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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 387 of 505

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Page 387

प्रपाठक ३ मन्त्र १ ३८७
वह यह प्रजापति रूपी आत्मा स्वयं ही अपने को पाँच भागों में विभक्त करके हृदयरूपी गुहा
(गुफा) क्षेत्र में प्रतिष्ठित है। यही आत्मा मनोमय रूप में, प्राणमय रूप में एवं तेजोमय रूप में, संकल्प रूप
में तथा आकाशात्म रूप में अवस्थित है। इस प्रकार यह आत्मा हृदय प्रदेश में स्थित रहते हुए इन्द्रियों का
अनुभव न करता हुआ स्वयं को अकृतार्थ अनुभव करने लगा। तदनन्तर अपने आप को कृतकृत्य करने हेतु
पाँच द्वारों (इन्द्रियों) का बेधन करके प्रादुर्भूत हुआ। ये पाँच द्वार ही (श्रोत्रादि) पाँच इन्द्रियों के रूप में
परिणत हो गये, जिनसे वह विषयों का उपभोग करता है। ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ लगाम हैं तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ
घोड़े हैं। शरीर को रथ एवं मन को सारथि की संज्ञा प्रदान की गई है और स्वभाव (प्रकृति) को चाबुक
कहा गया है। इस चाबुक से प्रेरणा प्राप्त करके यह शरीर चक्र की भाँति गमन करता है। इस प्रकार यह
आत्मा ही इस शरीर को सचेतन बनाए हुए है तथा इसे प्रेरित करता रहता है ॥ ९॥
स वा एष आत्मेत्यदो वशं नीत एव सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमान
इव प्रतिशरीरेषु चरत्यव्यक्तत्वात्सूक्ष्मत्वाददृश्यत्वादग्राह्यत्वान्निर्ममत्वाच्चानव-
स्थोऽकर्ता कर्तेवावस्थितः ॥ १०॥
ऐसा प्रतीत होता है कि यह आत्मा ही शरीर के वशीभूत होकर शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप बन्धन
में फँस गया है। इसी कारण वह (आत्मा) विविध शरीरों में संचरित होता रहता है, परन्तु चिन्तन करने पर
ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में वह अव्यक्त, सूक्ष्म, अदृश्य, अग्राह्य, ममता से रहित एवं अवस्था
(जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) रहित है। अतः वह (आत्मा) अकर्त्ता होते हुए भी कर्त्तारूप में प्रतीत होता है ॥ १० ॥
स वा एष शुद्धः स्थिरोऽचलश्चालेपोऽव्यग्रो निःस्पृहः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्य
चरितभुग्गुणमयेन पटेनात्मानमन्तर्धायावस्थित इत्यवस्थित इति ॥ ११ ॥
यह (आत्मा) शुद्ध, स्थिर, अचल, निर्लिप्त, उद्विग्रता रहित, निःस्पृह द्रष्टा की भाँति रहते हुए अपने
द्वारा किये गये कर्मों के फल का उपभोग करता हुआ-सा प्रतीत होता है। साथ ही यह भी प्रतीत होता है
कि उस आत्मा ने अपने रूप को तीन गुणों (सत्, रज, तम,) रूपी वस्त्र द्वारा आच्छादित कर रखा है ॥ ११ ॥
॥ तृतीयः प्रपाठकः॥
ते होचुर्भगवन्यद्येवमस्यात्मनो महिमानं सूचयसीत्यन्यो वा परः कोऽयमात्मा
सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमानः सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वां वा गतिं
द्वन्द्वैरभिभूयमानः परिभ्रमतीति कतम एष इति तान्होवाच ॥ १ ॥
महर्षि ने पुनः प्रश्न किया - हे भगवन् ! इस आत्मा की महिमा का वर्णन यदि इस प्रकार है, तो पुनः
वह (आत्मा) श्रेष्ठ एवं निकृष्ट कर्मों के बन्धन में बँधा हुआ तथा अच्छी-बुरी योनियों में घूमता हुआ क्या
कोई अन्य आत्मा है ? सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अभिभूत ऊर्ध्वगामी अथवा अधोगामी गतियों में विचरण
करने वाला कौन है ? ॥ १ ॥
अस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्मा योऽयं सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमानः
सदसद्योनिमापद्यत इत्यवाचीं वोर्ध्वां गतिं द्वन्द्वैरभिभूयमानः परिभ्रमतीत्यस्योपव्याख्यानं
पञ्च तन्मात्राणि भूतशब्देनोच्यन्ते पञ्च महाभूतानि भूतशब्देनोच्यन्तेऽथ तेषां यः समुदायः