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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 385 of 505

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Page 385

प्रपाठक २ मन्त्र ६ ३८५
हे राजन्! जिस (अविनाशी ब्रह्मविद्या) का सभी उपनिषदें एक स्वर से उपदेश करती हैं, उस
ब्रह्मविद्या के ज्ञान को भगवान् मैत्रेय ने मुझे बताया है, वही श्रेष्ठ ज्ञान मैं तुम्हें बतलाता हूँ। साधना द्वारा
जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे तेजस्वी एवं ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने वाले मुनि वालखिल्य के
नाम से जाने जाते हैं। ऐसा ही एक बार उन श्रेष्ठ मुनि ने ब्रह्मा जी से प्रश्न किया- हे ब्रह्मन् ! यह शरीर गाड़ी
की भाँति अचेतन है, तो फिर ऐसा कौन सा अतीन्द्रिय तत्त्व है, किस श्रेष्ठ तत्त्व की ऐसी महिमा है ? जिससे
कि यह शरीर चैतन्य की भाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इस शरीर को जो प्रेरित करता है, उसे वाणी से भी
परे (श्रेष्ठ) बताया गया है। हे भगवन् ! उसी (श्रेष्ठ तत्त्व) को हमारे समक्ष बताने की कृपा करें ॥ ३ ॥
यो ह खलु वाचोपरिस्थः श्रूयते स वा एष शुद्धः पूतः शून्यः शान्तः प्राणोऽनी-
शात्माऽनन्तोऽक्षय्यः स्थिरः शाश्वतोऽजः स्वतन्त्रः स्वे महिम्नि तिष्ठत्यनेनेदं शरीरं
चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयिता चैषोऽस्येति ते होचुर्भगवन्कथमनेनेदृशेनानिच्छेनैतद्विधमिदं
चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयिता चैषोऽस्येति कथमिति तान्होवाच ॥ ४ ॥
(ब्रह्मा जी ने मुनि से कहा) उस श्रेष्ठ तत्त्व को शुद्ध, पवित्र, शून्य, शान्त, जीवन प्रदान करने वाला,
अनन्त, अविनाशी, शाश्वत, सनातन, स्थिर, अजन्मा एवं स्वतन्त्र रूप से निवास करने वाला आत्मा कहा
जाता है। उसी की ही यह महान् महिमा है। उस आत्मा से ही इस अचेतन शरीर को चेतन की भाँति प्रतिष्ठा
प्राप्त होती है। वही चेतन आत्म तत्त्व प्रेरणा प्रदान करने वाला है। यह सुनने के बाद महामुनि वालखिल्य
जी ने पुनः प्रश्न किया- हे भगवन् ! यह आत्मा अनिच्छित होते हुए भी चैतन्यरूप से इस शरीर में कैसे स्थिर
है ? इस शरीर को यह प्रेरित क्यों करता है ? तथा इस आत्मा की यह महिमा किस प्रकार की है ? ॥ ४ ॥
स वा एष सूक्ष्मोऽग्राह्योऽदृश्यः पुरुषसंज्ञको बुद्धिपूर्वमिहैवावर्ततेऽशेन सुषुप्तस्यैव
बुद्धिपूर्वं निबोधयत्यथ यो ह खलु वावैतस्यांशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपूरुषं क्षेत्रज्ञः
संकल्पाध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिर्विश्वाक्षस्तेन चेतनेनेदं शरीरं चेतनवत्प्रतिष्ठापितं
प्रचोदयिता चैषोऽस्येति ते होचुर्भगवन्नीदृशस्य कथमंशेन वर्तनमिति तान्होवाच ॥ ५ ॥
ब्रह्मा जी ने कहा - (हे मुने !) यह आत्मा सूक्ष्म, अग्राह्य और अदृश्य रूप है, इस कारण
इसे 'पुरुष' नाम की संज्ञा द्वारा जाना जाता है। यह आत्मा अपने एक अंश से इस शरीर में अपने
प्रयोजन के अभाव में भी बुद्धिपूर्वक सतत आता रहता है। सोते हुए को वह युक्तिपूर्वक बोध
कराते हुए चैतन्य रूप से सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित करता है। वही प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप
में प्रतिष्ठित है; वही प्रकाश, संकल्प, प्रयास, अहंकार, लिंग (पुरुष-स्त्री आदि) और प्रजापति के
रूप में समस्त विश्व को देखने वाला है। उसी की चेतना से शरीर चैतन्ययुक्त है। वही इस शरीर को
क्रियान्वयन हेतु प्रेरित करता है। वालखिल्य ने पुनः प्रश्न किया - हे भगवन् ! यह आत्मा अखण्ड
होने पर भी किस तरह अंश रूप में यहाँ स्थिर है ? ॥ ५ ॥
प्रजापतिर्वा एषोऽग्रेऽतिष्ठत्स नारमतैकः स आत्मानमभिध्यायद्बह्वीः प्रजा असृजत्ता
अस्यैवात्मप्रबुद्धा अप्राणा स्थाणुरिव तिष्ठमाना अपश्यत्स नारमत सोऽमन्यतैतासां
प्रतिबोधनायाभ्यन्तरं प्राविशानीत्यथ स वायुमिवात्मानं कृत्वाभ्यन्तरं प्राविशतस एको
नाविशतस पञ्चधात्मानं प्रविभज्योच्यते यः प्राणोऽपानः समान उदानो व्यान इति ॥ ६ ॥