१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
३०८ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स
होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवंमेवैताभिरुपनिषद्भिः
समाहितात्मास्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व
गमिष्यसीति नाहं तद्भगवन्वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति
ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् महाराजा जनक अपने कूर्च (अपने विशिष्ट आसन) से उठकर खड़े हो गये और बोले-
हे याज्ञवल्क्य ! आपको नमन है। आप मुझे उपदेश प्रदान करें। याज्ञवल्क्य बोले - हे राजन् ! जिस प्रकार
दूर की यात्रा करने के लिए नौका अथवा रथ का आश्रय लिया जाता है, उसी प्रकार (उपनिषदों का सहारा
लेकर) आप समाहित आत्मा हो गये हैं। आपने पूज्य श्रीमन्त होकर वेदों का अध्ययन किया है, उपनिषदों
का भी श्रवण किया है। यहाँ से गमन करके अब आप कहाँ पहुँचेंगे ? जनक ने कहा- यह मुझे ज्ञात नहीं।
याज्ञवल्क्य ने कहा- आप जहाँ पहुँचेंगे, वह गन्तव्य मैं निश्चित रूप से आपको बताऊँगा। जनक ने कहा,
ठीक है- बताने का अनुग्रह करें ॥ १ ॥
इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्धꣳ सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते
परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥
(याज्ञवल्क्य ने कहा- सुनिये) दक्षिण नेत्र में जो पुरुष स्थित है, उसका नाम 'इन्ध' है। इसी 'इन्ध'
को परोक्ष रूप से 'इन्द्र' कहते हैं। देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं, वे प्रत्यक्ष के प्रति द्वेष भाव रखते हैं ॥ २ ॥
[ देव शक्तियाँ सूक्ष्म प्राण-प्रवाह रूप हैं, उन्हें परोक्ष रूप से ही अनुभव किया जा सकता है। आँख या कान
प्रत्यक्ष रूप में देखने-सुनने वाले दिखते हैं; किन्तु देखने-सुनने की क्षमता रूप देव शक्तियाँ परोक्ष ही हैं। इसीलिए
देवों को परोक्ष प्रिय कहा गया है।]
अथैतद्वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सꣳस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय
आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डोऽथैनयोरेतत्प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये
जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः संचरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा
भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतदास्रवदास्रवति
तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥
बायें नेत्र में स्थित पुरुष वस्तुतः इन्द्र की पत्नी विराट् है। इन दोनों का मिलने का केन्द्र यही हृदयाकाश
है। हृदयान्तर्गत स्थित लाल पिण्ड ही इन दोनों का अन्न है। हृदयान्तर्गत स्थित जल ही इन दोनों का आवरण
वस्त्र है। हृदय के ऊपर जाने वाली नाड़ी ही इनके संचरण करने का मार्ग है। बाल के हजारवें हिस्से
जितनी सूक्ष्म-हिता नाम की नाड़ियाँ हैं, जो हृदय के अन्दर स्थित हैं। इन्हीं नाड़ियों के द्वारा प्रवाहित हुआ
अन्न सम्पूर्ण शरीर में पहुँचता है। इसी कारण यह सूक्ष्म देह, सूक्ष्म आहार ग्रहण करने वाला होता है ॥ ३ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९
[ दायें और बायें नेत्रों के पति-पत्नी जैसा ऋषि का यह कथन रहस्यात्मक है। वर्तमान विज्ञान इस सन्दर्भ में अभी
सीमित ज्ञान ही प्राप्त कर सका है। दोनों आँखों में सन्निहित शक्तियों को पुरुष ही कहा गया है, लेकिन वे पति-पत्नी की
तरह परस्पर पूरक हैं। एक को अर्धाङ्ग ही कहा जा सकता है। नेत्र विज्ञान के डॉक्टर यह बताते हैं कि दोनों आँखों के बीच
एक कोमल संवेदनात्मक रिश्ता है। यदि किसी कारण एक आँख की नर्वस् में खराबी आ जाये, तो उसके प्रति संवेदना
के नाते दूसरी ओर भी कमजोरी आने लगती है। डॉक्टर इसे आफ्थैल्मिक सिम्पैथी कहते हैं।]
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चःप्राणा दक्षिणा दिग्दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः
प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा
दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स
होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे
नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४॥
उस विद्वान् पुरुष के लिए पूर्व दिशा-पूर्व प्राण, दक्षिण दिशा-दक्षिण प्राण, पश्चिम दिशा-पश्चिम
प्राण, उत्तर दिशा- उत्तर प्राण, ऊर्ध्व दिशा - ऊपरी प्राण, नीचे की दिशा- निचला प्राण है एवं समस्त
दिशाएँ - सम्पूर्ण प्राण हैं। वह आत्मा नेति-नेति रूप से वर्णित है, वह ग्रहण न किए जाने के कारण
'अग्राह्य' है, वह नष्ट न होने के कारण अशीर्य है, वह असङ्ग भी है तथा बन्धन रहित भी। वह कभी
व्यथित नहीं होता। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे जनक! आप निश्चित ही अभय हो गये हैं। जनक ने कहा- हे
याज्ञवल्क्य! आपने मुझे अभय ब्रह्म का ज्ञान कराया है, अतः आप भी अभय हों, आपको नमस्कार है, यह
विदेहदेश और मैं (जनक) आपके अनुगामी हैं। ॥ ४॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
जनकः ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो
याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तꣳ
हास्मै ददौ तꣳ सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १॥
महर्षि याज्ञवल्क्य विदेहराज जनक के पास गये। उन्होंने विचार किया कि वहाँ मैं कुछ न बोलूँगा; परन्तु पूर्व
में एक बार जनक और याज्ञवल्क्य का अग्निहोत्र के विषय में वार्तालाप हुआ था, तब याज्ञवल्क्य ने जनक को
इच्छानुसार प्रश्न करने का वरदान दिया था। अतः इस बार राजा जनक ने ही उनसे प्रश्न प्रारम्भ किया ॥ १॥
याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं
ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २॥
विदेहराज जनक ने प्रश्न किया हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योति से युक्त है।
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- हे राजन्! यह पुरुष आदित्य रूप ज्योति से सम्पन्न है। यह पुरुष आदित्य
ज्योति से ही प्रतिष्ठित होता है, उसी से चतुर्दिक् जाता है, कर्म सम्पादित करता है और उसी से
वापस लौट आता है। जनक ने कहा- हाँ, यह उचित है ॥ २॥
३१० बृहदारण्यकोपनिषद्
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य
ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येव-
मेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥
इसके उपरान्त जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! सूर्यास्त हो जाने पर यह पुरुष किस ज्योति से
युक्त होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि उस समय यह पुरुष चन्द्रमा की ज्योति से सम्पन्न होता है। वह
चन्द्रमा की ज्योति से स्थित होता, आता-जाता, कर्म करता और उसी से वापस लौट आता है। जनक ने
कहा- हाँ, यह भी यथार्थ है ॥ ३ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य
ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥
जनक ने पुनः प्रश्न पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र दोनों अस्त हो जाते हैं, तब यह पुरुष
किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- उस समय यह अग्नि की ज्योति से सम्पन्न होता
है। यह उसी (अग्नि) की ज्योति से बैठता, गमन करता, कर्म करता और वापस भी लौट आता है। जनक
इसे स्वीकारते हुए बोले- हे याज्ञवल्क्य ! वस्तुतः यही सत्य है ॥ ४ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किंज्योतिरेवायं पुरुष
इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति
तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतैऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र
न्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र अस्त हो जाते हैं तथा अग्नि भी शान्त हो
जाती है, तब यह पुरुष किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- तब यह वाक् रूपी
ज्योति से सम्पन्न होता है। उसी से बैठता, गमन करता, कर्म सम्पादन करता और उसी से वापस लौट आता
है। हे राजन् ! जहाँ अँधेरे में हाथ भी दृष्टिगोचर नहीं होता, वहाँ वाणी का उच्चारण सुनते ही यह पहुँच
सकता है। जनक ने कहा- हे महात्मन् ! यह तथ्य भी उचित है ॥ ५ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि
किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म
कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
जनक ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य, चन्द्र अस्त हो जाते हैं, अग्नि और वाक् भी शान्त हो जाती
है, तब इस पुरुष की कौन सी ज्योति होती है। याज्ञवल्क्य ने कहा- तब यह पुरुष आत्मज्योति से सम्पन्न
होता है। यह उसी के द्वारा बैठता, आता-जाता, कर्म सम्पन्न करता और फिर वापस भी लौट आता है ॥ ६ ॥
कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः
सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोक-
मतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११
जनक ने प्रश्न किया- यह आत्मा कौन है ? उन्होंने उत्तर दिया- प्राणों में चित्तवृत्तियों के भीतर स्थित,
विज्ञानमय ज्योति पुरुष है, वही समान रूप से दोनों लोकों (इहलोक और परलोक) में संचरित होता है।
वह मानो चिन्तन और चेष्टा करता हो। वह पुरुष (आत्मा) स्वप्न के रूप में इहलोक (देह और इन्द्रियों के
समुच्चय) का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी उल्लंघन करता है ॥ ७ ॥
स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन्
म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
यह पुरुष जब जन्म लेता है, तब देह के साथ आत्मभाव को प्राप्त होकर पापों से युक्त हो जाता है;
किन्तु जब मृत्यु के उपरान्त ऊर्ध्वगमन करता है, तब पापों को परित्यक्त कर देता है ॥ ८ ॥
तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं
स्वप्नस्थानं तस्मिन्सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ
यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दांश्च पश्यति
स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन
भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥
इस पुरुष के इहलोक और परलोक ये दो ही स्थान हैं। स्वप्न लोक इन दोनों के बीच का लोक है।
इस मध्यवर्ती स्थान में रहकर पुरुष इहलोक और परलोक का दर्शन करता रहता है। परलोक में निवास
करते समय वह पाप और आनन्द दोनों का दर्शन करता है। जब वह शयन करता है, तब अपनी सांसारिक
भावनाओं के बनते-बिगड़ते रहने से अपने ही तेजः स्वरूप और ज्योतिः स्वरूप के कारण स्वप्न देखता है॥
न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्रथयोगान्पथः सृजते न तत्रानन्दा
मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो
भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्था (स्वप्नावस्था) में न रथ होता है, न उनमें जोते जानेवाले अश्व होते हैं और न ही पथ
होता है, परन्तु वह (पुरुष) स्वयं ही इन सबको निर्मित कर लेता है। इसी प्रकार उस स्थिति में आनन्द,
मोद और प्रमोद भी नहीं होते, किन्तु वह उन्हें भी उत्पन्न कर लेता है। वहाँ कुण्ड, सरोवर और नदियाँ भी
नहीं होतीं, किन्तु वह उनका भी निर्माण कर लेता है। वस्तुतः वही उन सबका कर्ता है ॥ १० ॥
तदेते श्लोका भवन्ति। स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्याऽसुप्तः सुप्तानभिचाकशीति।
शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥
ये श्लोक इस सन्दर्भ में है- स्वप्न की स्थिति में शरीर को निश्चेष्ट करके यह आत्मा स्वयं शयन नहीं
करता, वरन् समस्त प्रसुप्त पदार्थों को जाग्रत् करता है अर्थात् उन्हें देखता है। वह हिरण्मय पुरुष एकाकी
ही अपने तेज के साथ पुनः जाग्रत् स्थिति को प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा। स ईयतेऽमृतो यत्र कामं
हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥
३१२ बृहदारण्यकोपनिषद्
वह अनश्वर और हिरण्मय पुरुष अपने शरीररूपी घोंसले की रक्षा करता हुआ, इस शरीर को परित्यक्त
करके बहिर्गमन करता है। वह अमृत पुरुष जहाँ कामना (वासना) होती है, वहीं चला जाता है ॥ १२ ॥
स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो
जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥
वह दिव्य गुण सम्पन्न पुरुष स्वप्न की अवस्था में उच्च-नीच विभिन्न भावों को प्राप्त होकर अनेक रूपों
का निर्माण कर लेता है। वह कभी नारियों के साथ मोद मनाता, कभी मित्रों के साथ आनन्दित होता और
कभी भय उत्पन्न करने वाले दृश्य देखता है ॥ १३ ॥
आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति तं नायतं बोधयेदित्याहुः ।
दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि
ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं
ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४॥
सभी इस पुरुष के विश्राम स्थल (शरीर) को ही देखते हैं। उसके (वास्तविक स्वरूप) को कोई नहीं
देखता। उस प्रसुप्त पुरुष को अचानक नहीं जगाना चाहिए, ऐसा (वैद्य लोगों का) मत है, क्योंकि एकदम जगाने से
विभिन्न इन्द्रियों में उसकी चेतना न पहुँचने से फिर चिकित्सा करना कठिन हो जाता है। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि
यह स्वप्नावस्था जाग्रत् स्थिति ही है, क्योंकि जो पुरुष (आत्मा) स्वप्नावस्था में देखता है, वही जाग्रत् अवस्था में भी
देखता है, इस स्थिति में यह पुरुष स्वयं प्रकाशपुञ्ज होता है। (यह सुनकर) जनक बोले- मैं आपके निमित्त एक
हजार मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। हे भगवन्! अब मोक्ष सम्बन्धी उपदेश प्रदान करें ॥ १४ ॥
स वा एष एतस्मिन्संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥
(याज्ञवल्क्य बोले-) यह जीव सुषुप्तावस्था में (प्रगाढ़ निद्रा की स्थिति में) अनेक प्रकार से विचरण
करते हुए पाप और पुण्यों का दर्शन करता है। (अर्थात् भले- बुरे दृश्य देखता है)। इसके उपरान्त वह
जिस योनि से गया था, उसी योनि अर्थात् स्वप्नावस्था में ही लौट आता है। फिर भी वह पुरुष सबसे
अनासक्त ही रहता है क्योंकि वह पुरुष स्वतः असङ्ग है। जनक ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! यह तथ्य यथार्थ
है। मैं आपको सहस्र मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। आप मेरे लिए मोक्ष विषयक उपदेश करें ॥ १५ ॥
स वा एष एतस्मिन्स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥
यह पुरुष जब स्वप्न की स्थिति में होता है, तब वहाँ विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में विचरण करता
हुआ, अनेक प्रकार के पाप-पुण्यों के दृश्य देखता हुआ लौट जाता है, जहाँ से वह आया था अर्थात् फिर
से जाग्रत् स्थिति में आ जाता है; किन्तु वह उस सबसे अलिप्त ही रहता है, जो कुछ उसने वहाँ देखा था।
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २१ ३१३
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २१ ३१३
फिर भी वह पुरुष अनासक्त ही रहता है, इसका कारण यह है कि पुरुष वस्तुतः असङ्ग ही होता है। (यह
सुनकर) जनक बोले- हाँ भगवन्! यह यथार्थ है। मैं आपको सहस्र मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। आप (आगे
भी) मोक्ष सम्बन्धी उपदेश ही कीजिए ॥ १६ ॥
स वा एष एतस्मिन्बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥
यह आत्मा जाग्रत् स्थिति में विचरण करते हुए, विभिन्न पाप-पुण्यों का दर्शन करते हुए, पुनः वहीं
स्वप्नावस्था में पहुँच जाता है ॥ १७ ॥
तद्यथा महामत्स्य उभे कूलेऽनुसंचरति पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्ता-
वनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥
जिस प्रकार कोई महामत्स्य (बड़ा मगरमच्छ) नदी के पूर्वापर (इस और उस) किनारों पर आता जाता
रहता है, ठीक उसी प्रकार यह पुरुष भी स्वप्न और जाग्रतावस्था में क्रमशः आवागमन करता रहता है॥ १८ ॥
तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः संहृत्य पक्षौ संलयायैव
ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न
कंचन स्वप्नं पश्यति ॥ १९ ॥
जिस प्रकार आकाश में श्येन (बाज) अथवा सुपर्ण पक्षी चतुर्दिक उड़ता हुआ थक जाता है
और पंखों को सिकोड़कर अपने घोंसलों की ओर गमन करता है, उसी प्रकार यह पुरुष इस स्थान
(सुषुप्ति) की ओर दौड़ता है जहाँ शयन करने पर, न तो उसे किसी भोग की कामना रहती है और
न ही स्वप्न दिखाई पड़ता है ॥ १९ ॥
ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति
शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव
हस्तीव विच्छादयति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र
देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥
उस पुरुष की हिता नामक नाड़ियाँ इतनी सूक्ष्म होती हैं, जितना एक बाल का हजारवाँ भाग। ये
(नाड़ियाँ) श्वेत, पीली, नीली, हरी और लाल रंग वाली होती हैं। वह पुरुष स्वप्नावस्था में जब जाग्रतावस्था
के समान ही भयानक दृश्य देखता है कि मुझे कोई मार रहा है, अपने वश में कर रहा है, हाथी खदेड़ रहा
है अथवा मैं गड्ढे में गिर रहा हूँ, तो वह अज्ञान के कारण इन्हें यथार्थ मान लेता है और दुःखी होता है;
किन्तु जब वह यह मानता है कि मैं ही देवता हूँ, राजा हूँ अथवा सब कुछ मैं ही हूँ, तब उस समय वह
अपने को आनन्द लोक में अनुभव करता है, (अथवा वही उसका आनन्द होता है) ॥ २० ॥
तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो
न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद
नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥
३१४ बृहदारण्यकापानषद
सुषुप्तावस्था में अवस्थित उस पुरुष का रूप कामरहित, पापरहित और भयरहित होता है। जिस प्रकार
अपनी निज की पत्नी का आलिङ्गन करने वाला पुरुष (पूर्णतया आत्मविभोर होने के कारण) बाहर और
भीतर की सभी प्रकार की जानकारियों से अनभिज्ञ रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञ आत्मा से एकीकृत
होकर बाह्य और आभ्यान्तर विषयों से अनभिज्ञ रहता है अर्थात् उसे कोई चिन्ता नहीं सताती। उस पुरुष का
यह स्वरूप निश्चित ही आप्तकाम, आत्मकाम, निष्काम तथा शोक रहित होता है ॥ २१ ॥
अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदा अत्र
स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः
श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा
सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥
सुषुप्तावस्था में पिता अपिता, माता अमाता, लोक अलोक, देव अदेव, वेद अवेद, चोर अचोर,
भ्रूणघाती अभ्रूणघाती, चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस (क्षत्रिय स्त्री और शूद्र पुरुष से उत्पन्न पुरुष)
अपौल्कस, संन्यासी (श्रमण) असंन्यासी, तपस्वी अतपस्वी हो जाते हैं। तब वह पुरुष समस्त पुण्यों और
पापों से अनासक्त रहता है, क्योंकि उस समय वह हृदय के सम्पूर्ण शोकों को पार कर चुका होता है ॥ २२ ॥
यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न
तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥
उस स्थिति में वह देखते हुए भी नहीं देखता। अमरत्व प्राप्त होने के कारण उसकी दृष्टि कभी विलुप्त
नहीं होती। उस अवस्था में उस (पुरुष) के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता, जिसे वह देख सके ॥ २३ ॥
यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविना-
शित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥
उस समय सूँघने की शक्ति होते हुए भी वह नहीं सूँघता। उसकी घ्राण शक्ति कभी समाप्त नहीं होती,
क्योंकि वह अनश्वर होता है। उस अवस्था में वह क्या सूँघे ? क्योंकि उससे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है ॥
यद्वै तन्न रसयते रसयन्वै तन्न रसयते नहि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥
वह रस ग्रहण करने में समर्थ होने पर भी रस ग्रहण नहीं करता। उसकी रस ग्रहण करने की सामर्थ्य
का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अमर्त्य है। उस स्थिति में उससे भिन्न अन्य कोई पदार्थ भी तो नहीं
है, जिसका वह रसपान करे ॥ २५ ॥
यद्वै तन्न वदति वदन्वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न
तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥
वाक्शक्ति सम्पन्न होते हुए भी वह बोलता नहीं। उसकी वाक्शक्ति का कभी विनाश नहीं होता,
क्योंकि वह शाश्वत है। उससे अन्य कुछ और भी तो नहीं है, जिसके संदर्भ में वह बोले ॥ २६ ॥
यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन्वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७॥
वह श्रवण शक्ति से युक्त होने पर भी नहीं सुनता। अमर्त्य होने के कारण उसकी श्रवण शक्ति का
कभी विनाश नहीं होता। उससे भिन्न जब कुछ भी नहीं है, तो वह क्या सुने ? ॥ २७ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३२ ३१५
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३२ ३१५
यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्र
तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत ॥ २८ ॥
मनन करने की सामर्थ्य होने पर भी वह मनन नहीं करता। कभी नष्ट न होने वाला होने से उसकी मनन शक्ति
कभी समाप्त नहीं होती। उसके अतिरिक्त जब अन्य कुछ है ही नहीं, तो वह मनन भी किसका करे ? ॥ २८ ॥
यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशत्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥
स्पर्श की शक्ति से सम्पन्न होने पर भी वह स्पर्श नहीं करता। उसकी स्पर्श शक्ति का कभी लोप नहीं
होता, क्योंकि वह अमरणशील है। जब उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, तो वह स्पर्श भी किसका करे ? ॥
यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वौ तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वात्र तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥
जानने की सामर्थ्य होने पर भी वह नहीं जानता। उसके ज्ञान का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह
अनश्वर है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, जिसे वह जाने ॥ ३० ॥
[ उपर्युक्त स्थितियाँ सुषुप्तावस्था की हैं- अब जाग्रत् स्थिति का वर्णन है- ]
यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद्रसयेदन्योऽन्यद्वदेदन्योऽ-
न्यच्छृणुयादन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत्स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥
जहाँ (जाग्रत् अवस्था में) अपने से भिन्न कुछ अन्य का भाव होता है, वहाँ (उस स्थिति में) अन्य,
अन्य का दर्शन करने; अन्य, अन्य को सूंघने; अन्य, अन्य का रसास्वादन करने; अन्य, अन्य को बोलने;
अन्य, अन्य का स्पर्श करने और अन्य, अन्य को जानने में समर्थ होता है (अर्थात् जाग्रतावस्था में समस्त
बाहरी विषयों से सम्बद्ध रहने से स्वयं से भिन्न सबकी अनुभूति होती है) ॥ ३१ ॥
सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य
एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द
एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा- हे राजन् ! जिस प्रकार अथाह जल में एक अद्वितीय द्रष्टा है, उसी प्रकार
सुषुप्तावस्था में एक अद्वैत द्रष्टा है। यही ब्रह्मलोक है। यही इस पुरुष की परम गति, यही इसकी सच्ची
सम्पदा है, यही इसका परम लोक और परम आनन्द है। इसी परम आनन्द के एक भाग का आश्रय ग्रहण
करके समस्त भूत जीवित रहते हैं ॥ ३२ ॥
स यो मनुष्याणाँ राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः संपन्नतमः
स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामाानन्दाः स एकः पितॄणां
जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक
आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाःस एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा
देवत्वमभिसंपद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च
३१६ बृहदारण्यकोपनिषद्
श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोक
आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको
ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः
सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र
ह याज्ञवल्क्यो बिभयांचकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो मान्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥
जो मनुष्यों में राद्ध (सम्पूर्ण अंग-अवयवों से युक्त) और समृद्धि से सम्पन्न है, समस्त मानवीय भोग्य पदार्थों
से युक्त है, मनुष्यों में उत्तम और उनका अधिपति है, वही मनुष्य का परमानन्द है। मनुष्यों का सौ गुना आनन्द,
पितृलोक विजेता पितरों का एक आनन्द होता है। पितृलोक विजेता पितरों के सौ आनन्द गन्धर्व लोक का एक
आनन्द है। गन्धर्व लोक के सौ आनन्द देवताओं का कर्मरूपी एक आनन्द है। कर्म के माध्यम से ही देवत्व की प्राप्ति
होती है। देवगणों के कर्म स्वरूप शत आनन्द, जन्मसिद्ध (अजन्मा) देवताओं के एक आनन्द के बराबर है।
निष्काम वेदपाठी और पापरहित पुरुषों का भी वही एक आनन्द है। आजान देवताओं के सौ आनन्द प्रजापति लोक
के एक आनन्द के समतुल्य हैं। कामना रहित श्रोत्रिय और पापरहित व्यक्तियों का भी वही एक आनन्द है। प्रजापति
लोक के सौ आनन्द, ब्रह्मलोक के एक आनन्द के बराबर है। वेदपाठी, कामनारहित और पापरहित व्यक्तियों का वही
एक आनन्द है। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे सम्राट् ! इसी को परमानन्द और इसी को ब्रह्मलोक कहते हैं। महाराज जनक
बोले- मैं आपको एक सहस्र (गौएँ अथवा मुद्राएँ) प्रदान करता हूँ। अब आप आगे भी हमारे निमित्त मोक्ष का
उपदेश करें। यह सुनकर ऋषि याज्ञवल्क्य भयभीत हो गये कि इस मेधावी राजा ने तो मुझे सब प्रश्नों के उत्तर मिल
जाने तक प्रतिबन्धित कर लिया है ॥ ३३ ॥
स वा एष एतस्मिन्स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा- यह पुरुष स्वप्न समाप्त हो जाने पर क्रीड़ा और विहार के पश्चात् पाप-पुण्य
का दर्शन करके पुनः उसी मार्ग से जाग्रतावस्था में पहुँच जाता है, जहाँ से वह गया था ॥ ३४ ॥
तद्यथाऽनः सुसमाहितमुत्सर्जद्यायादेवमेवायग् शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ
उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३५ ॥
जैसे भारवाहक शकट बोझ के कारण (चर-मर) शब्द करते हुए गतिमान् होता है, वैसे ही देहस्थित यह आत्मा
प्राज्ञ आत्मा से अधिष्ठित होकर, शब्दायमान होता हुआ, ऊपर को श्वास खींचता हुआ गमन करता है ॥ ३५ ॥
स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपतावाणिमानं निगच्छति तद्यथाम्रं वोदुम्बरं
वा पिप्पलं वा बन्धनात्प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः संप्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥
जिस समय यह शरीर वृद्धावस्था को प्राप्त होकर कमजोर हो जाता है, उस समय यह पुरुष
उसी प्रकार शरीर के अवयवों से छूटता जाता है, जिस प्रकार आम, गूलर अथवा पीपल का फल,
वृक्ष से अलग होकर गिरने लगता है। यह पुरुष उसी मार्ग से अन्य योनियों में शरीर धारण करने के
निमित्त चला जाता है, जिस मार्ग से आया था ॥ ३६ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २ ३१७
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २ ३१७
तद्यथा राजानमायान्तमुग्राःप्रत्येनसःसूतग्रामण्योऽन्नैःपानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽ-
यमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं
ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥ ३७ ॥
जैसे क्रूरकर्मी सैनिक, दण्डाधिकारी, सारथि और ग्राम के प्रधान या नेता लोग आते हुए राजा की
अन्न, पानी, निवास आदि की व्यवस्था करके स्वागतार्थ प्रतीक्षा करते रहते हैं कि ये आ रहे हैं, ये आ रहे
हैं। वैसे ही ज्ञान सम्पन्न (कर्मफल जानने वाले) इस जीव की सभी भूत यह कहकर प्रतीक्षा करते रहते हैं,
कि यह आ रहा है, ब्रह्म आ रहा है॥ ३७॥
तद्यथा राजानं प्रयािसन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवे-
ममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छासी भवति ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार राजा के जाते समय उग्रकर्मा सैनिक, दण्डाधिकारी, सारथि और गाँव के मुखिया लोग
उसके समक्ष उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार यह जीव जाते समय ऊपर को श्वास खींचता है, तब इस
गमनशील जीव के समक्ष समस्त प्राण उपस्थित होकर उसका अनुगमन करते हैं॥ ३८॥
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
स यत्रायमात्माऽबल्यं न्येत्य संमोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स
एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ्
पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥
जिस प्रकार यह जीवात्मा निर्बल होकर सम्मोहित (मूर्छित जैसा) हो जाता है, तब शरीरगत सभी
प्राण उसके समक्ष उपस्थित होते हैं। इसके पश्चात् वह इनके (प्राणों के) तेजांश को भली प्रकार ग्रहण
करके हृदय की ओर गमन करता है। जिस समय वह चक्षु में व्याप्त पुरुष नेत्रों से बहिर्गमन कर जाता है,
तब उनकी रूप दर्शन की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है॥ १॥
एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरे-
कीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति
न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष
आत्मा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽ-
नूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञान-
मेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २॥
इस प्रकार शरीरस्थ प्राण जीवात्मा में (समाहित) एकीकृत हो जाने पर यह जीव देखना बन्द कर देता
है, ऐसा कहते हैं। (इसी प्रकार घ्राणेन्द्रिय, वाक् इन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, कर्णेन्द्रिय, त्वचा, मन और बुद्धि स्थित
चेतना जब उस आत्मा से एकीकृत हो बहिर्गमन करती है, तो) यह जीव न सूँघता है, न बोलता है, न स्वाद
चखता है, न सुनता है, न स्पर्श करता है, न मनन करता है और न ही जानता है, ऐसा लोग कहते हैं। उस
३१८ बृहदारण्यकोपनिषद्
समय उसके हृदय का अग्रभाग अत्यन्त देदीप्यमान होता है और प्राण, नेत्र, मस्तिष्क अथवा शरीर के अन्य
किसी अवयव से बहिर्गमन कर जाता है। प्राण के बाहर निकलने के साथ ही समस्त इन्द्रियाँ उसका
अनुगमन करने लगती हैं। उस समय यह आत्मा विशिष्ट ज्ञान से सम्पन्न होता है और विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न
प्रदेश (देह) को ही गमन करता है। उस समय उसके साथ उसकी विद्या, उसके कर्म और पूर्व प्रज्ञा
(अनुभव किये गये विषयों की वासना) भी साथ चलते हैं॥ २॥
तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्ये-
वमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसं हरति ॥
जैसे तृण (घास पर चलने वाली) जोंक नामक कीड़ा एक तृण के अन्तिम भाग पर पहुँच कर दूसरे
तृण का आश्रय ग्रहण करने के लिए अपनी देह को सिकोड़ता हुआ अन्य तृण पर रखता है, वैसे ही यह
आत्मा इस (वर्तमान) शरीर का आश्रय छोड़कर अविद्या का परित्याग करके अपना उपसंहार करते हुए
दूसरे नवीन शरीर का आश्रय ग्रहण कर लेता है॥ ३॥
तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत
एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते
पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४॥
जिस प्रकार स्वर्णकार स्वर्ण लेकर उसे नवीन कल्याणकारी रूप प्रदान करता है, उसी प्रकार यह
आत्मा वर्तमान शरीर को चेतनारहित करके, अविद्या से मुक्ति पाकर पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा
अथवा अन्य प्राणियों के नवीन स्वरूपों को धारण करता है अथवा नूतन रूपों का निर्माण करता है॥ ४॥
स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय
आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः
क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी
यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा
भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति
तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते ॥ ५॥
यह आत्मा ब्रह्म स्वरूप है; जो विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथ्वीमय, जलमय,
वायुमय और आकाशमय है। यह तेजोयुक्त, अतेजोयुक्त, कामयुक्त, अकामयुक्त, क्रोधयुक्त, अक्रोधयुक्त
और धर्म तथा अधर्म से भी युक्त है। यह सर्वमय इदम् युक्त (प्रत्यक्ष) अदोयुक्त (परोक्ष) भी है। वह जिस
तरह का कर्म और आचरण करता है, उसी तरह के भाव वाला हो जाता है। शुभ कार्य करने से वह शुभ
और पाप कृत्य करने से पापी होता है। वह पुण्य कर्मों द्वारा पुण्यात्मा और पाप कर्मों द्वारा पापात्मा होता
है। कुछ लोगों का कथन है कि वह पुरुष कामात्मा है। वह कामना के अनुरूप ही संकल्प करता है और
संकल्प के अनुरूप ही कार्य करता है तथा कर्मानुसार ही फल प्राप्त करता है॥ ५॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र ९ ३१९
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र ९ ३१९
तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य ।
प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण
इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य
प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥
यह श्लोक इस सन्दर्भ में है- इस पुरुष का लिङ्ग (कारण शरीर) जिस पर आसक्त होता है, उसी की ओर अपनी
इच्छा शक्ति एवं कर्म सहित गमन करता है। इहलोक में किए गये कर्मों द्वारा परलोक को प्राप्त करके उन कर्मों के
भोग के निमित्त वह पुनः इहलोक में आता है। कर्मफल भोग की कामना वालों का ही निश्चित रूप से आवागमन
चलता रहता है, किन्तु निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम पुरुष के प्राणों (इन्द्रियों) का उत्क्रमण (संकल्प पूर्वक
गमन) नहीं होता, वह तो ब्रह्म स्वरूप बनकर ब्रह्म को ही प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
तदेष श्लोको भवति ।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ।
तद्यथाऽहिनिर्व्ययनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथा-यमशरीरोऽमृतः
प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥७॥
यह श्लोक इस विषय में है- जब इस पुरुष के हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब
यह मर्त्य, अमृत अर्थात् अविनाशी होकर यहीं ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है। जिस प्रकार सर्प की केंचुली
उसके बिल के बाहर मृत स्थिति में पड़ी रहती है और उसी प्रकार यह शरीर भी मृत पड़ा रहता है और
ब्रह्मतेज से युक्त यह पुरुष जीवनमुक्त होकर शरीर के बिना ही रहता है। (यह सुनकर) विदेहराज जनक
ने कहा- हे भगवन्! मैं आपको एक सहस्र गौएँ (अथवा मुद्राएँ) प्रदान करता हूँ ॥ ७ ॥
तदेते श्लोका भवन्ति ।
अणुः पन्था विततः पुराणो माꣳस्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।
तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ ८ ॥
उस विषय (मोक्ष) के सन्दर्भ में ये श्लोक हैं- यह मार्ग (ज्ञानमार्ग) अति सूक्ष्म, विस्तृत और प्राचीन
है, जो मुझे प्राप्त हुआ है और मैंने ही इसकी शोध की है। धैर्यशील ब्रह्मविद् पुरुषों को इहलोक में ही मुक्ति
प्राप्त हो जाती है और शरीर छोड़ने के पश्चात् वे उसी पथ से स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं। विमुक्त स्थिति
वाले तो स्वर्ग से भी आगे ऊर्ध्व लोक को प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥
तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलꣳ हरितं लोहितं च ।
एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च ॥ ९ ॥
ब्रह्मवेत्ता द्वारा खोजे गये उस मार्ग को कई लोग अलग-अलग रंग वाला बताते हैं। कुछ लोगों का
कहना है कि वह श्वेत वर्ण का है, कुछ कहते हैं कि वह नीलवर्ण वाला है, कुछ उसे पीला, कुछ हरा तथा
कुछ लाल वर्ण वाला बताते हैं। वह मार्ग साक्षात् परब्रह्म (परमात्म स्वरूप ब्रह्मज्ञ) द्वारा अनुभव किया
हुआ है। उस मार्ग से पुण्यात्मा, तेजस्वी और ब्रह्मवेत्ता ही जाते हैं ॥ ९ ॥
३२० बृहदारण्यकोपनिषद्
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥
(एकांगी जीवन जीने वाले) जो लोग केवल अविद्या (पदार्थपरक कौशल) की उपासना करते हैं,
वे घने अंधेरे में (जहाँ कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ता उस स्थिति में) जा गिरते हैं। इसी प्रकार जो लोग केवल
विद्या (चेतना परक कौशल) की उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार अन्धकार में पड़ जाते हैं ॥ १० ॥
अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाꣳसोऽबुधो जनाः ॥ ११ ॥
जो अज्ञानी और मूढ़ जन हैं, वे मृत्योपरान्त आनन्दहीन और अन्धकार से युक्त लोकों को प्राप्त करते हैं ॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥
यदि पुरुष (आत्मा को) यह ज्ञान हो जाए कि मैं क्या हूँ, तो फिर किस कामना और इच्छा से शरीर
के लिए उसे दुःखी होना पड़े ? ॥ १२ ॥
यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन्संदेह्ये गहने प्रविष्टः ।
स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥
जो मननशील और प्रबुद्ध आत्मा वाला है, वह इस विषम (गहन) शरीर में प्रविष्ट होकर समस्त कर्म
सम्पन्न करता है, क्योंकि वह विश्वकृत् (कृत-कृत्य) है, सब कुछ करने वाला है, उसी प्राणी का वह लोक
है और वही स्वतः भी लोक है ॥ १३ ॥
इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।
ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥
हम इस शरीर में ही निवास करते हुए यदि उस आत्मा या ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं (तो कृत-
कृत्य हो जाते हैं)। यदि उसे नहीं जानते, तो विनष्ट होते हैं। जो जान लेते हैं, वे अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं,
इससे भिन्न तो दुःख ही उठाते हैं ॥ १४ ॥
यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥
जब मनुष्य उस भूतकाल और भविष्यत् काल के स्वामी, प्रकाशमान आत्मा का प्रत्यक्ष दर्शन कर
लेता है, तब वह उससे कभी पराङ्मुख नहीं होता ॥ १५ ॥
यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥
जिसके पीछे दिन-रात्रि सहित संवत्सर अनुगमन करता हुआ, परिभ्रमण करता रहता है; ज्योतियों में
परम ज्योति उस 'आयु' (रूप आत्मा) की देवगण उपासना करते हैं ॥ १६ ॥
यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥
जिसके अन्दर पञ्च महाभूत, पञ्चजन और आकाश आश्रित हैं, उस आत्मा को ही मैं अविनाशी ब्रह्म
मानता हूँ अथवा मैं ही वह ब्रह्मवेत्ता और अमृत हूँ ॥ १७ ॥
प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म
पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१
अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१
जो उसे प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु, श्रोत्र का भी श्रोत्र और मन का भी मन जानते हैं, वे उसे
पुरातन और अग्रगण्य ब्रह्म मानते हैं ॥ १८॥
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥
उस ब्रह्म को एकात्मभाव से अन्तर्मुखी होकर ही देखा जाना चाहिए। इसमें नानात्व विभेद नहीं है।
जो इसे नानात्व के रूप में देखता है, वह मृत्यु के द्वारा मृत्यु को प्राप्त करता है ॥ १९ ॥
एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्। विरजः पर आकाशादज आत्मा महान्ध्रुवः ॥२०॥
वह ब्रह्म जो एक ही प्रकार से दर्शन करने योग्य है, वह अप्रमेय एवं निश्चल है, निर्मल है, आकाश
से भी अधिक सूक्ष्म है, अजन्मा है और वह महान् आत्मा अनश्वर है ॥ २० ॥
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि
तदिति ॥ २१ ॥
प्रज्ञावान् ब्राह्मण को चाहिए कि उसे ही जाने और उसी का चिन्तन-मनन करे। अधिक शब्दों के
जंजाल में न उलझे। वह तो वाणी का व्यर्थ श्रम ही है ॥ २१ ॥
[ शब्दों से मात्र संकेत मिलते हैं, फिर तो प्रत्यक्ष अनुभव से ही उसका बोध होता है। अस्तु, यहाँ व्यर्थ वाग्-
जंजाल से बचने का परामर्श दिया गया है।]
स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय
आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा
भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण
एषां लोकानामसंभेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन
तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति
एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं
लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं
चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव
भवतः । स एष नेति नेत्यात्माऽनगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः
कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥
यह आत्मा महान्, अमृत, अज, विज्ञानमय तथा हृदयाकाशशायी है। यह सबको वश में रखने वाला
तथा सबका नियन्त्रक और अधिपति है। यह पुण्य कर्मों से प्रवृद्ध नहीं होता और न ही पापकृत्यों से ह्रास
को प्राप्त होता है। यह सभी प्राणियों का स्वामी, उनका ईश्वर और सर्वभूत पालक है। लोकों की मर्यादा
बनाये रखने के लिए इनको धारण करने वाला सेतु है। इस आत्मा को ब्राह्मण जन वेदों का अध्ययन करके
यज्ञ, दान और कामना रहित तप के द्वारा जानते हैं। इसी को जानकर वे मुनि बनते हैं। इस (आत्मारूपी)
लोक की कामना करते हुए ही त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर संन्यास ग्रहण करते हैं। पहले के विद्वान
३२२ बृहदारण्यकोपनिषद्
सन्तान आदि सकाम कर्मों के फल प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं करते थे अर्थात् इससे विरत रहते हुए ये
सोचते थे कि हमारा लोक तो आत्म लोक है, सन्तति आदि का हम क्या करेंगे ? इसी कारण वे पुत्रैषणा,
वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाटन करते थे। पुत्रैषणा ही वित्तैषणा और वित्तैषणा ही
लोकैषणा है। आत्मा का ज्ञान देते समय विद्वज्जन 'नेति-नेति' ही कहते हैं, क्योंकि वह ग्रहण नहीं किया
जा सकता अर्थात् अग्राह्य है। वह आत्मा असङ्ग अर्थात् आसक्ति रहित है, अहिंस्य है, बन्धन रहित अर्थात्
मुक्त है, व्यथा रहित है और कभी नष्ट न होने वाला है। पाप और पुण्य दोनों को लाँघने में ये समर्थ हैं,
क्योंकि ये किए हुए और न किए हुए दोनों ही प्रकार के कर्मों से लिप्त नहीं होता ॥ २२ ॥
तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।
तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त
उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा
तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो
ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते
विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
इसी तथ्य का उल्लेख ऋचा में भी मिलता है- ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्मविद्) की यह महिमा नित्य है, जो कर्म
के द्वारा न प्रवृद्ध होती है और न ह्रास को ही प्राप्त होती है। उस महिमा के स्वरूप का ही ज्ञान प्राप्त करना
चाहिए। उसका ज्ञान प्राप्त करके फिर वह पापकर्म से लिप्त नहीं होता। इस प्रकार ज्ञान रखने वाला शान्त
चित्त, तपस्वी, उपरत, तितीक्षा करने वाला और समाहित चित्त वाला होकर आत्मा में ही आत्मा का दर्शन
करता है, सभी को अपने आत्मा के रूप में ही देखता है। फिर कोई पाप उसे नहीं व्याप्तता, वह पापों को
लाँघ जाता है। वह पाप शून्य, मलरहित, संशयहीन और ब्राह्मण हो जाता है। हे राजन् ! यही ब्रह्मलोक है,
आप यहाँ तक पहुँच गये हैं। तब जनक बोले- हे भगवन् ! मैं आपको नमन करता हूँ और आपकी सेवार्थ
(आपके श्री चरणों में ) स्वयं को भी समर्पित करता हूँ ॥ २३ ॥
स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
यह महान् आत्मा जन्म न लेने वाला, अन्न भक्षक और कर्मफल प्रदाता है। इसे इस प्रकार जानने
वाला मनुष्य समस्त कर्मों का फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म
भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
यह महान् आत्मा अज, जरारहित, मृत्युरहित, अमर एवं भयरहित ब्रह्म स्वरूप है। जो अभय है, वही
ब्रह्म है, ऐसा जानने वाला अभय ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ॥ २५ ॥
अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ५ ३२३
अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ५ ३२३
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी
बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
यह प्रख्यात है कि ऋषि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं। जिनका नाम मैत्रेयी और कात्यायनी था। इन
दोनों में मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी और कात्यायनी सामान्य स्त्रियों की तरह ही थी। याज्ञवल्क्य ने अगले आश्रम
(वानप्रस्थ) में प्रवृत्त होने की इच्छा से कहा ॥ १ ॥
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन्वा अरेऽयमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया
कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥
पत्नी मैत्रेयी से (उन्होंने कहा)-हे मैत्रेयी ! मैं अब वर्तमान स्थान (गृहस्थाश्रम) से अगले स्थान
(वानप्रस्थ) में परिव्रज्या हेतु जाना चाहता हूँ। अतः मेरी आकांक्षा है कि दूसरी धर्मपत्नी कात्या
३२४ बृहदारण्यकोपनिषद्
ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य
कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय
लोकाः प्रिया भवन्त्यामनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय
देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः
प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि
प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय
सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो
मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदꣲ सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- हे मैत्रेयी ! निश्चित ही पति की आकांक्षा पूर्ति के लिए पति प्रिय नहीं होता
वरन् अपनी (आत्मीयता को ) आकांक्षा पूर्ति के लिए (पत्नी को) पति प्रिय होता है। इसी प्रकार पत्नी के
प्रयोजन के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रयोजन के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है। पुत्रों की आकांक्षा
पूर्ति के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए (पिता को) पुत्र प्रिय होते हैं। धन के प्रयोजन पूर्ति
के लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए (व्यक्ति को) धन प्रिय होता है। पशुओं के प्रयोजन
के निमित्त नहीं, वरन् अपने प्रयोजन के लिए पशु प्रिय होते हैं। ज्ञान या ब्राह्मण के प्रयोजन के लिए नहीं,
वरन् अपने प्रयोजन के लिए ज्ञान या ब्राह्मण प्रिय होता है। शक्ति अथवा क्षत्रिय की आकांक्षा के लिए नहीं,
वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए शक्ति या क्षत्रिय प्रिय होते हैं। लोकों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन्
अपनी ही इच्छा पूर्ति के लिए लोक प्रिय होते हैं। देवों के प्रयोजन के लिए देव प्रिय नहीं होते अपने
(आत्मीयता) प्रयोजन के लिए देव प्रिय होते हैं। वेदों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन् निज के प्रयोजन के
लिए वेद प्रिय होते हैं। प्राणियों के हित के लिए नहीं, वरन् अपने हित के लिए प्राणी प्रिय होते हैं। सभी
के हित के निमित्त नहीं, वरन् अपने हित के निमित्त सब प्रिय होते हैं। इसलिए हे मैत्रेयी ! यह आत्मा ही
दर्शन करने योग्य, श्रवण करने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन (अनुभव) करने योग्य है। इस
आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है ॥ ६ ॥
ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं
परादुर्योऽन्यात्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद वेदास्तं
परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान्वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यात्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं
परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदꣲ
सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
जो ब्राह्मण या ज्ञान को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में जानने वाला होता है, उसे ब्राह्मण या ज्ञान
परित्यक्त कर देता है। क्षत्रिय या बल को आत्मा से भिन्न किसी वस्तु में देखने वाले को बल या क्षत्रिय
परित्यक्त कर देता है। लोकों को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को लोक त्याग देते हैं।
देवताओं को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को देवता छोड़ देते हैं। वेदों को आत्मा के
अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ११ ३२५
अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को वेद परित्यक्त कर देते हैं। समस्त प्राणियों को आत्मा के अतिरिक्त
किसी अन्य में देखने वाले को समस्त प्राणी त्याग देते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण (ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति),
लोक, देवता, वेद और समस्त प्राणी ये सभी आत्मा ही हैं, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं ॥ ७ ॥
[ आत्मा से भिन्न देखने पर ज्ञान, बल, लोक, देव, वेद आदि का वास्तविक लाभ मिलना बन्द हो जाता
है। उनका कलेवर भर बना रहे, तो कुछ लाभ नहीं होता।]
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेर्ग्रहणेन दुन्दुभ्या-
घातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि के बाहर निकलते हुए शब्दों को ग्रहण कर सकने (रोक सकने) में
कोई दूसरा समर्थ नहीं है, उन (शब्दों) को केवल स्वयं दुन्दुभि अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है (उसी प्रकार आत्मा को ग्रहण करने में आत्मा ही समर्थ है अथवा आत्मा के संचालक प्राण द्वारा ही
ग्रहण किया जा सकता है) ॥ ८ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन
शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
जिस प्रकार बजाये जाते हुए शङ्ख के शब्दों को केवल वह शङ्ख अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर
सकता है, अन्य कोई ग्रहण करने में समर्थ नहीं है (उसी प्रकार आत्मा अथवा संचालक द्वारा ही आत्मा
को ग्रहण किया जा सकता है।) ॥ ९ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन
वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥
जैसे बजायी जाती हुई वीणा के शब्दों को स्वयं वह वीणा अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है, अन्य कोई नहीं (उसी प्रकार आत्मा को आत्मा द्वारा अथवा उसके संचालक द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है) ॥
स यथार्द्राग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य
निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः
श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टः हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च
लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥
जिस प्रकार चारों ओर से आधान किए हुए गीले ईंधन से उत्पन्न अग्नि से धूम्र निकलता है, उसी
प्रकार हे मैत्रेयी ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद्, सूत्र, श्लोक, व्याख्यान,
अनुव्याख्यान, इष्ट (यज्ञ), हुत (यज्ञ किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ),
इहलोक, परलोक और समस्त प्राणी उस महान् सत्ता के निःश्वास ही हैं ॥ ११ ॥
स यथा सर्वासामपाꣳ समुद्र एकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ स्पर्शानां त्वगेकायनमेवꣳ सर्वेषां
गन्धानां नासिके एकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ रसानां जिह्वैकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ रूपाणां
चक्षुरेकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ शब्दानाꣳ श्रोत्रमेकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ संकल्पानां मन
३२६ बृहदारण्यकोपनिषद्
एकायनमेवँ सर्वासां विद्यानाँ हृदयमेकायनमेवँ सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेवँ
सर्वेषामाSnapshot: न्दानामुपस्थ एकायनमेवँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवँ सर्वेषामध्वनां
पादावेकायनमेवँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम्॥ १२॥
जिस प्रकार समस्त जलों का आश्रय स्थल एक मात्र समुद्र है, समस्त स्पर्शों का अयन त्वचा है, समस्त गन्धों
का आश्रय नासिका है, समस्त रसों का आश्रय रसना (जिह्व) है, समस्त रूपों का आश्रय चक्षु है, समस्त शब्दों का
आश्रय श्रोत्र, समस्त संकल्पों का आश्रय मन, समस्त विद्याओं का आश्रय हृदय, समस्त कर्मों का आश्रय हस्त,
समस्त आनन्दों का आश्रय उपस्थ, समस्त विसर्गों (विसर्जनों) का आश्रय पायु (गुदा), समस्त मार्गों का आश्रय
चरण है, उसी प्रकार समस्त ज्ञान (वेदों) का एक ही आश्रय वाक्शक्ति (वाणी) है॥१२॥
स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्माऽनन्त-
रोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य
संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा-जिस प्रकार लवण (नमक) की डली बाहर और भीतर से रहित सम्पूर्ण रूप
से रसघन ही है, उसी प्रकार हे मैत्रेयी ! यह आत्मा बाह्याभ्यन्तर भेदों से शून्य प्रज्ञान घन ही है। यह
विज्ञानघन आत्मा समस्त भूतों से ऊँचा उठकर उन्हीं में विलीन होकर नष्ट हो जाता है। मृत्यु के उपरान्त इस
तत्त्व का नाम शेष नहीं रहता (संज्ञाविहीन हो जाता है, क्योंकि वह देहेन्द्रिय भाव से मुक्त हो जाता है) ॥१३
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मोहान्तमापीपिपन्न वा अहमिमं विजानामीति स
होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १४॥
मैत्रेयी ने कहा- हे भगवन्! यहीं आपने मुझे मोह में डाल दिया है। मैं इस (उपर्युक्त) तथ्य को विशेष
रूप से नहीं समझ सकती। याज्ञवल्क्य बोले- हे मैत्रेयी? मैं मोह में डालने के लिए यह बात नहीं कह
रहा हूँ। यह आत्मा निश्चित रूप से अमर्त्य (अविनाशी) है और उच्छेद (नष्ट होने के) धर्म वाली नहीं है॥
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरँ
रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरँ
स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं
जिघ्रेत्तत्केन कँ रसयेत्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कँ शृणुयात्तत्केन कं मन्वीत तत्केन
कँस्पृशेत्तत्केन कं विजानीयाद्येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्स एष नेति
नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न
रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति
होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १५ ॥
जहाँ (अज्ञान जनित स्थिति में) द्वैतावस्था में कोई अन्य किसी अन्य को देखता, सूँघता, रसास्वादन
करता, सुनता, कहता, मनन करता, स्पर्श करता और जानता है; किन्तु जब इसके लिए सभी कुछ आत्मा
ही हो गया है, तब (वहाँ) किसके द्वारा किसे देखे, किसके माध्यम से किसे सुने, किसके द्वारा किसका
अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७
अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७
रसास्वादन करे, किसके माध्यम से किसे कहे, किसके द्वारा किसका मनन करे, किससे किसका स्पर्श
करे, किससे किसे जाने ? हे मैत्रेयी ? जिसके द्वारा सभी को जाना जाता है, उसे किसके द्वारा जाने ? वह
आत्मा अग्राह्य है, जिसके विषय में 'नेति-नेति' ऐसा कहा गया है। उसका कभी नाश नहीं होता- वह
अशीर्य (नष्ट न होने वाला) है, वह किसी से आसक्त नहीं होता- वह असङ्ग है, वह कभी बन्धन में नहीं
बँधता- वह अबद्ध है। हे मैत्रेयी ! सर्वज्ञाता को किसके द्वारा जाना जाए ? अरी मैत्रेयी ! अमृतत्व की प्राप्ति
के लिए इतना ज्ञान (शिक्षा) बहुत है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य (परिव्रज्या हेतु) चले गये ॥ १५ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः (पौतिमाष्यात्) पौतिमाष्यो गौपवनाद्वौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो
गौपवनाद्वौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः
कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो
गौतमाद्गौतमः सैतवात्सैतवः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद्गार्ग्यायण उद्दालकायं-
नादुद्दालकायनो जाबालायनज्जाबालायनो माध्यन्दिनायनान्माध्य-
न्दिनायनः सौकरायणात्सौकरायणः काषायणा-त्काषायणः सायकायनात्सायकायनः
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृतकौशिकाद्धृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पा-
राशर्यायणःपाराशर्यात्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरा-
यणस्त्रैवणेस्त्रैवणिरापजङ्गनेरापजङ्घनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो
माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्य शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्या-
त्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डि-
न्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्धत्सनपाद्वाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः
सौभरोऽयस्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वा-
ष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङाथर्वणो दैवादथर्वांदैवो मृत्योः
प्राध्वंसनान्मृत्युःप्राध्वंसनःप्रध्वंसनात्प्रध्वंसन एकऋषेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्ति-
व्यंष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो
ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
अब (याज्ञवल्कीय काण्ड का) वंश वर्णन किया जाता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने
पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने
शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से (ज्ञानार्जन किया), गौतम ने आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य
ने गार्ग्य से, गर्गवंशी ने गर्गवंशी से, गर्गवंशी ने गौतम से, गौतम ने सैतव से, सैतव ने पाराशर्यायण
(पराशर पुत्र) से, पाराशर्यायण ने गार्ग्य पुत्र से, गार्ग्य पुत्र ने उद्दालकायन से, उद्दालकायन ने जाबालायन
से, जाबालायन ने माध्यन्दिनायन से, माध्यन्दिनायन ने सौकरायण से, सौकरायण ने काषायण से, काषायण
ने सायकायन से, सायकायन ने कौशिकायनि से (ज्ञानार्जन किया); कौशिकायनि ने घृतकौशिक से,