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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 400 of 505

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Page 400

४०० शुकरहस्योपनिषद्
सर्वज्ञो भवतु क्षिप्रं मम पुत्रो महेश्वर। तव प्रसादसंपन्नो लभेन्मुक्तिं चतुर्विधाम्॥
हे महेश्वर! मेरा पुत्र शीघ्र ही सर्वज्ञानी हो और आपके अनुग्रह का पात्र बनकर वह चतुर्विध मुक्ति
(सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य) को प्राप्त हो जाए ॥८॥
तच्छ्रुत्वा व्यासवचनं सर्वदेवर्षिसंसदि।
उपदेष्टुं स्थितः शम्भुः साम्बो दिव्यासने मुदा॥ ९॥
श्री वेदव्यास जी की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान् शिव भगवती उमा सहित देवर्षियों की सभा में
उपदेश देने के लिए गये और प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य आसन पर अधिष्ठित हुए॥ ९॥
कृतकृत्यः शुकस्तत्र समागत्य सुभक्तिमान्।
तस्मात् स प्रणवं लब्ध्वा पुनरित्यब्रवीच्छिवम्॥ १०॥
वहाँ शुकदेव मुनि भगवान् शिव से भक्तिपूर्ण अवस्था में सत्संग का लाभ लेकर कृतकृत्य हुए।
प्रणव दीक्षा लेकर पुनः वे भगवान् से प्रार्थना करने लगे॥ १०॥
श्रीशुक उवाच-
देवादिदेव सर्वज्ञ सच्चिदानन्दलक्षण। उमारमण भूतेश प्रसीद करुणानिधे॥ ११॥
मुनि शुकदेव जी ने निवेदन किया- हे देवों के आदि देव! हे सर्वज्ञ! हे सच्चिदानन्द स्वरूप! हे
उमापते! आप सम्पूर्ण प्राणियों पर कृपा करने वाले करुणा के भण्डार हैं, आप मुझ पर प्रसन्न हों॥ ११॥
उपदिष्टं परंब्रह्म प्रणवान्तर्गतं परम्। तत्त्वमस्यादिवाक्यानां प्रज्ञादीनां विशेषतः॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन षडङ्गानि यथाक्रमम्। वक्तव्यानि रहस्यानि कृपयाद्य सदाशिव।
आपने मेरे लिए प्रणव स्वरूप और उससे परे परब्रह्म का उपदेश किया है, परन्तु मैं विशेषरूप से
‘तत्त्वमसि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ प्रभृति महावाक्यों का तत्त्व षडङ्गन्यास क्रमपूर्वक सुनने की इच्छा रखता हूँ। हे
सदाशिव! कृपापूर्वक मेरे लिए उन रहस्यों को प्रकट करें॥ १२-१३॥
श्रीसदाशिव उवाच-
साधु साधु महाप्राज्ञ शुक ज्ञाननिधे मुने। प्रष्टव्यं तु त्वया पृष्टं रहस्यं वेदगर्भितम्॥
भगवान् शिव ने कहा- हे ज्ञाननिधि मुनि शुकदेव ! तुम निश्चय ही महान् प्रज्ञावान् हो। तुमने वेदों
के गूढ़ रहस्यों के व्यावहारिक स्वरूप का प्रश्न किया है॥ १४॥
रहस्योपनिषन्नाम्ना सषडङ्गमिहोच्यते। यस्य विज्ञानमात्रेण मोक्षः साक्षान्न संशयः॥
सो मैं तुम्हारे लिए इस रहस्योपनिषद् नामक गूढ़ विषय का षडङ्गन्यास पूर्वक वर्णन करता हूँ।
इसका (अनुभूतिजन्य) विशेष ज्ञान हो जाने से साक्षात् मोक्ष प्राप्ति में कोई संशय नहीं है॥ १५॥
अङ्गहीनानि वाक्यानि गुरुर्नोपदिशेत्पुनः।
सषडङ्गान्युपदिशेन्महावाक्यानि कृत्स्नशः॥ १६॥
उपयुक्त यही है कि गुरु के द्वारा अङ्गहीन वाक्यों का उपदेश नहीं किया जाना चाहिए, सब
महावाक्यों का षडंग सहित उपदेश करना चाहिए॥ १६॥
चतुर्णामपि वेदानां यथोपनिषदः शिरः। इयं रहस्योपनिषत्तथोपनिषदां शिरः॥
जैसे चारों वेदों में उपनिषदें सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे सम्पूर्ण उपनिषदों में रहस्योपनिषद् सर्वश्रेष्ठ है॥ १७॥