिन्नेषान्तर्हितेति तस्मादेषोपासीतेति ॥ ६ ॥
इसके अनन्तर इस (ॐकाररूप ब्रह्म) ने जो विस्तार किया, वही सत्य है। प्रजापति ने कठोर तप
३९६ मैत्रायण्युपनिषद्
करके उन तीन व्याहृतियों भूः, भुवः और स्वः का उच्चारण किया। यही (व्याहृतियाँ) प्रजापति का स्थूल
शरीर है। इसका निर्माण लोकों के द्वारा हुआ है। स्वः उसका मस्तक है, भुवः नाभि है, भूः पैर हैं और
आदित्य उसके नेत्र हैं। यह सब उसके अधीन है। महापुरुषों की ये मात्राएँ (अंश) हैं। यह (पुरुष) नेत्रों
के द्वारा इन मात्राओं में गमन करता है। सत्य ही नेत्र हैं। नेत्र में स्थित पुरुष ही सभी पदार्थों के विषय में
बतलाता है। अतः भूः, भुवः और स्वः इस विधि के अनुसार ही उपासना करनी चाहिए। अन्न ही प्रजापति
है। वह सभी का आत्मा तथा सभी का चक्षु है, वह उपास्य है, ऐसा वेद भी कहते हैं। यह प्रजापति ही
समस्त विश्व को धारण करने वाला शरीर है, इसमें वह सभी कुछ स्थित है तथा वह इन सभी में विद्यमान
है। अतः इसी श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करनी चाहिए ॥ ६ ॥
तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणाय आत्मकामेनेत्या-
हुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्गो देवस्य धीमहीति सविता वै तेऽवस्थिता योऽस्य भर्गः कं
संचिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ धियो यो नः प्रचोदयादिति बुद्धयो वै धियस्ता योऽस्माकं
प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्ग इति यो ह वा अस्मिन्नादित्ये निहितस्तारकेऽक्षिणि
वैष भर्गाख्यो भाभिर्गतिरस्य हीति भर्गो भर्जति वैष भर्ग इति रुद्रो ब्रह्मवादिनोऽथ भ
इति भासयतीमाँल्लोकान् र इति रञ्जयतीमानि भूतानि ग इति गच्छन्त्यस्मिन्नागच्छन्त्य-
स्मादिमाः प्रजास्तस्माद्भरगत्वाद्वर्गः। शश्वत्सूयमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदाना-
दादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्य इत्येवं ह्याह खल्वात्मनात्मामृताख्यश्चेता मन्ता
गन्ता स्रष्टाऽऽनन्दयिता कर्ता वक्ता रसयिता घ्राता स्पर्शयिता च विभुर्विग्रहे संनिविष्ट
इत्येवं ह्याहाथ यत्र द्वैतीभूतं विज्ञानं तत्र हि शृणोति पश्यति जिघ्रति रसयते चैव स्पर्शयति
सर्वमात्मा जानीतेति यत्राद्वैतीभूतं विज्ञानं कार्यकारणनिर्मुक्तं निर्वचनमनौपम्यं निरूपाख्यं
किं तदङ्ग वाच्यम् ॥ ७॥
'तत्सवितुर्वरेण्यं' यही उस सविता का प्रकाश है अथवा स्वयं ही यह आदित्य है और यही समस्त
प्राणि-समुदाय को उत्पन्न करने वाला 'सविता' है। ऐसा जानकर आत्मतत्त्व की इच्छा रखने वाले को,
उसी को ग्रहण करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ऐसा ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले कहते हैं। अब 'भर्गो
देवस्य धीमहि' इस पद का विवेचन करते हैं; इसके अनुसार क्योंकि वह 'भर्ग' सम्मुख ही उपस्थित रहता
है। उनका जो 'भर्ग' है, वह बुद्धि (ज्ञान) को प्राप्त करता रहता है। ब्रह्मवादी प्रायः प्रश्न करते रहते हैं कि
हम किसका चिंतन करें ? तो इसका उत्तर यह है कि हम उस 'भर्ग शक्ति' का ही ध्यान करें। अब 'धियो
यो नः प्रचोदयात्' की विवेचना करते हैं। इसके अनुसार बुद्धि को ही 'धी' कहते हैं। 'जो हमारी बुद्धि
को प्रेरणा प्रदान करता है - सन्मार्ग की ओर उन्मुख करता है' ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं। 'भर्ग' वही है,
जो सूर्य में निहित है। आँख की पुतली में भी 'भर्ग' स्थित है। इसकी कान्ति से मनुष्य गति करता है, अतः
यह 'भर्ग' है अथवा यह सभी को तप्त करता है, इस कारण से यह 'भर्ग' कहलाता है। यह रुद्र को ब्रह्म
मानने वालों के विचार हैं। 'भ' अर्थात् लोकों को प्रकाशित करने वाला, 'र' अर्थात् समस्त प्राणियों का
रञ्जन करने वाला एवं 'ग' अर्थात् प्राणियों-प्रजाओं के गमनागमन का आधार स्वरूप, इस प्रकार भ, र,
ग होने से भर्ग है। निरन्तर प्रसव (जन्म देने) के कारण सूर्य कहलाता है, सबको प्रादुर्भूत करने के कारण
प्रपाठक ५ मन्त्र ८ ३९७
प्रपाठक ५ मन्त्र ८ ३९७
'सविता' कहलाता है। सबको प्रकाश देने के कारण आदित्य और सबको पवित्र करता है, इससे
पवमान कहलाता है अथवा सभी की ओर गमन करने से तथा सभी का अयन (आश्रय स्थल) होने
से उसे 'आदित्य' कहते हैं। वह स्वयं ही आत्मा है। इसका नाम अमृत है, सर्वज्ञ है, चिन्तन करता
है, गति करता है, सृजन करता है, आनन्द प्रदान करता है, स्वयं कहता है, स्वाद लेता है, सूँघता है,
स्पर्श करता है, समस्त शरीर में व्याप्त रहता है और उत्तम स्वाद से युक्त है, ऐसा (वेद) कहते हैं।
जहाँ पर विज्ञान द्वैत (दो) रूप में होता है, वहाँ जो सुनता है, देखता है, सूँघता है, स्वाद लेता है और
स्पर्श करता है, वह सब आत्मा ही है, इस तरह से तुम ऐसा निश्चय रखो। जहाँ विज्ञान अद्वैत हो
जाता है, वहाँ कार्य और कारण से रहित, वर्णनातीत, उपमारहित तथा व्याख्या विहीन हो जाता है।
ऐसे उस 'भर्ग-शक्ति' के संदर्भ में क्या कहा जाए ? ॥ ७॥
एष हि खल्वात्मेशानः शंभुर्भवो रुद्रः प्रजापतिर्विश्वसृद्धिरण्यगर्भः सत्यं प्राणो
हंसः शास्ता विष्णुर्नारायणोऽर्कः सविता धाता सम्राडिन्द्र इन्दुरिति य एष तपत्यग्निना
पिहितः सहस्राक्षेण हिरण्मयेनानन्देनैष वाव विजिज्ञासितव्योऽन्वेष्टव्यः सर्वभूतेभ्योऽभयं
दत्त्वारण्यं गत्वाथ बहिःकृतेन्द्रियार्थान्स्वशरीरादुपलभतेऽथैनमिति विश्वरूपं हरिणं
जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः
प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८॥
(हे श्रेष्ठ मुने!) यही आत्मा है, यही सबका नियन्ता, ईश्वर, शंकर, भव, रुद्र, प्रजापति,
विश्वस्रष्टा, हिरण्यगर्भ, सत्य, प्राण, हंस, शास्ता (उपदेशक), विष्णु, नारायण, अर्क, सविता, धाता,
सम्राट्, इन्द्र और चन्द्र भी वही है। जो इस अग्नि के रूप में तप है और सहस्रों के चक्षु रूप में
प्रकाशमय आनन्द से परिपूर्ण है, वही जानने योग्य है। सभी प्राणियों को अभय-दान प्रदान करके
तपोवन में जाकर उस 'ॐकार' का अनुसंधान करना चाहिए। (जो मनुष्य) इन्द्रियों के विषय-
भोगों का बहिष्कार करते हैं, उनको अपने शरीर में से ही वह (प्रकाश तत्त्व) प्राप्त हो जाता है। यही
विश्वरूप, मनोहर, जन्म ग्रहण करने वालों का पूर्ण ज्ञाता है, सभी का परम आश्रय स्थल और
ज्योतिरूप से तप्त (प्रकाशित) होता है। यह सूर्य-सविता (परमात्मा) सहस्रों रश्मियों से युक्त,
सैकड़ों तरह से वर्तमान तथा समस्त प्रजाजनों का प्राणरूप होकर प्रकट होता है ॥ ८ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु..........इति। शान्तिः ॥
॥ इति मैत्रायण्युपनिषत्समाप्ता ॥
॥ शिवसङ्कल्पापनिषद् ॥
यह उपनिषद् ‘ईशोपनिषद्’ की तरह ही शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४ मन्त्र १-६) है। इसमें केवल
छः मंत्र हैं, जिनमें मन की अद्भुत सामर्थ्यो का वर्णन करते हुए उस मन को ‘शिव संकल्प’ युक्त बनाने की प्रार्थना
की गयी है। मनुष्य का मन बड़ा सामर्थ्यवान् है, उसमें जो संकल्प जाग जाएँ, उससे उसे विरत करना बड़ा कठिन
है। इसलिए ऋषि उसे शुभ-कल्याणकारी संकल्पयुक्त बनाने के लिए ही प्रार्थना करते हैं। मंत्रों का गठन इतना
सारगर्भित एवं भावपूर्ण बन पड़ा है कि उन्हें स्वतंत्र रूप से एक उपनिषद् की मान्यता दी गयी है।
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ १ ॥
हे परमात्मन् ! जो मन जाग्रत् अवस्था में दूर-दूर तक गमन करता है और उसी प्रकार सुप्तावस्था में
भी दूर-दूर तक जाता है; वही (मन) निश्चित रूप से इन्द्रियों का प्रकाशक है, जीवात्मा का एकमात्र माध्यम
है, ऐसा हमारा वह मन श्रेष्ठ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ १ ॥
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ।
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ २ ॥
हे परमेश्वर ! जिस मन के द्वारा मनीषीगण यज्ञ आदि सत्कर्मों का सम्पादन करते हैं। जो सबके शरीर
में विद्यमान है तथा यज्ञादिकों में अपूर्व एवं आदरणीय भाव से सुशोभित रहता है, वह हमारा मन श्रेष्ठ-
कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ २ ॥
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।
यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ३ ॥
हे प्रभो ! जो मन प्रखर ज्ञान से सम्पन्न, चेतनशील, धैर्य सम्पन्न है, जो समस्त प्राणियों के अन्तःकरण
में अमर प्रकाश-ज्योतिःरूप में स्थित है, जिसके बिना कोई भी कार्य किया जाना सम्भव नहीं हो पाता; वह
हमारा मन श्रेष्ठ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ ३ ॥
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ४ ॥
जिस अविनाशी मन की सामर्थ्य से सभी कालों का ज्ञान (प्रत्यक्षीकरण) किया जाता है तथा जिसके
द्वारा सप्त होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ ४ ॥
यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः ।
यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ५ ॥
जिस (मन) में वैदिक ऋचाएँ प्रतिष्ठित हैं, जिसमें साम और यजुर्वेद के मन्त्र उसी प्रकार प्रतिष्ठित
हैं, जिस प्रकार रथ के पहिये में ‘अरे’ स्थित होते हैं तथा जिस मन में प्रजाजनों के समस्त ज्ञान समाहित हैं,
ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ ५ ॥
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ६ ॥
जिस प्रकार कुशल 'सारथि' लगाम के नियन्त्रण से गतिमान् अश्वों को गन्तव्य पथ पर अभीष्ट दिशा
में ले जाता है, उसी प्रकार जो मन मनुष्यों को लक्ष्य तक पहुँचाता है, जो जरारहित, अतिवेगशील (मन) इस
हृदय स्थान में स्थित है; ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ॥ ६ ॥
॥ शुकरहस्यापानषद् ॥
यह कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद् है। इस उपनिषद् में महर्षि व्यास जी के आग्रह पर भगवान् शिव ने
शुकदेव जी को उपदेश दिया है। शुकदेवजी ने उनसे चार महावाक्यों १. ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म, २. ॐ अहं
ब्रह्मास्मि, ३. ॐ तत्त्वमसि एवं ४. ॐ अयमात्मा ब्रह्म के सम्बन्ध में षडङ्गन्यास पूर्वक जानना चाहा।
उपनिषद् के पहले -दूसरे खण्डों में उक्त घटना, प्रश्न तथा न्यासादि का वर्णन है। तीसरे खण्ड में चारों
महावाक्यों की व्याख्या पदविन्यास पूर्वक की गई है। अंत में इस ज्ञान को हृदयंगम करने से शुकदेव जी की
चेतना का चराचर के साथ संयुक्त हो जाने का वर्णन है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु .............इति शान्तिः ॥ ( द्रष्टव्य-अमृतनादोपनिषद् )
अथातो रहस्योपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अब रहस्योपनिषद् का वर्णन किया जाता है॥ १ ॥
देवर्षयो ब्रह्माणं संपूज्य प्रणिपत्य पप्रच्छुर्भगवन्नस्माकं रहस्योपनिषदं ब्रूहीति ॥ २ ॥
एक बार देवर्षियों ने देव ब्रह्माजी की पूजा की और हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए उनसे निवेदन
किया - भगवन् ! आप हमारे लिए रहस्योपनिषद् का उपदेश करें ॥ २ ॥
सोऽब्रवीत्-पुरा व्यासो महातेजाः सर्ववेदः तपोनिधिः । प्रणिपत्य शिवं साम्बं
कृताञ्जलिरुवाच ह ॥ ३ ॥
इस पर ब्रह्मा जी ने कहा-प्राचीनकाल में महातेजस्वी, तपोनिष्ठ, सम्पूर्ण वेदों के विग्रह स्वरूप श्री
वेदव्यास जी ने पार्वती सहित भगवान् शिव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे प्रार्थना की ॥ ३ ॥
श्रीवेदव्यास उवाच-
देवदेव महाप्राज्ञ पाशच्छेददृढव्रत । शुकस्य मम पुत्रस्य वेदसंस्कारकर्मणि ॥ ४ ॥
ब्रह्मोपदेशकालोऽयमिदानीं समुपस्थितः । ब्रह्मोपदेशः कर्त्तव्यो भवताद्य जगद्गुरो ॥
श्री वेदव्यास बोले-हे देवों के देव-महादेव ! महाप्राज्ञ ! हे जगत् पाशों के उच्छेदक ! हे सुदृढ़
व्रतधारी ! मेरे पुत्र शुकदेव के वेदाध्ययन संस्कार कर्म में प्रणव और गायत्री मन्त्रोपदेश का समय आ गया
है। हे जगद्गुरो ! आप उसके लिए मन्त्रोपदेश कर्त्तव्य को स्वीकार करें ॥ ४-५ ॥
ईश्वर उवाच -
मयोपदिष्टे कैवल्ये साक्षाद्ब्रह्मणि शाश्वते ।
विहाय पुत्रो निर्वेदात्प्रकाशं यास्यति स्वयम् ॥ ६ ॥
भगवान् शिव ने कहा- हे महामुने ! यदि मैं तुम्हारे पुत्र को शुद्धस्वरूप साक्षात् सनातन परब्रह्म का
उपदेश करूँगा, तो वह सब कुछ त्यागकर, वैराग्यवान् होकर स्वयं ही प्रकाशस्वरूप को प्राप्त हो जाएगा ॥६ ॥
श्री वेदव्यास उवाच -
यथा तथा वा भवतु ह्युपनायनकर्मणि । उपदिष्टे मम सुते ब्रह्मणि त्वत्प्रसादतः ॥
श्री वेदव्यास जी ने निवेदन किया- चाहे जैसा भी हो, मेरे पुत्र के उपनयन संस्कार कर्म में आप
अनुग्रहपूर्वक उसे ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें ॥ ७ ॥
४०० शुकरहस्योपनिषद्
सर्वज्ञो भवतु क्षिप्रं मम पुत्रो महेश्वर। तव प्रसादसंपन्नो लभेन्मुक्तिं चतुर्विधाम्॥
हे महेश्वर! मेरा पुत्र शीघ्र ही सर्वज्ञानी हो और आपके अनुग्रह का पात्र बनकर वह चतुर्विध मुक्ति
(सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य) को प्राप्त हो जाए ॥८॥
तच्छ्रुत्वा व्यासवचनं सर्वदेवर्षिसंसदि।
उपदेष्टुं स्थितः शम्भुः साम्बो दिव्यासने मुदा॥ ९॥
श्री वेदव्यास जी की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान् शिव भगवती उमा सहित देवर्षियों की सभा में
उपदेश देने के लिए गये और प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य आसन पर अधिष्ठित हुए॥ ९॥
कृतकृत्यः शुकस्तत्र समागत्य सुभक्तिमान्।
तस्मात् स प्रणवं लब्ध्वा पुनरित्यब्रवीच्छिवम्॥ १०॥
वहाँ शुकदेव मुनि भगवान् शिव से भक्तिपूर्ण अवस्था में सत्संग का लाभ लेकर कृतकृत्य हुए।
प्रणव दीक्षा लेकर पुनः वे भगवान् से प्रार्थना करने लगे॥ १०॥
श्रीशुक उवाच-
देवादिदेव सर्वज्ञ सच्चिदानन्दलक्षण। उमारमण भूतेश प्रसीद करुणानिधे॥ ११॥
मुनि शुकदेव जी ने निवेदन किया- हे देवों के आदि देव! हे सर्वज्ञ! हे सच्चिदानन्द स्वरूप! हे
उमापते! आप सम्पूर्ण प्राणियों पर कृपा करने वाले करुणा के भण्डार हैं, आप मुझ पर प्रसन्न हों॥ ११॥
उपदिष्टं परंब्रह्म प्रणवान्तर्गतं परम्। तत्त्वमस्यादिवाक्यानां प्रज्ञादीनां विशेषतः॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन षडङ्गानि यथाक्रमम्। वक्तव्यानि रहस्यानि कृपयाद्य सदाशिव।
आपने मेरे लिए प्रणव स्वरूप और उससे परे परब्रह्म का उपदेश किया है, परन्तु मैं विशेषरूप से
‘तत्त्वमसि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ प्रभृति महावाक्यों का तत्त्व षडङ्गन्यास क्रमपूर्वक सुनने की इच्छा रखता हूँ। हे
सदाशिव! कृपापूर्वक मेरे लिए उन रहस्यों को प्रकट करें॥ १२-१३॥
श्रीसदाशिव उवाच-
साधु साधु महाप्राज्ञ शुक ज्ञाननिधे मुने। प्रष्टव्यं तु त्वया पृष्टं रहस्यं वेदगर्भितम्॥
भगवान् शिव ने कहा- हे ज्ञाननिधि मुनि शुकदेव ! तुम निश्चय ही महान् प्रज्ञावान् हो। तुमने वेदों
के गूढ़ रहस्यों के व्यावहारिक स्वरूप का प्रश्न किया है॥ १४॥
रहस्योपनिषन्नाम्ना सषडङ्गमिहोच्यते। यस्य विज्ञानमात्रेण मोक्षः साक्षान्न संशयः॥
सो मैं तुम्हारे लिए इस रहस्योपनिषद् नामक गूढ़ विषय का षडङ्गन्यास पूर्वक वर्णन करता हूँ।
इसका (अनुभूतिजन्य) विशेष ज्ञान हो जाने से साक्षात् मोक्ष प्राप्ति में कोई संशय नहीं है॥ १५॥
अङ्गहीनानि वाक्यानि गुरुर्नोपदिशेत्पुनः।
सषडङ्गान्युपदिशेन्महावाक्यानि कृत्स्नशः॥ १६॥
उपयुक्त यही है कि गुरु के द्वारा अङ्गहीन वाक्यों का उपदेश नहीं किया जाना चाहिए, सब
महावाक्यों का षडंग सहित उपदेश करना चाहिए॥ १६॥
चतुर्णामपि वेदानां यथोपनिषदः शिरः। इयं रहस्योपनिषत्तथोपनिषदां शिरः॥
जैसे चारों वेदों में उपनिषदें सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे सम्पूर्ण उपनिषदों में रहस्योपनिषद् सर्वश्रेष्ठ है॥ १७॥
मन्त्र २१ ४०१
रहस्योपनिषद्व्रह्म ध्यातं येन विपश्चिता। तीर्थैर्मन्त्रैः श्रुतैर्जप्यैस्तस्य किं पुण्यहेतुभिः॥
जिस तत्त्वदर्शी विचारक ने इस रहस्योपनिषद् में वर्णित ब्रह्म का चिन्तन-मनन किया है, उसे
पुण्यदायक कारणों तीर्थ-सेवन, मन्त्र-पाठ, वेद-पाठ तथा जप आदि करने से क्या प्रयोजन है ? ॥ १८ ॥
वाक्यार्थस्य विचारेण यदाप्नोति शरच्छतम्। एकवारजपेनैव ऋष्यादिध्यानतश्च यत्॥
सौ शरद्-ऋतुओं (वर्षों) तक महावाक्यों के अर्थों पर विचार करने से जिस फल की प्राप्ति होती है,
वह फल इन वाक्यों के ऋष्यादि के स्मरण सहित एक बार जप करने से ही प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
ॐ अस्य श्रीमहावाक्यमहामन्त्रस्य हंस ऋषिः। अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो
देवता। हं बीजम्। सः शक्तिः। सोऽहं कीलकम्। मम परमहंसप्रीत्यर्थे महावाक्यजपे
विनियोगः। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। नित्यानन्दो ब्रह्म तर्जनीभ्यां स्वाहा।
नित्यानन्दमयं ब्रह्म मध्यमाभ्यां वषट्। यो वै भूमा अनामिकाभ्यां हुम्। यो वै भूमाधिपतिः
कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। सत्यं ज्ञानमनन्तं
ब्रह्म हृदयाय नमः। नित्यानन्दो ब्रह्म शिरसे स्वाहा। नित्यानन्दमयं ब्रह्म शिखायै वषट्।
यो वै भूमा कवचाय हुम्। यो वै भूमाधिपतिः नेत्रत्रयाय वौषट्। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म
अस्त्राय फट्। भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २० ॥
ॐ इस महावाक्य महामंत्र के हंस ऋषि हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द है, परमहंस देवता हैं, हं बीज मंत्र
है, सः शक्ति है, सोऽहं कीलक है। परमहंस देवता की प्रीति के लिए महावाक्य जपने हेतु मेरे द्वारा
विनियोग है। करन्यास के लिए ब्रह्म सत्य, ज्ञानमय और अनन्त है, उसे नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श ब्रह्म
नित्य (शाश्वत) आनन्द स्वरूप है, उसे नमन है- तर्जनी अँगुली का स्पर्श। ब्रह्म नित्यानन्दमय है, उसे
नमन है- मध्यमा अँगुली का स्पर्श। जो अति- विस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- अनामिका अँगुली
का स्पर्श। जो अतिविस्तृत का (भी) अधिपति है (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- कनिष्ठिका अँगुली का
स्पर्श। ब्रह्म एक एवं अद्वितीय है, उसे नमन है- करतल एवं कर पृष्ठ का स्पर्श। ब्रह्म सत्य, ज्ञानमय एवं
अनन्त है उसे नमन है- हृदय (स्थान) का स्पर्श। ब्रह्म नित्य आनन्द स्वरूप है, उसे नमस्कार है, सिर का
स्पर्श। ब्रह्म नित्य आनन्दमय है, उसे नमन है- शिखा का स्पर्श। जो विस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमन
है- दायें -बाँयें कन्धे का स्पर्श। जो विस्तृत का अधिपति है, (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- दोनों नेत्रों का
स्पर्श। ब्रह्म एक और अद्वितीय है, उसे नमन है- दायें हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर बायें हाथ पर
ताली बजाएँ। ॐ (परब्रह्म) भूः (भू), भुवः (अन्तरिक्ष) और स्वः (द्युलोक) में संव्यास है, उसे
नमस्कार है- सभी दिशाओं से रक्षा का विधान ॥ २० ॥
ध्यानम्-
नित्यानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं
नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥ २१ ॥
ध्यान-जो सदा ही आनन्दरूप, श्रेष्ठ सुखदायी स्वरूप वाले, ज्ञान के साक्षात् विग्रह रूप हैं। जो
संसार के द्वन्द्वों (सुख-दुःखादि) से रहित, व्यापक आकाश के सदृश (निर्लिप्त) है तथा जो एक ही
परमात्म तत्त्व को सदैव लक्ष्य किये रहते हैं। जो एक हैं, नित्य हैं, सदैव शुद्ध स्वरूप है, ( झंझावातों में)
४०२ शुक्तरहस्योपनिषद
अचल रहने वाले, सबकी बुद्धि में अधिष्ठित, सब प्राणियों के साक्षीरूप, राग-आसक्ति आदि भावों से दूर,
लोभ, मोह, अहंकार जैसे सामान्य त्रिगुणों से रहित हैं, उन सद्गुरु को हम नमस्कार करते हैं ॥ २१ ॥
अथ महावाक्यानि चत्वारि । यथा ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ १ ॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि ॥ २ ॥
ॐ तत्त्वमसि ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म ॥ ४ ॥ तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति
ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति ॥ २२ ॥
अब चार महावाक्य दिये जाते हैं। ॐ प्रज्ञानम् ब्रह्म (प्रकृष्ट ज्ञान ब्रह्म है) ॥ १ ॥ ॐ अहं
ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) ॥ २ ॥ ॐ तत्त्वमसि (वह ब्रह्म तुम्हीं हो) ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा
ब्रह्म है) ॥ ४ ॥ इनमें से यह 'तत्त्वमसि' महावाक्य ब्रह्म से अभेद का प्रतिपादन करता है। जो साधक
इसका जप (चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान् शिव की सायुज्य मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं ॥
आगे 'ॐ तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद के षडंग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
तत्पदमहामन्त्रस्य । हंस ऋषिः । अव्यक्तगायत्री छन्दः । परमहंसो देवता । हं
बीजम् । सः शक्तिः । सोऽहं कीलकम् । मम सायुज्यमुक्त्यर्थे जपे विनियोगः । तत्पुरु-
षाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ईशानाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । अघोराय मध्यमाभ्यां वषट् ।
सद्योजाताय अनामिकाभ्यां हुम् । वामदेवाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । तत्पुरुषेशानाघोर-
सद्योजातवामदेवेभ्यो नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः
सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २३ ॥
तत्पुरुष को नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श। ईशान को नमन - तर्जनी का स्पर्श। अघोर को नमन-
मध्यमा अँगुली का स्पर्श। सद्योजात को नमन- अनामिका का स्पर्श। वामदेव को नमन- कनिष्ठिका का
स्पर्श तत्पुरुष, ईशान, अघोर, सद्योजात और वामदेव को नमन है- करतल-करपृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार
हृदयादि न्यास का क्रम है। ॐ (परमात्मा) भूः (भूलोक), भुवः (अन्तरिक्ष लोक) एवं स्वः (द्युलोक)
में संन्यास है- उसे नमस्कार है- सभी दिशाओं से रक्षा का विधान ॥ २३ ॥
ध्यानम् -
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्धं बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च ।
सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दरूपं ध्यायेद्देवं तन्महो भ्राजमानम् ॥ २४ ॥
वह ज्ञानरूप, जानने योग्य है एवं ज्ञानगम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध रूप, बुद्धिरूप, मुक्तरूप,
अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान, सच्चिदानन्दरूप ध्यान करने योग्य है। हमें उस महातेजस्वी देव का
ध्यान करना चाहिए ॥ २४ ॥
आगे 'ॐ तत्त्वमसि' महावाक्य के 'त्वम्' पद के षडङ्ग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः । गायत्रीछन्दः । परमात्मा देवता । ऐं बीजम् । क्लीं
शक्तिः । सौः कीलकम् । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोगः । वासुदेवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
संकर्षणाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । प्रद्युम्नाय मध्यमाभ्यां वषट् । अनिरुद्धाय अनामिकाभ्यां
हुम् । वासुदेवाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषद् । वासुदेवसंकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्यः करतलकर-
पृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २५ ॥
यहाँ महामन्त्र के त्वम् पद के ऋषि- विष्णु हैं। छन्द-गायत्री है। देवता- परमात्मा है। बीज- 'ऐं'
है। शक्ति- क्लीं है। कीलक-सौः है। मेरी मुक्ति के लिए जप का विनियोग है। करन्यास- वासुदेव को
नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श। संकर्षण को नमन- तर्जनी का स्पर्श। प्रद्युम्न को नमन- मध्यमा का स्पर्श।
अनिरुद्ध को नमन- अनामिका का स्पर्श। वासुदेव को नमन- कनिष्ठिका का स्पर्श। वासुदेव, संकर्षण
प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध को नमन- करतल- कर पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादिन्यास (अंगन्यास) का
क्रम है। 'भूर्भुवः स्वः ॐ' यह दिग्बन्ध है॥ २५॥
ध्यानम्-
जीवत्वं सर्वभूतानां सर्वत्राखण्डविग्रहम्।
चित्ताहंकारयन्तारं जीवाख्यं त्वं पदं भजे॥ २६॥
आप सभी प्राणियों में जीवस्वरूप हैं, सर्वत्र अखण्ड विग्रह रूप हैं तथा हमारे चित्त और अहंकार
पर नियंत्रण करने वाले हैं। जीवों के रूप में त्वं (तत्त्वमसि के अन्तर्गत) पद की हम स्तुति करते हैं॥ २६॥
आगे 'ॐ' तत्त्वमसि महामन्त्र के 'असि' पद के षडंग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
असिपदमहामन्त्रस्य मन ऋषिः। गायत्री छन्दः। अर्धनारीश्वरो देवता। अव्यक्ता-
दिर्बीजम्। नृसिंहः शक्तिः। परमात्मा कीलकम्। जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः। पृथ्वीद्व्य-
णुकाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। अब्द्व्यणुकाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। तेजोद्व्यणुकाय मध्यमाभ्यां
वषट्। वायुद्व्यणुकाय अनामिकाभ्यां हुम्। आकाशद्व्यणुकाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।
पृथिव्यप्तेजोवाव्वाकाशद्व्यणुकेभ्यः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। एवं हृदयादि न्यासः। भूर्भुवः
सुवरोमिति दिग्बन्धः॥ २७॥
महामन्त्र के 'असि' पद के ऋषि- मन हैं। छन्द-गायत्री है। देवता-अर्धनारीश्वर हैं। बीज-अव्यक्तादि
है। शक्ति-नृसिंह है। कीलक- परमात्मा है। जीव-ब्रह्म के ऐक्य के लिए जप में निम्न विनियोग है।
करन्यास- पृथ्वी द्वयणुक को नमन- अँगूठे का स्पर्श। अप् (जल) द्वयणुक को नमन- तर्जनी का स्पर्श।
तेज (अग्नि) द्वयणुक को नमन-मध्यमा का स्पर्श। वायु द्वयणुक को नमन- अनामिका का स्पर्श। आकाश
द्वयणुक को नमन- कनिष्ठिका का स्पर्श। पृथ्वी, अप्, तेज, वायु तथा आकाश के द्वयणुक को नमन
करतल-कर पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादि न्यास का क्रम है। 'भूर्भुवः स्वः ॐ' यह दिग्बन्ध है॥२७॥
ध्यानम्-
जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मनःस्थितिः।
ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा॥ २८॥
जीव ही ब्रह्म है इस महावाक्य के अर्थ पर जो विचार करता -मन को स्थिर करता है, तथा 'असि'
पद का सदैव चिन्तन-मनन करता है, वह तत्त्व को ऐक्य प्रदान करने में समर्थ होता है (पंचतत्त्व अन्त में
एक- ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।)॥ २८॥
एवं महावाक्यषडङ्गान्ययुक्तानि ॥ २९॥
इस प्रकार महावाक्यों के षडङ्गों का विवेचन किया गया ॥ २९॥
४०४ शुकरहस्योपनिषद्
अथ रहस्योपनिषद्द्द्विभागशो वाक्यार्थश्लोकाः प्रोच्यन्ते ॥ ३० ॥
अब रहस्योपनिषद् के वाक्यों के अर्थ वाचक श्लोकों का उपदेश किया जाता है ॥ ३० ॥
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥
प्राणी जिसके द्वारा देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह
प्रज्ञान कहा जाता है ॥ ३१ ॥
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥ ३२ ॥
चतुर्मुख ब्रह्मा, इन्द्रदेव, सम्पूर्ण देवता, मनुष्य, अश्व, गौ आदि पशु और अन्य सभी प्राणियों में एक
ही चैतन्य सत्ता- 'ब्रह्म' अवस्थित है, वही प्रज्ञान ब्रह्म मुझमें भी समाया हुआ है ॥ ३२ ॥
परिपूर्णः परात्मास्मिन्देहे विद्याधिकारिणि ।
बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥ ३३ ॥
यह हमारा शरीर ही परिपूर्ण ब्रह्मविद्या प्राप्ति का अधिकारी है। इसमें साक्षिरूप में अवस्थित
परमात्म-बुद्धि के स्फुरित होने पर उसे 'अहं' कहा जाता है ॥ ३३ ॥
स्वतः पूर्णः परात्मात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः ।
अस्मीत्यैक्यपरामर्शस्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥ ३४ ॥
स्वतः स्थापित परिपूर्ण परमात्मा को यहाँ 'ब्रह्म' शब्द से वर्णित किया गया है। 'अस्मि' शब्द से
ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। इस प्रकार 'मैं ही ब्रह्म हूँ' (यह अर्थ निकलता है।) ॥ ३४ ॥
एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥
सृष्टि के पूर्व द्वैत के अस्तित्व से रहित, नाम एवं रूप से रहित, एकमात्र, सत्यस्वरूप, अद्वितीय
'ब्रह्म' था तथा वह ब्रह्म अब भी विद्यमान है। वही ब्रह्म 'तत्' पद (तत्त्वमसि) में वर्णित है ॥ ३५ ॥
श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् । एकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥
उपदेशों का श्रवण करने वाले शिष्य के आत्मतत्त्व को, जो शरीर-इन्द्रियों से परे है, 'त्वम्' पद से
वर्णित किया गया है। 'असि' पद के द्वारा 'तत्' और 'त्वम्' पदों के वाच्यार्थ ब्रह्म और आत्म तत्त्व के
ऐक्य को अनुभव करना चाहिए ॥ ३६ ॥
स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तं प्रत्यगात्मेति गीयत ॥
उस ('अयमात्मा ब्रह्म' के अन्तर्गत) स्वप्रकाशित परोक्ष (प्रत्यक्ष शरीर से परे) तत्त्व को 'अयं' पद
के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहंकार से लेकर शरीर तक को प्रत्यक् आत्मा कहा गया है ॥ ३७ ॥
दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्त्वमीर्यते । ब्रह्मशब्देन तद्ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥
इस सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् में जो तत्त्व संव्यास है, वह ब्रह्म शब्द से वर्णित किया जाता है। वही ब्रह्म
स्वयं प्रकाशित आत्मतत्त्व के रूप में (प्राणियों में) संव्यास है ॥ ३८ ॥
अनात्मदृष्टेरविवेकानिद्रामहं मम स्वप्रगतिं गतोऽहम् ।
स्वरूपसूर्येऽभ्युदिते स्फुटोक्तेर्गुरोर्महावाक्यपदैः प्रबुद्धः ॥ ३९ ॥
मैं अनात्म पदार्थों में आत्म तुष्टि के कारण अविवेक की निद्रा में, 'मैं,' 'मेरे' की सम्मोहित स्थिति