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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 393 of 505

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Page 393

प्रपाठक ५ मन्त्र १ ३९३
विष्णुरित्यथ यो ह खलु वावास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं ब्रह्माथ यो ह खलु वावास्य
तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं रुद्रोऽथ यो ह खलु वावास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स एव विष्णुः
स वा .एष एकस्त्रिधाभूतोऽष्टधैकादशधा द्वादशधाऽपरिमितधा चोद्भूत उद्भूतत्वाद्भूतेषु
चरति प्रतिष्ठा सर्वभूतानामधिपतिर्बभूवेत्यसावात्मान्तर्बहिश्चान्तर्बहिश्च ॥ ५ ॥
सृष्टि-रचना के पूर्व यह (भूतात्मा) केवल अन्धकार (अज्ञान) रूप ही था। तत्पश्चात् परमात्मा द्वारा
प्रेरणा प्राप्त करके इन्द्रियों के विषय रूप में परिणत हो गया । इन (रूपों) में से यह वस्तु रजोगुण के रूप
में है। यह तमोगुण का भी स्वरूप है अर्थात् प्रेरणा प्राप्त तमोगुण ही तमोगुण में से प्रकट होता है। यह सत्त्व
गुण का भी रूप है अर्थात् प्रेरणा प्राप्त हुआ सत्त्वगुण ही सत्त्वगुणों में से स्रवित हुआ है। जो यह चेतन सत्ता
हर भूत-प्राणियों में क्षेत्रज्ञ जीव रूप से स्थिर है और परमात्मा का अंश है। वह संकल्प युक्त और
अध्यवसायी, दृढ़निश्चयी है, अहंकार रूप (मैं पन) से पहचाना जाने वाला तथा समस्त प्रजा का पति है।
ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र को ही परमात्मा का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ शरीर कहा गया है। उस परमात्मा के
रजोगुण अंश को 'ब्रह्मा' कहा गया है, तमोगुण अंश को 'रुद्र' और जो सतोगुण अंश है, उसे 'विष्णु' कहा
गया है। इस कारण से वह एक ही परमात्मा तीन (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) रूपों में, आठ (अष्टवसु) रूप में,
ग्यारह (रुद्र) रूपों में, बारह (आदित्य) रूपों में तथा अन्य (असंख्य संसारी जन रूप) अगणित रूपों में
उत्पन्न हुआ है। वह इस तरह 'उद्भूत' होते हुए भी प्रत्येक भूतों-प्राणियों में स्थित है। वही समस्त प्राणियों
का अधिष्ठाता है और वही अन्दर-बाहर आत्मा के रूप में विद्यमान है। वही अन्दर और बाहर है ॥ ५ ॥
॥ पंचमः प्रपाठकः ॥
द्विधा वा एष आत्मानं बिभर्त्ययं यः प्राणो यश्चासावादित्योऽथ द्वौ वा एतावास्तां
पञ्चधा नामान्तर्बहिश्चाहोरात्रे तौ व्यावर्तते असौ वा आदित्यो बहिरात्मान्तरात्मा प्राणो
बहिरात्मागत्यान्तरात्मनानुमीयते । गतिरित्येवं ह्याह यः कश्चिद्विद्वानपहतपाप्मा-
ध्यक्षोऽवदातमनास्तन्निष्ठ आवृत्तचक्षुः सोऽन्तरात्मागत्या बहिरात्मनोनुमीयते गतिरित्येवं
ह्याहाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो यः पश्यति मां हिरण्यवत्स एषोऽन्तरे हृत्पुष्कर
एवाश्रितोऽन्नमत्ति ॥ १ ॥
वह परमात्मा दो प्रकार की आत्माओं (स्वरूपों) को ग्रहण करता है। यह जो प्राण है तथा जो सूर्य
है, यही दोनों सर्वप्रथम उत्पन्न हुए है। यह सूर्य बाह्य आत्मा है और प्राण अन्तः की आत्मा है। इसकी गति
को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि यह अन्तरात्मा ही है। वेदों में कहा गया है कि यह आत्मा
गतिरूप ही है। जिस विद्वान् के पापों का शमन हो चुका है, वह सभी का अध्यक्ष होता है। उसका मन
पवित्र होता है तथा उसकी स्थिति परमात्मा में ही रहती है। उस (विद्वान्) का ज्ञान-चक्षु जाग्रत् हो जाता
है तथा वह अन्तरात्मा में ही स्थिर रहता है। वह गतिशील होता हुआ बहिर्गमन कर जाता है। आत्मा की
गति का अनुमान लगाया जा सकता है, ऐसा वेदों ने भी प्रतिपादित किया है। सूर्य के मध्य भाग में जो
'पुरुष' स्वर्ण के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जो हमें हिरण्यमय अर्थात् प्रकाश स्वरूप दृष्टिगोचर होता है,
वही (पुरुष) हृदयरूपी कमल में स्थित रहते हुए अन्न को ग्रहण करता है ॥ १ ॥