१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९
यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥
वह साम जिस ऋचा में हो, उस ऋचा का, उसके ऋषि का तथा उसके देवता का चिन्तन भी उद्गाता
को करना चाहिए ॥ ९ ॥
येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममु-
पधावेत् ॥ १० ॥
वह उद्गाता जिस छन्द के द्वारा स्तुति करता हो, उस छन्द का चिन्तन करे। जिन स्तोत्रों से स्तुति
करता हो, उन स्तोत्रों का चिन्तन करे ॥ १० ॥
यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥
वह जिस दिशा की स्तुति करता हो, उस दिशा का चिन्तन करे ॥ ११ ॥
आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः
समृद्ध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥
अन्त में अपने आत्मस्वरूप का और अपनी कामना का चिन्तन करके, वह प्रमादरहित स्तुति करे।
जिस कामना की पूर्ति के लिए वह परमात्मा की स्तुति करता है, वह शीघ्र ही अभीष्ट फल प्राप्त करता है ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर ही उद्गीथ है- यह जानकर उपासना करनी चाहिए। उद्गाता यज्ञ में ॐ का उच्चारण
करके उद्गान करता है। उस उद्गीथ की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशꣳस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिर-
च्छादयꣳस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥
मृत्यु से डरते हुए देवों ने त्रयी विद्या में प्रवेश लिया और अपने को छन्दों से आच्छादित कर लिया।
आच्छादित करने वाले होने के कारण वे छन्द कहे गये ॥ २ ॥
[ देवता तो अमर कहे गये हैं, फिर उन्हें मृत्यु का भय कैसे ? यहाँ देवों का तात्पर्य शरीरस्थ देव शक्तियों से
है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में उल्लेख है कि विराट् पुरुष के अंगों से उत्पन्न देवों ने मनुष्य के अंग-अवयवों में प्रवेश
किया। मनुष्य मर्त्य है, उसके अंगों में स्थित देवों को ही मृत्युभय होता है।]
तानु तत्र मृत्युर्रथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु
वित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥
जिस प्रकार मछली पकड़ने वाला धीवर जल के भीतर मछली को देख लेता है, उसी प्रकार ऋक् ,
साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों में संलग्न देवों को मृत्यु ने देख लिया। देवों को यह बात ज्ञात होने पर वे
उन ऋक्, साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों को त्यागकर उस ॐकार अक्षर में ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥
यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣳ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमे-
तदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥
जब कोई उपासक ऋचा-पाठ करता है, तो वह बड़े आदर के साथ ॐ का उच्चारण करता है। उसी
प्रकार साम एवं यजुष् पाठ करने वाले भी ॐ अक्षर का उच्चारण करते हैं। यद्यपि ॐएक स्वर है, तथापि
१० छांदोग्योपनिषद्
यह अक्षर, अमृत और अभय रूप ब्रह्म का ही प्रतीक है। देवगण इस अक्षर ब्रह्म ॐकार में प्रविष्ट
होकर अमरत्व और अभय को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥
[ देवगण जब तक नश्वर इन्द्रियादि के रसों में अपना अस्तित्व देखते हैं, तब तक वेदोक्त अनुशासन का
पालन करने पर भी मृत्यु भय से मुक्त नहीं होते। जब ॐकार रूप ब्रह्म के सर्वोत्तम रस के आनन्द में प्रवेश करते
हैं, तो अमर हो जाते हैं। ]
स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरꣳ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य
यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥
जो ज्ञानी इस अक्षर ब्रह्म ॐ को इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह अमृत और अभयरूप स्वर
ब्रह्म ॐ में ही प्रविष्ट करता है। जिस प्रकार इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमरत्व भाव को प्राप्त हुए, उसी
प्रकार वह भी अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष
प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥
यथार्थ में यह जो उद्गीथ है, वही प्रणव ॐ है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। यह जो सूर्य है,
वही उद्गीथ है, वही प्रणव है, क्योंकि यह गमन करते हुए ॐ का ही उच्चारण करता रहता है ॥ १ ॥
[ अपने पूरे सौर मण्डल को लिए सूर्य भी गतिशील है, यह तथ्य वर्तमान विज्ञान स्वीकार करता है। सूर्य के
द्वारा प्राणों के संचार को उद्गीथ (छान्दो.१.३.१ में) पहले ही कहा जा चुका है।]
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच
रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥
कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी आदित्य को लक्ष्य कर ॐकार का गान
किया था, इसी से तू मेरा एक पुत्र है। अब तू यदि सूर्य से विकेन्द्रित होती सूर्य की रश्मियों का ध्यान कर,
तो निश्चय ही तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। यह आधिदैविक उपासना का वर्णन है ॥ २ ॥
[ साधक के संकल्प के अनुरूप प्राण शक्ति का नियोजन होता है। उसी के अनुसार एक या बहुत से पुत्र प्राप्त
होने की बात कही गयी है।]
अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥
अब आध्यात्मिक उपासना का वर्णन है। यह जो मुख्य प्राण है, उसी के रूप में उद्गीथ की उपासना
करनी चाहिए, क्योंकि यह गमन करते हुए सर्वदा ॐकार स्वर का ही उच्चारण करता रहता है ॥ ३ ॥
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं
भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥
कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी मुख्य प्राण को लक्ष्यकर ॐकार का गान
किया था; अतः तू मेरा एक पुत्र हुआ। अब तू मुख्य प्राण के गुणभेद से विशिष्ट प्राणों का चिन्तन कर, तो
निश्चय ही तुम्हारे बहुत से पुत्र होंगे ॥ ४ ॥
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि
दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥