सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र ४ २६५

अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र ४ २६५
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स
होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥
(कभी) गर्ग गोत्रीय बालाकि नामक वेद प्रवक्ता ने काशी नरेश अजातशत्रु से अहंकार पूर्ण वाणी में
कहा कि मैं आपको ब्रह्मज्ञान का उपदेश करूँगा, तब काशी नरेश अजातशत्रु ने कहा- इसके निमित्त मैं
आपको एक सहस्र गौएँ प्रदान करता हूँ; क्योंकि प्रजाजन (ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु) 'जनक' 'जनक'
कहकर उन्हीं की ओर दौड़ते रहते हैं (अर्थात् सभी प्रजाजन यही कहते हैं कि जनक बहुत बड़े दाता हैं
और बहुत बड़े श्रोता भी। मुझे ब्रह्मज्ञान देने का वचन देते ही आपने मेरे लिए दोनों बातें सुगम कर दीं।
इसलिए मैं आपको एक हजार गौएँ प्रदान करता हूँ।) ॥ १ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास
इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥
तब गर्गवंशी उन बालाकि ने कहा कि मैं आदित्य स्थित पुरुष की ब्रह्मरूप में उपासना करता हूँ। यह
सुनकर अजातशत्रु ने कहा-आप ऐसा न बोलें, जो समस्त प्राणियों के मूर्धा स्वरूप हैं, दीप्तिमान् हैं एवं सबका
अतिक्रमण करके स्थित हैं, उन ब्रह्म की मैं उपासना करता हूँ। ऐसा जानते हुए जो उस ब्रह्म की उपासना
करता है, वह समस्त भूतों में उनकी मूर्धा (मस्तक) स्वरूप स्थित होता हुआ सबका राजा होता है॥ २ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा बृहत्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्तेऽहरहहं सुतः प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् उन गार्ग्य बालाकि ने कहा कि चन्द्रमा में स्थित पुरुष की मैं ब्रह्म मानकर उपासना
करता हूँ। (यह सुनकर) राजा अजातशत्रु बोले- आप ऐसा न कहें, यह चन्द्रमा शुभ्र वस्त्र धारण करने
वाला देदीप्यमान और राजा सोम है, ऐसा मानकर मैं इसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जान कर इसकी
उपासना करने वाले की सम्पन्नता सदैव बनी रहती है और उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता ॥ ३ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥
वेद प्रवक्ता बालाकि ने कहा- मैं तो विद्युत् के अन्तर्गत निहित शक्ति को ही ब्रह्म मानकर
उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु बोले-नहीं, नहीं-ऐसा न कहो, मैं तो विद्युत् को तेजःस्वरूप
मानकर उपासना करता हूँ। ऐसा मानकर जो ब्रह्म की उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और
उसकी सन्तति भी तेजस्विनी होती है ॥ ४॥

२६६ बृहदारण्यकोपनिषद
स होवाच गार्ग्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजा-
तशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥
उन गर्गवंशी बालाकि ने कहा- आकाशस्थ पुरुष को ही ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ।
इस पर अजातशत्रु ने कहा- नहीं व्यर्थ वार्ता न करो, मैं उस आकाश तत्त्व को पूर्ण मानकर उसकी
उपासना करता हूँ। इस तथ्य को इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करने वाला सदैव प्रजा (सन्तान) और
पशुओं से परिपूर्ण रहता है। उसकी प्रजा कभी विनष्ट नहीं होती ॥ ५ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६॥
इसके बाद बालाकि ने कहा- मैं वायु स्थित पुरुष को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ, तब
राजा अजातशत्रु बोले- आप ऐसा न कहें, मैं इस वायु की इन्द्र, बैकुण्ठ और अपराजिता सेना के रूप में
उपासना करता हूँ। जो इस वायु की इस प्रकार (उपर्युक्त रूप में) जानकर उपासना करता है, वह प्रसिद्ध
विजयशील, अपराजित (जिसे कोई पराजित न कर सके) और शत्रु विजेता होता है ॥ ६॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह
भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७॥
वे गर्गवंशी बोले-मैं तो अग्नि में स्थित पुरुष (अथवा आग्नेय शक्ति) को ब्रह्म मानकर उपासना करता
हूँ। तब काशी नरेश अजातशत्रु ने कहा-ब्रह्म के सम्बन्ध में व्यर्थ प्रलाप मत करो, मैं तो अग्नि की विषासहि
(सब कुछ सहन करने की या सब कुछ आत्मसात् कर लेने की सामर्थ्य) को ब्रह्म मानकर उपासना करता
हूँ। अग्नि के सम्बन्ध में इस प्रकार जानने वाला विषासहि होता है और उसकी प्रजा भी विषासहि होती है॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपग्
हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥८॥
तत्पश्चात् बालाकि गार्ग्य ने कहा-जल में स्थित पुरुष को ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ,
यह सुनकर राजा अजातशत्रु बोले- ऐसा न कहो, मैं तो जल तत्त्व को प्रतिरूप मानकर उसकी उपासना
करता हूँ। ऐसा जानकर उपासना करने वाला अपना प्रतिरूप प्राप्त करता है। उसे कभी अपना अप्रतिरूप
प्राप्त नहीं होता और उससे प्रतिरूप (पुत्र) उत्पन्न होता है ॥ ८॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते रोचिष्णुर्ह
भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वाँस्तानतिरोचते ॥९॥