१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
३३८ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च
ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ को जानने में सक्षम है, वह अपनी जाति में ज्येष्ठ (बड़ा) एवं श्रेष्ठ है। जो भी
व्यक्ति इस तरह से (ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ की) उपासना करता है, वह व्यक्ति अपनों के बीच में तथा जिन लोगों
के बीच चाहता है, उन सभी में श्रेष्ठता और महानता को प्राप्त करता है॥ १ ॥
यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि
च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
जो वसिष्ठ (श्रेष्ठता) को जानता है, वह स्वजनों के बीच में वसिष्ठ (श्रेष्ठ) होता है। वाणी ही श्रेष्ठ है।
जो (व्यक्ति) इस तरह से वाणी की उपासना करता है, वह अपने आत्मीय जनों में और जिनके प्रति
उसकी विशेष चाह (स्नेह) है, उन सभी में वसिष्ठ (श्रेष्ठ) होता है॥ २ ॥
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे
च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
जो प्रतिष्ठा को जानने में समर्थ है, वह देश-काल की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता दोनों स्थितियों में प्रतिष्ठित
होता है। नेत्र ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि नेत्र ही समान अथवा असमान देश-काल में प्रतिष्ठित होते हैं। इस प्रकार से जानने
वाला (व्यक्ति) अपनी इच्छा के द्वारा समान अथवा असमान परिस्थितियों में प्रतिष्ठित होता है॥ ३ ॥
यो ह वै सम्पदं वेद सँ हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे
वेदा अभिसम्पन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥
जो सम्पद् (दैवी सम्पदा) को जानने में समर्थ है, वह अपनी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करता है।
श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्र में ही समस्त वेद भली-भाँति समाये हुए हैं। जो इस प्रकार से जानता
हुआ, जिस भोग की इच्छा करता है, वह उसे पूर्णरूप से प्राप्त करता है॥ ४ ॥
यो ह वा आयतनं वेदायतनँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ
स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥
जो आयतन (आश्रय) को जानने वाला है, वह स्वयं अपने लोगों के लिए और दूसरों के लिए भी
आयतन (आश्रय) रूप होता है। मन ही आयतन है, जो भी (व्यक्ति) इस प्रकार जानता है, वह स्वजनों
और अन्य दूसरे लोगों को भी आश्रय प्रदान करता है॥ ५ ॥
यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया
पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥