१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
भृगुवल्ली अनुवाक १० मन्त्र ६ २१३
भृगुवल्ली अनुवाक १० मन्त्र ६ २१३
आदर करता है। वह परमात्मा वाणी में रक्षक शक्ति के रूप में है, प्राण और अपान में प्रदाता और रक्षक
दोनों सामर्थ्य वाला है। वह हाथों में कर्म करने की शक्ति, पैरों में गति सामर्थ्य, गुदा में विसर्जन शक्ति के
रूप में स्थित है। यह उस ब्रह्म की मानुषी सत्ता का वर्णन है, अब उसकी दैवी सत्ता का वर्णन करते हैं।
वह वृष्टि में तृप्ति है, बिजली में शक्ति है। पशुओं में यश, ग्रहों-नक्षत्रों में ज्योति, उपस्थ में प्रजनन-सामर्थ्य,
वीर्य और आनन्द रूप में सन्निहित है। वह आकाश में व्यापक विश्व (प्रत्यक्ष जगत्) रूप में स्थित है। वह
परमात्मा सबका आधाररूप है, ऐसा मानकर-उपासना करने वाला सबको आधार देने वाला बन जाता है।
वह सबसे महान् है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला महान् बन जाता है। वह मन है, ऐसा मानकर
उपासना करने वाला मननशील होता है। वह नमन योग्य है, ऐसा मानने वाले उपासक के लिए सम्पूर्ण
कामनाएँ नत होती हैं। वह ब्रह्म है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला ब्रह्ममय हो जाता है। वह परिमर
(जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य और अग्नि -ये पाँच देवता मृत्यु (अस्त) को प्राप्त होते हैं।) -
आकाश-मृत्युनियामक देव है, ऐसा मानकर उपासना करने वाले के विद्वेषी शत्रु समाप्त हो जाते हैं, उसका
अप्रिय चाहने वाले बन्धु भी नष्ट हो जाते हैं, जो इस मनुष्य में है, वह सूर्य में भी है, जो साधक इस प्रकार
दोनो में एकत्व को जानता है, वह इस लोक से प्रयाण कर अन्नमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः प्राणमय
आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः मनोमय आत्मा, फिर विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः वह
आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है। आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होकर वह इच्छित भोग और रूप को प्राप्त
करता है। फिर साम गायन करता हुआ सब लोकों में विचरण करता है॥ १-५ ॥
अहमन्नमह-मन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३ ऽहमन्नादः।
अह१श्लोककृदह१श्लोककृद-ह१श्लोककृत्। अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं
देवेभ्योऽमृतस्य ना ३ भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः । अहमन्नमन्नमदन्तमा ३
द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णज्योतीः । य एवं वे। इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥
आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !!! मैं (आत्मतत्त्व) ही अन्न हूँ। आश्चर्य है कि मैं (आत्मा ) ही
अन्न का उपभोग करने वाला हूँ । आश्चर्य है कि मैं (आत्मा) ही इनका संयोजक हूँ। मैं ही श्लोककृत्
(मन्त्रद्रष्टा) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ। मैं इस प्रत्यक्ष सत्यरूप जगत् के प्रथम उत्पत्तिकर्त्ता हिरण्यगर्भ
आदि अमर देवों के भी पूर्व स्थित अमरत्व का केन्द्र हूँ। जो मुझे देता है, वह देकर मेरी रक्षा करता
है। मैं अन्नरूप होकर अन्न-भक्षक का भी भक्षण कर लेता हूँ। मैं सम्पूर्ण भुवनों को नगण्यरूप
अनुभव करता हूँ। मेरा तेज सूर्य के समान है। इस प्रकार का बोध करने वाला विद्वान् वैसी ही
सामर्थ्य वाला होता है। (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु । ........ इति शान्तिः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ॥ ............ इति शान्तिः ॥
॥ इति तैत्तिरीयोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ नादाबन्दूपानषद् ॥
यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् के प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस मानकर उसके विभिन्न
अंगोपांगों का वर्णन किया गया है। फिर ॐ की १२ मात्राओं तथा उनके साथ प्राणों के विनियोग का फल कहा
गया है। योगयुक्त साधक की स्थिति तथा ज्ञानी के प्रारब्ध कर्मों के क्षय का वर्णन करते हुए नाद के अनेक प्रकार
तथा नादानुसंधान साधना का स्वरूप समझाया गया है। अंत में मन के प्रभावित होने, मन के लय होने तथा
मनोलय की स्थिति का वर्णन किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ वाङ्मे मनसि........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- ऐतरेयोपनिषद्)
ॐ अकारो दक्षिणः पक्ष उकारस्तूत्तरः स्मृतः ।
मकारं पुच्छमित्याहुरर्धमात्रा तु मस्तकम् ॥ १ ॥
ॐ कार रूप हंस का 'अकार' दक्षिण पक्ष (दाहिना पंख) तथा 'उकार' उत्तर पक्ष (बायाँ पंख)
कहा गया है। उसकी पूँछ ही 'मकार' है और अर्धमात्रा ही उसका शीर्ष भाग है ॥ १ ॥
पादादिकं गुणास्तस्य शरीरं तत्त्वमुच्यते ।
धर्मोऽस्य दक्षिणं चक्षुरधर्मोऽथो परः स्मृतः ॥ २ ॥
उस (ॐ कार रूप हंस) के दोनों पैर रजोगुण एवं तमोगुण हैं और (उसका) शरीर सतोगुण कहा
गया है। धर्म (उसका) दक्षिण चक्षु है और अधर्म बायाँ चक्षु (नेत्र) कहा गया है ॥ २ ॥
भूर्लोकः पादयोस्तस्य भुवर्लोकस्तु जानुनि ।
सुवर्लोकः कटीदेशे नाभिदेशे महर्जगत् ॥ ३ ॥
उस (हंस) के दोनों पैरों में भूः (पृथ्वी) लोक स्थित है। उसकी जंघाओं में भुवः (अन्तरिक्ष) लोक
केन्द्रित है। स्वः (स्वर्ग-ऊर्ध्व) लोक उसके कटिप्रदेश तथा महः लोक उसके नाभि प्रदेश में स्थित है ॥ ३ ॥
जनोलोकस्तु हृद्देशे कण्ठे लोकस्तपस्ततः ।
भ्रुवोर्ललाटमध्ये तु सत्यलोको व्यवस्थितः ॥ ४ ॥
उसके हृदय स्थल में जनः लोक और कण्ठ प्रदेश में तपोलोक विद्यमान है। ललाट और भौंहों के
मध्य में सत्य लोक स्थित है ॥ ४ ॥
सहस्रार्णमतीवात्र मन्त्र एष प्रदर्शितः ।
एवमेतां समारूढो हंसयोगविचक्षणः ॥ ५ ॥
न भिद्यते कर्मचारैः पापकोटिशतैरपि ।
आग्नेयी प्रथमा मात्रा वायव्येषा तथापरा ॥ ६ ॥
इस प्रकार से वर्णित सहस्रावयव युक्त प्रणवरूप हंस पर आसीन होकर कर्मानुष्ठान-ध्यान आदि में
रत हंस योगी- विचक्षण पुरुष ओंकार की श्रेष्ठ विधि से मनन व चिन्तन करता हुआ सहस्रों-करोड़ों पापों
से निवृत्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। (ॐकार के देवता अग्नि हैं। उसका स्वरूप भी अग्नि
मण्डल जैसा है। 'अकार' नामक (प्रणव की) प्रथम मात्रा 'आग्नेयी' कही गयी है और ('उकार' नामक)
मन्त्र १३ २१५
द्वितीया मात्रा 'वायव्या' कही गयी है। (इस वायव्या के देवता वायु हैं और यह वायुमण्डल की
भाँति रंग-रूप वाली है) ॥ ५-६॥
भानुमण्डलसंकाशा भवेन्मात्रा तथोत्तरा।
परमा सार्धमात्रा या वारुणीं तां विदुर्बुधाः ॥ ७॥
तत्पश्चात् 'मकार' नामक यह तृतीय 'मात्रा' सूर्य मण्डल के समतुल्य है। (इस मात्रा के देवता सूर्य
हैं तथा) चतुर्थ मात्रा 'अर्धमात्रा' के रूप में 'वारुणी' कही गयी है। (इस वारुणी के देवता वरुण हैं) ॥ ७॥
कालत्रयेऽपि यस्येमा मात्रा नूनं प्रतिष्ठिताः।
एष ओंकार आख्यातो धारणाभिर्निबोधत ॥ ८ ॥
इन उपर्युक्त चारों मात्राओं में से हर एक मात्रा तीन-तीन काल अथवा कला रूप है। इस प्रकार 'ॐकार'
को द्वादश कलाओं से युक्त कहा गया है। धारणा, ध्यान एवं समाधि के द्वारा इसे जानने का प्रयास करना चाहिए॥
[ ॐकार साधना मात्र उच्चारण से पूरी नहीं होती, दिव्य प्राण प्रवाह रूप ॐकार की अनुभूति धारणा
ध्यानादि द्वारा की जाती है।]
घोषिणी प्रथमा मात्रा विद्युन्मात्रा तथापरा।
पतङ्गिनी तृतीया स्याच्चतुर्थी वायुवेगिनी ॥ ९॥
(इस प्रकार बारह कलाओं की मात्राओं में) प्रथम मात्रा 'घोषिणी' कही गई है। द्वितीय मात्रा का
नाम 'विद्युन्मात्रा' है, तृतीय मात्रा 'पातङ्गी' और चतुर्थ मात्रा 'वायुवेगिनी' के नाम से जानी जाती है ॥ ९ ॥
पञ्चमी नामधेया तु षष्ठी चैन्द्रयभिधीयते।
सप्तमी वैष्णवी नाम अष्टमी शांकरीति च ॥ १०॥
पाँचवीं मात्रा का नाम 'नामधेया' है और छठवीं मात्रा 'ऐन्द्री' के नाम से जानी जाती है। सातवीं
मात्रा का नाम 'वैष्णवी' और आठवीं मात्रा 'शाङ्करी' के नाम से प्रसिद्ध है ॥ १० ॥
नवमी महती नाम धृतिस्तु दशमी मता।
एकादशी भवेन्नारी ब्राह्मी तु द्वादशी परा ॥ ११ ॥
नौवीं मात्रा 'महती' तथा दसवीं मात्रा को 'धृति' (ध्रुवा) कहा गया है। ग्यारहवीं मात्रा 'नारी'
(मौनी) और बारहवीं मात्रा 'ब्राह्मी' के नाम से जानी जाती है ॥ ११ ॥
प्रथमायां तु मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते।
भरते वर्षराजासौ सार्वभौमः प्रजायते ॥ १२ ॥
( ॐकार की इन द्वादश कलाओं की) प्रथम मात्रा में यदि साधक अपने प्राणों का परित्याग कर
देता है, तो वह भारतवर्ष में सार्वभौमिक चक्रवर्ती सम्राट् के रूप में प्रादुर्भूत होता है ॥ १२ ॥
द्वितीयायां समुत्क्रान्तो भवेद्यक्षो महात्मवान्।
विद्याधरस्तृतीयायां गान्धर्वस्तु चतुर्थिका ॥ १३ ॥
( ॐकार की) द्वितीय मात्रा में जब साधक के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तब वह महान्
महिमाशाली यक्ष के रूप में उत्पन्न होता है। ( ॐकार की) तृतीय मात्रा में प्राण त्याग करने पर (वह)
विद्याधर के रूप में और चतुर्थ मात्रा में प्राण के परित्याग करने से (वह) गन्धर्व के रूप में जन्म लेता है ॥
२१६ नादाबन्दूपानषद
[ अपने प्राणों के स्पन्दन का ॐकार रूप महाप्राण की जिस कोटि के साथ तादात्म्य होता है, उसी के
अनुरूप देहान्तर की प्राप्ति होती है।]
पञ्चम्यामथ मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते ।
उषितः सह देवत्वं सोमलोके महीयते ॥ १४॥
यदि पाँचवीं मात्रा में उस (साधक) के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तो वह 'तुषित' नामक देवों के
साथ निवास करता हुआ चन्द्रलोक में सम्मानित होता है ॥ १४॥
षष्ठ्यामिन्द्रस्य सायुज्यं सप्तम्यां वैष्णवं पदम् ।
अष्टम्यां व्रजते रुद्रं पशूनां च पतिं तथा ॥ १५ ॥
छठवीं मात्रा में (शरीर से प्राणों का उत्क्रमण होने पर) साधक देवराज इन्द्र के सायुज्य पद को प्राप्त
करता है। सातवीं मात्रा में भगवान् विष्णु के पद-वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है तथा आठवीं मात्रा में
पशुपति भगवान् शिव के रुद्रलोक में जाकर उनकी समीपता का लाभ प्राप्त करता है ॥ १५॥
नवम्यां तु महर्लोकं दशम्यां तु जनं व्रजेत्।
एकादश्यां तपोलोकं द्वादश्यां ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १६ ॥
नवीं मात्रा में महः लोक को, दसवीं मात्रा में जनः लोक (ध्रुवलोक) को प्राप्त होता है। ग्यारहवीं
मात्रा में तपोलोक को और बारहवीं मात्रा में साधक शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है ॥ १६ ॥
ततः परतरं शुद्धं व्यापकं निर्मलं शिवम्।
सदोदितं परं ब्रह्म ज्योतिषामुदयो यतः ॥ १७॥
इससे भी परतर (परे), श्रेष्ठ, व्यापक, शुद्ध, निर्मल, कल्याणकारी, सदैव उदीयमान (वह) परमब्रह्म-
तत्त्व है। उसी से सभी तरह की ज्योतियाँ (अग्नि, सूर्य एवं चन्द्र आदि) प्रादुर्भूत हुई हैं ॥ १७ ॥
अतीन्द्रियं गुणातीतं मनो लीनं यदा भवेत्।
अनूपमं शिवं शान्तं योगयुक्तं सदाविशेत् ॥ १८ ॥
जब श्रेष्ठ साधक का मन समस्त इन्द्रियों एवं सत्, रज और तम आदि तीनों गुणों से परे होकर
परमतत्त्व में विलीन हो जाता है, तब वह उपमारहित, कल्याणकारी, शान्तस्वरूप हो जाता है; ऐसी उच्च
स्थिति में पहुँचे हुए साधकों को योग युक्त कहा जाना चाहिए ॥ १८ ॥
तद्युक्तस्तन्मयो जन्तुः शनैर्मुञ्चेत्कलेवरम्।
संस्थितो योगचारेण सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ १९ ॥
उस योगयुक्त और तन्मय हुए साधक को अविद्या आदि दोषों से मुक्त और योग पद्धति से
स्वस्थ (आत्मा में स्थित) होकर सभी प्रकार के आसक्ति आदि दोषों से रहित हो जाना चाहिए ॥ १९ ॥
ततो विलीनपाशोऽसौ विमलः कमलाप्रभुः ।
तेनैव ब्रह्मभावेन परमानन्दमश्नुते ॥ २०॥
इस प्रकार उस (साधक) के समस्त सांसारिक बन्धनों का शमन (क्षय) हो जाता है। वह
निर्मल, कैवल्यपद को प्राप्त कर स्वयं ही परमात्म स्वरूप हो जाता है। वह ब्रह्मभाव से परमानन्द को
प्राप्त करके असीम आनन्द की अनुभूति करता है ॥ २० ॥
मन्त्र २७ २१७
आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते।
प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥ २१ ॥
.हे ज्ञानवान् पुरुष ! तुम सतत प्रयत्न करते हुए आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करो। उसी
के सच्चिन्तन में अपने समय को लगाओ। प्रारब्ध कर्मानुसार जो भी कष्ट-कठिनाइयाँ सामने आयें, उनको
भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न (खिन्न-दुःखी) नहीं होना चाहिए ॥ २१ ॥
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति ।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते ॥ २२॥
देहादीनामसत्त्वात्तु यथा स्वप्ने विबोधतः ।
कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति कीर्तितम् ॥ २३ ॥
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही
तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक
असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों
को प्रारब्ध कर्म की संज्ञा प्रदान की गई है ॥ २२-२३ ॥
यत्तु जन्मान्तराभावात्पुंसो नैवास्ति कर्हिचित् ।
स्वप्नदेहो यथाध्यस्तस्तथैवायं हि देहकः ॥ २४॥
ज्ञानी के लिए तो जन्म-जन्मान्तर भी नहीं है। इसलिए प्रारब्ध कर्म ज्ञानी के लिए कभी भी बाधक
नहीं होता। जैसे स्वप्नकालीन देह, देह नहीं होती, केवल अध्यास मात्र (रस्सी में साँप की तरह) ही होती
है, वैसे ही यह जाग्रत् अवस्था का शरीर भी अध्यास मात्र ही है ॥ २४॥
अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे कुतः स्थितिः ।
उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भाण्डस्येव पश्यति ॥ २५॥
अध्यस्त (अयथार्थ) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? और उत्पत्ति के अभाव में उस वस्तु की
स्थिति कैसे होगी ? (जिस प्रकार रज्जु-रस्सी में सर्प का अध्यास होने पर रज्जु में सर्प नहीं उत्पन्न होता और
न ही उस स्थान में सर्प की स्थिति ही होती है।) इसलिए इस प्रपञ्च का मुख्य उपादान कारण आत्मा ही
है। जैसे कि मिट्टी के द्वारा निर्मित पात्रों का उपादान कारण मिट्टी होती है ॥ २५॥
अज्ञानं चेति वेदान्तैस्तस्मिन्नष्टे क्व विश्वता ।
यथा रज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात् ॥ २६ ॥
तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्पश्यति मूढधीः ।
रज्जुखण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न तिष्ठति ॥ २७॥
वेदान्तानुसार ये सभी सांसारिक प्रपञ्च अज्ञानान्धकार के कारण आत्मा में ही प्रतिभासित होते हैं।
अज्ञानरूपी अन्धकार के विनष्ट होने पर संसार की स्थिति नहीं रह जाती। जिस तरह भ्रम बुद्धि से ग्रस्त मनुष्य
रज्जु बुद्धि का परित्याग कर उसे सर्प बुद्धि से ग्रहण करता है, अर्थात् रस्सी को सर्प समझने लगता है, इसी
तरह अज्ञानी (मूढ़) मनुष्य सत्य (आत्मा) का ज्ञान (बोध) न होने के कारण इस भ्रम-बुद्धिवश सांसारिक
प्रपञ्च का अवलोकन करता है। जब मनुष्य ठीक तरह से उस रस्सी को पहचान लेता है, तो पूर्व में
दृष्टिगोचर होने वाले सर्प की भावना नहीं रह जाती ॥ २६-२७॥
२१८ नादबिन्दूपनिषद्
अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चे शून्यतां गते ।
देहस्यापि प्रपञ्चत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः ॥ २८ ॥
जिस तरह अधिष्ठान (आधार) स्वरूप आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर प्रपञ्च (संसार) शून्यता को
प्राप्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में देह (शरीर) भी प्रपञ्चरूप (अयथार्थ) होने के कारण प्रारब्ध की स्थिति
किस प्रकार रह सकती है? ॥ २८ ॥
अज्ञानजनबोधार्थं प्रारब्धमिति चोच्यते ।
ततः कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते ॥ २९ ॥
अज्ञान से ग्रसित लोगों को बोध कराने के लिए प्रारब्ध कर्म की बात कही जाती है। तदनन्तर
कालवश ही सांसारिक प्रारब्ध कर्मों का विनाश हो जाता है ॥ २९ ॥
ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः ।
स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् (प्रारब्ध कर्मों के समाप्त होने पर) 'ॐकार' स्वरूप ब्रह्म की आत्मा के साथ एकता के
चिन्तन से नादरूप में स्वयं प्रकाशमान शिव के कल्याणकारी स्वरूप (परब्रह्म) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार
हो जाता है, जिस प्रकार बादलों के हट जाने पर भगवान् भास्कर प्रकाशित हो जाते हैं ॥ ३० ॥
सिद्धासने स्थितो योगी मुद्रां संधाय वैष्णवीम् ।
शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं सदा ॥ ३१ ॥
योगी (साधक) को सिद्धासन से बैठने के पश्चात् वैष्णवी मुद्रा धारण करनी चाहिए। तदनन्तर
दाहिने कान के अन्दर उठते हुए नाद (अनाहत ध्वनि) का सतत श्रवण करना चाहिए ॥ ३१ ॥
[ बायें पैर की एड़ी से गुदा स्थान को तथा दाहिने पैर से जननेन्द्रिय मूल को दबाकर, शरीर को सीधा
रखकर त्रिबन्ध (मूल, जालन्धर, उड्डीयान) लगाने को सिद्धासन कहा जाता है तथा अपलक नेत्रों से बाह्य दृष्टि
को अन्तर्लक्ष्य करके (भ्रुकुटि-मध्य में) देखना वैष्णवी मुद्रा कहलाती है।]
अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिः ।
पक्षाद्विपक्षमखिलं जित्वा तुर्यपदं व्रजेत् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार नाद का किया गया अभ्यास बाह्य ध्वनियों को आवृत कर लेता है, इस तरह (योगी
साधक) दोनों पक्षों 'अकार' और 'मकार' को जीतकर क्रमशः सम्पूर्ण 'ओंकार' को शनैः-शनैः
आत्मसात् कर तुर्यावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥
श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान् ।
वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३३ ॥
अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह महान् नाद (अनाहत ध्वनि) विभिन्न तरह से सुनायी देता है। इसके
अनन्तर जब अभ्यास अधिक बढ़ जाता है, तब उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप (भेद) सुनायी पड़ने लगते हैं ॥ ३३ ॥
आदौ जलधिजीमूतभेरीनिर्झरसंभवः ।
मध्ये मर्दलशब्दाभो घण्टाकाहलजस्तथा ॥ ३४ ॥
अन्ते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनिःस्वनः ।
इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३५ ॥
मन्त्र ४१ २१९
इस नाद की ध्वनि प्रारम्भिक काल में समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनायी
देती है। इसके बाद बीच की अवस्था (मध्यमावस्था) में मृदङ्ग, घंटे और नगाड़े की भाँति यह ध्वनि सुनाई
पड़ती है। अन्त में अर्थात् उत्तरावस्था में किङ्किणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की ध्वनि के समान मधुर नाद-
ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए नाना प्रकार के नाद सुनायी पड़ते हैं ॥३४-३५॥
महति श्रूयमाणे तु महाभेर्यादिकध्वनौ।
तत्र सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ॥ ३६ ॥
निरन्तर नाद का अभ्यास करते हुए जब भेरी आदि की ध्वनि (आवाज) तेजी से सुनायी पड़ने लगे,
तब उसमें भी सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर नाद के सुनने का विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥
घनमत्सृज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने।
रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत् ॥ ३७ ॥
(नाद में रुचि रखने वाले साधक को चाहिए कि) वह घन नाद को छोड़कर सूक्ष्मनाद (मन्द
ध्वनि) या फिर सूक्ष्म नाद का परित्याग करके घन नाद में मन को केन्द्रित करे। अन्यत्र और कहीं भी
इधर-उधर मन को भ्रमित न होने दे ॥ ३७ ॥
यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः।
तत्र तत्र स्थिरीभूत्वा तेन सार्धं विलीयते ॥ ३८ ॥
साधक का मन सर्वप्रथम जहाँ-कहीं किसी भी सूक्ष्म (अतिमन्द) अथवा घननाद (अभेद्यध्वनि)
में लगता है। उसको (मन को) वहीं केन्द्रित करना चाहिए। ऐसा करने से वह (चित्त) स्वयमेव तन्मय
(विलीन) होने लगता है ॥ ३८ ॥
विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादे दुग्धाम्बुवन्मनः।
एकीभूयाथ सहसा चिदाकाशे विलीयते ॥ ३९ ॥
साधक का मन सभी सांसारिक बाह्य-प्रपंचों से विस्मृत होकर दूध में मिश्रित जल की भाँति नाद
(ध्वनि) में एकीभूत हो जाता है। इस प्रकार वह (मन) नाद के साथ अकस्मात् ही चिदाकाश में स्वयं को
विलय कर लेता है ॥ ३९ ॥
उदासीनस्ततो भूत्वा सदाभ्यासेन संयमी ।
उन्मनीकारकं सद्यो नादमेवावधारयेत् ॥ ४० ॥
संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषयों-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास
द्वारा मन को तत्क्षण ही उस नाद में नियोजित करे और सदैव चिन्तन के द्वारा उसी में रमण करता रहे ॥ ४० ॥
सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जितः ।
नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते ॥ ४१ ॥
योगी साधक को चाहिए कि सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर सभी तरह
की चेष्टाओं से मन को हटाकर (उस) नाद का ही अनुसन्धान (श्रवण-मनन-चिन्तन) करे; क्योंकि
(चिन्तन द्वारा सहज ही) चित्त का नाद में लय हो जाता है ॥ ४१ ॥
२२० नादबिन्दूपनिषद्
मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा।
नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि काङ्क्षति॥ ४२॥
जिस प्रकार भ्रमर फूलों का रस ग्रहण करता हुआ पुष्पों के गन्ध की अपेक्षा नहीं रखता है, ठीक
वैसे ही सतत नाद में तल्लीन रहने वाला चित्त विषय-वासना आदि की आकांक्षा नहीं करता है॥ ४२॥
बद्धः सुनादगन्धेन सद्यः संत्यक्तचापलः।
नादग्रहणतश्चित्तमन्तरङ्गभुजङ्गमः॥ ४३॥
यह चित्त रूपी अन्तरङ्ग भुजङ्ग (सर्प) नाद को सुनने के पश्चात् उस सुन्दर नाद की गन्ध से आबद्ध
हो जाता है और तत्क्षण ही सभी तरह की चपलताओं का परित्याग कर देता है॥ ४३॥
विस्मृत्य विश्वमेकाग्रः कुत्रचिन्न हि धावति।
मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः॥ ४४॥
नियामनसमर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः।
नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते॥ ४५॥
अन्तरङ्गसमुद्रस्य रोधे वेलायतेऽपि वा।
ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः॥ ४६॥
तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके
(विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन
रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद
मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता
है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है॥ ४४-४६॥
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्।
तावदाकाशसंकल्पो यावच्छब्दः प्रवर्तते॥ ४७॥
मन वहाँ ही (उस प्रकाश तत्त्व में) विलय को प्राप्त हो जाता है। वहीं परम श्रेष्ठ भगवान् विष्णु का परम पद
है। मन में आकाश तत्त्व का संकल्प तभी तक रहता है, जब तक कि शब्दों का उच्चारण और श्रवण होता है॥ ४७॥
निःशब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मा समीयते ।
नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी॥ ४८॥
निःशब्द (शब्दरहित) होने पर तो वह (मन) परमब्रह्म के परमात्म-तत्त्व का अनुभव करने लगता
है। नाद (ध्वनि) के रहने तक ही मन का अस्तित्व बना रहता है। नाद के समापन होने पर मन भी 'अमन'
(शून्यवत्) हो जाता है॥ ४८॥
सशब्दश्चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्।
सदा नादानुसंधानात्संक्षीणा वासना तु या॥ ४९॥
निरञ्जने विलीयेते मनोवायू न संशयः।
नादकोटिसहस्राणि बिन्दुकोटिशतानि च॥ ५०॥
मन्त्र ५६ २२१
सर्वे तत्र लयं यान्ति ब्रह्मप्रणवनादके ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ॥ ५१ ॥
मृतवत्तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ।
शङ्खदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन ॥ ५२ ॥
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह
निःशब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण
नष्ट हो जाती हैं, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं।
करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत्, स्वप्न तथा
सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति
में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता
है और वह (योगी) शङ्ख-दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ॥ ४९-५२ ॥
काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ।
न जानाति स शीतोष्णं न दुःखं न सुखं तथा ॥ ५३ ॥
जिस अवस्था में मन 'अमन' हो जाता है, उस अवस्था के प्राप्त होने पर शरीर लकड़ी की भाँति
चेष्टारहित सा हो जाता है। वह (मन) न शीत जानता है, न गर्मी जानता है और न ही वह सुख-दुःख का
अनुभव करता है ॥ ५३ ॥
न मानं नावमानं च संत्यक्त्वा तु समाधिना ।
अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिनः सदा ॥ ५४ ॥
वह (योगी) मान-अपमान से परे हो जाता है। समाधि द्वारा वह इन सभी का पूर्णतया परित्याग कर
देता है। योगी का चित्त तीनों अवस्थाओं-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि का कभी भी अनुगमन नहीं करता
है (अर्थात् उससे परे हो जाता है) ॥ ५४ ॥
जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्तः स्वरूपावस्थतामियात् ॥ ५५ ॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनासदृश्यं वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् ।
चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं स ब्रह्मतारान्तरनादरूप इत्युपनिषत् ॥ ५६ ॥
(वह) योगी जाग्रत् और निद्रा (स्वप्न) की अवस्था से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर
हो जाता है। दृश्य वस्तु के अभाव में भी जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है, बिना प्रयास के ही जिसका प्राण
अपने स्थान पर सुस्थिर हो जाता है तथा बिना किसी आश्रय अथवा अवलम्बन के ही जिसका चित्त स्थिरता
को प्राप्त हो जाता है, ऐसा वह (योगी) ब्रह्ममय प्रणव नाद के अन्तर्वर्ती तुरीयावस्था (परमानंद) में सदैव
स्थित हो जाता है। यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है ॥ ५५-५६ ॥
ॐ वाङ्मे मनसि.........इति शान्तिः ॥
॥ इति नादबिन्दूपनिषत्समाप्ता ॥
॥ निरालम्बोपनिषद् ॥
शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रकृति, जगत् , ज्ञान, कर्म आदि का सुन्दर
विवेचन किया गया है। निर्विकार ब्रह्म जब प्रकृति के साथ सृष्टि का सृजन करके उसका ईशन-शासन-संचालन
करता है, तो ईश्वर कहलाता है। इसी प्रकार विभिन्न संबोधनों को परिभाषित किया गया है। ऋषि जाति-पाँति
सम्बन्धी भ्रमों का निवारण करते हुए कहते हैं कि वह आत्मा, रक्त, चमड़ा, मांस, हड्डियों आदि से सम्बन्धित नहीं
है, वह तो व्यवहार के क्रम में कल्पित व्यवस्था मात्र है। इसी प्रकार अहंता, ममता आदि को त्याग कर इष्ट में
समर्पित हो जाने को 'संन्यास' कहते हुए उन्हीं को मुक्त, पूज्य, योगी, परमहंस आदि उपाधियों से विभूषित होने की
बात समझायी गयी है। ऐसी स्थिति प्राप्त करके ही साधक जन्म-मरण के बन्धनों को काट सकता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- ईशावास्योपनिषद)
ॐ नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये। निष्प्रपञ्चाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे ।
निरालम्बं समाश्रित्य सालम्बं विजहाति यः । स संन्यासी च योगी च कैवल्यं पदमश्रुते ॥ १ ॥
उस कल्याणकारी (शिव) गुरु, सत्-चित् और आनन्द की मूर्ति को नमस्कार है। उस निष्प्रपञ्च,
शान्त, आलम्ब (आश्रय) रहित, तेजःस्वरूप परमात्मा को नमन है। जो निरालम्ब (परमात्म तत्त्व) का
आश्रय ग्रहण करके (सांसारिक) आलम्बन का परित्याग कर देता है, वह योगी और संन्यासी है, वही
कैवल्य (मोक्ष) पद प्राप्त करता है ॥ १ ॥
एषामज्ञानजन्तूनां समस्तारिष्टशान्तये। यद्यद्बोद्धव्यमखिलं तदाशङ्क्य ब्रवीम्यहम् ॥ २ ॥
इस संसार के अज्ञानी जीवों के सभी अरिष्टों (कष्टों) की शान्ति के निमित्त जो-जो ज्ञान आवश्यक
है, उसकी आशंका करके (उसके उत्तर के रूप में) मैं यहाँ कहता हूँ (पूछता हूँ) ॥ २ ॥
किं ब्रह्म। क ईश्वरः । को जीवः । का प्रकृतिः । कः परमात्मा । को ब्रह्मा । को विष्णुः । को
रुद्रः । क इन्द्रः । कः शमनः । कः सूर्यः । कश्चन्द्रः । के सुराः । के असुराः । के पिशाचाः । के
मनुष्याः । काः स्त्रियः । के पश्वादयः । किं स्थावरम् । के ब्राह्मणादयः । का जातिः । किं कर्म ।
किमकर्म। किं ज्ञानम्। किमज्ञानम्। किं सुखम्। किं दुःखम्। कः स्वर्गः। को नरकः। को बन्धः।
को मोक्षः । क उपास्यः । कः शिष्यः । को विद्वान् । को मूढः । किमासुरम् । किं तपः । किं परमं
पदम् । किं ग्राह्यम् । किमग्राह्यम् । कः संन्यासीत्याशङ्क्याह ब्रह्मेति ॥ ३ ॥
ब्रह्म क्या है ? ईश्वर कौन है ? जीव कौन है ? प्रकृति क्या है ? परमात्मा कौन है ? ब्रह्मा कौन
है ? विष्णु कौन है ? रुद्र कौन है ? इन्द्र कौन है ? यम कौन है ? सूर्य कौन है ? चन्द्र कौन है ? देवता
कौन हैं ? असुर कौन हैं ? पिशाच कौन हैं ? मनुष्य क्या हैं ? स्त्रियाँ क्या हैं ? पशु आदि क्या हैं ?
स्थावर (जड़) क्या है ? ब्राह्मण आदि क्या हैं ? जाति क्या है ? कर्म क्या है ? अकर्म क्या है ? ज्ञान
और अज्ञान क्या हैं ? सुख-दुःख क्या हैं ? स्वर्ग-नरक क्या हैं ? बंधन और मुक्ति क्या हैं ? उपासना
करने योग्य कौन है ? शिष्य कौन है ? विद्वान् कौन है ? मूर्ख कौन है ? असुरत्व क्या है ? तप क्या है ?
परमपद किसे कहते हैं ? ग्रहणीय और अग्रहणीय क्या हैं ? संन्यासी कौन है ? इस प्रकार शंका व्यक्त
करके उन्होंने ब्रह्म आदि का स्वरूप विवेचित किया ॥ ३ ॥
मन्त्र १० २२३
स होवाच महदहंकारपृथिव्यप्तेजोवाव्वाकाशत्वेन बृहद्रूपेणाण्डकोशेन
कर्मज्ञानार्थरूपतया भासमानमद्वितीयमखिलोपाधिविनिर्मुक्तं तत्सकलशक्त्यु-
पबृंहितमनाद्यनन्तं शुद्धं शिवं शान्तं निर्गुणमित्यादिवाच्यमनिर्वाच्यं चैतन्यं ब्रह्म। ईश्वर
इति च। ब्रह्मैव स्वशक्तिं प्रकृत्यभिधेयामाश्रित्य लोकान्सृष्ट्वा प्रविश्यान्तर्यामित्वेन ब्रह्मादीनां
बुद्धीन्द्रियनियन्तृत्वादीश्वरः ॥ ४॥
उन्होंने कहा कि महत् तत्त्व, अहं, पृथिवी, आपः, तेजस्, वायु और आकाश रूप बृहद् ब्रह्माण्ड
कोश वाला, कर्म और ज्ञान के अर्थ से प्रतिभासित होने वाला, अद्वितीय, सम्पूर्ण (नाम रूप आदि)
उपाधियों से रहित, सर्व शक्तिसम्पन्न, आद्यन्तहीन, शुद्ध, शिव, शान्त, निर्गुण और अनिर्वचनीय चैतन्य
स्वरूप परब्रह्म कहलाता है। अब ईश्वर के स्वरूप का कथन करते हैं। यही ब्रह्म जब अपनी प्रकृति
(शक्ति) के सहारे लोकों का सृजन करता है और अन्तर्यामी स्वरूप से (उनमें) प्रविष्ट होकर ब्रह्मा, विष्णु
और महेश तथा बुद्धि और इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है, तब उसे ईश्वर कहते हैं ॥ ४ ॥
जीव इति च ब्रह्मविष्णुवीशानेन्द्रादीनां नामरूपद्वारा स्थूलोऽहमिति
मिथ्याध्यासवशाज्जीवः। सोऽहमेकोऽपि देहारम्भकभेदवशाद्बहुजीवः ॥ ५॥
जब इस चैतन्य स्वरूप ईश्वर को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इन्द्रादि नामों और रूपों के द्वारा देह का
मिथ्याभिमान हो जाता है कि मैं स्थूल हूँ, तब उसे जीव कहते हैं। यह चैतन्य 'सोऽहं' स्वरूप में एक होने
पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण 'जीव' अनेकविध बन जाता है ॥ ५ ॥
प्रकृतिरिति च ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरूपा ब्रह्मश-
क्तिरेव प्रकृतिः ॥ ६॥
प्रकृति उसे कहते हैं, जो ब्रह्म के सान्निध्य से चित्र-विचित्र संसार को रचने की शक्ति वाली तथा
ब्रह्म की बुद्धिरूपा शक्ति वाली है ॥ ६ ॥
परमात्मेति च देहादेः परतरत्वाद् ब्रह्मैव परमात्मा ॥ ७॥
देहादि से परे रहने के कारण ब्रह्म को ही परमात्मा कहते हैं ॥ ७॥
स ब्रह्मा स विष्णुः स इन्द्रः स शमनः स सूर्यः स चन्द्रस्ते सुरास्ते असुरास्ते
पिशाचास्ते मनुष्यास्ताः स्त्रियस्ते पश्वादयस्तत्स्थावरं ते ब्राह्मणादयः ॥ ८॥
यही परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, सूर्य और चन्द्र आदि देवता के रूप में; यही असुर, पिशाच,
नर-नारी और पशु आदि के रूप में प्रकट होता है; यही जड़-पदार्थ और ब्राह्मण आदि भी है ॥ ८ ॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ ९॥
यह समस्त विश्व ही ब्रह्म है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ९ ॥
जातिरिति च। न चर्मणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः । न जातिरात्मनो
जातिर्व्यवहारप्रकल्पिता ॥ १०॥
जाति (शरीर के) चर्म, रक्त, मांस, अस्थियों और आत्मा की नहीं होती। उसकी (मानव, पशु-पक्षी
या ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति की) प्रकल्पना तो केवल व्यवहार के निमित्त की गई है ॥ १० ॥
[ ऋषि यहाँ स्पष्टता से कहते हैं कि जाति शरीर भेद से नहीं, व्यवहार भेद से निर्धारित की गयी है।]
२२४ निरालम्बोपनिषद्
कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियैः कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म।
अकर्मेति च कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यहंकारतया बन्धरूपं जन्मादिकारणं नित्यनैमित्तिकया-
गव्रततपोदानादिषु फलाभिसंधानं यत्तदकर्म॥ ११-१२॥
इन्द्रियों द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं। जिस क्रिया को 'मैं करता हूँ' इस भावपूर्वक
(अध्यात्म निष्ठा से) किया जाता है, वही कर्म है। कर्त्तापन और भोक्तापन के अहंकार के द्वारा फल की इच्छा
से किये गये बन्धन स्वरूप नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, व्रत, तप, दान आदि कर्म 'अकर्म' कहलाते हैं॥ ११-१२॥
ज्ञानमिति देहेन्द्रियनिग्रहसद्गुरूपासनश्रवणमनननिदिध्यासनैर्यद्यद्दृग्दृश्यस्वरूपं
सर्वान्तरस्थं सर्वसमं घटपटादिपदार्थमिवाविकारं विकारेषु चैतन्यं विना किंचिन्नास्तीति
साक्षात्करानुभवो ज्ञानम्॥ १३॥
सृष्टि की सभी बदलने वाली वस्तुओं में एक ही अपरिवर्तनशील चैतन्य तत्त्व विद्यमान है, अन्य
कुछ भी नहीं है, द्रष्टा और दृश्य जो कुछ भी है, सब कुछ चैतन्य तत्त्व ही है। सबके अन्दर यह चैतन्य तत्त्व
ही विद्यमान रहने पर भी ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह घट-वस्त्रादि रूप में ही परिवर्तित हो गया है। इसी
साक्षात्कार की अनुभूति को ज्ञान कहते हैं। यह अनुभूति शरीर और इन्द्रिय आदि पर नियंत्रण रखने से और
सद्गुरु की उपासना, उनके उपदेशों के श्रवण, चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करने से होती है॥ १३॥
अज्ञानमिति च रज्जौ सर्पभ्रान्तिरिवाद्वितीये सर्वानुस्यूते सर्वमये ब्रह्मणि देवतिर्यङ्-
नरस्थावरस्त्रीपुरुषवर्णाश्रमबन्धमोक्षोपाधिनानात्मभेदकल्पितं ज्ञानमज्ञानम्॥ १४॥
जिस प्रकार रस्सी में सर्प की भ्रान्ति होती है, उसी प्रकार सब में विद्यमान ब्रह्म और देव, पशु-पक्षी, मनुष्य,
स्थावर, स्त्री-पुरुष, वर्ण-आश्रम, बन्धने-मुक्ति आदि सभी अनात्म वस्तुओं में भेद मानना ही 'अज्ञान' है॥ १४॥
सुखमिति च सच्चिदानन्दस्वरूपं ज्ञात्वानन्दरूपा या स्थितिः सैव सुखम्॥ १५॥
सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा के ज्ञान से जो आनन्दपूर्ण स्थिति बनती है, वही सुख है॥ १५॥
दुःखमिति अनात्मरूपो विषयसंकल्प एव दुःखम्॥ १६॥
अनात्म रूप (नश्वर) विषयों का सङ्कल्प (विचार) करना दुःख कहलाता है॥ १६॥
स्वर्ग इति च सत्संसर्गः स्वर्गः। नरक इति च असत्संसारविषयजनसंसर्ग एव नरकः॥ १७॥
सत् का (अनश्वर का) समागम (सत्पुरुषों का सत्संग) ही स्वर्ग है। असत् (नश्वर) संसार
के विषयों (में रचे-पचे लोगों) का संसर्ग ही नरक है॥ १७॥
बन्ध इति च अनाद्यविद्यावासनया जातोऽहमित्यादिसंकल्पो बन्धः॥ १८॥
अनादि अविद्या की वासना (संस्कार) द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि 'मैं हूँ,' यही बन्धन है॥
पितृमातृसहोदरदारापत्यगृहारामक्षेत्रममतासंसारावरणसङ्कल्पो बन्धः॥ १९॥
माता-पिता, भ्राता, पुत्र, गृह, उद्यान तथा खेत आदि मेरे अपने हैं, यह सांसारिक विचार भी बन्धन ही हैं॥
कर्तृत्वाद्यहंकारसंकल्पो बन्धः॥ २०॥
कर्त्तापन के अहंकार का संकल्प भी बन्धनरूप है॥ २०॥
अणिमाद्यष्टैश्वर्याशासिद्धसंकल्पो बन्धः॥ २१॥
मन्त्र ३४ २२५
अणिमा आदि (अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये अष्ट
सिद्धियाँ अथवा ऐश्वर्य हैं) आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का संकल्प भी बन्धन है॥ २१॥
देवमनुष्याद्युपासनाकामसंकल्पो बन्धः ॥ २२॥
मनोकामना की पूर्ति के संकल्पपूर्वक की गई देवताओं और मनुष्यों की उपासना भी बन्धन रूप है ॥ २२ ॥
यमाद्यष्टाङ्गयोगसंकल्पो बन्धः ॥ २३ ॥
यम आदि (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) आठ अङ्गों वाले
योग का संकल्प भी बन्धन ही है॥ २३॥
वर्णाश्रमधर्मकर्मसंकल्पो बन्धः ॥ २४ ॥
वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) और आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास)
धर्म-कर्म के संकल्प भी बन्धन स्वरूप हैं ॥ २४ ॥
आज्ञाभयसंशयात्मगुणसंकल्पो बन्धः ॥ २५ ॥
आज्ञा, भय, संशय आदि आत्म-गुणों के संकल्प भी बन्धन हैं ॥ २५ ॥
यागव्रततपोदानविधिविधानज्ञानसंकल्पो बन्धः ॥ २६ ॥
यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के संकल्प भी बन्धन हैं ॥२६ ॥
केवलमोक्षापेक्षासंकल्पो बन्धः ॥ २७॥
मोक्ष प्राप्ति का विचार करना भी बन्धन रूप है ॥२७ ॥
संकल्पमात्रसंभवो बन्धः ॥ २८॥
संकल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धन स्वरूप है ॥ २८ ॥
मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तुविचारादनित्यसंसारसुखदुःख
विषयसमस्तक्षेत्र ममताबन्धक्षयो मोक्षः ॥ २९ ॥
जब नित्य और अनित्य वस्तुओं के विषय में विचार करने से नश्वर संसार के सुख-दुःखात्मक सभी
विषयों से ममतारूपी बन्धन विनष्ट हो जाएँ, उस (स्थिति) को मोक्ष कहते हैं॥ २९ ॥
उपास्य इति च सर्वशरीरस्थचैतन्यब्रह्मप्रापको गुरुरुपास्यः ॥ ३० ॥
समस्त शरीरों में स्थित, चैतन्य स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला गुरु ही उपास्य (पास बैठने योग्य) है॥
शिष्य इति च विद्याध्वस्तप्रपञ्चावगाहितज्ञानावशिष्टं ब्रह्मैव शिष्यः ॥ ३१ ॥
जिसके हृदय में विद्या द्वारा नष्ट हुए जगत् के अवगाहन से उत्पन्न ब्रह्म रूप ज्ञान शेष रहे, वही शिष्य है॥
विद्वानिति च सर्वान्तरस्थस्वसंविद्रूपविद्विद्वान् ॥ ३२॥
सबके अन्तर में स्थित आत्म तत्त्व के विज्ञानमय स्वरूप को जानने वाला ही विद्वान् है ॥३२ ॥
मूढ इति च कर्तृत्वाद्यहंकारभावारूढो मूढः ॥ ३३ ॥
कर्त्तापन आदि के भाव में आरूढ़ व्यक्ति ही मूढ़ (मूर्ख) है ॥ ३३ ॥
आसुरमिति च ब्रह्मविष्ण्वीशानेन्द्रादीनामैश्वर्यकामनया निरशनजपाग्निहोत्रादि-
ष्वन्तरात्मानं संतापयति चात्युग्ररागद्वेषविहिंसादम्भाद्यपेक्षितं तप आसुरम् ॥ ३४॥
जो ब्रह्मा, विष्णु, ईशान और इन्द्र आदि देवों के ऐश्वर्य की कामनापूर्वक व्रत, जप, यज्ञ आदि में
अन्तरात्मा को तपाये तथा अत्युग्र राग-द्वेष, हिंसा, दम्भ आदि दुर्गुणों से युक्त होकर जो तप करे, वह
आसुरी तप कहलाता है ॥ ३४ ॥
२२६
तप इति च ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्यपरोक्षज्ञानाग्निना। ब्रह्माद्यैश्वर्याशासिद्धसङ्कल्प-
बीजसन्तापं तपः॥ ३५॥
ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है, इस प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान से ब्रह्मा आदि देवों के ऐश्वर्य प्राप्त करने
के सङ्कल्प-बीज को संतप्त करना (जला डालना) ही (यथार्थ) तप कहा जाता है॥ ३५॥
परमं पदमिति च प्राणेन्द्रियाद्यन्तःकरणगुणादेः। परतरं सच्चिदानन्दमयं
नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं परमं पदम्॥ ३६॥
प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि से भिन्न सच्चिदानन्द स्वरूप और नित्य मुक्त ब्रह्म का स्थान 'परमपद'
कहलाता है॥ ३६॥
ग्राह्यमिति च देशकालवस्तुपरिच्छेदराहित्यचिन्मात्रस्वरूपं ग्राह्यम्॥ ३७॥
देश, काल, वस्तु की मर्यादा से परे चिन्मात्र स्वरूप (जो कुछ है, वह) ही ग्रहण करने योग्य (ग्राह्य) है॥
अग्राह्यमिति च स्वस्वरूपव्यतिरिक्तमायामयबुद्धीन्द्रियगोचरजगत्स-
त्यत्वचिन्तनमग्राह्यम्॥ ३८॥
निजस्वरूप से परे, माया द्वारा कल्पित और बुद्धि तथा इन्द्रियगम्य जगत् की सत्यता का चिन्तन 'अग्राह्य' है॥
संन्यासीति च सर्वधर्मान्परित्यज्य निर्ममो निरहंकारो भूत्वा ब्रह्मेष्टं शरणमुपगम्य तत्त्वमसि
अहं ब्रह्मास्मि सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचनेत्यादिमहावाक्यार्थानुभवज्ञानाद्
ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चित्य निर्विकल्पसमाधिना स्वतन्त्रो यतिश्चरति स संन्यासी स मुक्तः स
पूज्यः स योगी स परमहंसः सोऽवधूतः स ब्राह्मण इति॥ ३९॥
जो समस्त धर्मों (कर्मों) में ममता एवं अहंकार का परित्याग करके इष्ट (ब्रह्म) की शरण में जाकर
और 'तू वही है', 'मैं ब्रह्म हूँ', 'जो कुछ भी यह है, सब कुछ निश्चित ही ब्रह्म है', 'ब्रह्म के अतिरिक्त और
कुछ भी नहीं है', आदि इन महावाक्यों द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ', इस प्रकार का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि
में लीन रहकर परम स्वतन्त्र और यतिस्वरूप होता है, वह पुरुष 'संन्यासी' कहलाता है, वही मुक्त, पूज्य,
योगी, परमहंस, अवधूत और ब्राह्मण होता है॥ ३९॥
इदं निरालम्बोपनिषदं योऽधीते गुर्वनुग्रहतः सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति
न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते पुनर्नाभिजायते पुनर्नाभिजायते इत्युपनिषत्॥ ४०॥
इस निरालम्ब उपनिषद् का जो (साधक) गहन अध्ययन करता है, गुरु कृपा से वह अग्निपूत (अग्नि
की तरह पवित्र) और वायुपूत (वायु की तरह पावन) हो जाता है, फिर उसका पुनरावर्तन नहीं होता, वह
पुनः-पुनः जगत् में जन्म नहीं लेता। निरालम्ब उपनिषद् का यही रहस्य है॥ ४०॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं .............इति शान्तिः ॥
॥ इति निरालम्बोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ प्रणवापानषद् ॥
नाम के अनुरूप इसमें प्रणव ॐकार का विवेचन किया गया है। ॐकार को परब्रह्म की अक्षराभिव्यक्ति
कहा गया है। इसकी तीन मात्राओं (अ, उ, म्) के साथ त्रिदेव, त्रिकाल, त्रिवेद, तीन अग्नियों की संगति बिठाई
गयी है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना सहित ७२ हजार नाड़ियों में ॐकार को संव्याप्त कहा गया है। अन्त में कहा गया है
कि जो साधक ॐकार के माध्यम से ब्रह्म तादात्म्य प्राप्त करते हैं, वे अमृतत्व के अधिकारी हो जाते हैं।
पुरस्ताद्ब्रह्मणस्तस्य विष्णोरद्भुतकर्मणः।
रहस्यं ब्रह्मविद्याया धृताग्निं संप्रचक्षते॥ १॥
अब ब्रह्म स्वरूप भगवान् विष्णु के अद्भुत कर्मों से युक्त, (संचित कर्मों को भस्मसात् करने में
समर्थ) अग्नि को धारण करने वाली ब्रह्मविद्या का रहस्य वर्णित किया जा रहा है॥ १॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म यदुक्तं ब्रह्मवादिभिः।
शरीरं तस्य वक्ष्यामि स्थानकालत्रयं तथा॥ २॥
ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार को ही एक अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म कहा है, उसके शरीर, स्थान और
कालत्रय (भूत, भविष्यत् और वर्तमान) का विवेचन अब किया जाता है॥ २॥
तत्र देवास्त्रयः प्रोक्ता लोका वेदास्त्रयोऽग्नयः।
तिस्त्रो मात्रार्धमात्रा च प्रत्यक्षस्य शिवस्य तत्॥ ३॥
उस ॐकार रूप ब्रह्म में तीन देवता, (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः), तीन वेद
(ऋक्, यजुष्, साम), तीन अग्नियां (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय), तीन पूर्ण मात्रा और एक अर्धमात्रा
(अ, उ, म् एवं अनुस्वार) सन्निहित है। वही उसका साक्षात् कल्याणकारी शिव स्वरूप है॥३॥
ऋग्वेदो गार्हपत्यं च पृथिवी ब्रह्म एव च।
अकारस्य शरीरं तु व्याख्यातं ब्रह्मवादिभिः॥ ४॥
ऋग्वेद, पृथ्वी, गार्हपत्य अग्नि और देव ब्रह्मा - ये तत्त्व ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार के तीन अक्षरों में
अकार के शरीर रूप में बताये हैं॥ ४॥
यजुर्वेदोऽन्तरिक्षं च दक्षिणाग्निस्तथैव च।
विष्णुश्च भगवान् देव उकारः परिकीर्तितः॥ ५॥
यजुर्वेद, अन्तरिक्ष, दक्षिणाग्नि और भगवान् विष्णु ये सब तत्त्व ॐकार के तीन अक्षरों में 'उकार' के
स्वरूप में निरूपित किये गये हैं॥५॥
सामवेदस्तथा द्यौश्चाहवनीयस्तथैव च।
ईश्वरः परमो देवो मकारः परिकीर्तितः॥ ६॥
सामवेद, द्युलोक, आहवनीय अग्नि और महादेव शिव- ये सब ॐकार के तीन अक्षरों में से
'मकार' के स्वरूप में निरूपित हुए हैं॥ ६॥
२२८ प्रणवापानषद्
सूर्यमण्डलमाभाति ह्यकारश्चन्द्रमध्यगः।
उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः॥ ७॥
सूर्य मण्डल का जो स्वरूप है, वह ॐकार के अक्षरों में 'अकार' का स्वरूप है। चन्द्रमण्डल का
स्वरूप 'उकार' से निरूपित है, जो इस ॐकार के मध्य में अवस्थित है॥ ७॥
मकारश्चाग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः।
तिस्रो मात्रास्तथा ज्ञेयाः सोमसूर्याग्नितेजसः॥ ८॥
ॐकार का अन्तिम अक्षर मकार, उस अग्नि स्वरूप में है, जो धूम्ररहित है, विद्युत् सदृश है। ॐकार
की तीनों मात्राओं को चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेजस् के स्वरूप में समझना चाहिए॥ ८॥
शिखा च दीपसंकाशा यस्मिन्नु परिवर्तते।
अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता॥ ९॥
दीपक की ज्योतिशिखा के स्वरूप में, जिसमें शिखा ऊर्ध्वगामी हो, उस प्रणव अक्षर 'ॐकार' के
ऊपर स्थित अर्द्धचन्द्र-अर्द्ध मात्रा को समझना चाहिए॥ ९॥
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखाभा दृश्यते परा।
नासादि सूर्यसंकाशा सूर्य हित्वा तथापरम्॥ १०॥
दूसरी कमल सूत्र (कमल नाल) के सदृश सूक्ष्म शिखा की कान्ति (मस्तक प्रदेश में) दृष्टिगोचर
होती है, वह नासारन्ध्र से सूर्यवत् तेज को धारण कर सूर्यमण्डल का भेदन कर वहाँ स्थित है॥ १०॥
द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडिभिस्त्वा तु मूर्धनि।
वरदं सर्वभूतानां सर्वं व्याप्यैव तिष्ठति॥ ११॥
अग्नि स्वरूप में वह शिखा (ॐकार की अर्द्धमात्रा) बहत्तर हजार नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों
को वर (जीवन-प्राण) देने वाली और सबको व्याप्त करके अवस्थित है॥ ११॥
कांस्यघण्टानिनादः स्याद्यदा लिप्यति शान्तये।
ओङ्कारस्तु तथा योज्यः श्रुतये सर्वमिच्छति॥ १२॥
जब मुमुक्षु मोक्ष प्राप्ति के निकट शान्त स्थिति को प्राप्त होता है, तो काँसे के घण्टे के समान निनाद
सुनाई देता है, यह ॐ कार का ही स्वरूप है। इस स्वरूप को सभी साधक सुनने की इच्छा करते हैं॥ १२॥
यस्मिन् स लीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते।
सोऽमृतत्वाय कल्पते सोऽमृतत्वाय कल्पते इति॥ १३॥
जो साधक (उक्त) ओङ्कार स्वरूप शब्द नाद में लीन हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही कहा जाता है।
वही अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सुनिश्चित है॥ १३॥
॥ इति प्रणवोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ प्रश्नोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा का ब्राह्मण भाग है। प्रश्नोपनिषद् में जिज्ञासुओं द्वारा
महर्षि पिप्पलाद से पूछे गये छः प्रश्न और उनके उत्तरों का वर्णन है। प्रथम प्रश्न में कबन्धी ने प्राण और रयि
के सम्बन्ध में जानना चाहा। द्वितीय प्रश्न में भार्गव ने प्रजा के आधार विषयक तीन प्रश्न किये हैं। तीसरे प्रश्न
के अन्तर्गत आश्वलायन द्वारा प्राण की उत्पत्ति के सन्दर्भ में छः प्रश्न पूछे गये हैं। चौथे प्रश्न में गार्ग्य द्वारा
जीवात्मा-परमात्मा के सम्बन्ध में पाँच जिज्ञासाएँ प्रकट की गयी हैं। पाँचवें प्रश्न के अन्तर्गत सत्यकाम ने
ॐकार-उपासना जाननी चाही है। छठा प्रश्न सुकेशा ने किया, जिसमें १६ कलायुक्त पुरुष के विषय में
जिज्ञासा की गयी है। अन्त में सभी प्रश्नों के समुचित समाधान पाकर जिज्ञासुओं द्वारा महर्षि पिप्पलाद के
प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनकी वन्दना की गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तु-
ष्टुवाग्ंसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे देवो ! हम कानों द्वारा कल्याणमय वचनों का श्रवण करें। हम नेत्रों से शुभ दृश्य देखें और
सुदृढ़ अंगों से युक्त शरीर वाले होकर आयु पर्यन्त देव हित में लगे रहें। इन्द्रदेव हमारे निमित्त
कल्याणकारी हों, पूषादेव हमारा कल्याण करें, अरिष्टनाशक गरुड़देव हमारे लिए कल्याणकारी हों
तथा बृहस्पति देव हमारे लिए स्वस्ति प्रदाता हों। त्रिविध तापों का शमन हो।
॥ प्रथमः प्रश्नः ॥
ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्य-
श्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा
एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥
भरद्वाज पुत्र सुकेशा, शिबि पुत्र सत्यकाम, गर्गसुत सौर्यायणि (सूर्य का पौत्र), अश्वलपुत्र
कौसल्य, विदर्भवासी भार्गव और कात्यायन (कत्यवंशी) कबन्धी आदि परब्रह्म के उपासक और
उसके अनुरूप अनुष्ठान में तत्पर छः ऋषिगण, परब्रह्म के प्रति जिज्ञासु भाव से हाथ में समिधा लेकर
महर्षि पिप्पलाद के निकट गये ॥ १ ॥
तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं
प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥
उन (महर्षि पिप्पलाद) ने उन आगन्तुक ऋषियों से कहा कि आप ब्रह्मचर्यपूर्वक तपस्यारत
रहते हुए एक वर्ष तक श्रद्धापूर्वक यहीं रहें, तत्पश्चात् आप अपनी इच्छानुसार प्रश्न करें, यदि मैं
जानता होऊँगा, तो आपको अवश्य ही उनके उत्तर दूँगा ॥ २ ॥
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ। भगवन्कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥
( एक वर्ष पिप्पलाद ऋषि के आश्रम में निवास करने के पश्चात् ) कात्यायन कबन्धी ने ऋषि
पिप्पलाद के निकट जाकर पूछा- भगवन्! यह प्रजा किससे प्रकट (उत्पन्न)होती है ? ॥ ३ ॥
२३० प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स
मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने कहा कि प्रजा वृद्धि की इच्छा वाले प्रजापति ब्रह्मा ने तप किया। तदनन्तर
उन्होंने रयि और प्राण नामक एक युगल उत्पन्न किया और सोचा कि यह युगल ही अनेक प्रकार की
प्रजा का उत्पादन करेगा ॥ ४ ॥
[ प्राण गति प्रदान करने वाला चेतन तत्त्व या शक्ति है तथा रयि उसे धारण करके विविध रूप देने में
समर्थ प्रकृति है। वर्तमान विज्ञान की भाषा में इन्हें चेतना युक्त ऊर्जा (लाइव एनर्जी) तथा पदार्थ (मैटर)
भी कह सकते हैं। दोनों के संयोग से ही सृष्टि उत्पन्न होती है।]
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥
आदित्य ही प्राण स्वरूप और रयि ही चन्द्र स्वरूप है। इस विराट् विश्व में जो कुछ मूर्त और
अमूर्त अर्थात् स्थूल एवं सूक्ष्म है, वह सब रयि ही है, अतएव मूर्ति ही रयि है ॥ ५ ॥
[ पृथ्वी पर प्राण संचार का दृश्य स्रोत सूर्य है। सूर्य प्रकाशक-प्रेरक है, अस्तु प्राण रूप है। चन्द्रमा
सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित-प्रेरित है, अस्तु रयि का प्रतीक है। स्थूल, सूक्ष्म प्रकृति के सभी घटक रयि ही
कहे जाते हैं।]
अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ।
यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन
सर्वान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥
रात्रि के समापन पर पूर्व में उदित होकर सूर्यदेव पूर्व दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करते
हैं, तदनन्तर वे ही सूर्यदेव दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर और दिशाओं के मध्य भागों को भी देदीप्यमान
करते हैं और उन सब दिशाओं के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करते हैं ॥ ६ ॥
स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७॥
वे सूर्यदेव ही वैश्वानर अग्निरूप, विश्वरूप एवं प्राणरूप होकर प्रकट होते हैं। ऋचा (वेद मंत्रों)
द्वारा भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है ॥ ७ ॥
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥
वे सूर्य सर्वरूप, सर्वाधार, रश्मिवान्, सर्वज्ञाता, तपोनिष्ठ एवं अद्वितीय हैं। वे सहस्रों किरणों वाले
सूर्यदेव सैकड़ों रूपों से विद्यमान रहते हुए समस्त प्राणधारियों के प्राणस्वरूप होकर उदित होते हैं॥ ८॥
संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते
कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऽऋषयः
प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥
(एक दृष्टि से) संवत्सर ही प्रजापति है तथा उसके दक्षिण और उत्तर दो अयन हैं। जो लोग
अपने अभीष्ट की पूर्ति हेतु कर्मपथ का आश्रय लेते हैं, वे चन्द्रलोक को प्राप्त कर आवागमन को प्राप्त
करते हैं। ये प्रजा की कामना करने वाले ऋषिगण दक्षिण की ओर पितृयान मार्ग से गमन करते हैं।
यह पितृयान मार्ग ही रयि है ॥ ९ ॥
प्रश्न १ मन्त्र १६ २३१
[ चन्द्र शब्द 'चदि' धातु से बना है। जिसका अर्थ 'सुख' है। लौकिक सुख को लक्ष्य करके अपनी
ऊर्जा को नियोजित करने वाले, प्रजा उत्पन्न करने वाले जीवन-मरण का चक्र चलाने में सहायक होते हैं।]
अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजproperty यन्ते। एतद्वै
प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥
आत्मशोधी पुरुष तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या द्वारा परमात्मा को प्राप्त करके उत्तरमार्ग
(उत्तरायण) द्वारा सूर्य लोक को प्राप्त करते हैं। वे सूर्यदेव ही प्राणों के आश्रय हैं, वे ही अभय हैं,
वे ही अविनाशी हैं और वे ही परमगति वाले हैं। अस्तु, इस सूर्यलोक को प्राप्त करके फिर पुनरावर्तन
नहीं होता। इस तथ्य को यह अगला मन्त्र स्पष्ट करता है ॥ १०॥
[ सूर्य (प्रेरक ऊर्जा स्रोत) को लक्ष्य करके अपनी ऊर्जा को नियोजित करने वाले साधक सृजेता
(परमात्मा) से एकात्मरूप हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में ब्रह्मचर्य, श्रद्धा आदि का प्रयोग करना होता है।]
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्। अथेमे अन्य उ परे
विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥
कुछ विद्वान् (प्रजापति को) पाँच पैरों (पंच प्राणों या पंच तत्त्वों) और बारह आकृतियों (बारह
मासों) वाला तथा द्युलोक के बीच (अन्तरिक्ष) में जल धारण करने वाला कहते हैं। अन्य विद्वानों ने उसे
सात चक्रों (सात वारों) और छः अरों (छः ऋतुओं) वाला कहा है ॥ ११ ॥
मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेतऽ ऋषयः
शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥
(अन्य दृष्टि से) मास प्रजापति है। उसके कृष्ण पक्ष रयि तथा शुक्ल पक्ष प्राण हैं। इसलिए ये ऋषि
(द्रष्टागण) शुक्लपक्ष में इष्ट कर्म करते हैं तथा अन्य विद्वान् दूसरे कृष्ण पक्ष में इष्ट कार्य संपादित करते हैं ॥
[ शुक्ल पक्ष में प्रकाश बढ़ता है। शुक्ल पक्ष में इष्ट कर्म का भाव है-ऊर्जा उत्पादन कर्म। कृष्णपक्ष
में कर्म का भाव है-ऊर्जा नियोजन कर्म।]
अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति।
ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३॥
अन्य दृष्टि से अहोरात्र प्रजापति स्वरूप हैं। इनमें दिन, प्राण और रात्रि रयि हैं। इसलिए दिन के
समय स्त्री से विहार करने वाले पुरुष अपने प्राण को क्षीण करते हैं, पर रात्रि में रति हेतु संयोग करने
वाले पुरुष उसके कर्मफल से लिप्त नहीं होते, अतः वे ब्रह्मचारी ही माने जाते हैं ॥ १३ ॥
अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥
अन्न ही प्रजापति है, उसी से वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्य से ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है ॥
तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते। तेषामेवैष ब्रह्मलोको
येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
इस प्रकार प्रजापति के इस व्रत पालन करने वाले पुरुष (कन्या-पुत्र रूप) मिथुन का उत्पादन
करते हैं। तपस्वी और ब्रह्मचर्ययुक्त तथा सत्यावलम्बी पुरुष ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ॥ १५ ॥
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥
जिन व्यक्तियों में कुटिलता, झूठ और माया (छल-कपट) नहीं है, वे विशुद्ध ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ॥
२३२ प्रश्नोपनिषद्
॥ द्वितीयः प्रश्नः ॥
अथ हैन भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते ? कतर
एतत्प्रकाशयन्ते ? कः पुनरेषां वरिष्ठः ? इति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् विदर्भदेशीय भार्गव ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! प्रजाधारण करने वाले
देवताओं की संख्या कितनी है ? उनमें से कौन देवता इसे प्रकाशित करते हैं तथा उनमें से वरिष्ठ कौन है ? ॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते
प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने उनसे (भार्गव ऋषि से) कहा कि निश्चित रूप से आकाश, अग्नि, जल, पृथिवी
(पंचभूत) तथा मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र आदि (इन्द्रियाँ) ये सब भी देव ही हैं। ये समस्त देवगण प्रकट
होकर कहते हैं कि हमने ही इस शरीर को धारण किया है। अस्तु, हम ही इसके आश्रयदाता हैं॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथा । अहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्-
बाणमवष्टभ्य विधारयामीति ॥ ३ ॥
इन सभी देवताओं में सर्वश्रेष्ठ प्राण ने कहा कि आप मोह का परित्याग करें, मैं ही अपने पाँच विभागों
(अवयवों) से इस शरीर को आश्रय प्रदान करके धारण करता हूँ ॥३ ॥
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व
एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते तद्यथा मक्षिका मधुकरराजान-
मुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते एवमस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः
श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥
प्राण की इस बात पर देवताओं को विश्वास नहीं हुआ। तब प्राण के अभिमान पूर्वक ऊपर उठने और
बाहर निकलने लगने के साथ ही वाक्, नेत्र, मन और श्रोत्रादि भी शरीर से बाहर निकलने लगे। जब वह
रुक गया, तो उपर्युक्त सभी इन्द्रियाँ भी ठहर गयीं। जैसे मधुमक्खियों में रानी मक्खी के छत्ते से ऊपर
निकलते ही, सभी मक्खियाँ उसके साथ ही बहिर्गमन करने लगती हैं और उसके बैठे रहने पर बैठी रहती
हैं, इस प्रकार प्राण की वरिष्ठता सिद्ध हो जाने पर वाक् आदि सभी देवों ने प्राण की अभ्यर्थना की ॥४॥
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥
यह प्राण ही अग्नि होकर तपता है। यही सूर्य, इन्द्र, मेघ, वायु, पृथिवी एवं रयि है। सत्, असत् और
अमृत भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥
जिस प्रकार रथचक्र की नाभि में अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार प्राण में ऋग्वेद की ऋचाएँ,
यजुर्वेद और सामवेद के मन्त्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और यज्ञ-सभी सन्निहित हैं ॥ ६ ॥