१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं।
॥ ऐतरेयोपनिषद्✪ ॥
ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यक के दूसरे आरण्यक के चौथे, पाँचवें एवं छठवें अध्याय ब्रह्मविद्या प्रधान हैं,
अस्तु, इन्हें ऐतरेयोपनिषद् की मान्यता दी गयी है। प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं तथा शेष (दूसरे, तीसरे)
अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं।
प्रथम अध्याय के प्रथम खण्ड में परमात्मा द्वारा सृष्टि रचना का संकल्प तथा लोकों-लोकपालों की रचना
का प्रसंग है। हिरण्यगर्भ से विराट् पुरुष एवं उसकी इन्द्रियों से देवताओं की उत्पत्ति दर्शायी गयी है। दूसरे खण्ड
में देवताओं के लिए आवास रूप मनुष्य शरीर तथा क्षुधा-पिपासा की शान्ति हेतु अन्नादि की रचना का प्रसंग है।
तीसरे खण्ड में प्राणों द्वारा अन्न को ग्रहण करने के उपाख्यान के साथ स्वयं परमात्मा द्वारा मूर्धा मार्ग से
प्रवेश करने का प्रकरण दिया गया है। व्यक्ति रूप में उत्पन्न पुरुष की जिज्ञासा और परमात्म तत्त्व के
साक्षात्कार से उसके कृतकृत्य होने का भी उल्लेख है। दूसरे अध्याय में ऋषि वामदेव द्वारा जीवन चक्र का
अनुभव प्राप्त करने का वर्णन है। माता के गर्भ में जीव प्रवेश उसका प्रथम जन्म, बालक रूप में बाहर
आना द्वितीय जन्म तथा मरणोत्तर योनियों में जाना तीसरा जन्म कहा गया है। तीसरे अध्याय में उपास्य
कौन है, यह प्रश्न खड़ा करके प्रज्ञान रूप परमात्मा को ही उपास्य सिद्ध किया गया है। उसे प्राप्त करके
काया त्याग के बाद परमधाम अमरपद प्राप्ति का निरूपण किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः
श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु
तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। (हे परमात्मन्!) आप मेरे समक्ष
प्रकट हों। मेरे लिए वेद का ज्ञान लाएँ (प्रकट करें)। मैं पूर्वश्रुत ज्ञान को विस्मृत न करूँ। इस स्वाध्यायशील
प्रवृत्ति से मैं दिन और रात्रियों को एक कर दूँ (मेरा स्वाध्याय सतत चलता रहे)। मैं सदैव ऋत और सत्य
बोलूँगा। ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह (ब्रह्म) वक्ता (आचार्य) की रक्षा करे। त्रिविध ताप शान्त हों।
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
इस उपनिषद् में ब्रह्म से लोकों, लोकपालों सहित मानवी सृष्टि, उसके विकास तथा मोक्ष सहित विराट्
जीवन चक्र का उल्लेख है। ऋषि ने हर चरण को स्पष्ट एवं सरल ढंग से व्यक्त किया है। आवश्यकतानुसार अव्यक्त
भावों को पाद टिप्पणियों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है-
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥
सृष्टि के आरम्भ में एक मात्र आत्मा (परमात्म तत्त्व) ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी सचेष्ट
न था। (तब) उस (परमात्मा) ने विचार किया कि 'मैं लोकों का सृजन करूँ' ॥ १ ॥
✪ अड़यार लाइब्रेरी से प्रकाशित दशोपनिषद् (१९३५) संग्रह के ऐतरेयोपनिषद् में प्रारम्भिक तीन अध्याय
और प्रकाशित हैं, जिनका समावेश अन्य किसी उपनिषत्संग्रह में न होने से यहाँ भी नहीं ग्रहण किया गया है।
४२ ऐतरेयोपनिषद्
[ मंत्र में 'नान्यत् किंचन मिषत्' वाक्य है, मिषत् शब्द पलक हिलाने के भाव में भी प्रयुक्त होता है, जो
सबसे कम प्रयास में होने वाली दृश्य चेष्टा है। इसलिए पद का भाव यही लेना उचित है कि अन्य कुछ भी नहीं था
तथा जो था वह किंचित् भी सचेष्ट नहीं था। पहली चेष्टा उस ब्रह्म के संकल्प के रूप में ही हुई।]
स इमाँल्लोकानसृजत अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठाऽन्तरिक्षं
मरीचयः। पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥
उस (परमात्मा) ने अम्भ, मरीचि, मर और आपः लोकों की रचना की। द्युलोक से परे और स्वर्ग की
प्रतिष्ठा वाले लोकों को अम्भ अन्तरिक्ष (प्रकाश लोक) को मरीचि, पृथिवीलोक को मर्त्यलोक और
पृथिवी के नीचे (परे) आपः लोक है॥ २॥
[ यहाँ लोकों के नाम और उनकी स्थितियाँ विचारणीय हैं। पृथ्वी को 'मर' मृत्युलोक कहा ही जाता है।
अन्तरिक्ष मरीचि अर्थात् प्रकाश किरणों से युक्त लोक मान्य है। मरीचि का अर्थ शब्द कल्पद्रुम के अनुसार पापों,
क्षुद्र जीवों या तमस् को मारने वाला कहा गया है। अन्तरिक्ष में ऐसे तेजस्वी मारक प्रवाह होने की पुष्टि वर्तमान
विज्ञान भी करता है। अम्भ = अम् (प्राण) तथा भः (भरणकर्ता) से बना है। द्युलोक से परे यह अव्यक्त रूप से
सूक्ष्म प्राण का भरण करने वाला लोक है, जिसकी प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा के रूप में द्युलोक है। पृथ्वी के नीचे आपः लोक
का भाव अनेक आचार्यों ने माना है। जो अधिक उचित प्रतीत नहीं होता।
वस्तुतः ऋग्वेद ने आपः को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। आपः सृष्टि का
आधारभूत द्रव्य है, इसलिए ऋषि ने उसे 'या अधस्तात् ता आपः' जो आधाररूप है वह आपः है, ऐसा कहा है। वही
हिरण्यगर्भ रूप है, जिसे वेद ने 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां' (पृथ्वी और द्युलोक का आधार वही है) कहा है।
आपः जल को भी कहते हैं; किन्तु वह अर्थ लेने से मंत्र का भाव सिद्ध नहीं होता। अस्तु, आपः को वेद की
अवधारणा के आधार पर ही स्वीकार करना उचित है। इसे 'ताः' स्त्रीलिंग बहुवचन का संबोधन दिया गया है।
इसी आपः तत्त्व के गर्भ में ब्रह्म का संकल्प बीज रूप में पककर विश्वरूप बनता है, यह गुण मातृसत्ता का होने से
आपः को 'देवी आपः' या 'ताः आपः' कहना उचित है। इस उपनिषद् में भी अगले मंत्रों में आपः का उत्पादक
प्रयोग बार-बार परिलक्षित होता है।]
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति। सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्॥
(लोकों का निर्माण करने के बाद) उसने विचार किया कि लोकों का निर्माण तो हो गया, अब मुझे
लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। ऐसा चिन्तन करके उसने आपः (तरल प्रवाह) में से ही एक पुरुष
को समुद्धृत करके (निकालकर) उसे मूर्त्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥
[ पुरुष संबोधन सृजनात्मक पुरुषार्थ करने में समर्थ के लिए प्रयुक्त होता है। ब्रह्म ने उस मूल प्रवाह
में से विराद् पुरुष को मूर्तरूप दिया अर्थात् विराट् संरचना की सामर्थ्य को जाग्रत् किया। ऋषि ने उसे
'अद्भ्य एव समुद्धृत्य' कहा है। अद्भ्यः का सीधा अर्थ जल होता है; किन्तु यहाँ भी उसका प्रयोग
(आपः) विश्व सृजनशील प्रवाह ही है।]
तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके
निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः। प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष
आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि
लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत
नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४॥
उस विराट् पुरुष को देखकर ईश्वर ने सङ्कल्पपूर्वक तप किया। उस तप के प्रभाव से (उस हिरण्यगर्भ
स्वरूप) पुरुष के शरीर से सर्वप्रथम अण्डे की तरह एक मुख छिद्र प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्रिय और