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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३४५

अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३४५
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरप-
क्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं
पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमꣳ राजानमाप्यायस्वापक्षी-
यस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त
आकाशाद्वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते
ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान्प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्तेऽथ य एतौ पन्थानौ न
विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार जो यज्ञ, दान और तपश्चर्या द्वारा लोकों पर विजय प्राप्त करते हैं, वे धूम (धूम के अधिष्ठाता
देवता) को प्राप्त होते हैं। धूम से रात्रि देवता को, रात्रि से कृष्ण पक्ष (कृष्णपक्ष के अधिष्ठाता देवता) को,
कृष्णपक्ष से दक्षिणायन सूर्य वाले छः महीनों को, छः मासों से पितृलोक को एवं पितृलोक से चन्द्र लोक
को प्राप्त होते हैं। वहाँ (चन्द्रलोक में) उस अन्न को देवतागण उसी प्रकार ग्रहण (भक्षण) करते हैं, जिस
प्रकार ऋत्विकगण सोम का पान करते हैं, जब उनके (जीवों के) पुण्यफल (कर्मफल) क्षीण हो जाते हैं,
तब वे आकाश को प्राप्त करते हैं। आकाश से वायु को, वायु से वृष्टि को, वृष्टि से पृथ्वी को अन्नरूप में प्राप्त
होते हैं। तत्पश्चात् पुरुष रूपी अग्नि में (उन अन्नों की) आहुति दी जाती हैं, जिसके द्वारा वे लोकों के
उत्थानकर्त्ता होकर स्त्री रूपी अग्नि में प्रकट होते हैं। इस प्रकार (विभिन्न लोकों को बार-बार प्राप्त करते
हुए) ये जीव घूमते ही रहते हैं; किन्तु जो इन दोनों (उत्तर-दक्षिण) मार्गों को नहीं जानते, वे कीट, पतङ्ग
और दन्दशूक (मच्छर) आदि होते हैं ॥ १६ ॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाह-
मुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कꣳसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य
परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यꣳ संस्कृत्य पुꣳसा नक्षत्रेण मन्थꣳ संनीय
जुहोति-यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान्। तेभ्योऽहं भागधेयं
जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा। या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति। तां
त्वा घृतस्य धारया यजे सꣳराधनीमहꣳ स्वाहा ॥ १ ॥
जो महत्ता प्राप्त करना चाहता हो, वह आदित्य के उत्तरायण होने पर शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में बारह
दिन के अन्दर किसी शुभ तिथि में उपसद्व्रती (पयोव्रती) होकर गूलर काष्ठ से निर्मित कटोरे या चमस
में सर्वौषधि और फल आदि को एकत्र करके, यज्ञ वेदी का परिसमूहन (सफाई) और उपलेपन (लिपाई)
सम्पन्न करे। तदुपरान्त अग्नि स्थापन करे और वेदी के चारों ओर कुश-आसन बिछाकर गृह्यसूत्र में वर्णित
पद्धति से घृत को संस्कारित करके, जिसका नाम पुरुष वाची हो, उस नक्षत्र (हस्त, पुष्य आदि नक्षत्र) में
मन्थ (औषधियों का मिश्रित रूप) को (स्रुवा) के बीच में रखकर आहुति प्रदान करे। आहुति के साथ
इस मन्त्र के माध्यम से प्रार्थना करे- हे जातवेदा (अग्ने)! मनुष्यों की कामनाओं में बाधा डालने वाले

३४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तुममें प्रतिष्ठित जितने तिर्यग् (कुटिल) देवगण हैं, उन सभी देवों को मैं आहुति प्रदान करता हूँ। वे सभी
तृप्त होकर मेरी कामनाओं को पूर्ण करें। इन देवताओं के अतिरिक्त जो तिरश्ची (कुटिल) देवियाँ हैं, उनको
भी मैं घृताहुति प्रदान करता हूँ। वे भी मेरी कामनाओं को पूर्ण करें॥ १ ॥
ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा
वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
मन्थे संस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा संपदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति
श्रोत्राय स्वाहाऽयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ
हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥
(साधक या याजक) 'ज्येष्ठाय स्वाहा', 'श्रेष्ठाय स्वाहा' इन मन्त्रों से यज्ञ में आहुति प्रदान करता हुआ
स्रुवा के अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'प्राणाय स्वाहा', 'वसिष्ठायै स्वाहा' इन मन्त्रों से आहुति
प्रदान करता हुआ संस्रव (स्रुवा में बचे घृत) को मन्थ में डाल देता है, 'वाचे स्वाहा', 'प्रतिष्ठायै स्वाहा'
इन मन्त्रों से अग्नि में हवन करते हुए संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'चक्षुषे स्वाहा', 'सम्पदे स्वाहा' मन्त्र
बोलते हुए आहुति करके अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'श्रोत्राय स्वाहा', 'आयतनाय स्वाहा'
उच्चारण करते हुए आहुति प्रदान करके बचे हुए घृत को मन्थ में डाल देता है, 'मनसे स्वाहा', 'प्रजात्यै
स्वाहा' मन्त्रों से आहुति करके संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'रेतसे स्वाहा' मन्त्र के साथ आहुति देकर
अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है ॥ २ ॥
अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे
संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः
स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति
क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे
संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ
हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये
स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥
'अग्नये स्वाहा' मन्त्र से अग्नि में आहुति प्रदान करता हुआ अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है।
सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा, भूर्भुवः स्वः स्वाहा, ब्रह्मणे स्वाहा, क्षत्राय स्वाहा,
भूताय स्वाहा, भविष्यते स्वाहा, विश्वाय स्वाहा, सर्वाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण
करते हुए संस्रव (अवशिष्ट घृत) को मन्थ में डाल देता है ॥ ३ ॥
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिंकृतमसि
हिंक्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्दे संदीप्तमसि
विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥