१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ५ ३०५
अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ५ ३०५
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्कुर्वाष्ण॑श्चक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य
चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति
तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४॥
याज्ञवल्क्य ने पुनः राजा जनक से कहा- आप किसी आचार्य द्वारा प्राप्त किये गये ज्ञान से हमें भी
अवगत कराएँ। जनक ने कहा- मुझसे बर्कु वार्ष्णि (कृष्ण पुत्र) ने कहा कि चक्षु ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य
बोले- माता-पिता और आचार्य से शिक्षित हुए के समान ही उन वार्ष्णि ने चक्षु को ब्रह्म कहा है, क्योंकि
चक्षु के बिना कुछ देख सकना असम्भव है; किन्तु क्या उन्होंने आपको चक्षु के आयतन और आश्रय
(प्रतिष्ठा) के विषय में भी कुछ बताया है? जनक ने कहा कि इसके विषय में तो उन्होंने कुछ नहीं बताया।
यह तो एक पाद वाला अथवा अपूर्ण शिक्षण हुआ। राजा जनक ने कहा-तो आप ही इस संदर्भ में हमें बताएँ।
याज्ञवल्क्य ने कहा- चक्षु का आयतन (शरीर) चक्षु ही है तथा आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा है। चक्षु को सत्य
मानकर उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- सत्यता किसे कहते हैं? ऋषि ने कहा- हे राजन् ! चक्षु ही
स्वयं सत्यता है; क्योंकि चक्षु से (दर्शन करने वाले से) जब पूछा जाता है कि क्या आपने (अमुक दृश्य)
देखा है ? तब वह उत्तर देता है- हाँ मैंने देखा है, तो वह सत्य ही होता है। हे सम्राट् ! चक्षु ही परब्रह्म है, जो
ऐसा जानता है, चक्षु (स्थूल-सूक्ष्म दृष्टि) उसका कभी परित्याग नहीं करते और समस्त प्राणी भी उसके
अनुगत रहते हैं। वह देव बनकर देवलोक में निवास करता है। तब विदेहराज जनक ने कहा- मैं आपको
हाथी के तुल्य हृष्ट-पुष्ट बैल प्रदान करने वाली एक हजार गौएँ प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे
पिताश्री की मान्यता थी कि पूर्ण ज्ञान दिये बिना शिष्य से दक्षिणा ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥ ४ ॥
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति
यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि
किं स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै
नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता
याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद्वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या
अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्रः श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनः श्रोत्रं
जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते
हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत
नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥
३०६ बृहदारण्यकोपनिषद्
ऋषि याज्ञवल्क्य, महाराज जनक से बोले- किसी भी आचार्य ने (ब्रह्म के विषय में) आपसे जो कुछ
भी कहा हो वह आप हमें बताने का कष्ट करें। जनक बोले- भारद्वाज गोत्रीय गर्दभी (विपीत) ने मुझे
बताया था कि श्रोत्र ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य ने कहा- जिस प्रकार कोई माता-पिता और गुरु द्वारा प्रशिक्षित
होकर कहता है, उसी प्रकार गर्दभी विपीत ने भी श्रोत्र ही ब्रह्म है, ऐसा कह दिया है, क्योंकि श्रोत्र के बिना
सुन सकना संभव नहीं है। क्या उन (गर्दभी विपीत) ने उस श्रोत्र के शरीर और प्रतिष्ठा (आश्रय) के
विषय में भी कुछ बताया है ? जनक ने कहा- नहीं। याज्ञवल्क्य बोले- यह ज्ञान एक पद वाला अर्थात्
अधूरा है। राजा ने कहा- तो फिर आप ही उसके विषय में मुझे बताएँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- श्रोत्र ही, श्रोत्र
की देह है और आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा अर्थात् आश्रय है। इस श्रोत्र की उपासना इसे अनन्तरूप मानकर
करनी चाहिए। जनक ने पूछा- अनन्तता क्या है। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि दिशाएँ ही अनन्त हैं, क्योंकि
किसी भी दिशा में गमन करने पर उसका अन्त नहीं मिलता। हे सम्राट् ! दिशाओं को ही श्रोत्र मानना
चाहिए और श्रोत्र ही ब्रह्म है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता हुआ व्यवहार करता है, श्रोत्र उसका कभी
परित्याग नहीं करते। सभी प्राणी उसका अनुसरण करते हैं और वह (ज्ञानी) देवता बनकर देवलोक में
वास करता है। जनक बोले- हे ऋषिवर! मैं हाथी जैसे हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करने वाली सहस्र गौएँ आपको
प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य जी ने कहा- मेरे पिताजी ऐसा मानते थे कि शिष्य को पूर्ण ज्ञान दिये बिना
दक्षिणा का धन ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥ ५ ॥
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति
यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किँ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता
याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः
पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति
देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभ सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ६ ॥
याज्ञवल्क्य पुनः बोले- हे जनक ! आपको किसी आचार्य ने ब्रह्म सम्बन्धी जो भी ज्ञान दिया हो, वह
आप मुझसे कहें। विदेहराज जनक बोले- सत्यकाम जाबाल ने मुझसे कहा था कि मन ही ब्रह्म है।
याज्ञवल्क्य बोले कि यह तो उन्होंने माता-पिता और गुरु द्वारा प्रशिक्षित की तरह कह दिया, क्योंकि मन
के बिना कुछ भी करना असम्भव है। क्या उन्होंने मन के आश्रय और प्रतिष्ठा के विषय में भी वर्णन किया
है ? जनक बोले- नहीं। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे राजन् ! उन्होंने यह तो अपूर्ण ज्ञान ही दिया है। जनक ने
कहा- तो फिर आप ही उसके विषय में पूर्णरूपेण बताएँ। याज्ञवल्क्य बोले- मन का शरीर मन ही है और
आकाश उसका आश्रय है। मन को आनन्द मानकर उसकी उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- कि
यह आनन्दत्व क्या है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- राजन् ! मन ही आनन्द है। मन से ही स्त्री की कामना की