१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextयहाँ महामन्त्र के त्वम् पद के ऋषि- विष्णु हैं। छन्द-गायत्री है। देवता- परमात्मा है। बीज- 'ऐं'
है। शक्ति- क्लीं है। कीलक-सौः है। मेरी मुक्ति के लिए जप का विनियोग है। करन्यास- वासुदेव को
नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श। संकर्षण को नमन- तर्जनी का स्पर्श। प्रद्युम्न को नमन- मध्यमा का स्पर्श।
अनिरुद्ध को नमन- अनामिका का स्पर्श। वासुदेव को नमन- कनिष्ठिका का स्पर्श। वासुदेव, संकर्षण
प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध को नमन- करतल- कर पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादिन्यास (अंगन्यास) का
क्रम है। 'भूर्भुवः स्वः ॐ' यह दिग्बन्ध है॥ २५॥
ध्यानम्-
जीवत्वं सर्वभूतानां सर्वत्राखण्डविग्रहम्।
चित्ताहंकारयन्तारं जीवाख्यं त्वं पदं भजे॥ २६॥
आप सभी प्राणियों में जीवस्वरूप हैं, सर्वत्र अखण्ड विग्रह रूप हैं तथा हमारे चित्त और अहंकार
पर नियंत्रण करने वाले हैं। जीवों के रूप में त्वं (तत्त्वमसि के अन्तर्गत) पद की हम स्तुति करते हैं॥ २६॥
आगे 'ॐ' तत्त्वमसि महामन्त्र के 'असि' पद के षडंग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
असिपदमहामन्त्रस्य मन ऋषिः। गायत्री छन्दः। अर्धनारीश्वरो देवता। अव्यक्ता-
दिर्बीजम्। नृसिंहः शक्तिः। परमात्मा कीलकम्। जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः। पृथ्वीद्व्य-
णुकाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। अब्द्व्यणुकाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। तेजोद्व्यणुकाय मध्यमाभ्यां
वषट्। वायुद्व्यणुकाय अनामिकाभ्यां हुम्। आकाशद्व्यणुकाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।
पृथिव्यप्तेजोवाव्वाकाशद्व्यणुकेभ्यः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। एवं हृदयादि न्यासः। भूर्भुवः
सुवरोमिति दिग्बन्धः॥ २७॥
महामन्त्र के 'असि' पद के ऋषि- मन हैं। छन्द-गायत्री है। देवता-अर्धनारीश्वर हैं। बीज-अव्यक्तादि
है। शक्ति-नृसिंह है। कीलक- परमात्मा है। जीव-ब्रह्म के ऐक्य के लिए जप में निम्न विनियोग है।
करन्यास- पृथ्वी द्वयणुक को नमन- अँगूठे का स्पर्श। अप् (जल) द्वयणुक को नमन- तर्जनी का स्पर्श।
तेज (अग्नि) द्वयणुक को नमन-मध्यमा का स्पर्श। वायु द्वयणुक को नमन- अनामिका का स्पर्श। आकाश
द्वयणुक को नमन- कनिष्ठिका का स्पर्श। पृथ्वी, अप्, तेज, वायु तथा आकाश के द्वयणुक को नमन
करतल-कर पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादि न्यास का क्रम है। 'भूर्भुवः स्वः ॐ' यह दिग्बन्ध है॥२७॥
ध्यानम्-
जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मनःस्थितिः।
ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा॥ २८॥
जीव ही ब्रह्म है इस महावाक्य के अर्थ पर जो विचार करता -मन को स्थिर करता है, तथा 'असि'
पद का सदैव चिन्तन-मनन करता है, वह तत्त्व को ऐक्य प्रदान करने में समर्थ होता है (पंचतत्त्व अन्त में
एक- ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।)॥ २८॥
एवं महावाक्यषडङ्गान्ययुक्तानि ॥ २९॥
इस प्रकार महावाक्यों के षडङ्गों का विवेचन किया गया ॥ २९॥